इतिहास का परिचय | Chittorgarh Fort History
पहली ऐतिहासिक स्थापना
चित्तौड़गढ़ किले की जगह पर, प्राचीन महाभारत काल में भी इस स्थान पर एक किला हुआ माना जाता है। क्योंकि महाभारत का युद्ध आज से लगभग 5100 वर्ष पहले हुआ था।
ओर चित्तौड़गढ़ किले के इस स्थान की सामरिक और धार्मिक रीति रिवाज हजारों वर्षों से चली आ रही है। किवदंती के अनुसार, एक बार भीम जब संपत्ति की खोज में निकले थे।
तो उन्हें रास्ते में एक योगी मिले। जिन्होंने पारस पत्थर के बदले रातों-रात पहाड़ी पर किले के निर्माण की शर्त रखी। और भीम अपने भाइयों के साथ किले के निर्माण (वर्तमान चित्तौड़गढ़ किला) वाले स्थान में जुट गए।
दूसरी बात, ईसा के जन्म से लगभग सवा तीन सौ साल पहले मौर्य वंश की स्थापना हुई थी। तब चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही। मौर्यों की सत्ता राजस्थान में फैल गई।
हालांकि चित्तौड़गढ़ पर मौर्यों का अधिकार बहुत ही पुराना माना जाता हैं। जहां किले की औपचारिक स्थापना 7वीं शताब्दी में हुई। चित्तौड़ पर मौर्यों का अधिकार अशोक के शासन काल में भी हुआ करता था.
इसका अनुमान इस तथ्य से लगता है कि अंग्रेज पुरातत्त्वविद हेनरी कजेन्स ने एक अशोक कालीन सिंह मस्तक, नगरी (जिला चित्तौड़गढ़) की कंकाली माता की मूर्ति के पास पड़ा देखा था।
यह पुरातात्त्विक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करता है कि चित्तौड़गढ़ क्षेत्र पर मौर्य वंश का प्रभाव मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष काल से ही रहा है।
तीसरी बात, चित्तौड़गढ़ किले की पहली ऐतिहासिक स्थापना की कहानी। 7वीं शताब्दी से शुरू में भी मानी जाती है।
यह वही कालखंड है जब भारत में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभर रही थीं। किंतु मौर्य वंश के शासकों ने राजस्थान में अपनी जड़ें पहले से ही जमाई हुई थीं।
जहां मौर्य शासक चित्रांगद मौर्य ने। 734 ईस्वी में इस किले के निर्माण की शुरुआत की थी। उस वक्त किले को 700 एकड़ के विशाल इलाके में। किले को समुद्र तल से लगभग 180 मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया था।
इस समय के दौरान इसे चित्रकुट के नाम से जाना जाता था। जो बाद में अपने वर्तमान नाम चित्तौड़गढ़ में विकसित हुआ। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि ‘चित्रकूट’ नाम सीधे राजा चित्रांगद के नाम से लिया गया था।
जो यह सिद्ध करता है कि इस नगर और किले की पहचान उसी एक राजा से जुड़ी हुई थी। वहीं मेवाड़ के प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम देखने को मिलता है।
हालांकि किले की नींव पूर्व मौर्य काल में रखी गई थी। जब यह इलाका छोटे राजवंशों के पास था।
पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि यह स्थान महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ माना है। लेकिन ठीक 8वीं सदी के आसपास इसे चित्रकूट के नाम से जाना गया। किले में प्राचीन मंदिर और कुछ खंडहर के अवशेष आज देखे जा सकते है। जो काफी प्राचीन माने जाते है।
8वीं शताब्दी के बाद यह किला मेवाड़ के गुहिल वंश के अधीन आया। और फिर 734 से 1303 ईस्वी तक। यह राजपूतों की शक्ति का प्रमुख केंद्र बना रहा। जहां गुहिल वंश (वर्तमान सिसोदिया खानदान) के राजा बप्पा रावल ने। इस किले को मेवाड़ की राजधानी बनाया। और उनके शासनकाल में किले का विकास और मजबूती बढ़ी।
