Patwa Haveli History | स्थापना. भ्रमण. पर्यटन जगहें. 5 हवेलियां वास्तुकला. आक्रमण. भूगोल.

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पटवों की हवेली के इतिहास का परिचय | Patwa Haveli History

पटवों की हवेली की स्थापना और प्रारंभिक निर्माण

पटवों की हवेलियों का इतिहास अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से जुड़ा हुआ है। यह कहानी गुमान चंद पटवा नाम के एक धनी व्यापारी से शुरू होती है, जो अपने समय के सबसे सफल कारोबारियों में से एक थे।

पटवा परिवार मूल रूप से जैन समुदाय से था और उनका व्यवसाय सोने-चांदी के आभूषण, ब्रोकेड (जरी का काम), और अफीम के व्यापार में था।

कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, उनका व्यापार सिंध-बलूचिस्तान, कोचीन और पश्चिम एशिया के देशों तक फैला हुआ था।

एक रोचक किस्सा है कि पटवा भाई शुरुआत में जैसलमेर छोड़कर जाना चाहते थे क्योंकि एक जैन मंदिर के पुजारी ने उन्हें सलाह दी थी कि उनका व्यवसाय जैसलमेर में नहीं पनप सकता।

लेकिन जब वे बाहर गए और बेहद सफल हुए, तो उन्होंने अपनी जन्मभूमि में वापस आकर इस शानदार हवेली परिसर का निर्माण करवाने का फैसला किया।

पटवों की हवेली में पहली हवेली का निर्माण 1805 ईस्वी में शुरू हुआ। गुमान चंद पटवा ने अपने पांच बेटों में से हर एक के लिए एक अलग हवेली बनवाने का निर्णय लिया। पहली हवेली, जिसे कोठारी की पटवा हवेली के नाम से जाना जाता है, सबसे भव्य और बड़ी है।

यह उनकी संपत्ति और स्थापत्य कला के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक है। पटवों की हवेलियों के निर्माण में करीब 60 साल का समय लगा। यह समय 1805 से 1860 के बीच का माना जाता है।

इतिहासकारों का कहना है कि केवल डिजाइन बनाने में ही 30 साल लग गए थे, और फिर अगले 30 सालों में निर्माण कार्य पूरा हुआ। यह बात ही दिखाती है कि कितनी बारीकी और सूझबूझ से इस हवेली का निर्माण किया गया था।

स्थानीय लोग बताते हैं कि इस पटवों की हवेलियों के निर्माण में करीब 1000 करोड़ रुपये का खर्च आया था (उस समय की कीमतों के अनुसार)। पीले बलुआ पत्थर, जो जैसलमेर में आसानी से मिल जाता है, का इस्तेमाल किया गया।

यह पत्थर नक्काशी के काम के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है और इसे घिसने पर यह चमकदार हो जाता है। इसीलिए पटवों की हवेली में पीले बलुआ पत्थर को औजारों से तरसा (डिजाइन) दी गई.

पटवों की हवेली का ऐतिहासिक महत्त्व

उन्नीसवीं सदी में जैसलमेर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। यह रेशम मार्ग (सिल्क रूट) पर स्थित था, जिससे होकर व्यापारी भारत से मध्य एशिया और अरब देशों तक माल लेकर जाते थे।

पटवा परिवार इसी व्यापार का हिस्सा था और उन्होंने अपनी संपत्ति से न केवल भव्य हवेलियां बनवाईं, बल्कि जैन मंदिरों के निर्माण में भी योगदान दिया। पटवों की हवेली में हिंदू, ईरानी, यहूदी और मुगल स्थापत्य कला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

यह बताता है कि उस समय विभिन्न संस्कृतियों का आदान-प्रदान कितना सक्रिय था। इस हवेली की एक खास बात यह है कि इसमें एक हवेली के ‘दीपघरों’ के शीशों पर ग्वालियर के मराठा शासक महादजी सिंधिया को अंकित किया गया है।

यह दर्शाता है कि पटवा परिवार का संबंध केवल जैसलमेर तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के अन्य शासकों और व्यापारियों से भी था।

पटवों की हवेली की देखरेख और सुरक्षा की वर्तमान स्थिति

आज पटवों की हवेली का एक बड़ा हिस्सा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राजस्थान राज्य सरकार के संरक्षण में है। यह बदलाव समय के साथ हुआ जब सरकार ने इस ऐतिहासिक धरोहर को संभालने की जिम्मेदारी ली।

वर्तमान में, हवेली परिसर के अंदर ASI का कार्यालय और राज्य कला एवं शिल्प विभाग का दफ्तर भी स्थित है। जब मैं पटवों की हवेली में गया था, तो मुझे पता चला कि हालांकि सरकार इसकी देखभाल कर रही है, फिर भी रखरखाव की कुछ चुनौतियां हैं।

पटवों की हवेली में पुराने पत्थरों का क्षरण हो रहा है और कुछ नक्काशी वाले हिस्से टूट रहे हैं। मरुस्थलीय जलवायु, तेज हवाएं और रेत के तूफान इस हवेली को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

हालांकि, आज संरक्षण के प्रयास जारी हैं और समय-समय पर मरम्मत का काम भी होता रहता है।

पटवों की हवेली का एक हिस्सा संग्रहालय के रूप में जनता के लिए खोला गया है। यहां पटवों की हवेली के परिवार से जुड़ी कलाकृतियां, चित्र, पुराने आभूषण और राजस्थानी संस्कृति को दर्शाने वाली अनेक वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।

पटवों की हवेली का भूगोल

राजस्थान की सुनहरी नगरी जैसलमेर शहर। आज भारत के पश्चिमी भाग (पाकिस्तान की सीमा) के पास स्थित है। वही पटवों की हवेली भी जैसलमेर की संकरी गलियों “पटवा वैद्य मोहल्ला” के। बीचों बीच अमर सिंह पोल में है।

पटवों की हवेली की यह गलियां लगभग लगभग 8–9 फीट चौड़ी है. वही पटवों की हवेलियां लगभग 400-500 मीटर लंबे क्षेत्र में फैली हुई है.

जहां इन हवेलियों का मुख उत्तर और पश्चिम की ओर खुलता है। वही यहाँ का पूरा भूगोल जलवायु के हिसाब से डिजाइन किया गया था।

यह हवेली थार रेगिस्तान के मध्य में होने के कारण। एक अद्भुत स्थापत्य चमत्कार की तरह है। हालांकि यह क्षेत्र थार के रेगिस्तान के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में आता है, जहां दूर-दूर तक रेत के टीले फैले हुए हैं।

पटवों की हवेली पटवा परिसर के पास बनी है और यह जैसलमेर की पहली हवेली मानी जाती है। स्थानीय लोग इसे प्यार से जैसलमेर किला के करीब की सबसे खूबसूरत इमारत बताते हैं।

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो जैसलमेर करीब 26 डिग्री से 27 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 69 डिग्री से 72 डिग्री पूर्व देशांतर के बीच फैला हुआ है। यहां की जलवायु अत्यधिक गर्म और शुष्क रहती है।

जिसके कारण यहां की इमारतों की बनावट भी खास तरह की होती है। पटवों की हवेली की रचना भी इसी जलवायु को ध्यान में रखकर की गई थी।

पटवों की पांच हवेलियों के इमारतों की वास्तुकला

जब मैने पटवों की हवेली के परिवार के बारे में एक मजेदार किस्सा सुना. कि हवेलियां के निर्माण के कई साल पहले. शुरुआत में एक जैन मंदिर के पुजारी ने उन्हें सलाह दी थी कि उनका व्यवसाय जैसलमेर में नहीं पनप सकता।

परिवार ने जैसलमेर छोड़ दिया और बाहर जाकर बहुत धन कमाया। बाद में जब वे वापस लौटे तो अपनी जन्मभूमि पर ये शानदार हवेलियां 1800 से 1860 के बीच बनवाईं। हालांकि जब मैंने पहली बार जैसलमेर की सोनहरी गलियों में घूमते हुए पटवों की हवेलियां देखी थी।

तो मैं हैरान रह गया था। यह सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि पांच भव्य हवेलियों का एकजुट समूह है। आज मैं आपको इन पांचों हवेलियों के बारे में विस्तार से बताऊंगा। पटवों की हवेली में हर एक हवेली की अपनी कहानी है, अपनी खासियत है।

पहली हवेली: किशनलाल कोठारी की पटवा हवेली (सबसे भव्य और बड़ी)

पहली हवेली की स्थापना और निर्माण

1805 में पहली हवेली का निर्माण गुमान चंद पटवा ने शुरू करवाया था। यह पांचों में सबसे पुरानी और सबसे भव्य हवेली है। इसे किशनलाल कोठारी की पटवों की हवेली के नाम से जाना जाता है।

क्योंकि बाद में इसे जैसलमेर के एक व्यापारी जीवनलालजी कोठारी ने खरीद लिया था।

जब मैंने इस हवेली में प्रवेश किया था, तो पहली नजर में ही मुझे लगा कि यह किसी राजा के महल से कम नहीं। हालांकि किशनलाल कोठारी की हवेली का निर्माण सबसे पहले शुरू हुआ था और इसमें सबसे ज्यादा समय भी लगा।

मैंने स्थानीय गाइड से जाना कि किशनलाल कोठारी की हवेली को बनाने में करीब 20 से 25 साल का समय लगा था।

पहली हवेली (किशनलाल कोठारी की हवेली) की वास्तुशिल्प विशेषताएं

पटवों की हवेलियों में पहली हवेली पांच मंजिला है और इसमें सबसे ज्यादा कमरे हैं। पहली मंजिल में नाव और हाथी के आकार के गवाक्ष बने हैं, दूसरी मंजिल में मेहराबदार सुंदर छज्जे हैं, और तीसरी मंजिल पर षट्कोणीय छज्जे बने हैं।

यह डिजाइन बेहद खास है क्योंकि हर मंजिल की अपनी अलग पहचान है। हवेली का मुख्य दरवाज भूरे रंग के पत्थर से बना है जबकि बाकी पूरी इमारत पीले बलुआ पत्थर से बनी है। जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो यह सोने की तरह चमकती है।

मैंने देखा कि दरवाजे पर इतनी बारीक नक्काशी की गई है कि हर एक फूल और पत्ती साफ दिखाई देती है।

पहली हवेली (किशनलाल कोठारी की हवेली) की कारीगरी की बारीकियां

खंभों और छतों पर जटिल और आकर्षक नक्काशी की गई है, और मेहराब और द्वार लघु डिजाइनों से भरे हुए हैं। मैंने हवेली के अंदर देखा कि दीवारों पर दर्पण का काम (मिरर वर्क) किया गया है।

