भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी, यह नाम कब, कैसे ओर क्यों रखे गए थे

भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी, यह नाम कब, कैसे ओर क्यों रखे गए थे

भारत केवल एक देश नहीं है माना जाता हैं। बल्कि यह एक ऐसी सभ्यता है जिसका इतिहास हज़ारों साल पुराना है। इसी वजह से समय-समय पर इसे अलग-अलग सभ्यताओं ने, अलग-अलग भाषाओं में, अलग-अलग नामों से पुकारा है।

कभी वैदिक ऋषियों ने इसे आर्यावर्त कहा तो कभी फारसी और अरबी यात्रियों ने इसे हिंदुस्तान का नाम दिया। कभी यूनानी इतिहासकारों ने इसे इंडिका के नाम से पहचाना तो कभी चीनी यात्रियों ने इसे तियानझू कहकर बुलाया।

इस लेख में हम प्राचीन भारत से लेकर वर्तमान भारत तक के 30 ऐसे नामों की गहराई से पड़ताल करेंगे, जिनमें हर नाम कब पड़ा, किस कारण से पड़ा, किस सदी या कालखंड से जुड़ा है, और आखिर में उसका नाम कब और क्यों बदला।

भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी में प्राचीन एवं वैदिक नाम

भारत के सबसे पुराने नाम वैदिक ग्रंथों, पुराणों और इतिहास-ग्रंथों में मिलते हैं। इन नामों की जड़ें हज़ारों साल पुरानी हैं, इसीलिए इन्हें समझने के लिए वैदिक कालखंड और पौराणिक परंपरा दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है।

भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी

1. भारत

भारत नाम की कहानी सीधे महाभारत और विष्णु पुराण से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर इस भूमि का नाम भारतवर्ष पड़ा, वहीं एक दूसरी परंपरा के अनुसार यह नाम ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती से भी जुड़ता है।

इसी तरह रामायण काल में भगवान राम के भाई भरत का नाम भी इस परंपरा से जोड़ा जाता है, यही वजह है कि इतिहासकार तीन अलग-अलग भरत राजाओं का उल्लेख करते हैं। यह नामकरण वैदिक और उत्तर-वैदिक काल (लगभग 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व) के आसपास का माना जाता है,

हालांकि इसका प्रयोग महाकाव्य काल में सबसे ज़्यादा मज़बूत हुआ। खास बात यह है कि आज भी भारत का संविधान अनुच्छेद 1 में “इंडिया, जो भारत है” कहकर इसी प्राचीन नाम को आधिकारिक मान्यता देता है।

नाम कब पड़ा:- वैदिक एवं महाकाव्य कालखंड में, लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास।

मुख्य कारण:- राजा भरत के नाम पर, जिनका उल्लेख विष्णु पुराण और महाभारत दोनों में मिलता है।

नाम बदलने का कारण:- नाम कभी पूरी तरह बदला नहीं, बल्कि यह आज भी भारत गणराज्य का आधिकारिक नाम बना हुआ है।

2. भारतवर्ष

भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी

भारतवर्ष शब्द पौराणिक भूगोल की उस अवधारणा से आता है, जिसमें पूरी पृथ्वी को सात या नौ खंडों (वर्षों) में बांटा गया है, और भारतवर्ष इन्हीं में से एक माना गया है। विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण में इसकी सीमाएं स्पष्ट रूप से बताई गई हैं,

जिसमें कहा गया है कि उत्तर में हिमालय और दक्षिण में समुद्र तक का क्षेत्र भारतवर्ष कहलाता है। यह नाम पुराणों की रचना के कालखंड, यानी लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच, अधिक प्रचलन में आया, हालांकि इसकी मूल अवधारणा वैदिक काल से जुड़ी हुई है।

भारतवर्ष शब्द का प्रयोग खासतौर पर धार्मिक और खगोलीय ग्रंथों में इसलिए किया गया, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह भूभाग जम्बूद्वीप के नौ वर्षों में सबसे पवित्र और कर्मभूमि है।

नाम कब पड़ा:- पौराणिक कालखंड, लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच रचित पुराणों में।

मुख्य कारण:- जम्बूद्वीप के नौ वर्षों में से एक वर्ष के रूप में, राजा भरत की भूमि को भारतवर्ष कहा गया।

नाम बदलने का कारण:- धीरे-धीरे इसे संक्षेप में “भारत” कहा जाने लगा, जो आज भी प्रचलित है।

3. भारतखण्ड

भारतखण्ड शब्द भारतवर्ष से मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें “खण्ड” शब्द जुड़ने से यह और अधिक भौगोलिक और क्षेत्रीय अर्थ लेकर आता है। प्राचीन वैदिक और पौराणिक साहित्य में खण्ड शब्द का प्रयोग किसी बड़े भूभाग के एक निश्चित हिस्से के लिए किया जाता था।

इसीलिए भारतखण्ड का मतलब हुआ भारतवर्ष का वह विशिष्ट भाग जहां आर्य सभ्यता का विस्तार हुआ। इतिहासकारों के अनुसार यह नाम वैदिक साहित्य में भूगोल की व्याख्या करते समय इस्तेमाल हुआ।

जब ऋषियों को अपने यज्ञ-स्थलों और तीर्थों की सीमाएं तय करनी होती थीं। इसका कालखंड भी भारतवर्ष जैसा ही, यानी वैदिक उत्तर काल से लेकर पौराणिक काल तक फैला हुआ माना जाता है।