किले के अंदर आज भी। विशाल विजय स्तंभ बना हुआ है। जिसे कुंभलगढ़ किले के राजा राणा कुंभा ने। 1448 में मालवा के सुल्तान (महमूद गजनवी) और गुजरात की सभी सेनाओं पर। अपनी जीत की खुशी में। विजय स्तंभ को बनवाया था।
स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार यह किला 300 से अधिक वर्षों तक मेवाड़ की राजधानी रहा। और यही से पूरे मेवाड़ राज्य पर शासन किया जाता था। आज भी ।किले की दीवारों पर लगी शिलालेखों में। राजपूत राजाओं की वीरता की कहानियां लिखी हुई है।
सांस्कृतिक महत्त्व
चित्तौड़गढ़ किला राजस्थान ही नहीं। बल्कि पूरे भारत की संस्कृति का एक जीता जागता उदाहरण माना जाता है। क्योंकि इस किले की हर दीवार में राजपूतों की वीरता, त्याग और स्वाभिमान की गाथाएं छुपी हुई हैं।
यह किला 7वीं शताब्दी से लेकर। 16वीं शताब्दी तक मेवाड़ सिसोदिया राजवंश की सांस्कृतिक राजधानी रहा है। जिसमें राजपूत संस्कृति अपने सबसे उज्जवल रूप में दिखती है।
राजपूत वास्तुकला की पहचान:- चित्तौड़गढ़ किले में बनी इमारतें राजपूत स्थापत्य कला का अलग ही नमूना हैं। जिनमें विजय स्तंभ, रानी पद्मिनी महल और कुंभ श्याम मंदिर आदि शामिल हैं।
तीन साके और बलिदान की परंपरा:- इस किले में तीन महान साके (जौहर और शाके की घटनाएं) हो चुकी है। जिसमें यह घटना 1303 ई., 1534 ई. और 1568 ई. में हुई थी। जो राजपूत संस्कृति में आत्मसम्मान की खास मिसाल मानी जाती हैं।
मीराबाई की भक्ति संस्कृति:- महान कवयित्री और भक्त मीराबाई का जीवन भी। इसी किले से जुड़ा हुआ है। क्योंकि उनकी कृष्ण-भक्ति की परंपरा ने पूरे उत्तर भारत की लोक संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है।
UNESCO विश्व धरोहर स्थल:- वर्ष 2013 में UNESCO ने चित्तौड़गढ़ किले को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया था। जिससे इसका सांस्कृतिक महत्त्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ओर भी ज्यादा बढ़ किया।
लोक कलाओं का केंद्र:- इस किले ने राजस्थानी लोकगीत, लोकनृत्य, चित्रकला और हस्तशिल्प तक अपनी पहुंच बढ़ाई है। जहां यह मेवाड़ दरबार कलाकारों का सबसे बड़ा संरक्षक रहा है।
इतिहास और साहित्य का संगम:- जायसी का पद्मावत, मेवाड़ के चित्र और राजपूत इतिहास ग्रंथ सभी इसी किले की घटनाओं पर आधारित माने जाते हैं। जो भारतीय साहित्यिक संस्कृति की अनमोल धरोहर भी हैं।
धार्मिक महत्त्व
चित्तौड़गढ़ किला एक विशाल धार्मिक परिसर भी हुआ करता था। जिसमें हिंदू, जैन और शैव तीनों धार्मिक परंपराओं के पवित्र मंदिर बने हुए हैं। वहीं इस किले की भूमि पर बने मंदिर। आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था के केंद्र बने हुए हैं।
कुंभ श्याम मंदिर (विष्णु मंदिर):- इस मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। और यह वैष्णव धर्म का प्रमुख केंद्र भी माना जाता है।
मीराबाई मंदिर:- किले में स्थित मीराबाई का मंदिर कृष्ण भक्ति का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। क्योंकि यहीं पर मीरा बाई ने अपनी साधना और भजन-कीर्तन के माध्यम से भगवान कृष्ण की आराधना की थी।
श्रृंगार चंवरी मंदिर:- श्रृंगार चंवरी का या मंदिर महावीर स्वामी को समर्पित है। और जैन धर्म के तीर्थयात्रियों के लिए भी। एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है।
सतबीस देवरी (जैन मंदिर परिसर):- किले में 27 जैन मंदिरों का एक विशाल परिसर बना हुआ है। जिसमें जैन तीर्थंकरों की अद्भुत प्रतिमाएं स्थापित की गई थी।