छोटे-छोटे शीशे के टुकड़ों को इतनी खूबसूरती से लगाया गया है कि कमरे में रोशनी की चमक कई गुना बढ़ जाती है।

हवेली के अंदर भित्ति चित्र भी बनाए गए हैं। इन चित्रों में पौराणिक कथाओं के दृश्य, राजाओं-महाराजाओं के चित्र और प्रकृति के नजारे दिखाए गए हैं। रंग आज भी इतने ताजे लगते हैं कि यकीन नहीं होता कि ये 200 साल पुराने हैं।

पहली हवेली (किशनलाल कोठारी की हवेली) के झरोखे और जालियों का काम

पटवों की हवेली की पहली हवेली में करीब 20 से 25 झरोखे हैं। हर झरोखे में नक्काशीदार पत्थर के फ्रेम और जाली का काम है जो प्राकृतिक रोशनी के साथ जगह को रोशन करता है और हवा का आवागमन बनाए रखता है।

जब मैं हवेली में था तो गर्मी के बावजूद अंदर ठंडक थी, यह सब जालियों की वजह से था। पत्थर की जालियों में इतनी बारीकी है कि हैरानी होती है। कुछ जालियों में फूलों के डिजाइन हैं तो कुछ में ज्यामितीय आकृतियां।

एक खास बात यह है कि पटवों की हवेलियां विश्व की एकमात्र हवेली है जिसकी खिड़कियां पत्थर की बनी हुई हैं। लकड़ी की बजाय पत्थर का इस्तेमाल करना उस समय की तकनीकी उत्कृष्टता को दर्शाता है।

दूसरी हवेली: जुगल किशोर कोठारी की पटवा हवेली (मध्य भाग की हवेली)

दूसरी हवेली का निर्माण काल

पटवों की हवेली में दूसरी हवेली का निर्माण पहली हवेली के कुछ साल बाद शुरू हुआ। लगभग 1815 से 1820 के बीच। यह गुमान चंद पटवा के दूसरे बेटे के लिए बनाई गई थी। इस हवेली में भी पीले बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है।

दूसरी हवेली की वास्तुकला की विशेषताएं

पटवा की हवेली में दूसरी हवेली पहली हवेली से थोड़ी छोटी है लेकिन इसकी खूबसूरती में कोई कमी नहीं। इस हवेली में चार मंजिलें हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पर दो खूबसूरत मेहराब बनाए गए हैं जिन पर फूलों और बेलों की नक्काशी की गई है।

इस हवेली की खासियत इसके आंतरिक आंगन में है। आंगन के चारों ओर कमरे बने हुए हैं और बीच में एक छोटा सा फव्वारा था, जो अब सूख चुका है। मैंने देखा कि आंगन की दीवारों पर चित्रकारी की गई है जिसमें शिकार के दृश्य और महलों के चित्र बने हैं।

दूसरी हवेली की कारीगरी के नमूने

इस हवेली में अलग तरह का मिरर वर्क किया गया है। जहां पहली हवेली में छोटे शीशे इस्तेमाल हुए थे, वहीं इस हवेली में बड़े शीशों का इस्तेमाल किया गया है। दीवारों पर रंगीन कांच के टुकड़ों से सुंदर डिजाइन बनाए गए हैं।

बालकनियों में लकड़ी के काम की खूबसूरती देखते ही बनती है। लकड़ी के दरवाजों पर जानवरों और पक्षियों के चित्र उकेरे गए हैं। एक दरवाजे पर मोर का चित्र इतना जीवंत लगता है कि लगता है अभी उड़ जाएगा।

तीसरी हवेली: घूमनमल कोठारी की पटवा हवेली (सादगी में सुंदरता)

तीसरी हवेली के निर्माण की शुरुआत

तीसरी हवेली 1825 के आसपास बनकर तैयार हुई थी। यह गुमान चंद के तीसरे बेटे के लिए थी। यह हवेली आकार में मध्यम है और इसमें तीन मंजिलें हैं।

तीसरी हवेली की स्थापत्य

पटवा की हवेलियों में तीसरी हवेली की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी है। यहां भारी-भरकम नक्काशी की बजाय सरल और सुरुचिपूर्ण डिजाइन देखने को मिलते हैं। मेहराब और प्रवेश द्वार से इसे अलग पहचाना जा सकता है।

इस हवेली के झरोखे दूसरी हवेलियों से अलग हैं। ये आकार में छोटे हैं लेकिन इनकी जाली का काम बेहद बारीक है। मैंने गौर किया कि यहां की जालियों में मुगल और राजपूत शैली का मिश्रण है।

तीसरी हवेली की कारीगरी

पटवों की हवेलियों में तीसरी हवेली में दीवारों पर फूलों और लताओं की नक्काशी की गई है। ये नक्काशी इतनी उभरी हुई है कि छूने पर हर पंखुड़ी महसूस होती है। छत पर लकड़ी के बीम लगाए गए हैं जिन पर रंगीन पेंटिंग की गई है।

इस हवेली में कुछ कमरों में अभी भी पुरानी अलमारियां और अलमारियों के दरवाजे मौजूद हैं। इन दरवाजों पर पीतल की कारीगरी देखकर मैं हैरान रह गया। हर दरवाजे पर अलग डिजाइन है – कहीं हाथी तो कहीं घोड़े बने हुए हैं।

चौथी हवेली: चतूर सिंह कोठारी की पटवा हवेली (परंपरागत शैली)

चौथी हवेली का निर्माण

पटवा की हवेलियों में चौथी हवेली 1835 के आसपास बनकर तैयार हुई। यह चौथे बेटे के लिए बनाई गई थी और इसमें भी चार मंजिलें हैं।

चौथी हवेली की वास्तुकला

पटवों की हवेलियों में चौथी हवेली में परंपरागत राजस्थानी वास्तुकला की स्थापत्य कला को बखूबी देखा जा सकता है। इसमें हिंदू, ईरानी, यहूदी और मुगल स्थापत्य कला का सुंदर समन्वय है।

मुख्य दरवाजे पर बनी मेहराब मुगल शैली की है जबकि खिड़कियों का डिजाइन राजपूत परंपरा का है।

पटवा की हवेली में इस हवेली में एक खास बात यह है कि इसके कुछ कमरों में रंगीन कांच की खिड़कियां लगी हुई हैं। जब सूरज की रोशनी इन खिड़कियों से होकर गुजरती है तो कमरे में रंग-बिरंगी रोशनी फैल जाती है। मुझे यह नजारा देखकर बेहद अच्छा लगा था।

चौथी हवेली की कारीगरी की बारीकियां

झरोखे, मेहराब, बालकनियों, प्रवेश द्वार और दीवारों पर जटिल नक्काशी और पेंटिंग की गई है। इस हवेली में खास तौर पर पशु-पक्षियों के चित्र ज्यादा बनाए गए हैं। दीवारों पर हंस, तोते, हिरण और शेर के चित्र उकेरे गए हैं।

छत के नीचे लकड़ी के कंसोल लगे हैं जिन पर देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई गई हैं। हर कंसोल पर अलग देवता का चित्रण है। गाइड ने बताया कि ये सभी वैष्णव परंपरा के देवी-देवता हैं।

पांचवीं हवेली: गुरुमल की पटवा हवेली सबसे नई और आधुनिक

पांचवीं हवेली के निर्माण समय

पटवों की हवेलियों की पांचवीं और आखिरी हवेली 1855-1860 के बीच बनकर तैयार हुई। यह सबसे छोटे बेटे के लिए थी और पांचों में सबसे नई है। इसी वजह से इसमें कुछ नए तरीके और डिजाइन देखने को मिलते हैं।

पांचवीं हवेली की स्थापत्य

पटवा की हवेलियों में पांचवीं हवेली में तीन मंजिलें हैं और यह आकार में दूसरी और तीसरी हवेली के बीच की है। इस हवेली में यूरोपीय प्रभाव थोड़ा ज्यादा दिखता है क्योंकि उस समय तक अंग्रेजों का भारत में प्रभाव बढ़ चुका था।

इस हवेली के बरामदे चौड़े हैं और इनमें खंभों की संख्या ज्यादा है। खंभे पतले और लंबे हैं जो कुछ-कुछ यूरोपियन स्थापत्य जैसे लगते हैं। लेकिन इन खंभों पर की गई नक्काशी पूरी तरह भारतीय शैली की है।

पांचवीं हवेली की कारीगरी

पांचवीं हवेली में दर्पण के काम में नई तकनीक इस्तेमाल की गई है। यहां शीशों को इस तरह लगाया गया है कि वे कमरे को और बड़ा दिखाते हैं। एक कमरे में तो चारों दीवारों पर शीशे लगे हैं जिससे अनंत प्रतिबिंब बनते हैं।

हवेली के हर दरवाजे पर बारीक डिजाइन बनाया गया है। पांचवीं हवेली के दरवाजों पर सबसे बारीक काम देखने को मिलता है। एक दरवाजे पर तो इतनी बारीकी से फूलों की नक्काशी की गई है कि लगता है किसी ने असली फूल दीवार में जड़ दिए हों।

सभी पांच हवेलियों की साझा विशेषताएं

पांचों हवेलियों के पीले बलुआ पत्थर का इस्तेमाल

पटवा की हवेलियां (पांचों हवेलियां) पीले बलुआ पत्थर से बनी हुई हैं। यह पत्थर जैसलमेर के आसपास आसानी से मिल जाता है और इसे तराशना भी आसान है।

जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो ये हवेलियां सोने की तरह चमकती हैं, इसलिए जैसलमेर को सोनार किला या गोल्डन सिटी कहा जाता है।

मैंने महसूस किया कि यह पत्थर जैसलमेर की गर्मी में भी अंदर ठंडक बनाए रखता है। स्थानीय लोगों ने बताया कि यह पत्थर सूरज की गर्मी को सोख लेता है लेकिन अंदर तक नहीं जाने देता।

पांचों हवेलियों के 60 झरोखे और बरामदे

पटवा की हवेली (पांचों हवेलियों) को मिलाकर कुल 60 झरोखे और बरामदे हैं। हर झरोखा अपने आप में कला का नमूना है। कुछ झरोखे इतने बड़े हैं कि उनमें बैठकर बाहर का नजारा देखा जा सकता है।

मैंने एक झरोखे में बैठकर जैसलमेर की संकरी गलियों और भीड़भाड़ वाले बाजारों को देखा था।