नाम कब पड़ा:- वैदिक उत्तर काल एवं पौराणिक कालखंड में।

मुख्य कारण:- भारतवर्ष के एक विशिष्ट, सुव्यवस्थित भौगोलिक हिस्से को दर्शाने के लिए।

नाम बदलने का कारण:- समय के साथ भौगोलिक शब्दावली सरल होती गई, इसलिए यह नाम कम प्रचलित होकर भारतवर्ष और भारत में सिमट गया।

4. आर्यावर्त

भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी

आर्यावर्त नाम सीधे तौर पर आर्य सभ्यता से जुड़ा है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “आर्यों का निवास स्थान”। मनुस्मृति में इसकी सीमाएं बहुत स्पष्ट रूप से दी गई हैं, जिसके अनुसार हिमालय और विंध्य पर्वत के बीच का क्षेत्र, और पूर्वी सागर से पश्चिमी सागर तक फैला भूभाग आर्यावर्त कहलाता था।

यह नाम वैदिक कालखंड, यानी लगभग 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के बीच, सबसे ज़्यादा प्रचलन में रहा, क्योंकि इसी दौरान आर्य सभ्यता उत्तर भारत में फैल रही थी। धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से आर्यावर्त को वह पवित्र भूमि माना जाता था, जहां वैदिक कर्मकांड और यज्ञ परंपराएं सबसे शुद्ध रूप में पाली जाती थीं।

नाम कब पड़ा:- वैदिक कालखंड, लगभग 1500 से 500 ईसा पूर्व के बीच।

मुख्य कारण:- आर्य जाति के मूल निवास और वैदिक संस्कृति के केंद्र होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- आर्य शब्द का दायरा सिमटने और भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के साथ यह नाम धीरे-धीरे भारतवर्ष में समा गया।

5. जम्बूद्वीप

जम्बूद्वीप पौराणिक भूगोल की सबसे बड़ी अवधारणाओं में से एक है, जिसमें पूरी पृथ्वी को सात द्वीपों (जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप आदि) में बांटा गया है, और भारतवर्ष इसी जम्बूद्वीप के नौ वर्षों में से एक है।

“जम्बू” शब्द जामुन के वृक्ष से आया है, और कई इतिहासकारों का मानना है कि भारत में जामुन के पेड़ों की बहुलता के कारण ही इसे यह नाम मिला। यह अवधारणा पुराणों, खासकर विष्णु पुराण और भागवत पुराण, में विस्तार से मिलती है।

जिनकी रचना लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच मानी जाती है। जैन धर्म के ग्रंथों में भी जम्बूद्वीप का उल्लेख भूगोल और ब्रह्मांड विज्ञान की व्याख्या करते समय बार-बार आता है।

नाम कब पड़ा:- पौराणिक एवं जैन कालखंड में, लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- जामुन के वृक्षों की बहुलता और पौराणिक भूगोल की सात द्वीपों वाली अवधारणा के कारण।

नाम बदलने का कारण:- धीरे-धीरे भौगोलिक ज्ञान बढ़ने के साथ इसका प्रयोग सीमित होकर धार्मिक साहित्य तक रह गया।

6. अजनाभवर्ष

अजनाभवर्ष भारतवर्ष से भी पुराना नाम माना जाता है, जो विष्णु पुराण के अनुसार राजा नाभि के नाम पर पड़ा था। कथा के अनुसार राजा नाभि ऋषभदेव के पिता थे, और उन्हीं के शासनकाल में इस भूभाग को अजनाभवर्ष कहा जाता था।

बाद में जब नाभि के पौत्र भरत ने राजगद्दी संभाली, तब इसी भूमि का नाम बदलकर भारतवर्ष कर दिया गया। यह घटनाक्रम पौराणिक कालखंड का है, जिसे इतिहासकार सांकेतिक रूप से महाकाव्य-पूर्व काल से जोड़ते हैं। जैन परंपरा में भी ऋषभदेव को प्रथम तीर्थंकर माना गया है, इसीलिए अजनाभवर्ष नाम जैन और वैदिक, दोनों परंपराओं में समान महत्व रखता है।

नाम कब पड़ा:- पौराणिक कालखंड, राजा नाभि के शासनकाल के दौरान।

मुख्य कारण:- राजा नाभि के नाम पर, जो ऋषभदेव के पिता और भरत के दादा थे।

नाम बदलने का कारण:- भरत के राजा बनने के बाद इस भूमि का नाम बदलकर भारतवर्ष कर दिया गया।

7. नाभिवर्ष

नाभिवर्ष नाम भी अजनाभवर्ष जैसा ही है, और कई ग्रंथों में इन दोनों नामों का प्रयोग एक-दूसरे के पर्याय के रूप में हुआ है। पुराणों में बताया गया है कि राजा नाभि का शासन बहुत ही न्यायपूर्ण और समृद्ध था, इसीलिए उनकी प्रजा ने इस भूमि को उन्हीं के नाम पर नाभिवर्ष कहना शुरू किया।

यह नाम भी पौराणिक कालखंड से जुड़ा है, और इसका उल्लेख खासतौर पर उन ग्रंथों में मिलता है जो राजाओं की वंशावली का वर्णन करते हैं। नाभिवर्ष और अजनाभवर्ष, दोनों ही नामों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में किसी भूभाग का नाम अक्सर वहां के शासक के नाम पर रखने की परंपरा प्रचलित थी।