कालिका माता मंदिर:- यह प्राचीन शक्तिपीठ मंदिर 8वीं शताब्दी में बनाया गया था। जिसको पहले सूर्य देव के रूप में पूजा जाता था।
किंतु बाद में इसे देवी काली के मंदिर के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। जहां रोजान अब भी महाकाली माता की पूजा अर्चना की जाती है। ओर यहां आने वाले पर्यटक भी माता का आशीर्वाद लेते है।
गोमुख कुंड:- किले में स्थित यह पवित्र कुंड धार्मिक दृष्टि से इसकी बहुत ही ज्यादा पूजा अर्चना की जाती है। क्योंकि गाय के मुख के आकार की चट्टान से निरंतर जल बहता रहता होता है। जिसे गंगाजल के समान बहुत ही पवित्र माना जाता है।
आध्यात्मिक महत्त्व
चित्तौड़गढ़ किला आध्यात्मिक दृष्टि से त्याग, भक्ति और आत्मशुद्धि की भूमि भी माना जाता है। जहां हर कण में किसी न किसी साधक, भक्त या वीर की आत्मा की अनुभूति होती है।
मीराबाई की भक्ति साधना भूमि:- मीराबाई ने पहली बार। इसी किले में रहकर अपनी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत की थी। क्योंकि उनके भजन और कीर्तन आज भी करोड़ों लोगों के लिए। ईश्वर से जोड़ने का माध्यम बने हुए हैं।
जौहर की अग्नि और आत्मशुद्धि:- रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 1303 ई. में हुआ जौहर। केवल इतिहास की घटना ही नहीं मानी जाती है। बल्कि यह खुद की रक्षा के लिए। अपने प्राणों की आहुति देने की वह परंपरा है। जिसे भारतीय आध्यात्मिक चेतना में सर्वोच्च बलिदान माना जाता है।
विजय स्तंभ और आध्यात्मिक ऊर्जा:- विजय स्तंभ केवल जीत का प्रतीक नहीं माना जाता है। बल्कि यह ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का एक आध्यात्मिक स्मारक भी है। जिसकी दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां बनाई गई थी।
तीर्थ स्थल की अनुभूति:- यहां आने वाले पर्यटक बताते हैं। कि किले की मिट्टी में एक असाधारण आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास होता है। क्योंकि यह भूमि हजारों साल की तपस्या, बलिदान और भक्ति से जुड़ी हुई है।
साधु-संतों की शरणस्थली:- मध्यकाल में कई संत और साधक इस किले की शांत भूमि पर ध्यान और साधना के लिए आया करते थे। जिसमें शैव, वैष्णव और जैन परंपराओं के संत एक साथ अपनी आध्यात्मिक खोज करते थे।
भूगोल
भौगोलिक स्थिति
चित्तौड़गढ़ किला राजस्थान राज्य के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। जो भारत के पश्चिमी भाग में शामिल है। यह किला बेड़च नदी (प्राचीन नाम: गंभीरी) के किनारे। एक विशाल पहाड़ी पर बनाया गया था।
जो इसे प्राकृतिक रूप से बेहद सुरक्षित बनाती है। वहीं किले की भौगोलिक स्थिति लगभग 24.8887° उत्तरी अक्षांश और 74.6269° पूर्वी देशांतर पर है। जो इसे अरावली पर्वत श्रृंखला के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में रखती है।
क्षेत्रफल: यह किला लगभग 700 एकड़ (280 हेक्टेयर) में फैला हुआ है।
ऊंचाई: किला समुद्र तल से लगभग 180 मीटर (590 फीट) की ऊंचाई पर बनाया गया था।
पहाड़ी की लंबाई: लगभग 13 किलोमीटर लंबी और 3 किलोमीटर चौड़ी पहाड़ी पर बनवाया गया था।
यह किला उदयपुर से लगभग 112 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है। किंतु यह भौगोलिक दूरी।
इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उदयपुर से जोड़कर रखती है। चित्तौड़गढ़ शहर स्वयं किले की तलहटी में बसा हुआ है। जो इस क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक जीवन का केंद्र है।