हर हवेली के बरामदे अलग-अलग डिजाइन के हैं। कहीं खंभों पर ज्यादा काम है तो कहीं छत पर। लेकिन सभी बरामदों में एक बात समान है – सभी में बैठने की जगह बनाई गई है ताकि परिवार के लोग शाम को वहां बैठ सकें।

पांचों हवेलियों के हर हवेली की अलग पहचान

मेहराब और प्रवेश द्वार से हर हवेली को अलग-अलग पहचाना जा सकता है और हर हवेली में अलग-अलग तरह का मिरर वर्क किया गया है। यह बात मुझे बेहद दिलचस्प लगी कि एक ही परिवार की पांच हवेलियां होते हुए भी हर एक की अपनी अलग पहचान है।

पहली हवेली के दरवाजे पर गणेश जी की मूर्ति है, दूसरी पर लक्ष्मी जी की, तीसरी पर हनुमान जी की। इस तरह हर हवेली की पूजा के देवता अलग हैं। गाइड ने बताया कि हर बेटे की अपनी पसंद थी और उसी के अनुसार हवेलियां बनाई गईं।

पांचों हवेलियों की निर्माण तकनीक

1800 और 1860 के बीच की अवधि में निर्मित पटवों की हवेलियां पत्थर और लकड़ी से बने अपने पोर्टिको पर सुंदर जाली के काम के लिए जानी जाती हैं। उस समय कोई मशीन या आधुनिक औजार नहीं थे। सब कुछ हाथ से तराशा जाता था।

यह सोचकर ही आश्चर्य होता है कि बिना किसी मशीन के इतना बारीक काम कैसे संभव हो पाया।

स्थानीय कारीगरों ने बताया कि पत्थर को तराशने के लिए छोटे-छोटे हथौड़े और छेनी का इस्तेमाल किया जाता था। एक छोटी सी नक्काशी में कई दिन लग जाते थे। जाली का काम सबसे मुश्किल होता था क्योंकि पत्थर में बारीक छेद करने होते थे।

पटवों की हवेलियों की पर्यटन जगहें

जब मैं पहली बार जैसलमेर की सोनहरी गलियों में घूम रहा था, तो पटवा की हवेलियां देखकर मैं अचंभित रह गया। यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया है जहां हर कोने में कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है।

आज मैं आपको पटवों की के उन सभी खास स्थानों के बारे में बताऊंगा जो आपको जरूर देखने चाहिए।

पहला स्थान: मुख्य प्रवेश द्वार और बाहरी दीवारें

पहली नजर में दिखने वाली खूबसूरती

जब आप पटवों की हवेली के पास पहुंचते हैं, तो सबसे पहले आपको इसका भव्य मुख्य प्रवेश द्वार दिखता है। यह दरवाजा भूरे रंग के पत्थर से बना है, जबकि बाकी पूरी हवेली पीले बलुआ पत्थर से बनी है।

मैंने जब पहली बार इस दरवाजे को देखा था, तो मुझे लगा जैसे यह किसी राजमहल का प्रवेश द्वार हो। दरवाजे पर की गई नक्काशी इतनी बारीक है कि हर एक फूल और पत्ती साफ दिखाई देती है। मुख्य दरवाजे के ऊपर एक बड़ी मेहराब बनी है।

जिसमें फूलों और बेलों की नक्काशी की गई है। स्थानीय गाइड ने बताया कि इस दरवाजे को बनाने में करीब 2 साल का समय लगा था क्योंकि हर एक डिजाइन को हाथ से तराशा गया था।

बाहरी दीवारों की कहानी

पटवों की हवेलियां की बाहरी दीवारें पीले बलुआ पत्थर से बनी हुई हैं। जब सुबह की पहली धूप इन दीवारों पर पड़ती है, तो ये सोने की तरह चमकने लगती हैं। यही कारण है कि जैसलमेर को सोनार किला या गोल्डन सिटी कहा जाता है।

दीवारों पर अलग-अलग तरह के डिजाइन बने हुए हैं। कहीं फूलों के चित्र हैं तो कहीं ज्यामितीय आकृतियां। मैंने एक दीवार पर शेर की तस्वीर देखी जो इतनी जीवंत लगती थी कि लगता था अभी दहाड़ मारने वाली है।

दीवारों के नीचे के हिस्से में पालीवाल ब्राह्मणों की परंपराओं से जुड़े चिन्ह भी उकेरे गए हैं।

दूसरा स्थान: 60 झरोखे और खिड़कियां

झरोखों की अनूठी दुनिया

पटवों की हवेलियों में कुल 60 झरोखे और बरामदे हैं, जो इसकी सबसे बड़ी खासियत है। हर झरोखा अपने आप में कला का एक नमूना है। मैंने देखा कि कुछ झरोखे इतने बड़े हैं कि उनमें बैठकर बाहर का नजारा आराम से देखा जा सकता है।

जब मैं एक झरोखे में बैठा था, तो मुझे नीचे की संकरी गलियां और व्यापारियों की दुकानें साफ दिखाई दे रही थीं। उस समय मुझे लगा कि 200 साल पहले यहां रहने वाले लोग भी इसी तरह बैठकर बाजार का नजारा देखते होंगे।

खिड़कियों का अनोखा डिजाइन

पटवों की हवेलियां विश्व की एकमात्र हवेली है जिसकी खिड़कियां पूरी तरह पत्थर की बनी हुई हैं। लकड़ी की बजाय पत्थर का इस्तेमाल करना उस समय की तकनीकी उत्कृष्टता को दर्शाता है। हर खिड़की में नक्काशीदार पत्थर के फ्रेम और जाली का काम है।

मैंने एक खिड़की के पास खड़े होकर देखा कि कैसे सूरज की रोशनी जालियों से छनकर अंदर आती है और कमरे में खूबसूरत पैटर्न बनाती है। गर्मी के दिनों में भी अंदर ठंडक बनी रहती है क्योंकि जालियां हवा को अंदर आने देती हैं लेकिन गर्मी को रोक देती हैं।

प्राकृतिक एयर कंडीशनिंग का राज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि पटवों की हवेलियों का डिजाइन प्राकृतिक एयर कंडीशनिंग की तरह काम करता है। मैंने खुद इसे महसूस किया। बाहर 42 डिग्री का तापमान था लेकिन अंदर मुझे ठंडक महसूस हो रही थी।

यह सब झरोखों और जालियों की खास व्यवस्था की वजह से संभव है।

तीसरा स्थान: संग्रहालय (कोठारी की पटवा हवेली में)

संग्रहालय में प्रवेश

पटवों की हवेली के परिसर में एक संग्रहालय है जिसमें 19वीं शताब्दी से जुड़ी कलाकृतियां, चित्र, कला और शिल्प प्रदर्शित हैं। यह संग्रहालय पहली हवेली यानी कोठारी की पटवा हवेली में स्थित है। प्रवेश शुल्क केवल 20 रुपये प्रति व्यक्ति है।

जब मैं संग्रहालय में गया, तो मुझे लगा जैसे मैं समय में पीछे चला गया हूं। यहां पर पुरानी वस्तुओं का संग्रह इतना शानदार है कि मैं घंटों वहां रुका रहा।

पटवा परिवार की निजी वस्तुएं

संग्रहालय में पटवा परिवार के इस्तेमाल किए गए बर्तन, आभूषण, कपड़े और रोजमर्रा की चीजें रखी हैं। मैंने यहां चांदी के पुराने बर्तन देखे जिन पर बारीक नक्काशी की गई थी। एक कोने में पुराने जेवर रखे थे जो सोने और चांदी से बने थे।

कपड़ों के संग्रह में जरी की साड़ियां थीं जो पटवा परिवार के मुख्य व्यवसाय को दर्शाती हैं। एक साड़ी पर इतना बारीक काम था कि लगता था किसी ने धागे-धागे में कहानी बुनी हो।

हथियारों का संग्रह

संग्रहालय में पुराने हथियार भी रखे हैं। यहां तलवारें, भाले, ढालें और कटारें प्रदर्शित हैं। हर हथियार पर नाम और तारीख लिखी हुई है। गाइड ने बताया कि ये हथियार पटवा परिवार ने अपनी सुरक्षा के लिए रखे थे क्योंकि उस समय लूटपाट आम बात थी।

एक तलवार पर हीरे जड़े हुए थे। मुझे बताया गया कि यह तलवार गुमान चंद पटवा की निजी तलवार थी।

पुरानी तस्वीरें और दस्तावेज

पटवों की हवेली के संग्रहालय की दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी हैं जो पटवा परिवार के इतिहास को बयां करती हैं। एक तस्वीर में गुमान चंद पटवा अपने पांच बेटों के साथ खड़े दिखाई दे रहे थे। यह तस्वीर शायद 1850 के आसपास की है।

कुछ दस्तावेज भी रखे हैं जो व्यापार से जुड़े हैं। इन दस्तावेजों में सोने-चांदी की खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड हैं। मुझे एक दस्तावेज में फारसी भाषा में लिखा दिखा, जो उस समय के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को दर्शाता है।

सिक्कों का संग्रह

एक कांच के केस में पुराने सिक्के रखे हैं। ये सिक्के अलग-अलग देशों के हैं जो बताता है कि पटवा परिवार का व्यापार कितने दूर-दूर तक फैला था। मैंने यहां मुगलकालीन सिक्के, अरब देशों के सिक्के और यहां तक कि चीन के कुछ पुराने सिक्के भी देखे।

चौथा स्थान: आंतरिक आंगन

आंगन का केंद्रीय महत्व

आंगन पटवों की हवेली का मुख्य हिस्सा है जहां से 60 बालकनियां देखी जा सकती हैं। आंगन चारों तरफ से कमरों से घिरा हुआ है। बीच में खुली जगह है जहां सूरज की रोशनी सीधे आती है।

जब मैं आंगन में खड़ा था और ऊपर देखा, तो चारों तरफ बालकनियां दिखाई दीं। यह नजारा बेहद खूबसूरत था। मुझे लगा जैसे मैं किसी चित्र के अंदर खड़ा हूं।

आंगन में पुराना फव्वारा

आंगन के बीच में एक छोटा सा फव्वारा था जो अब सूख चुका है। स्थानीय लोगों ने बताया कि पहले यहां पानी बहता था और गर्मी के दिनों में यह जगह ठंडी रहती थी। फव्वारे के आसपास संगमरमर की पट्टियां लगी हैं जिन पर बैठने की जगह बनी है।

मैंने कल्पना की कि कैसे उस समय परिवार के लोग शाम को यहां बैठते होंगे। बच्चे खेलते होंगे, औरतें बातचीत करती होंगी और बुजुर्ग हुक्का पीते होंगे।