नाम कब पड़ा:- पौराणिक कालखंड, राजा नाभि के शासनकाल में।

मुख्य कारण:- राजा नाभि के न्यायपूर्ण शासन और उनकी वंश-परंपरा के सम्मान में।

नाम बदलने का कारण:- आगे चलकर भरत के नाम पर भारतवर्ष नाम अधिक प्रचलित हो गया।

8. हैमवतवर्ष

हैमवतवर्ष शब्द “हिम” यानी बर्फ से बना है, और इसका अर्थ है हिमालय से जुड़ा हुआ क्षेत्र। पौराणिक भूगोल में यह उस भूभाग को कहा जाता था जो हिमालय पर्वत श्रृंखला के दक्षिण में स्थित था, इसलिए कुछ ग्रंथों में इसे हिमवर्ष भी कहा गया है।

यह नाम पुराणों की रचना के दौरान, यानी लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच प्रचलन में रहा, और इसका उद्देश्य भारतवर्ष की उत्तरी सीमा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना था। भौगोलिक दृष्टि से यह नाम आज के हिमालयी क्षेत्रों, जैसे कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के आसपास के प्रदेशों से भी जोड़ा जाता है।

नाम कब पड़ा:- पौराणिक कालखंड, हिमालय से जुड़े भूगोल का वर्णन करते समय।

मुख्य कारण:- हिमालय पर्वत की निकटता और बर्फीले भूभाग की विशेषता के कारण।

नाम बदलने का कारण:- भौगोलिक सीमाओं की स्पष्टता बढ़ने के साथ यह नाम धीरे-धीरे भारतवर्ष के अंतर्गत समा गया।

9. सप्तसिंधु

भारत देश के 30 अलग अलग प्राचीन नामों की जानकारी

सप्तसिंधु ऋग्वेद में वर्णित एक बेहद महत्वपूर्ण नाम है, जिसका अर्थ है सात नदियों की भूमि। ऋग्वेद में सिंधु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), असिक्नी (चिनाब), परुष्णी (रावी), विपाशा (व्यास) और शुतुद्रि (सतलज) नदियों का उल्लेख मिलता है, और यही सातों नदियां मिलकर सप्तसिंधु क्षेत्र बनाती थीं।

यह नाम ऋग्वैदिक काल, यानी लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास, सबसे अधिक प्रचलन में रहा, क्योंकि इसी दौरान वैदिक ऋषि इन नदियों के किनारे बसकर अपने यज्ञ और सामाजिक जीवन का संचालन करते थे। आज का पंजाब, हरियाणा और सिंध का इलाका इसी सप्तसिंधु क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है।

नाम कब पड़ा:- ऋग्वैदिक कालखंड, लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास।

मुख्य कारण:- सात प्रमुख नदियों के संगम और वैदिक सभ्यता के केंद्र होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- सरस्वती नदी सूखने और सभ्यता के पूर्व की ओर विस्तार के साथ यह नाम कम प्रचलित हुआ।

10. ब्रह्मावर्त

ब्रह्मावर्त शब्द मनुस्मृति में वर्णित है, जिसमें इसे सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच का पवित्र क्षेत्र बताया गया है। मनु के अनुसार यह वह भूमि थी, जहां वैदिक देवताओं ने स्वयं यज्ञ किया था, इसीलिए इसे सबसे पवित्र और आदर्श भूभाग माना गया।

यह नाम धर्मशास्त्रीय कालखंड, यानी लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच रचित मनुस्मृति में स्पष्ट रूप से मिलता है, हालांकि इसकी अवधारणा वैदिक काल से जुड़ी हुई है। आज के हरियाणा और उत्तरी राजस्थान का कुछ भाग इसी ब्रह्मावर्त क्षेत्र में आता था, और इसे वैदिक संस्कृति और आचार-विचार का केंद्र-बिंदु माना जाता था।

नाम कब पड़ा:- धर्मशास्त्रीय कालखंड, मनुस्मृति की रचना के समय।

मुख्य कारण:- सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच स्थित पवित्र और आदर्श भूमि होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- सरस्वती नदी के सूखने के साथ यह क्षेत्र और नाम, दोनों धीरे-धीरे प्रभाव खोते गए।

प्राचीन भारत के भौगोलिक एवं क्षेत्रीय नामों की जानकारी

इस श्रेणी में वे नाम आते हैं जो भारत के किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र को दर्शाते थे, लेकिन समय के साथ इनका दायरा या तो बड़ा हो गया या फिर सीमित रह गया।

11. मध्यदेश

मध्यदेश का शाब्दिक अर्थ है “मध्य का देश”, और यह गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र, यानी आज के उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों के लिए प्रयोग होता था।

बौद्ध और जैन साहित्य में इसे सबसे उन्नत और सभ्य क्षेत्र माना गया है, क्योंकि यहीं से बुद्ध और महावीर, दोनों का धर्म-प्रचार शुरू हुआ था। यह नाम लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से प्रचलन में आया, जब मगध, कोसल और वत्स जैसे महाजनपद इसी क्षेत्र में फल-फूल रहे थे।

संस्कृत व्याकरण ग्रंथों में भी मध्यदेश की भाषा को सबसे शुद्ध संस्कृत माना गया है, इसीलिए इसका सांस्कृतिक महत्व बाकी नामों से भी ज़्यादा रहा।