पहाड़ी, जमीन का आकार
चित्तौड़गढ़ किला जिस पहाड़ी पर बना हुआ है। वह अरावली पर्वत श्रृंखला की एक प्रमुख शाखा मानी जाती है।
जो हजारों वर्षों से इस क्षेत्र की भूमि को आकार देती आई है। यह पहाड़ी मेसा (Mesa) प्रकार की है। अर्थात् इसकी चोटी समतल और किनारे खड़ी ढलान वाले हैं। जो इसे सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं।
चट्टानों का प्रकार: किले के पहाड़ की चट्टानों में बलुआ पत्थर (Sandstone) और क्वार्टजाइट (Quartzite) मौजूद है।
खड़ी ढलानें: पहाड़ी के चारों ओर लगभग 30 से 90 मीटर तक की खड़ी प्राकृतिक दीवारें बनाई गई थी।
भूमि क्षेत्र: किले के अंदर की भूमि काफी हद तक समतल और उपजाऊ है।
मिट्टी: किले में लाल-भूरी मिट्टी है। जो वर्षा के बाद हरी वनस्पति (घास) उगाती है।
प्राकृतिक जल स्रोत: किले के अंदर पहले कभी 84 जलाशय और कुंड मौजूद हुआ करते थे। जिनमें से अब भी कई जलाशय, कुंड देखे जा सकते हैं।
किले की यह प्राकृतिक संरचना इतनी मजबूत हुआ करती थी। कि शत्रु की सेनाएं सीधे आक्रमण करने में नाकामयाब हो जाती थीं। परंतु लंबे घेराबंदी (Siege) के समय जल और खाद्य की कमी ही सबसे बड़ी वजह बन जाती थी।
प्रवेश दरवाजे, रास्तों की भौगोलिक बनावट
चित्तौड़गढ़ किले तक पहुंचने का मार्ग। भौगोलिक दृष्टि से बहुत ही मुश्किल और घुमावदार था। जो इसे प्राकृतिक रूप से सुरक्षा देता है।
किले तक जाने वाला एकमात्र मुख्य रास्ता। पहाड़ी के दक्षिण-पश्चिम दिशा से होकर गुजरता है। जो लगभग 1.5 किलोमीटर लंबा और अत्यंत संकरा माना जाता है।
कुल प्रवेश द्वार (पोल): पहले बताया गया है कि किले में 7 प्रमुख द्वार बनाए गए थे। पाडन पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़न पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल आदि शमिल है।
राम पोल: यह मुख्य और अंतिम प्रवेश द्वार है माना जाता है। जो सीधे किले के मुख्य क्षेत्र में जाकर खुलता है।
चढ़ाई का कोण: मार्ग की ढलान लगभग 15 से 25 डिग्री तक बनी हुई है। जो घोड़ों और हाथियों के लिए भी चढ़ना काफी मुश्किल होता है।
मार्ग की चौड़ाई: संकरे स्थानों पर केवल 2 से 3 मीटर चौड़ा है। जहां से एक साथ अधिक सेना प्रवेश नहीं कर सकती थी।
घुमाव: रास्ते में तीखे मोड़ बने हुए हैं। जो शत्रु की तोप और बाणों के सीधे प्रहार से नाकामयाब करते थे।
इन 7 प्रवेश द्वारों की यह श्रृंखला। भौगोलिक और सेना दोनों दृष्टियों से इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। क्योंकि हर द्वार पिछले से ऊंचा और अधिक सुरक्षित है।
जल भूगोल, जलाशय
किले की भौगोलिक विशेषताओं में सबसे खास पहलू। इसका आंतरिक जल प्रबंधन तंत्र भी माना जाता है।
क्योंकि चित्तौड़गढ़ किले के अंदर प्राचीन काल में 84 जल कुंड और तालाब बनाए गए थे। जिनमें बारिश के पानी के एकत्र किया जाता था।
गौमुख कुंड: यह किले का सबसे खास और पवित्र जलाशय माना जाता है। जिसमें प्राकृतिक झरने से पानी आता था। हालांकि यहां पानी किले के किस जगह से आता है। इसके बारे ज्यादा जानकारी नहीं है।
राणा कुंभ का तालाब: यह किले के मध्य में स्थित बड़ा जलाशय है। जो पीने के पानी का मुख्य स्रोत माना जाता था।
भीमलत कुंड: यह कुंड किले के उत्तरी भाग में स्थित है। और प्राकृतिक रूप से बना हुआ है।
वर्षा जल संग्रह: किले की पहाड़ी की ढलानें इस प्रकार बनाई गई थीं। कि वर्षा का पानी स्वाभाविक रूप से कुंडों की ओर बहता था।