आंगन की दीवारों पर भित्ति चित्र

आंगन की दीवारों पर रंग-बिरंगे भित्ति चित्र बने हैं। इन चित्रों में शिकार के दृश्य, महलों के चित्र और पौराणिक कथाओं के दृश्य दिखाए गए हैं। एक चित्र में राजा शिकार पर जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। दूसरे चित्र में कृष्ण भगवान राधा के साथ बांसुरी बजाते हुए दिखाए गए हैं।

रंग आज भी इतने ताजे लगते हैं कि यकीन नहीं होता कि ये 200 साल पुराने हैं। गाइड ने बताया कि उस समय प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था जो आज भी बने हुए हैं।

पांचवां स्थान: बालकनी और बरामदे

अलग-अलग मंजिलों की बालकनियां

पटवों की हवेलियों में 60 बालकनियां हैं जो इसकी शोभा बढ़ाती हैं। हर मंजिल की बालकनी अलग डिजाइन की है। पहली मंजिल की बालकनियां सबसे बड़ी हैं और उनमें नाव और हाथी के आकार के गवाक्ष बने हैं।

मैं दूसरी मंजिल की एक बालकनी में खड़ा हुआ था। वहां से जैसलमेर के किले का नजारा साफ दिखाई दे रहा था। दूर तक रेगिस्तान फैला हुआ था। यह नजारा इतना खूबसूरत था कि मैं वहां करीब आधा घंटा खड़ा रहा।

बरामदों में बैठने की व्यवस्था

हर हवेली के बरामदे चौड़े हैं और उनमें बैठने की जगह बनाई गई है। बरामदों में खंभे लगे हैं जिन पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। खंभों पर पत्थर से फूल, पत्तियां और पक्षियों के चित्र उकेरे गए हैं।

एक बरामदे में मैंने बैठकर चाय पी थी। वहां से आंगन का पूरा नजारा दिखाई देता था। मुझे महसूस हुआ कि कैसे उस जमाने में लोग यहां बैठकर अपना समय बिताते होंगे।

छठा स्थान: दर्पण कक्ष (शीशे का काम)

मिरर वर्क की अद्भुत कला

पटवों की हवेली की दीवारों पर दर्पण का काम किया गया है जो इसकी सबसे खास विशेषता है। कुछ कमरों में तो चारों दीवारों पर छोटे-छोटे शीशे के टुकड़ों को इतनी खूबसूरती से लगाया गया है कि कमरे में रोशनी की चमक कई गुना बढ़ जाती है।

जब मैं एक दर्पण कक्ष में गया, तो मुझे अपनी छवि हर तरफ दिखाई दे रही थी। शीशों को इस तरह लगाया गया है कि वे कमरे को असल से बड़ा दिखाते हैं। यह उस समय की उन्नत तकनीक का प्रमाण है।

अलग-अलग शैली का मिरर वर्क

हर हवेली में अलग तरह का मिरर वर्क किया गया है। पहली हवेली में छोटे शीशे इस्तेमाल हुए हैं जबकि दूसरी हवेली में बड़े शीशों का इस्तेमाल किया गया है। तीसरी हवेली में रंगीन कांच के टुकड़ों से सुंदर डिजाइन बनाए गए हैं।

मुझे पटवों की हवेलियों के एक कमरे में हरे और लाल रंग के शीशे दिखे जो सूरज की रोशनी में अलग-अलग रंग बिखेर रहे थे। यह नजारा इतना मनमोहक था कि मैं उस कमरे से बाहर ही नहीं निकलना चाहता था।

सातवां स्थान: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का कार्यालय

ASI कार्यालय की भूमिका

पटवा की हवेलियों के परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का कार्यालय स्थित है। यह कार्यालय हवेली की देखभाल और संरक्षण का काम करता है। हवेली का एक हिस्सा इसी कार्यालय के लिए आरक्षित है।

जब मैं वहां गया था, तो मैंने देखा कि ASI के कर्मचारी हवेली के टूटे हुए हिस्सों की मरम्मत कर रहे थे। वे पत्थरों को जोड़ने के लिए पुरानी तकनीक का ही इस्तेमाल कर रहे थे ताकि मूल स्वरूप बना रहे।

ऐतिहासिक साक्ष्य और कलाकृतियां

ASI के कार्यालय में कुछ ऐतिहासिक साक्ष्य भी रखे गए हैं जो आम जनता के लिए नहीं खोले जाते। लेकिन गाइड ने बताया कि वहां पुराने दस्तावेज, नक्शे और पटवा हवेली के मूल डिजाइन की योजनाएं सुरक्षित रखी हुई हैं।

आठवां स्थान: छत और मंडप

छतों पर की गई नक्काशी

पटवा हवेलियों की छतें भी देखने लायक हैं। हर छत पर लकड़ी के बीम लगाए गए हैं जिन पर रंगीन पेंटिंग की गई है। छत के बीच में गोलाकार डिजाइन बने हैं जिनमें फूलों और बेलों की नक्काशी की गई है।

मैंने एक कमरे में छत को देखा तो पाया कि वहां पूरा सौरमंडल बना हुआ है। सूरज, चांद, तारे और ग्रह सभी चित्रित हैं। यह उस समय के ज्योतिष ज्ञान को दर्शाता है।

ऊपरी मंडप

कुछ हवेलियों में ऊपरी मंडप भी बने हैं जहां से पूरे जैसलमेर का नजारा दिखाई देता है। मैं एक मंडप में गया था जहां से किले के साथ-साथ पूरे शहर की भीड़भाड़ दिखाई दे रही थी। शाम के समय सूर्यास्त देखने के लिए यह जगह बेहतरीन है।

नौवां स्थान: पत्थर की जाली के काम वाली दीवारें

जाली कला की बारीकी

पटवों की हवेली की दीवारों, खंभों, झरोखों और बालकनियों पर बारीक नक्काशी और जाली का काम किया गया है। जालियों में फूलों के डिजाइन हैं तो कुछ में ज्यामितीय आकृतियां। हर जाली अलग है।

मैंने एक जाली के पास जाकर देखा तो पाया कि पत्थर में इतने बारीक छेद किए गए हैं कि आश्चर्य होता है। बिना किसी मशीन के इतना बारीक काम कैसे संभव हुआ होगा। एक जाली में 500 से ज्यादा छोटे-छोटे छेद थे।

जालियों का व्यावहारिक उपयोग

जालियां सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं हैं, बल्कि ये प्राकृतिक रोशनी और हवा के लिए भी बनाई गई हैं। गर्मी के दिनों में जब बाहर गर्म हवा चलती है, तो जालियां उसे ठंडा करके अंदर भेजती हैं। यह प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम का एक हिस्सा है।

दसवां स्थान: कमरे और अपार्टमेंट

राजसी कमरे

पटवों की हवेली के अंदर कई बड़े कमरे हैं जो राजसी ठाठ-बाठ से सजे हुए हैं। हर कमरे में एक अलग थीम है। एक कमरे में शिकार के दृश्य बने हैं, दूसरे में पौराणिक कथाओं के चित्र हैं।

मैंने एक कमरा देखा जो शायद पूजा का कमरा रहा होगा। वहां की दीवारों पर देवी-देवताओं के चित्र बने हुए हैं। उस कमरे में एक अलग तरह की शांति और पवित्रता महसूस हो रही थी।

महिलाओं के लिए खास कमरे

पटवों हवेलियों में कुछ कमरे महिलाओं के लिए खास बनाए गए थे। इन कमरों में ज्यादा झरोखे हैं ताकि महिलाएं पर्दे में रहते हुए भी बाहर का नजारा देख सकें। कमरों में छोटे-छोटे आलों में दीपक रखने की जगह बनी है।

एक कमरे में मैंने पुराने कपड़े रखने की अलमारियां देखीं। अलमारियों के दरवाजों पर पीतल की कारीगरी की गई है। हर दरवाजे पर अलग डिजाइन है – कहीं हाथी तो कहीं घोड़े बने हुए हैं।

ग्यारहवां स्थान: मेहराब और खंभे

मुगल शैली की मेहराबें

पटवों की हवेली में कई जगह मेहराब बने हैं जो मुगल स्थापत्य शैली की याद दिलाते हैं। मेहराबों पर बारीक नक्काशी की गई है। कुछ मेहराब नुकीले हैं तो कुछ गोल।

एक मेहराब के नीचे खड़े होकर मैंने फोटो खिंचवाई थी। वह मेहराब इतना खूबसूरत था कि हर कोई वहां फोटो खिंचवा रहा था। मेहराब के ऊपर फारसी में कुछ लिखा हुआ था जो शायद कोई शायरी या धार्मिक उद्धरण होगा।

खंभों पर उकेरी कहानियां

पटवों की हवेली के खंभे मोटे और मजबूत हैं। हर खंभे पर कहानियां उकेरी गई हैं। एक खंभे पर रामायण की कथा बनी है तो दूसरे पर महाभारत की। तीसरे खंभे पर जैन तीर्थंकरों के चित्र उकेरे गए हैं।

मैंने एक खंभे पर बारीकी से देखा तो पाया कि वहां एक पूरी कहानी बनी है जो ऊपर से शुरू होती है और नीचे तक चलती है। यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि किसी ने इतनी मेहनत से एक खंभे पर पूरी कहानी उकेरी होगी।

स्थान: प्रांगण और बाहरी खुली जगहें

छोटे आंगन और पार्क

पटवा हवेली परिसर में कई छोटे आंगन भी हैं जहां पेड़-पौधे लगे हुए हैं। ये आंगन आराम करने की जगह के तौर पर बनाए गए थे। एक आंगन में बेर का पुराना पेड़ है जो शायद 200 साल पुराना है।

मैं उस पेड़ के नीचे बैठा था और आसपास का नजारा देख रहा था। वहां की शांति और ठंडक बेहद सुकून देने वाली थी। गाइड ने बताया कि पहले इस आंगन में बैठकर परिवार के लोग चर्चा किया करते थे।

घूमने के लिए रास्ते

पटवों की हवेलियों के अंदर घूमने के लिए संकरे रास्ते बने हुए हैं। ये रास्ते एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाते है।

पटवों की हवेली के युद्ध, आक्रमण और हमलें

आज मैं आपको उन सभी आक्रमणों के बारे में बताऊंगा जिन्होंने जैसलमेर और इसकी हवेलियों को प्रभावित किया।

मैंने जब इतिहास खंगाला तो पाया कि पटवों की हवेली पर किसी सीधे सैन्य हमले का कोई प्रमाणित दस्तावेज नहीं मिलता। इसके कुछ कारण थे। पहला, हवेली के निर्माण के समय तक जैसलमेर में बड़े युद्धों का समय बीत चुका था।