नाम कब पड़ा:- महाजनपद कालखंड, लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- गंगा-यमुना दोआब में स्थित सबसे सभ्य और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- मौर्य और गुप्त साम्राज्य के विस्तार के साथ यह नाम राजनीतिक शब्दावली से हटकर सांस्कृतिक संदर्भ तक सीमित हो गया।

12. कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र नाम महाभारत के युद्ध से जुड़ा हुआ है, और इसका शाब्दिक अर्थ है “कुरु वंश की भूमि”। यह क्षेत्र आज के हरियाणा राज्य में स्थित है, और महाभारत काल में यहीं पर पांडवों और कौरवों के बीच अठारह दिन का युद्ध हुआ था।

कई प्राचीन ग्रंथों में उत्तर भारत के व्यापक क्षेत्र को भी कुरुक्षेत्र की सीमा में शामिल किया गया है, क्योंकि कुरु वंश का प्रभाव पूरे मध्य-उत्तर भारत तक फैला हुआ था। इसका कालखंड महाभारत युद्ध से जोड़ा जाता है, जिसे परंपरागत रूप से लगभग 3100 ईसा पूर्व माना जाता है, हालांकि आधुनिक इतिहासकार इसे लगभग 1000 ईसा पूर्व के आसपास रखते हैं।

नाम कब पड़ा:- कुरु वंश के शासनकाल में, महाभारत युद्ध से पहले और उसके दौरान।

मुख्य कारण:- कुरु वंश की राजधानी और महाभारत युद्ध के स्थल होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- महाजनपद काल में राजनीतिक शक्ति के केंद्र मगध और अन्य राज्यों की ओर स्थानांतरित हो गए, इसलिए यह नाम धार्मिक-ऐतिहासिक महत्व तक सिमट गया।

13. पंचनद

पंचनद शब्द का अर्थ है “पांच नदियों की भूमि”, और यह आज के पंजाब क्षेत्र के लिए प्रयोग होता था, जहां सतलज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम, ये पांच नदियां बहती हैं। यह नाम वैदिक और उत्तर-वैदिक कालखंड में प्रचलित था, और बाद में फारसी शासकों ने इसी अवधारणा के आधार पर इस क्षेत्र को “पंजाब” (पांच पानी) नाम दिया।

ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र सिकंदर के भारत आक्रमण (327 ईसा पूर्व) के समय भी बेहद महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि सिकंदर की सेना को इन्हीं पांच नदियों को पार करना पड़ा था।

नाम कब पड़ा:- वैदिक एवं उत्तर-वैदिक कालखंड में।

मुख्य कारण:- पांच प्रमुख नदियों के संगम क्षेत्र में बसे होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- मध्यकाल में फारसी प्रभाव के चलते यही अवधारणा “पंजाब” नाम में बदल गई।

14. सिंधु

सिंधु नाम भारत के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण नामों में से एक है, क्योंकि इसी से हिंदू, हिंद, हिंदुस्तान और इंडिया, इन सभी नामों की उत्पत्ति हुई है।

सिंधु मूल रूप से आज की सिंधु नदी और उसके आसपास के क्षेत्र, यानी सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व) से जुड़ा नाम है।

जब फारसी और यूनानी लोग इस क्षेत्र में आए, तो उन्होंने “स” का उच्चारण “ह” में बदल दिया, जिससे सिंधु से हिंदु और फिर हिंद बना। यही वजह है कि इतिहासकार सिंधु को भारत के सभी बाहरी नामों की मूल जड़ मानते हैं।

नाम कब पड़ा:- सिंधु घाटी सभ्यता कालखंड, लगभग 2600 ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- सिंधु नदी के किनारे विकसित हुई प्राचीन सभ्यता के कारण।

नाम बदलने का कारण:- फारसी उच्चारण में “स” के “ह” में बदलने से यह हिंदु, हिंद और बाद में इंडिया जैसे नामों में परिवर्तित होता गया।

15. कुमारिका खण्ड

कुमारिका खण्ड नाम भारतवर्ष के दक्षिणी हिस्से के लिए प्रयोग होता था, और इसका संबंध आज के कन्याकुमारी क्षेत्र से जोड़ा जाता है। पौराणिक भूगोल के अनुसार यह वह भूभाग था, जो समुद्र तक फैला हुआ था और जहां देवी कन्या कुमारी की पूजा प्राचीन काल से होती आई है।

यह नाम पुराणों की रचना के दौरान, यानी लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच प्रचलन में आया, और इसका उद्देश्य भारतवर्ष की दक्षिणी सीमा को परिभाषित करना था।

नाम कब पड़ा:- पौराणिक कालखंड में, दक्षिणी भारत के भूगोल का वर्णन करते समय।

मुख्य कारण:- कन्याकुमारी क्षेत्र और देवी की पूजा-परंपरा से जुड़े होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- समय के साथ यह क्षेत्रीय नाम सिमटकर सिर्फ कन्याकुमारी नगर और उसके आसपास के क्षेत्र तक रह गया।

फ़ारसी, अरबी एवं इस्लामी स्रोतों में भारत के नामों की जानकारी

फारसी और अरबी भाषाओं में भारत के नाम मूल रूप से सिंधु शब्द से ही निकले हैं, लेकिन उच्चारण और व्याकरण में बदलाव के साथ इनका रूप अलग-अलग होता गया।