भूमिगत नालियां: जल निकासी के लिए भूमिगत नालियों का एक जाल बना हुआ था। जो पहाड़ी के नीचे तक जाता था।
वर्तमान में सक्रिय जलाशय: आज भी लगभग 22 जलाशय पानी से भरे रहते हैं।
यह जल प्रबंधन इतने कीमती हुआ करते थे। यदि किला लंबे समय तक घेराबंदी को सहन कर जाए। तो किले के लोगो के लिए। पानी की कमी नहीं होगी।
हालांकि अलाउद्दीन खिलजी (1303 ई.) और अकबर (1567 ई.) के घेरे में भी। इन जलाशयों का इस्तेमाल कारण भी असफल रहा।
जलवायु, पर्यावरणीय भूगोल
चित्तौड़गढ़ किले का जलवायु अर्ध-शुष्क (Semi-Arid) प्रकार का है। जो राजस्थान की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण है। यहां ग्रीष्मकाल अत्यंत गर्म और शीतकाल मध्यम ठंडा रहता है।
ग्रीष्मकाल (अप्रैल–जून): चित्तौड़गढ़ किले का तापमान 42 से 46°C तक पहुंच जाता है। जो पहाड़ी पर और अधिक महसूस होता है।
शीतकाल (नवंबर–फरवरी): किले का तापमान 8 से 15°C के बीच रहता है। रात में कभी-कभी और भी कम हो जाता है।
मानसून (जुलाई–सितंबर): औसत वार्षिक वर्षा 638 मिलीमीटर के लगभग होती है।
वनस्पति: किले की पहाड़ी पर बबूल, खेजड़ी, धोक और नीम के पेड़ प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।
वन्यजीव: किले क्षेत्र में नीलगाय, खरगोश, लंगूर और विभिन्न प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं।
हवा की दिशा: पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम से आने वाली हवाएं गर्मी में कुछ राहत देती हैं।
किले की ऊंचाई के कारण यहां मैदानी क्षेत्रों की तुलना में तापमान 2 से 3°C कम रहता है। जो प्राचीन काल में किले के निवासियों के लिए एक प्राकृतिक लाभ था।
दीवारें, परिधि का भूगोल
चित्तौड़गढ़ किले की परिधि 13 किलोमीटर से अधिक लंबी है। जो इसे भारत के सबसे बड़े किलों में से एक बनाती है। वहीं किले की दीवारें पहाड़ी के प्राकृतिक किनारों पर बनाई गई थी। जिससे इन्हें कई ज्यादा मजबूती मिलती है।
दीवारों की ऊंचाई: किले की दीवारें 7 से 15 मीटर ऊंची बनी हुई है।
दीवारों की मोटाई: किले के दीवारों की मोटाई 3 से 7 मीटर तक है। जो तोपखाने के हमलों को सहन करने में कामयाब थी।
निर्माण सामग्री: दीवारों को बनाने में स्थानीय बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया। जो गर्मी में ठंडा और सर्दी में गर्म रहता था।
बुर्ज (Towers): किले की परिधि में 80 से अधिक बुर्ज (Watch Towers) बने हुए हैं।
प्राकृतिक खाई: किले की पहाड़ी के चारों ओर प्राकृतिक खड़ी ढलानें ही खाई का काम करती थीं।
दक्षिणी और पूर्वी भाग: यहां चट्टानें अधिक खड़ी हैं। इसलिए दीवारें तुलनात्मक रूप से पतली हैं।
किले की यह भौगोलिक और स्थापत्य संरचना मिलकर इसे अजेय बनाती थी। जिसके कारण इतिहास में इसे “राजपूताना का गौरव” कहा गया है।
इमारतों की वास्तुकला
चित्तौड़गढ़ किले की इमारतें ही नहीं। बल्कि चित्तौड़गढ़ किला मेसा के पठार पर बनाया गया था। जो आज भी राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में शामिल है।
चित्तौड़गढ़ किला मेवाड़ राजाओं की राजधानी हुआ करता था। जहां उन्होंने 8वीं से 16वीं शताब्दी तक राज किया।
हालांकि चित्तौड़गढ़ किले का पहला निर्माण कार्य। 7वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था। ओर 16वीं शताब्दी तक। लगातार किले का निर्माण होता रहा। जिसमें किले के निर्माण में समय समय पर।
मौर्य, गुर्जर-प्रतिहार, परमार, और राजपूत शासकों ने अपना अपना योगदान दिया।