दूसरा, पटवा परिवार व्यापारी था, राजनीतिक नहीं, इसलिए उन्हें सीधे निशाना नहीं बनाया जाता था। तीसरा, उन्होंने अपनी हवेली संकरी गलियों में बनवाई थी जो बाहरी लोगों के लिए पहुंचना मुश्किल था।

पटवों की हवेलियों का निर्माण 1805 से 1860 के बीच हुआ था। यह वह समय था जब जैसलमेर में बड़े युद्धों का दौर खत्म हो चुका था। पटवा परिवार बेहद धनी व्यापारी था और उन्होंने अपनी हवेली शहर के अंदर बसे इलाके में बनवाई थी।

किले के पास लेकिन किले के बाहर। जब मैं पटवों की हवेली में घूम रहा था, तो मुझे कई जगह दीवारों पर निशान दिखे जो समय के थपेड़ों की कहानी बयां करते थे।

स्थानीय गाइड से बात करने पर पता चला कि पटवा हवेली पर कोई सीधा आक्रमण नहीं हुआ, लेकिन जैसलमेर शहर ने। अपने इतिहास में कई भयंकर युद्ध और लूटपाट देखी है।

चलिए में आपको एक एक करके। उन सभी युद्ध, आक्रमण और हमलों के बारे में बताता हूं

जैसलमेर पर हुए प्रमुख आक्रमण जिनका असर पूरे शहर पर पड़ा

पहला आक्रमण: मुहम्मद गौरी का हमला (1178 ईस्वी)

जैसलमेर के इतिहास में पहला बड़ा आक्रमण 1178 में हुआ था, जब गोर के शासक शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने लोद्रवा (जैसलमेर की पुरानी राजधानी) पर हमला किया था।

यह हमला पटवों की हवेली के निर्माण से करीब 627 साल पहले हुआ था, इसलिए इसका हवेली पर कोई सीधा असर नहीं था।

लेकिन यह घटना जैसलमेर के इतिहास में अहम है। मुहम्मद गौरी ने लोद्रवा पर आक्रमण करके युवा रावल भोजदेव को मार डाला। इसके बाद रावल जैसल ने लोद्रवा को असुरक्षित मानकर 1156 में नया शहर जैसलमेर बसाया और एक मजबूत किला बनवाया।

स्थानीय लोग बताते हैं कि इस हमले के बाद जैसलमेर के लोगों ने सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क रहना शुरू कर दिया था। यही कारण है कि बाद में बनी हवेलियों में भी सुरक्षा का खास ध्यान रखा गया।

दूसरा आक्रमण: अलाउद्दीन खिलजी का पहला साका (1293-1294 ईस्वी)

जैसलमेर के इतिहास में सबसे खूनी और भयानक घटना अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुई। मूल राज भाटी के समय अलाउद्दीन खिलजी ने जैसलमेर पर आक्रमण किया तथा इस आक्रमण में जैसलमेर का प्रथम शाका हुआ था।

घटनाक्रम का विस्तार

यह 1293 या 1294 ईस्वी की बात है। राजा जैतसिंह के दो बेटे मूलराज और रतनसिंह ने अलाउद्दीन खिलजी का खजाना लूट लिया था और जैसलमेर भेज दिया।

जैतसिह के शासनकाल में उसके पुत्रो मूलराज और रतनसिंह ने अल्लाउद्दीन खिलजी का खजाना लुट कर जैसलमेर भेजा था। इसके अलावा, जब खिलजी ने मंडोर के शासक पर हमला किया तो उसने राजा जैतसिंह की शरण ली।

इन दोनों कारणों से क्रोधित होकर अलाउद्दीन खिलजी ने 1294 में जैसलमेर पर हमला कर दिया। उसने किले के बाहर पूरे बारह साल तक घेरा डाले रखा। पहले आठ साल तक जैतसिंह ने युद्ध का संचालन किया।

फिर उनकी मृत्यु के बाद मूलराज ने चार साल तक लड़ाई जारी रखी।

साका क्या होता है

साका राजपूताना इतिहास की सबसे दुखद परंपरा है। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी, तो राजपूत योद्धा अपनी महिलाओं को दुश्मन के हाथों में जाने से बचाने के लिए ‘जौहर’ करवाते थे। इसमें सभी महिलाएं एक बड़ी चिता में कूदकर अपनी जान दे देती थीं।

उसके बाद पुरुष केसरिया बाना पहनकर मौत को गले लगाने के लिए युद्ध में निकल जाते थे। इसे साका कहते हैं।

जब रसद समाप्त हो गई और हार निश्चित दिखी, तो जैसलमेर में पहला साका हुआ। हजारों राजपूत महिलाओं ने जौहर किया और पुरुषों ने केसरिया पहनकर मौत से लड़ाई की। अलाउद्दीन खिलजी ने किले पर कब्जा कर लिया और लगभग नौ साल तक शासन किया।

शहर पर प्रभाव

इस आक्रमण में पूरा जैसलमेर तबाह हो गया था। हजारों लोग मारे गए, घर जला दिए गए, मंदिरों और हवेलियों को लूटा गया। यह घटना पटवा हवेली के निर्माण से करीब 511 साल पहले की है, लेकिन इसने जैसलमेर की सामूहिक स्मृति पर गहरा असर डाला।

तीसरा आक्रमण: फिरोजशाह तुगलक का दूसरा साका (1352 ईस्वी)

दुर्जन साल के समय 1352 में फिरोज शाह तुगलक ने जैसलमेर पर आक्रमण किया इस आक्रमण में जैसलमेर का द्वितीय शाका हुआ।

आक्रमण का कारण

फिरोजशाह तुगलक दिल्ली का सुल्तान था। उसने जैसलमेर पर हमला किया क्योंकि जैसलमेर के रास्ते से व्यापारिक कारवां गुजरते थे और जैसलमेर के राजा उनसे कर वसूलते थे। तुगलक चाहता था कि यह कर उसे मिले।

युद्ध का घटनाक्रम

1352 में फिरोजशाह तुगलक की विशाल सेना ने जैसलमेर किले को घेर लिया। रावल दूदा, त्रिलोकसी और अन्य भाटी योद्धाओं ने बहादुरी से लड़ाई की। कई महीनों तक युद्ध चला। जब हार निश्चित लगी तो फिर से जौहर और साका हुआ।

इस युद्ध में रावल दूदा और त्रिलोकसी समेत सैकड़ों राजपूत योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। तुगलक की सेना ने शहर में घुसकर भारी लूटपाट की। मंदिरों और हवेलियों को तोड़ा गया।

प्रभाव

इस हमले के बाद जैसलमेर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। व्यापार ठप हो गया। कई परिवार शहर छोड़कर भाग गए। यह दूसरा साका भी पटवों की हवेली के निर्माण से 453 साल पहले हुआ था।

चौथा आक्रमण: कंधार के अमीर अली का हमला – अर्ध साका (1550 ईस्वी)

लूणकरण के समय 1550 में कंधार के अमीर अली ने जैसलमेर पर आक्रमण किया इस समय केसरिया तो किया गया लेकिन जोहर नहीं किया गया जिसके कारण इसे अर्थ शाका कहा जाता है।

खास घटना

यह आक्रमण 1550 में हुआ था, यानी पटवा हवेली के निर्माण से केवल 255 साल पहले। इसे अर्ध साका (आधा साका) कहा जाता है क्योंकि इसमें पुरुषों ने केसरिया पहनकर लड़ाई तो की और वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन महिलाओं ने जौहर नहीं किया।

क्यों नहीं हुआ जौहर

इतिहासकारों का मानना है कि शायद अमीर अली ने युद्ध के बीच में ही संधि की पेशकश कर दी होगी। या फिर किसी कारण से महिलाओं को बचा लिया गया होगा। रावल लूणकरण इस युद्ध में शहीद हो गए।

इस हमले का महत्व

यह हमला पटवों की हवेली के निर्माण काल के सबसे करीब का हमला है। इस समय तक जैसलमेर में व्यापार फिर से जीवित हो रहा था। लेकिन इस हमले ने एक बार फिर शहर को झकझोर दिया।

पटवों की हवेली के निर्माण काल (1805-1860): शांति का दौर

जब पटवों की हवेलियों का निर्माण शुरू हुआ, उस समय जैसलमेर में शांति थी। बड़े युद्धों का दौर बीत चुका था। 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में जैसलमेर मुगलों के ढीले नियंत्रण में था, लेकिन स्थानीय राजा को काफी स्वतंत्रता थी।

क्यों नहीं हुआ हमला

पहला कारण: व्यापारिक महत्व कम हो गया था। अब समुद्री मार्ग से व्यापार होने लगा था, इसलिए जैसलमेर का सिल्क रूट पर महत्व कम हो गया।

दूसरा कारण: मुगल साम्राज्य कमजोर हो रहा था। बड़े सुल्तान अब सत्ता में नहीं थे। छोटे-मोटे आक्रमण तो होते रहे लेकिन पूरे शहर को घेरने वाले बड़े हमले नहीं हुए।

तीसरा कारण: अंग्रेजों का आना। धीरे-धीरे अंग्रेज भारत में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे थे। उन्होंने कई राजपूत राज्यों से संधि कर ली थी जिससे एक तरह की शांति बनी रही।

लुटेरों और डकैतों से खतरा

हालांकि बड़े युद्ध नहीं हुए, लेकिन पटवों की हवेली के समय में लुटेरों और डकैतों का खतरा बना रहता था। थार रेगिस्तान में डकैती आम बात थी।

पटवा परिवार की सुरक्षा व्यवस्था

मैंने पटवा हवेली के संग्रहालय में देखा कि वहां तलवारें, भाले और ढालें रखी हुई हैं। गाइड ने बताया कि पटवा परिवार के पास अपने सुरक्षा गार्ड थे। धनी व्यापारियों को अपनी हवेलियों और माल की सुरक्षा के लिए हथियारबंद लोग रखने पड़ते थे।

हवेली की बनावट में भी सुरक्षा का ध्यान रखा गया था। संकरी गलियां, मोटी दीवारें, छोटे दरवाजे – ये सब सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। अगर कोई हमला होता भी तो संकरी गलियों में बड़ी सेना आसानी से नहीं आ सकती थी।

1857 की क्रांति और जैसलमेर

1857 में पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ। यह पटवों की हवेली के निर्माण के दौरान की घटना है (हवेली 1805-1860 में बनी)।