16. हिंद

हिंद शब्द की उत्पत्ति सीधे संस्कृत के सिंधु शब्द से हुई है। जब प्राचीन फारसी (एकेमेनिड साम्राज्य, लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व) बोलने वाले लोग सिंधु नदी के क्षेत्र में आए, तो उन्होंने “स” ध्वनि को “ह” में बदल दिया, जिससे सिंधु से हिंदु और फिर हिंद बना।

राजा दारा प्रथम के शिलालेखों में भी “हिदुष” नाम का उल्लेख मिलता है, जो इस क्षेत्र के लिए प्रयोग किया गया प्राचीनतम विदेशी नाम है। अरबी भाषा में हिंद शब्द बाद में इतना लोकप्रिय हुआ कि कई अरब महिलाओं के नाम भी “हिंद” रखे जाने लगे, और इस्लामी विद्वानों ने भारत से जुड़े ग्रंथों के नाम में भी हिंद शब्द जोड़ना शुरू किया।

नाम कब पड़ा:- एकेमेनिड फारसी साम्राज्य के कालखंड में, लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- सिंधु शब्द के फारसी उच्चारण में बदलाव के कारण, जिसमें “स” की जगह “ह” प्रयोग होने लगा।

नाम बदलने का कारण:- समय के साथ इसमें “स्थान” शब्द जुड़ने से यह हिंदुस्तान में परिवर्तित हो गया।

17. हिंदु

हिंदु शब्द मूल रूप से एक भौगोलिक पहचान थी, न कि किसी धर्म का नाम। अरब और फारसी यात्री सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले सभी लोगों को “हिंदु” कहते थे, चाहे वे किसी भी पंथ या परंपरा को मानते हों।

यह शब्द लगभग छठी से आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच अधिक प्रचलन में आया, खासकर जब अरब व्यापारी और यात्री सिंध और गुजरात के तटीय क्षेत्रों में आने लगे। अल-बिरूनी जैसे विद्वानों ने अपनी पुस्तक “तहकीक-ए-हिंद” में इसी शब्द का प्रयोग भारतीय उपमहाद्वीप और यहां के निवासियों, दोनों के लिए किया।

नाम कब पड़ा:- लगभग छठी से आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच, अरब-फारसी संपर्क के दौरान।

मुख्य कारण:- सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले सभी निवासियों की भौगोलिक पहचान के रूप में।

नाम बदलने का कारण:- मध्यकाल में यह शब्द धीरे-धीरे धार्मिक पहचान से जुड़ गया, जिससे इसका मूल भौगोलिक अर्थ बदल गया।

18. हिंदुस्तान

हिंदुस्तान शब्द “हिंद” और फारसी प्रत्यय “स्तान” (जिसका अर्थ है स्थान या देश) को जोड़कर बना है यह नाम विशेष रूप से दिल्ली सल्तनत (1206 से 1526 ईस्वी) और मुगल काल (1526 से 1857 ईस्वी) के दौरान बहुत लोकप्रिय हुआ,

क्योंकि इन शासकों ने अपने प्रभुत्व वाले क्षेत्र, जो दिल्ली के आसपास केंद्रित था, को हिंदुस्तान कहना शुरू किया। धीरे-धीरे यह शब्द पूरे उपमहाद्वीप के लिए प्रयोग होने लगा, और आज भी उर्दू, फारसी और हिंदी भाषाओं में यह भारत गणराज्य के लिए बोलचाल का सबसे लोकप्रिय नाम बना हुआ है।

नाम कब पड़ा:- दिल्ली सल्तनत काल से, यानी लगभग तेरहवीं शताब्दी ईस्वी से।

मुख्य कारण:- हिंद और स्तान शब्दों के मेल से, जिसका अर्थ है “हिंदुओं की भूमि” या “सिंधु के पार की भूमि”।

नाम बदलने का कारण:- आधुनिक काल में संविधान लागू होने के बाद आधिकारिक नाम “भारत” और “इंडिया” रखा गया, जबकि हिंदुस्तान आज भी बोलचाल में प्रचलित है।

19. हिन्दुस्थान

हिन्दुस्थान, हिंदुस्तान का संस्कृतनिष्ठ रूप है, जिसमें फारसी “स्तान” की जगह संस्कृत जैसा “स्थान” शब्द जोड़ा गया है। यह रूप खासतौर पर उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान लोकप्रिय हुआ,

जब भारतीय विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी फारसी-अरबी प्रभाव वाले शब्दों की जगह संस्कृतनिष्ठ शब्दों को बढ़ावा देना चाहते थे। कई हिंदी कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में हिन्दुस्थान शब्द का प्रयोग करते हुए इसे “हिमालय से इंदु सरोवर (हिंद महासागर) तक फैला देश” के रूप में परिभाषित किया।

नाम कब पड़ा:- आधुनिक कालखंड, उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवादी साहित्य में।

मुख्य कारण:- फारसी प्रभाव वाले हिंदुस्तान शब्द का संस्कृतनिष्ठ रूप बनाने के प्रयास के कारण।

नाम बदलने का कारण:- संविधान में इसे आधिकारिक मान्यता नहीं मिली, इसलिए यह मुख्यतः साहित्यिक और काव्यात्मक प्रयोग तक सीमित रह गया।

20. अल-हिन्द

अल-हिन्द अरबी भाषा का शब्द है, जिसमें “अल” निश्चयवाचक उपसर्ग है, जो अंग्रेज़ी के “द” (the) जैसा काम करता है। यह नाम खासतौर पर मध्यकालीन अरब भूगोलवेत्ताओं और यात्रियों, जैसे अल-बिरूनी और इब्न बतूता, की रचनाओं में प्रमुखता से मिलता है,