निर्माणकाल: चित्तौड़ किले का निर्माण 7वीं से 16वीं शताब्दी के बीच कई शासकों द्वारा बनाया गया है।
निर्माण सामग्री: इस किले में स्थानीय बलुआ पत्थर (Sandstone), चूने का गारा, और लाल-पीले पत्थर का उपयोग किया गया था।
निर्माण तकनीक: किले की निर्माण तकनीक में। पत्थर की खुदाई, इंटरलॉकिंग जॉइंट्स, और ड्राई-स्टोन मेसनरी का इस्तेमाल किया गया था।
लेआउट: किले का ढांचा एक लंबी पहाड़ी पर बना हुआ है। जो उत्तर से दक्षिण दिशा में दिखाई देता है।
UNESCO मान्यता: इसे 2013 में राजस्थान के पहाड़ी किलों में भी शामिल किया गया था।
निर्माण सामग्री, तकनीक उपयोग
यहां हर सदी में निर्माण तकनीक बढ़ती गई। हालांकि चित्तौड़गढ़ किले की इमारतों की निर्माण सामग्री और तकनीक में ज्यादातर स्थानीय बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया था।
7वीं–9वीं सदी: इस कालखंड के दौरान। चित्तौड़गढ़ किले में सूखे पत्थरों की चिनाई। जिनमें बिना सीमेंट या प्लास्टर का उपयोग किया गया था।
10वीं–12वीं सदी: इस समय चूने के गारे की शुरुआत हुई थी। लेकिन किले के निर्माण में डोवेटेल और इंटरलॉकिंग जॉइंट का इस्तेमाल किया गया था।
13वीं–15वीं सदी: इस सदी में संगमरमर और बलुआ पत्थर का मिश्रण देखने को मिलता है। ओर महीन नक्काशी का उत्कर्ष भी शामिल है।
16वीं सदी: इस सदी में मुगल प्रभाव के चलते। मेहराब और गुंबद की शैली में बदलाव देखने को मिलता है।
20वीं सदी: इस सदी के दौरान। किले में सीमेंट और यूरोपीय तकनीक का मेलजोल देखने को मिलता है।
विजय स्तंभ
यदि विजय स्तंभ को करीब से देखा जाए। तो इसकी ऊंचाई और बारीक नक्काशी देखकर तो हर कोई हैरान हो जाएगा।
क्योंकि इसे महाराणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को हराकर। अपनी जीत की खुशी में बनवाया था। जिसका निर्माण 1440 से 1448 ईस्वी के बीच हुआ माना जाता है।
ऊंचाई और माप: विजय स्तंभ की ऊंचाई लगभग 37.19 मीटर (122 फीट) है। और यह 9 मंजिला माना जाता है।
निर्माण सामग्री: विजय स्तंभ के निर्माण में। स्थानीय हल्के पीले बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया था। जिसे बिना किसी आधुनिक सीमेंट के बल्कि इंटरलॉकिंग तकनीक (दो पत्थर को आपस में जोड़कर) जोड़ा गया था।
निर्माण तकनीक: मजदूरों या कारीगरों ने पत्थर के विशाल ब्लॉक्स को। एक-दूसरे को आपस में जोड़ने के लिए। डोवेटेल जॉइंट की तकनीक अपनाई थी। जो खासकर भूकंप-रोधी भी मानी जाती है।
डिजाइन: विजय स्तंभ के मंजिल पर। हिंदू देवी-देवताओं की लगभग 500 से ज्यादा मूर्तियां उकेरी (बनाई) गई थी। जिनमें विष्णु, शिव, ब्रह्मा और नवग्रह प्रमुख माने जाते हैं।
लेआउट: विजय स्तंभ का आधार चौकोर बनाया गया था। और ऊपर जाते-जाते इसे अष्टकोणीय रूप में बनाया गया। जिसके अंदर बालकनी और झरोखे भी बनाए गए थे।
शिल्पकार: परंपरागत मान्यता के अनुसार, विजय स्तंभ के वास्तुकार जैता और उसके पुत्रों ने इसे तराशा (उकेरा, बनाया) था।
कीर्ति स्तंभ
कीर्ति स्तंभ को विजय स्तंभ से भी पुराना माना जाता है। जहां कीर्ति स्तंभ को राजस्थानी ओर जैन स्थापत्य शैली का सबसे खूबसूरत उदाहरण माना जाता है। जिसे 12वीं शताब्दी में जैन व्यापारी जीजा भगेरवाल ने बनवाया था।
ऊंचाई: कीर्ति स्तंभ की ऊंचाई लगभग 22 मीटर (72 फीट) रखी गई थी। ओर यह 7 मंजिला इमारत के समान बनाया गया।