जैसलमेर में भी 1857 की क्रांति का कुछ असर हुआ, लेकिन यहां बड़ी लड़ाई नहीं हुई। जैसलमेर के महारावल ने अंग्रेजों का साथ दिया था, इसलिए शहर में बड़ा विद्रोह नहीं हुआ।

हालांकि, स्थानीय लोग बताते हैं कि कुछ छोटे-मोटे विरोध हुए थे और शहर में तनाव का माहौल था। लेकिन पटवों की हवेलियों पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ा।

कुलधरा गांव पालीवाल ब्राह्मणों का पलायन: एक दुखद घटना

जैसलमेर के इतिहास में एक और दुखद घटना हुई जो सीधे युद्ध से जुड़ी नहीं थी, लेकिन इसने पूरे शहर को प्रभावित किया।

घटना का समय: 1825 के आसपास (पटवों की हवेली के निर्माण के दौरान)

क्या हुआ

जैसलमेर के करीबी गांव कुलधारा में पालीवाल ब्राह्मण रहते थे जो बेहद मेहनती और समृद्ध थे। उस समय के जैसलमेर के प्रधानमंत्री सालिम सिंह बहुत क्रूर और लालची थे। उन्होंने पालीवाल ब्राह्मणों पर भारी कर लगा दिए और उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

सालिम सिंह की नजर एक सुंदर पालीवाल लड़की पर पड़ी और उसने उससे शादी करने की कोशिश की। जब पालीवाल लोगों ने इनकार किया, तो उसने और भी ज्यादा अत्याचार शुरू कर दिए।

एक रात, सभी पालीवाल ब्राह्मणों ने मिलकर फैसला किया कि वे जैसलमेर छोड़ देंगे। 1825 की उस रात, 84 गांवों के हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने एक साथ जैसलमेर छोड़ दिया। वे जाते समय अपने घरों के दरवाजों पर अभिशाप लिख गए।

पटवों की हवेली पर प्रभाव

यह घटना पटवों की हवेली के लिए भी चिंता का कारण बनी होगी। पालीवाल ब्राह्मण जैसलमेर की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा थे। उनके जाने से व्यापार पर असर पड़ा। पटवा परिवार भी व्यापारी था, तो उनके कारोबार पर भी असर हुआ होगा।

अंग्रेजी शासन काल (1818-1947)

1818 में जैसलमेर रियासत ने अंग्रेजों से संधि कर ली। इसके बाद पूरा अंग्रेजी शासन काल अपेक्षाकृत शांत रहा। पटवों की हवेली के निर्माण का अधिकांश समय अंग्रेजी शासन में ही बीता।

अंग्रेजों ने सीधे तौर पर जैसलमेर पर शासन नहीं किया, बल्कि स्थानीय राजा को राज करने दिया। बदले में राजा को अंग्रेजों को कर देना पड़ता था और उनकी बात माननी पड़ती थी।

फायदा: बड़े युद्ध नहीं हुए, शांति बनी रही।

नुकसान: समुद्री व्यापार के कारण जैसलमेर का व्यापारिक महत्व घट गया। बॉम्बे बंदरगाह खुलने से व्यापार का रुख बदल गया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965 और 1971)

पटवों की हवेलियां पूरी तरह बनकर तैयार होने के बाद, भारत की आजादी के बाद 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध हुए। यह लड़ाईयां जैसलमेर की सीमा पर लड़ी गईं क्योंकि जैसलमेर पाकिस्तान की सीमा के पास है।

1965 का युद्ध

सितंबर 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया। जैसलमेर क्षेत्र में भी कुछ झड़पें हुईं। शहर में युद्ध का तनाव था। जैसलमेर के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया।

1971 का युद्ध

भारत की आजादी के बाद भारत-पाक के बीच बंटवारा हुआ, लेकिन पाकिस्तान ने फिर से अपने नापाक इरादों के साथ हिंदुस्तान पर पहले साल 1965 में और फिर साल 1971 में हमला कर दिया।

1971 के युद्ध में जैसलमेर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। इस युद्ध के दौरान वहां के लोगों की सुरक्षा को लेकर जैसलमेर की पूरी आबादी को इस भव्य किले के अंदर भेजने का फैसला लिया गया।

जैसलमेर का किला इतना बड़ा था कि उसमें 4000 से ज्यादा लोग आ सके।

पटवों की हवेली पर प्रभाव

इन युद्धों का सीधा असर पटवों की हवेलियों पर नहीं पड़ा क्योंकि लड़ाई सीमा पर हुई, शहर के अंदर नहीं। लेकिन युद्ध के समय हवेली को भी खाली करवाया गया होगा। पर्यटन बंद हो गया था। कुछ समय के लिए सेना ने शहर के कुछ भवनों को अपने कब्जे में ले लिया था।

पटवों की हवेलियों के पर्यटनों का भ्रमण (घूमना फिरना)

मैं जब पहली बार पटवों की हवेली में गया था, तब सुबह की धूप में पीली दीवारें ऐसे चमक रही थीं जैसे सोना हो। तब मुझे समझ आया कि जैसलमेर को गोल्डन सिटी क्यों कहते हैं।

प्रवेश टिकट और समय

टिकिट: पटवों की हवेली में घुसने के लिए टिकट खरीदना होता है। हर व्यक्ति के लिए 20 रुपये से 100 रुपये तक टिकिट देना पड़ता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कौन सी हवेली देखना चाहते हैं। कुछ जगहों पर 50 रुपये भी लग सकते हैं।

मैंने 20 रुपये में एक हिस्सा देखा था और 50 रुपये में पूरी पटवों की हवेलियों में घूमा था। अगर आप कैमरा लेकर जाना चाहते हैं तो अलग से 20 से 100 रुपये देने होंगे। फोटो खींचना और वीडियो बनाना हो तो मिलाकर 100 रुपये तक खर्च हो सकते हैं।

लेकिन जब आप उन नक्काशियों को देखेंगे तो लगेगा कि यह पैसा तो कुछ भी नहीं है।

समय: पटवा हवेलियां सप्ताह के सभी दिन खुली रहती है। हवेली सुबह 9 बजे खुलती है और शाम 5 बजे बंद हो जाती है। कुछ जगहों पर शाम 6 बजे तक खुली रहती है।

मेरा सुझाव है कि सुबह 10 बजे के बाद जाएं क्योंकि तब तक धूप अच्छी हो जाती है और फोटो भी शानदार आती हैं। लेकिन कभी कभी किसी सरकारी छुट्टी पर पटवों की हवेलियां बंद हो सकती है, इसलिए जाने से पहले एक बार पता कर लें।

कब जाए: पटवों की हवेलियों को देखने के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय सबसे अच्छा है। क्योंकि इन महीनों में मौसम सुहावना रहता है।

तापमान: दिन में 24 डिग्री और रात में 7-8 डिग्री तापमान रहता है। गर्मियों में पटवों की हवेली मत जाइए क्योंकि मई जून में 42 से 50 डिग्री तक गर्मी हो जाती है।

और गर्मियों के मौसम में खासकर जैसलमेर में घूमना बेहद कठिन माना जाता है. इसीलिए सुबह या शाम का समय बेहतर है।

हवेली के बाहर भोजन और धर्मशालाएं

भोजन व्यवस्था: पटवों की हवेलियों को देखने के बाद भूख लग जाती है और अच्छी बात यह है कि आसपास खाने की बहुत अच्छी जगहें हैं। मैंने हवेली से बाहर निकलते ही एक छोटी दुकान पर दाल बाटी चूरमा खाया था।

वो इतना स्वादिष्ट था कि मैं अब भी उसका स्वाद नहीं भूला हूं।

पटवों की हवेलियों के पास के इलाकों में कई होटल और रेस्तरां हैं। हनुमान चौक पर जाएं तो वहां छोटे स्नैक्स मिलते हैं। जलेबी, समोसा, कचौड़ी और पोहा भी वहां मिल जाता है। गड़ीसर झील के पास भी कुछ अच्छे कैफे हैं जहां बैठकर खाना खा सकते हैं।

राजस्थानी खाने में दाल बाटी चूरमा, मुर्ग-ए-सब्ज, मसाला रायता, घोटुआ और कड़ी पकौड़ा जरूर चखें। पंचधारी लड्डू भी बहुत मशहूर है। एक थाली में 200 से 500 रुपये तक का खर्च आता है। स्नैक्स में 50 से 100 रुपये में पेट भर जाता है।

होटल और धर्मशालाएं: अगर आप कुछ दिन जैसलमेर में रुकना चाहते हैं तो धर्मशालाएं अच्छा विकल्प हैं। जैन धर्मशाला पटवों की हवेली रोड पर ही है।

यहां साफ सुथरे कमरे मिलते हैं और खाने की भी व्यवस्था होती है। एसी और नॉन एसी दोनों तरह के कमरे मिलते हैं।

अमर सागर पोल के पास कई धर्मशालाएं हैं जहां रुका जा सकता है। धर्मशाला जिनालय और पुराना जैन भवन भी अच्छी जगह है। इंदिरा कॉलोनी में काशीराम व्यास गोविंद धर्मशाला है। सदर बाजार के पास भी कुछ धर्मशालाएं हैं।

धर्मशालाओं में रहने का खर्च बहुत कम होता है। कुछ में तो मुफ्त में भी रुक सकते हैं अगर आप जैन समुदाय से हैं। नहीं तो 200 से 500 रुपये में अच्छा कमरा मिल जाता है। होटलों की तुलना में यह बहुत सस्ता है जहां 1000 से 5000 रुपये तक लग जाते हैं।

मैं जब गया था तो एक स्थानीय होटल में रुका था जो हवेली से 10 मिनट की दूरी पर था। वहां 1500 रुपये में अच्छा कमरा मिला था। लेकिन अगली बार मैं धर्मशाला में रुकने की सोच रहा हूं क्योंकि वहां स्थानीय लोगों से बात करने का मौका मिलता है।

हवेली में पर्यटकों की सुविधाएं

पटवों की हवेली के अंदर घूमना बेहद आसान है। सीढ़ियां बनी हुई हैं जो आपको ऊपर की मंजिलों तक ले जाती हैं। हालांकि बुजुर्गों के लिए यह थोड़ा मुश्किल हो सकता है क्योंकि सीढ़ियां पुरानी और संकरी हैं।

मेरे साथ पटवों की हवेलियों में मेरी दादी गई थीं और उन्हें थोड़ी परेशानी हुई थी, लेकिन धीरे धीरे वो भी ऊपर चढ़ गईं। अंदर जगह जगह पर बैठने की व्यवस्था है। कमरे बड़े हैं और खिड़कियों से ठंडी हवा आती है।