जिनका कालखंड लगभग ग्यारहवीं से चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच रहा। आज भी अरब देशों और ईरान में भारत गणराज्य के लिए आधिकारिक रूप से “अल-हिन्द” शब्द प्रयोग किया जाता है, जबकि “हिंदुस्तान” शब्द पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए बोला जाता है।

नाम कब पड़ा:- मध्यकालीन अरब-इस्लामी कालखंड, लगभग ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से।

मुख्य कारण:- अरबी व्याकरण में निश्चयवाचक उपसर्ग “अल” जोड़कर हिंद शब्द को औपचारिक रूप देने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- यह नाम आज भी अरब जगत में प्रचलित है, इसलिए इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।

यूनानी एवं यूरोपीय सभ्यताओं द्वारा दिए गए भारत के नामों की जानकारी

यूनानी और बाद में यूरोपीय सभ्यताओं ने भारत को पहचानने के लिए सिंधु नदी से जुड़े शब्दों का ही सहारा लिया, लेकिन अपनी भाषा और उच्चारण के अनुसार उन्हें ढाल लिया।

21. इंडिया (India)

इंडिया नाम की जड़ें भी सिंधु शब्द में ही हैं। यूनानियों ने सिंधु नदी को “इंडोस” कहना शुरू किया, जो बाद में लैटिन भाषा में जाकर “इंडिया” बन गया। यह नाम चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से यूनानी साहित्य में प्रयोग होने लगा था,

लेकिन अंग्रेज़ी भाषा में इसका प्रयोग पुरानी अंग्रेज़ी (Old English) में नौवीं शताब्दी ईस्वी में और आधुनिक अंग्रेज़ी में सत्रहवीं शताब्दी से मिलता है।

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान यह नाम इतना प्रभावी हो गया कि स्वतंत्रता के बाद भी संविधान में इसे “भारत” के साथ आधिकारिक नाम के रूप में शामिल किया गया।

नाम कब पड़ा:- यूनानी कालखंड, लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से, और अंग्रेज़ी में नौवीं शताब्दी ईस्वी से।

मुख्य कारण:- सिंधु नदी के यूनानी उच्चारण “इंडोस” से लैटिन के रास्ते होते हुए “इंडिया” शब्द बनने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि आज भी यह भारत का आधिकारिक अंग्रेज़ी नाम बना हुआ है।

22. इंडिका (Indica)

इंडिका शब्द का सबसे पहला और सबसे प्रसिद्ध प्रयोग यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने किया था, जो लगभग 302 ईसा पूर्व सेल्यूकस साम्राज्य की ओर से चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में पाटलिपुत्र आया था।

मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक का नाम ही “इंडिका” रखा, जिसमें उसने मौर्य साम्राज्य की राजनीति, समाज और भूगोल का विस्तृत वर्णन किया।

यह पुस्तक आज मूल रूप में उपलब्ध नहीं है, लेकिन बाद के यूनानी और रोमन इतिहासकारों ने अपनी रचनाओं में इसके अंश उद्धृत किए हैं, जिससे मौर्यकालीन भारत को समझने में बहुत मदद मिलती है।

नाम कब पड़ा:- मौर्य साम्राज्य के कालखंड में, लगभग 302 ईसा पूर्व के आसपास।

मुख्य कारण:- मेगस्थनीज द्वारा भारत पर लिखी गई पुस्तक के शीर्षक के रूप में।

नाम बदलने का कारण:- यह नाम कभी देश के नाम के रूप में प्रचलित नहीं हुआ, बल्कि साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ तक सीमित रहा।

23. इंडोस (Indos)

इंडोस शब्द यूनानियों द्वारा सिंधु नदी के लिए प्रयोग किया गया मूल नाम है, जिससे आगे चलकर इंडिया और इंडस, दोनों शब्द निकले।

इतिहासकारों के अनुसार इसका प्रयोग लगभग पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से मिलता है, जब यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने अपनी रचनाओं में सिंधु नदी और उसके आसपास के क्षेत्र का वर्णन किया था।

बाद में सिकंदर के आक्रमण (327 ईसा पूर्व) के दौरान यूनानी सेना ने इसी नदी को पार किया, जिसके बाद इंडोस शब्द यूनानी और रोमन साहित्य में और भी मज़बूती से स्थापित हो गया।

नाम कब पड़ा:- प्राचीन यूनानी कालखंड, लगभग पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- सिंधु नदी के यूनानी उच्चारण के रूप में, जो फारसी “हिंदु” शब्द से प्रभावित था।

नाम बदलने का कारण:- लैटिन भाषा में जाकर यह शब्द “इंडस” और “इंडिया” जैसे रूपों में परिवर्तित हो गया।

24. इंडिया मेजर (India Major)

इंडिया मेजर नाम मध्यकालीन यूरोपीय यात्रियों और मानचित्रकारों द्वारा प्रयोग किया जाता था, ताकि भारतीय उपमहाद्वीप को दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडिया माइनर) और पूर्वी अफ्रीका (इंडिया टर्शिया) से अलग पहचाना जा सके।

यह शब्द लगभग तेरहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच, यानी मार्को पोलो जैसे यात्रियों के कालखंड में प्रचलित रहा, जब यूरोपीय व्यापारी और खोजी दल एशिया के अलग-अलग हिस्सों का मानचित्रण करने की कोशिश कर रहे थे।