निर्माण सामग्री: कीर्ति स्तंभ के निर्माण में हल्के पीले-भूरे रंग के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया था। जहां मजदूरों ने पत्थरों के ऊपर महीन छेनी (छेनी हथौड़ों) की सहायता से। सुन्दर जैन तीर्थंकरों की आकृतियां बनाई थी।
डिजाइन: कीर्ति स्तंभ का आधार वर्गाकार (चौकोर) और शिखर गोलाकार-गुंबदनुमा आकृति का बनाया गया था। जो पूरी तरह जैन नागर शैली में बनाया गया था।
नक्काशी: प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की आकृतियां तो हर तरफ बनाई गई थी। आज तो इसे “आदिनाथ स्तंभ” भी कहा जाता है।
निर्माण तकनीक: कीर्ति स्तंभ के निर्माण में कारीगरों (मजदूरों) ने। सूखे पत्थर की चिनाई (Dry Masonry) का इस्तेमाल किया था। जिसमें किसी बाहरी बंधक का प्रयोग भी नहीं किया गया था।
राणा कुंभा महल
उस समय राणा कुंभा का महल। किले के उत्तर-पश्चिम में बनाया गया था। और इसका निर्माण 1433 से 1468 ईस्वी के बीच। खुद महाराणा कुंभा के शासनकाल में हुआ था।
लेआउट: राणा कुम्भा के महल परिसर में। कई आंगन, दीवान-ए-खास, जनाना महल, दीपमालिका और हाथी पोल बनाए गए थे।
निर्माण सामग्री: राणा कुम्भा के महल में मोटे लाल बलुआ पत्थर के साथ-साथ। चूने और रेत के मोर्टार (प्लास्टर) का उपयोग किया गया था।
निर्माण तकनीक: राणा कुम्भा के महल की दीवारें बेहद मोटी (3–4 फीट) रखी गईं थीं। जिसका इस्तेमाल गर्मी और शत्रु के आक्रमण दोनों के लिए किया जाता था।
डिजाइन: राणा कुम्भा के महल की बालकनियों में नक्काशीदार जाली (Latticed Screens) लगाई गई थी। जो राजपूत वास्तुकला की विशेषता को दिखलाती है।
विशेष तथ्य: राणा कुम्भा महल के तहखाने में। रानी पद्मिनी और हजारों राजपूत महिलाओं ने 1303 ई. में जौहर भी किया था।
रानी पद्मिनी महल
रानी पद्मिनी के महल की इमारत झील (तालाब) के बीचों बीच बनाई गई थी। इसीलिए यह भारत में जल-आधारित वास्तुकला का एक अलग ही उदाहरण माना जा सकता है।
निर्माणकाल: रानी पद्मिनी के महल का निर्माण 13वीं–14वीं शताब्दी में करवाया गया था। ओर यह खाकर बाद में, सिसोदिया वंश के शासनकाल में बना हुआ माना जाता है।
लेआउट: पद्मिनी महल को तीन भागों में विभाजित करके बनाया गया था। जहां मुख्य महल (उत्तरी किनारे पर), जल में बना मंडप, और दक्षिणी छोर पर अमर सिंह का कक्ष बनवाया गया था।
निर्माण सामग्री: पद्मिनी महल का निर्माण। कारीगरों द्वारा सफेद संगमरमर और हल्के पीले बलुआ पत्थर से किया गया था।
निर्माण तकनीक: पद्मिनी महल को बनाने से पहले। झील के बीचों बीच नींव रखने। यानी नींव को पानी की सतह से ऊपर उठाने के लिए।
सबसे पहले झील के बीचों बीच ठीक अंदर की तरफ। बड़े बड़े पत्थरों को डालकर। मजबूत चबूतरे का निर्माण किया गया था।
डिजाइन: पद्मिनी महल में छतरियां (छोटे गुंबददार मंडप), झरोखे और मेहराबें बनवाई गई थी। जो पानी पर प्रतिबिंब बनाती हैं।
मीरा बाई मंदिर और कुंभश्याम मंदिर
किले के बीचों बीच में दो मंदिर साथ-साथ खड़े गए थे। जिसे आज मीरा मंदिर और कुंभश्याम मंदिर कहा जाता है।
इन दोनों मंदिरों का निर्माण उस वक्त उत्तर भारतीय नागर शैली (वास्तुकला) में किया गया था। दोनों मंदिर एक ही परिसर में बने हुए हैं। किंतु इनकी शैली में बिल्कुल अंतर दिखाई देता है।
निर्माणकाल: कुंभश्याम मंदिर को 15वीं शताब्दी में महाराणा कुंभा ने बनवाया था। ओर मीरा मंदिर को 16वीं शताब्दी में राणा सांगा के शासनकाल में बनवाया गया था।
निर्माण सामग्री: दोनों मंदिरों को बनाने के लिए। पीले बलुआ पत्थर पर महीन छेनी (छीनी हथौड़ों) की सहायता से खूबसूरत नक्काशी की गई थी।