गर्मियों में भी अंदर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है क्योंकि पटवों की हवेली में दीवारें मोटी हैं।

मैंने मई के महीने में यहां घूमा था और बाहर 42 डिग्री था, लेकिन अंदर काफी सहन करने लायक था। वही टॉयलेट की सुविधा हवेली के बाहर या पास में मिल जाती है। पीने के पानी के लिए भी व्यवस्था है।

लेकिन अपने साथ एक बोतल पानी की जरूर रखें खासकर गर्मियों में। पटवों की हवेलियों के अंदर गाइड भी मिल जाते हैं। वो 200 से 300 रुपये में पूरी हवेली घुमा देते हैं और हर चीज के बारे में बताते हैं। अगर आप हवेली का पूरा इतिहास जानना चाहते हैं।

तो गाइड रखना अच्छा रहता है। पार्किंग की सुविधा हवेली के पास ही है। आप रिक्शा, ऑटो या अपनी गाड़ी से आ सकते हैं। जैसलमेर किले से यहां आने में बस 10 मिनट लगते हैं।

स्थानीय जानकारी और सुझाव

पास में ही सलीम सिंह की हवेली और नाथमल की हवेली भी हैं। एक ही दिन में तीनों हवेलियां देखी जा सकती हैं। गड़ीसर झील भी 10 मिनट की दूरी पर है जहां नाव की सवारी का मजा ले सकते हैं। वहां 50 से 100 रुपये में 30 मिनट की सवारी मिल जाती है।

जैसलमेर किला तो देखना ही है जो पटवों की हवेली से बस 10 मिनट दूर है। किले में घुसने के लिए पैसे नहीं लगते लेकिन अंदर के महल देखने हों तो 200 रुपये देने पड़ते हैं।

पटवों की हवेलियों के निकट स्थानीय बाजार में जरूर जाएं। वहां राजस्थानी कपड़े, चांदी के जेवर, ऊंट की चमड़े की चीजें और रंगीन दुपट्टे मिलते हैं। मैंने अपनी बहन के लिए एक कंथा बैग खरीदा था जो बहुत पसंद आया।

जैसलमेर में घूमने के लिए रिक्शा, ऑटो और टैक्सी मिल जाती हैं।

पूरे दिन के लिए टैक्सी बुक कर लें तो आराम से सारी जगहें घूम सकते हैं। एक दिन की टैक्सी में 1500 से 2000 रुपये लगते हैं। थार रेगिस्तान में ऊंट की सवारी करना मत भूलिएगा। यह एक अलग ही अनुभव है।

सैम सैंड ड्यून्स पर शाम को जाएं और वहां रेत के टीलों पर सूरज डूबता देखें। यह नजारा कभी नहीं भूलेंगे। ऊंट सफारी में 1000 से 3000 रुपये तक खर्च होता है।

पटवों की हवेलियों के स्थानीय लोग बहुत अच्छे हैं। अगर कुछ पूछना हो तो बेझिझक पूछें। वो खुशी से रास्ता बता देते हैं। मैंने एक दुकानदार से पूछा था।

कि सबसे अच्छा खाना कहां मिलेगा और उसने एक छोटी गली में ले जाकर ऐसा ढाबा दिखाया जहां का खाना अब तक नहीं भूला हूं।

पानी की बोतल हमेशा साथ रखें। जूते आरामदायक पहनें क्योंकि बहुत चलना पड़ता है। धूप से बचने के लिए टोपी या दुपट्टा जरूर लें। गर्मियों में छाता भी काम आता है।

पटवों की हवेलियों का पर्यटन यात्रा मार्ग (यहां कैसे पहुंचे)

सड़क मार्ग से पर्यटक पटवों की हवेली कैसे पहुंचे

पहला चरण: नजदीकी बस स्टैंड तक पहुंचना

शहरदूरी (किमी)समय (घंटे)बस का नाम/प्रकारसरकारी किराया (₹)
दिल्ली65217-18RSRTC Volvo/AC1200-2000
मुंबई120024-26Private/RSRTC2500-4000
कोलकाता190036-40Private3500-5000
बैंगलोर217440-42Private2900-4000
हैदराबाद160028-30Private2800-4500
अहमदाबाद45010-12GSRTC/RSRTC800-1500
चेन्नई220042-45Private4000-6000
सूरत80015-17Private1500-2500
पुणे110022-24Private2200-3500
जयपुर55013-14RSRTC Express700-900.
कानपुर90018-20UPSRTC1200-1800
नागपुर110022-24Private2000-3000
लखनऊ95019-21UPSRTC1300-2000
भोपाल85016-18MPSRTC1400-2200
इंदौर75014-16Private1200-2000
पटना140028-30Private2500-4000
भुवनेश्वर200038-40Private3500-5500
विशाखापत्तनम210040-42Private3800-6000
मदुरै240045-48Private4500-7000
तिरुचिरापल्ली230044-46Private4200-6500

दूसरा चरण: बस स्टैंड से पटवों की हवेली तक पहुंचना

जैसलमेर बस स्टैंड से पटवों की हवेलियां सिर्फ 2 किलोमीटर दूर है। पर्यटन कई तरीकों से यहां पहुंच सकते हैं:

ऑटो रिक्शा: बस स्टैंड से ऑटो लेना सबसे आसान तरीका है। किराया 30-50 रुपए तक होता है। मैंने 40 रुपए में ऑटो किया था।

टैक्सी या कैब: अगर पर्यटन आराम से जाना चाहते हैं, तो प्राइवेट टैक्सी ले सकते हैं। किराया 100-150 रुपए होगा।

पैदल: अगर आपके पास समय है और आप शहर की गलियों को देखना चाहते हैं, तो पैदल भी जा सकते हैं। 20-25 मिनट में पहुंच जाएंगे।

महत्वपूर्ण बात: पटवों की हवेलियां जैसलमेर के मध्य इलाके में अमर सिंह पोल में स्थित है। हालांकि मुख्य सड़कें हवेली तक जाती हैं, लेकिन आखिरी 200-300 मीटर की संकरी गलियों में आपको पैदल चलना होगा।

यही संकरी गलियां पुराने जैसलमेर की असली खूबसूरती दिखाती हैं।

रेल मार्ग से पर्यटन पटवों की हवेली कैसे पहुंचे

पहला चरण: नजदीकी रेलवे स्टेशन तक पहुंचना

शहरदूरी (किमी)समय (घंटे)रेल का नामकिराया (₹, स्लीपर/3A)
दिल्ली80012-14Ranikhet Exp (15014)440/1185
मुंबई110021-22BDTS JSM SF (22931)595/1550.
कोलकाता170030-32Weekly Exp700/2000
बैंगलोर200036-40Via Delhi800/2500
हैदराबाद150028-30Weekly650/1900
अहमदाबाद4509-10JSM Exp350/1000
चेन्नई220040-42Via Delhi900/2800
सूरत70013-15SF Exp450/1200
पुणे100020-22Weekly550/1500
जयपुर48512-13Ranikhet Exp (15014)380/1100
कानपुर75015-17Exp via Delhi500/1400
नागपुर95018-20Weekly550/1600
लखनऊ80016-18Exp520/1450
भोपाल70013-15Exp450/1300
इंदौर60012-14SF Exp400/1200
पटना130025-27Weekly600/1800
भुवनेश्वर180034-36Via Delhi750/2200
विशाखापत्तनम190036-38Weekly780/2400
मदुरै250046-48Via Chennai1000/3200
तिरुचिरापल्ली240045-47Long Route950/3000

दूसरा चरण: रेलवे स्टेशन से पटवों की हवेली तक पहुंचना

जैसलमेर रेलवे स्टेशन से पटवों की हवेलियां 2 किलोमीटर की दूरी पर है। आपके पास कई विकल्प हैं:

ऑटो रिक्शा: स्टेशन के बाहर हर समय ऑटो मिल जाते हैं। किराया 30-60 रुपए के बीच होता है। भीड़ के समय थोड़ा ज्यादा मांग सकते हैं, इसलिए पहले किराया तय कर लें। फिर पटवों की हवेली जाने का फैसला ले।

शेयर्ड ऑटो: कई बार एक ऑटो में 3-4 लोग बैठकर जाते हैं, तो किराया 15-20 रुपए प्रति व्यक्ति हो जाता है।

टैक्सी या कैब: प्री-पेड टैक्सी की सुविधा स्टेशन पर उपलब्ध है। किराया 100-200 रुपए होता है। आप ओला या उबर भी बुक कर सकते हैं।

साइकिल या बाइक किराए पर: अगर आप एडवेंचर पसंद करते हैं, तो स्टेशन के पास साइकिल या बाइक किराए पर मिल जाती है। 50-100 रुपए में पूरे दिन के लिए ले सकते हैं।

पैदल: अगर आपके पास हल्का सामान है, तो 25-30 मिनट में पैदल भी जा सकते हैं। रास्ते में शहर की पुरानी गलियां और दुकानें देखने का मजा अलग है।

हवाई मार्ग से पर्यटक पटवों की हवेली कैसे पहुंचे

पहला चरण: नजदीकी एयरपोर्ट तक पहुंचना

शहरदूरी (किमी)समय (घंटे)विमान का नाम/एयरलाइनकिराया (₹, इकोनॉमी)
दिल्ली8501.5IndiGo 6E-25584000-8000
मुंबई11002IndiGo (1 stop)5000-10000
कोलकाता19003-4 (stop)IndiGo7000-15000
बैंगलोर17003 (stop)SpiceJet5400-13000
हैदराबाद14002.5 (stop)IndiGo6000-12000
अहमदाबाद5001.5 (stop)IndiGo4500-9000
चेन्नई20003.5 (stop)IndiGo8000-16000
सूरत7002 (stop)Private5500-11000
पुणे9002 (stop)IndiGo5000-10000
जयपुर3001SpiceJet/IndiGo3500-7000
कानपुर7002 (via DEL)IndiGo5500-11000
नागपुर9002.5 (stop)IndiGo6000-12000
लखनऊ8002.5 (via DEL)Air India5800-12000
भोपाल7002 (stop)IndiGo5000-10000
इंदौर6002 (stop)Air India4500-9000
पटना12003 (stop)IndiGo6500-14000
भुवनेश्वर17004 (stop)IndiGo7500-16000
विशाखापत्तनम16003.5 (stop)IndiGo7000-15000
मदुरै22004 (multi)Private9000-20000
तिरुचिरापल्ली21004 (multi)IndiGo8500-18000