इस नाम से यह भी पता चलता है कि यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं के लिए “इंडिया” शब्द केवल एक देश नहीं, बल्कि एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र का सूचक था।

नाम कब पड़ा:- मध्यकालीन यूरोपीय कालखंड, लगभग तेरहवीं शताब्दी ईस्वी से।

मुख्य कारण:- भारतीय उपमहाद्वीप को दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी अफ्रीका के क्षेत्रों से अलग पहचानने के लिए।

नाम बदलने का कारण:- आधुनिक भूगोल और राष्ट्र-राज्यों की अवधारणा स्थापित होने के साथ यह वर्गीकरण अप्रचलित हो गया।

चीनी एवं पूर्वी एशियाई स्रोतों में भारत के नामों की जानकारी

चीनी यात्रियों और बौद्ध भिक्षुओं ने भारत को समझने और यहां की शिक्षा ग्रहण करने के लिए लंबी यात्राएं कीं, और इसी दौरान उन्होंने भारत के लिए अपनी भाषा में नए नाम गढ़े।

25. तियानझू (Tianzhu)

तियानझू चीनी भाषा का वह नाम है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “स्वर्ग जैसा बांस का देश”, हालांकि वास्तव में यह शब्द प्राचीन फारसी शब्द “हिंदुक” के चीनी उच्चारण से बना है।

इस नाम का प्रयोग खासतौर पर हान राजवंश (206 ईसा पूर्व से 220 ईस्वी) के समय से मिलता है, और बाद में प्रसिद्ध बौद्ध यात्री फाह्यान (पांचवीं शताब्दी ईस्वी) और ह्वेन त्सांग (सातवीं शताब्दी ईस्वी) ने अपने यात्रा-वृत्तांतों में भारत के लिए इसी नाम का प्रयोग किया।

चीनी विद्वानों ने भारतीय उपमहाद्वीप को पांच क्षेत्रों में बांटकर इसे “वू तियानझू” यानी “पांच भारत” भी कहा, जो उस समय भारत की विशाल भौगोलिक संरचना को दर्शाता है।

नाम कब पड़ा:- हान राजवंश कालखंड से, लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- प्राचीन फारसी शब्द “हिंदुक” के चीनी उच्चारण और रूपांतरण से।

नाम बदलने का कारण:- बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ यह नाम धार्मिक ग्रंथों तक सीमित होकर आधुनिक चीनी में “यिन्दु” में बदल गया।

26. शेन्तु (Shendu)

शेन्तु, तियानझू से भी पुराना चीनी नाम माना जाता है, जो हान राजवंश के प्रारंभिक अभिलेखों में मिलता है। यह शब्द भी सिंधु नदी के नाम से ही निकला है,

और इसका प्रयोग तब हुआ जब चीनी दूत झांग छ्यान (लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) मध्य एशिया की यात्रा पर निकले और वहां से भारत के बारे में जानकारी लेकर लौटे।

यह नाम चीनी इतिहास-ग्रंथों, खासकर “शिजी” जैसे ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज है, जो प्राचीन चीन और भारत के बीच व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संपर्कों का महत्वपूर्ण प्रमाण माने जाते हैं।

नाम कब पड़ा:- हान राजवंश के प्रारंभिक कालखंड में, लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- सिंधु नदी के नाम पर, चीनी दूतों और यात्रियों के माध्यम से मिली भौगोलिक जानकारी के आधार पर।

नाम बदलने का कारण:- समय के साथ उच्चारण परिवर्तन के कारण यह शब्द तियानझू और बाद में यिन्तु में बदल गया।

27. यिन्तु (Yindu)

यिन्तु आधुनिक चीनी भाषा में भारत के लिए प्रयोग होने वाला नाम है, जो सीधे सिंधु शब्द के करीब उच्चारण पर आधारित है।

यह नाम अपेक्षाकृत आधुनिक कालखंड में, यानी उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मानकीकृत हुआ, जब चीन और भारत के बीच आधुनिक कूटनीतिक संबंध स्थापित होने लगे।

पुराने तियानझू और शेन्तु जैसे नामों की तुलना में यिन्तु अधिक सरल और मूल सिंधु शब्द के करीब है, इसीलिए आधुनिक चीनी मानचित्रों और सरकारी दस्तावेज़ों में आज यही नाम आधिकारिक रूप से प्रयोग होता है।

नाम कब पड़ा:- आधुनिक कालखंड, उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मानकीकरण के दौरान।

मुख्य कारण:- सिंधु शब्द के करीब आधुनिक चीनी उच्चारण अपनाने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- पुराने धार्मिक-सांस्कृतिक नामों की जगह आधुनिक कूटनीतिक ज़रूरतों के अनुसार सरल नाम अपनाया गया।

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भारत का प्राचीन काल से ही दुनिया के कई हिस्सों के साथ व्यापारिक संबंध रहा है, और इसी व्यापार के दौरान भारत तथा उसके पड़ोसी क्षेत्रों के लिए कई महत्वपूर्ण नाम गढ़े गए।

28. मेलुह्हा (Meluhha)

मेलुह्हा वह नाम है, जो प्राचीन मेसोपोटामिया (आज का इराक क्षेत्र) की सुमेरियन और अक्कादियन सभ्यताओं के अभिलेखों में मिलता है, और इतिहासकारों के अनुसार यह सिंधु घाटी सभ्यता के लिए ही प्रयोग किया गया नाम था।