दूसरा चरण: जोधपुर एयरपोर्ट से पटवों की हवेली तक पहुंचना

जोधपुर एयरपोर्ट से जैसलमेर पहुंचने के कई विकल्प हैं:

प्री-बुक्ड टैक्सी: एयरपोर्ट से जैसलमेर के लिए टैक्सी बुक कर सकते हैं। किराया 4000-6000 रुपए होता है। यात्रा में 5-6 घंटे लगते हैं। इसमें आप रास्ते में रुककर खाना-पानी भी ले सकते हैं।

बस सेवा: एयरपोर्ट से जोधपुर शहर के बस स्टैंड तक जाएं (10-15 किलोमीटर), फिर वहां से जैसलमेर की बस पकड़ें। यह सबसे सस्ता विकल्प है. एयरपोर्ट से शहर 50-100 रुपए और फिर बस का 250-600 रुपए।

रेंटल कार: अगर आप अपनी मर्जी से घूमना चाहते हैं, तो जोधपुर में सेल्फ ड्राइव कार किराए पर ले सकते हैं। रोज का किराया 1500-2500 रुपए होता है।

ट्रेन: एयरपोर्ट से जोधपुर रेलवे स्टेशन जाएं (करीब 5 किलोमीटर), फिर वहां से जैसलमेर की ट्रेन पकड़ें। यह थोड़ा समय लेगा लेकिन सस्ता पड़ेगा।

जैसलमेर पहुंचने के बाद: जब आप जैसलमेर शहर पहुंच जाएं (बस या ट्रेन से), तो ऊपर बताए गए तरीकों से पटवों की हवेलियों तक पहुंच सकते हैं। ऑटो, टैक्सी या पैदल – जो भी आपको पसंद हो।

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पटवों की हवेलियों पर निष्कर्ष

पटवों की हवेलियां जैसलमेर की सबसे शानदार हवेलियां है. यह 19वीं सदी के शुरू के समय बनी थी। माना जाता है कि यह 1805 ईस्वी में बनवाई गई. इसे धनी व्यापारी गुमान चंद पटवा ने बनवाया था. उन्होंने यह हवेली अपने पाँच बेटों के लिए बनवाई।

इसलिए इसे पटवों की हवेलियां भी कहा जाता है. हवेली के पाँच हिस्से हैं और यह सुनहरे पत्थरों से चमकती है. मैंने इसे दिसंबर 2024 में देखा. सूरज की रोशनी उसकी बारीक नक्काशी पर पड़ती थी।

रेगिस्तान की ठंडी हवा और आसपास की चुप्पी इसे जादुई बना देती है

यह हवेली राजपूत और मुगल शैली का मिला-जुला रूप है. दीवारों पर फूल, जानवर और ज्यामितीय आकार की नक्काशी दिखती है. ऊपरी मंज़िलों से जैसलमेर किले का नज़ारा बेहद सुंदर लगता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पटवा व्यापारी रेशम और सोना बेचते थे।

19वीं सदी में यह हवेली जैसलमेर के व्यापार का केंद्र थी. समय के साथ यह खंडहर हो गई. 20वीं सदी में इसे सरकारी सुरक्षा मिली. आज यह पर्यटकों के लिए खुली है. सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक घूम सकते हैं. भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क 50 रुपये है।

मेरा अनुभव खास था। मैं जैसलमेर पहुँचा। ठंडी शाम में पटवों की हवेलियों के अंदर गया। गाइड ने बताया कि पहली हवेली गुमान चंद ने अपने बेटे मोती चंद के लिए बनवाई थी। मोती चंद ने आगे चार हिस्से जोड़े। हर हिस्सा एक अलग परिवार के लिए था।

दीवारों पर पेंटिंग्स रंगीन थीं और अभी भी चमकते थे। मैंने छत पर चढ़कर रेगिस्तान देखा; सूर्यास्त का समय था। नीचे बाजार की रोशनी जल रही थी। स्थानीय चाय की दुकान पर बैठकर गर्म चाय पी। वहाँ बुजुर्गों ने पुरानी कहानियाँ सुनाईं।

एक ने कहा कि पटवों की हवेलियों में भूतों की कहानियाँ भी चलती हैं, पर मैंने कुछ नहीं देखा। रात को होटल लौटकर मुझे नींद अच्छी आई। अगले दिन फिर गया और तस्वीरें लीं

पटवा हवेली के पास गादिसर झील है। शाम को वहाँ ऊंट की सवारी कर सकते हैं। जैसलमेर में नवंबर से फरवरी तक मौसम अच्छा रहता है। गर्मी में मत जाइए, बहुत गर्मी पड़ती है। खाने में स्थानीय दाल-बाटी-चूरमा खाइए।

पटवा हवेलियों के आसपास की दुकानों पर हस्तशिल्प खरीदिए. लेकिन दुकानदारों से मोलभाव करें. सुरक्षा के लिए दिन में घूमिए. महिलाओं को साड़ी या सलवार-सूट पहनना अच्छा लगता है।

पटवों की हवेलियों पर 20 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: कोठरी पटवों की हवेली क्या है?

उत्तर: पटवों की हवेली जैसलमेर में स्थित पाँच हवेलियों का समूह है, जिन्हें पटवा व्यवसायिक परिवार ने 1800–1860 के बीच बनवाया था। यह हवेलियाँ अपनी स्वर्ण-नगरी शैली, जालीदार खिड़कियों, भव्यता और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 2: पटवों की हवेली किसने बनवाई थी?

उत्तर: इन हवेलियों को अमीर व्यापारी गुरुमल चिरंजन दास पटवा और उनके परिवार ने बनवाया था, जो सोने–चाँदी, कढ़ाई और व्यापार के लिए प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 3: पटवों की हवेली कब बनाई गई थी?

उत्तर: निर्माण कार्य लगभग 1805 से 1860 के बीच हुआ, यानी लगभग 55 वर्षों में इन पाँच हवेलियों का निर्माण पूरा हुआ।

प्रश्न 4: पटवों की हवेली को “पाँच हवेलियों का समूह” क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि यहाँ पाँच अलग-अलग भाइयों के लिए पाँच स्वतंत्र हवेलियाँ बनाई गई थीं, जिनमें हर हवेली का अपना डिज़ाइन और पहचान है।

प्रश्न 5: पटवों की हवेली की सबसे बड़ी और भव्य हवेली कौन सी है?

उत्तर: पहली और सबसे भव्य हवेली कोठारी की पटवा हवेली (कई बार कोठारी हवेली कहा जाता है) है।

प्रश्न 6: पटवों की हवेली में कौन-सी हवेली सबसे ज्यादा परंपरागत शैली में है?

उत्तर: चौथी हवेली अपनी परंपरागत राजस्थानी निर्माण शैली के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

प्रश्न 7: पाँचवीं हवेली का नाम क्या है?

उत्तर: पाँचवीं हवेली को ऐतिहासिक रूप में गुरुमल पटवा हवेली कहा जाता है, जिसे सबसे नई और आधुनिक मानी जाती है।

प्रश्न 8: पटवों की हवेली का मुख्य आकर्षण क्या है?

उत्तर: सूक्ष्म जालीदार नक्काशी, कांच की सजावट, भित्ति चित्र, सोने की कारीगरी और 19वीं सदी के वाणिज्यिक जीवन को दर्शाती वस्तुएँ मुख्य आकर्षण हैं।

प्रश्न 9: क्या पटवों की हवेली में कोई रहस्य जुड़ा हुआ है?

उत्तर: स्थानीय कथाओं के अनुसार, हवेलियों में व्यापारिक तिजोरियों के गुप्त मार्ग, पुराने रिकॉर्ड और अदृश्य धन के रहस्य बताए जाते हैं, पर ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं।

प्रश्न 10: क्या पटवों की हवेली में एक म्यूजियम भी है?

उत्तर: हाँ, दो हवेलियाँ—विशेषकर कोठारी पटवा हवेली—आज संग्रहालय के रूप में संचालित होती हैं जहाँ पुराने फर्नीचर, व्यापारिक उपकरण, पेंटिंग्स और दस्तावेज़ रखे हैं।

प्रश्न 11: पटवों की हवेली में प्रवेश शुल्क कितना है?

उत्तर: भारतीय पर्यटकों के लिए लगभग ₹100–₹150, और विदेशी पर्यटकों के लिए लगभग ₹250–₹300 (समय के अनुसार थोड़ा बदल सकता है)।

प्रश्न 12: पटवों की हवेली के खुलने का समय क्या है?

उत्तर: सामान्यतः सुबह 9:00 AM से शाम 5:00 PM तक पर्यटकों के लिए खुली रहती है।

प्रश्न 13: पटवों की हवेली कहाँ स्थित है?

उत्तर: यह जैसलमेर शहर के गढ़सीसर झील के पास, “पटवा वैद्य मोहल्ला” में स्थित है।

प्रश्न 14: पटवों की हवेलियां किस पत्थर से बनाई गई है?

उत्तर: इसे जैसलमेर के पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया है, जो सूर्य की रोशनी में सोने जैसा चमकता है।

प्रश्न 15: पटवों की हवेली का वास्तुकला शैली क्या है?

उत्तर: राजस्थानी, मुगल और व्यापारिक वास्तुकला का मिश्रित रूप, जिसमें नक्काशीदार झरोखे, बालकनी और सजावटी दरवाजे प्रमुख हैं।

प्रश्न 16: क्या पटवों की हवेली में फोटोग्राफी की अनुमति है?

उत्तर: हाँ, लेकिन कुछ संग्रहालय कमरे में अतिरिक्त शुल्क लागू हो सकता है।

प्रश्न 17: पटवों की हवेली किसके अधीन है?

उत्तर: दो हवेलियाँ राजस्थान सरकार और शेष हवेलियाँ निजी स्वामित्व में हैं।

प्रश्न 18: पटवों की हवेली घूमने में कितना समय लगता है?

उत्तर: पटवों की हवेलियों में लगभग 1 से 2 घंटे, यदि आप हर हवेली के अंदर की कला को ध्यान से देखें।

प्रश्न 19: क्या पटवों की हवेली परिवार अभी भी जैसलमेर में रहता है?

उत्तर: नहीं, मूल पटवा परिवार ने जैसलमेर छोड़कर बनारस, कोलकाता और अन्य व्यापारिक शहरों में स्थायी रूप से बस गए थे।

प्रश्न 20: क्या पटवों की हवेली जैसलमेर का सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है?

उत्तर: हाँ, जैसलमेर किला और गढ़सीसर झील के बाद पटवों की हवेली सबसे ज्यादा देखे जाने वाले आकर्षणों में से एक है।

Author (India World History)

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