यह उल्लेख लगभग 2300 ईसा पूर्व के आसपास के क्यूनिफॉर्म (कीलाकार) अभिलेखों में मिलता है, जिनमें मेलुह्हा से आने वाले व्यापारिक सामान, जैसे हाथी दांत, कीमती पत्थर और लकड़ी का विस्तृत वर्णन है। इससे यह साफ पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का मेसोपोटामिया के साथ समुद्री और स्थल, दोनों मार्गों से गहरा व्यापारिक संबंध रहा था।

नाम कब पड़ा:- सिंधु घाटी सभ्यता कालखंड, लगभग 2300 ईसा पूर्व के आसपास।

मुख्य कारण:- मेसोपोटामिया के साथ व्यापारिक संबंधों के दौरान सुमेरियन-अक्कादियन अभिलेखों में उल्लेख होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के साथ यह नाम भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट गया।

29. सुवर्णभूमि

सुवर्णभूमि का शाब्दिक अर्थ है “सोने की भूमि”, और यह नाम प्राचीन भारतीय व्यापारियों द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया के उन क्षेत्रों के लिए प्रयोग किया जाता था, जहां सोने और कीमती धातुओं का व्यापार होता था।

बौद्ध जातक कथाओं में इसका उल्लेख मिलता है, जिनकी रचना लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू हुई मानी जाती है, जिनमें भारतीय व्यापारियों के समुद्री मार्ग से सुवर्णभूमि तक यात्रा करने की कहानियां दर्ज हैं।

कुछ इतिहासकार इसे आज के म्यांमार और थाईलैंड क्षेत्र से जोड़ते हैं, जबकि कुछ इसे भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्र, खासकर ओडिशा, से भी जोड़कर देखते हैं।

नाम कब पड़ा:- बौद्ध कालखंड, लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से।

मुख्य कारण:- सोने और कीमती धातुओं के समृद्ध व्यापारिक केंद्र होने के कारण।

नाम बदलने का कारण:- आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की स्थापना के साथ यह नाम अलग-अलग देशों (म्यांमार, थाईलैंड आदि) के आधुनिक नामों में विभाजित हो गया।

30. सुवर्णद्वीप

सुवर्णद्वीप का अर्थ है “सोने का द्वीप”, और यह नाम मुख्य रूप से आज के इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के लिए प्रयोग होता था, जहां भारतीय व्यापारी सोने और मसालों के व्यापार के लिए जाया करते थे।

यह नाम प्राचीन भारतीय व्यापारिक ग्रंथों और बाद में चोल साम्राज्य (लगभग ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी) के अभिलेखों में भी मिलता है, जब राजेंद्र चोल प्रथम ने श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध समुद्री अभियान चलाया था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत का दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ केवल व्यापारिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध भी बहुत गहरा रहा है।

नाम कब पड़ा:- प्राचीन भारतीय व्यापारिक कालखंड से, विशेष रूप से चोल साम्राज्य के समय, लगभग ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में।

मुख्य कारण:- सुमात्रा द्वीप में सोने और मसालों के समृद्ध व्यापार के कारण।

नाम बदलने का कारण:- आधुनिक कालखंड में यह क्षेत्र इंडोनेशिया राष्ट्र का हिस्सा बन गया, इसलिए पुराना संस्कृत नाम धीरे-धीरे लुप्त हो गया।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत नाम सबसे पहले कब पड़ा था?

उत्तर: भारत नाम राजा भरत के शासनकाल से जुड़ा हुआ माना जाता है। ओर राजा भरत के नाम पर ही भारत पड़ा था।

जिसका उल्लेख विष्णु पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसलिए इसे वैदिक और पौराणिक काल से जोड़ा जाता है।

प्रश्न 2. इंडिया नाम किस भाषा से आया है?

उत्तर: इंडिया नाम यूनानी भाषा के “इंडस” शब्द से विकसित हुआ था। जो सिंधु नदी के उच्चारण पर आधारित है। इसलिए इसे यूरोपीय स्रोतों का प्रमुख नाम माना जाता है।

प्रश्न 3. हिंदुस्तान नाम कहां से आया?

उत्तर: हिंदुस्तान नाम फारसी भाषा के “हिंद” और “स्तान” शब्दों के मेल से बना हुआ हैं। जिसका अर्थ हिंदुओं का देश होता है। इसलिए यह नाम मध्यकाल में विशेष रूप से प्रचलित हुआ था।

Author (India World History)

  • मेरा नाम ललित कुमार (रवि) है। और में फिलहाल N.H.8, भीम, राजसमंद, राजस्थान में रह रहा हूँ।

    में खुद को एक इतिहासकार कहूं. तो शायद गलत नही होगा. क्योंकि इतिहास के विषयों की दुनिया ने मुझे इतना अनुभव दिया है।

    की मुझे अलग से एक इतिहासकार बनने की पढ़ाई या उसके खिलाफ अध्ययन करने की जरूरत नहीं है।

    इसीलिए मैं, फिलहाल हमारी कंपनी इंडिया वर्ल्ड हिस्ट्री पर. खुद को मुख्य लेखक और इतिहास का शोधकर्ता समझता हूँ।

    यही नहीं मैंने भारतीय पब्लिक स्कूल (BPS) चौधरी चरण सिंह कॉलोनी नवलगढ़ रोड़ सीकर से 12TH की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।

    इतिहास विषयों की जानकारियों में मेरे पास. 2026 से पहले 4 वर्षो का अनुभव शामिल हैं।

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