निर्माण तकनीक: दोनों मंदिरों के सबसे ऊपरी शिखर को बनाने में। उत्तरोत्तर संकुचन (Receding Tiers) की तकनीक अपनाई गई थी। जो मंदिर के सबसे ऊपरी हिस्से से लेकर नींव तक। मंदिर के ढांचे को संभालकर रखती है।
डिजाइन: कुंभश्याम मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, मंडप और अर्ध-मंडप भी बना हुआ है। जिन्हें उस समय पूर्ण चतुरंग योजना से बनाया गया था।
लेआउट: दोनों मंदिर की दिशा पूर्व में रखी गई थी। और उनके बीच एक खुला प्रांगण भी बनाया गया था।
मीरा मंदिर की विशेषता: मीरा मंदिर में वैष्णव शैली की मूर्तिकला को स्थापित की गई थी। जिसमें राधा-कृष्ण की लीलाओं को पत्थर पर उकेरा गया था।
कालिका माता मंदिर
कालिका माता के मंदिर को 8वीं शताब्दी से पहले। सूर्य देव के रूप में पूजा जाता था। बाद में मंदिर काली माता की मूर्ति को स्थापित करके। कालिका माता के मंदिर के रूप में पूजा जाने लगा।
निर्माणकाल: महाकाली माता के मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में किया गा था। 14वीं शताब्दी तक मंदिर काफी बदलाव किया गया।
निर्माण सामग्री: महाकाली माता के मंदिर के निर्माण में। गहरे पीले-भूरे पत्थर का उपयोग किया गया था। जो मौर्यकालीन शैली से प्रभावित है।
निर्माण तकनीक: मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से पंचायतन शैली में किया गया था। वहीं मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे उप-मंदिर भी बनाए गए थे।
डिजाइन: मंदिर की बाहरी दीवारों पर सूर्य देव, अप्सराओं और द्वारपालों की मूर्तियां स्थापित की गई थी।
विशेष: मंदिर के द्वार-शाखाओं पर की गई नक्काशी। गुप्तकालीन कला की शैली से मेल खाती है।
सात प्रवेश द्वार (पोल)
चित्तौड़गढ़ किले के दरवाजों के अंदर चढ़ाई करते वक्त। किले का रास्ता खुद एक रक्षा-तंत्र की तरह लगता है।
किले में कुल 7 प्रवेश द्वार (पोल) को बनवाया गया था। जिनमें पाड़न पोल, भैरों पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल आदि शामिल हैं।
निर्माणकाल: चित्तौड़गढ़ किले के 7 प्रवेश दरवाजों को। 9वीं से 15वीं शताब्दी के बीच कई राजाओं के द्वारा बनवाया गया था।
निर्माण सामग्री: 7 प्रवेश दरवाजों का निर्माण। विशाल लाल और पीले बलुआ पत्थर के खंड से किया गा था। जिन पर चूने का मोर्टार लगाया गया।
निर्माण तकनीक: 7 प्रवेश द्वारा ज़िग-ज़ैग मार्ग की तरह है। प्रत्येक द्वार दूसरे से कोण पर स्थित है। मतलब 90° के एंगल पर बनवाया गया था। ताकि कोई शत्रु की सेना सीधे किले में प्रवेश न कर सके।
लेआउट: 7 दरवाजे एक-दूसरे से लगभग 200 से 400 मीटर की दूरी पर बनाए गए थे। जिससे हर द्वार एक स्वतंत्र रक्षा-बिंदु की तरह बन जाता था।
डिजाइन: द्वारों पर मेहराब, बुर्ज और पहरेदारी कक्ष बनवाए गए थे। जिनमें तीरंदाजी और तोप के लिए छिद्र (Loop Holes) भी किए गए।
राम पोल की विशेषता: राम पोल को किले का मुख्य और सबसे भव्य द्वार माना जाते है। जिसके दोनों ओर विशाल बुर्ज बनाए गए थे। जिनके ऊपर हाथियों की प्रतिमाएं भी बनाई गई थी।
गौमुख जलाशय
चित्तौड़गढ़ किले में जल इकठ्ठा करने की व्यवस्था। इतनी उन्नत मानी जाती थी। कि किले में 84 जलाशय हुआ करते थे।
जिनमें से गौमुख कुंड सबसे प्रमुख माना जाता है। जो आज भी खासकर पर्यटन को आकर्षित करता है। वहीं किले के गौमुख जलाशय की वास्तुकला प्राचीन भारतीय जल-इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना माना जाता है।
निर्माणकाल: इसका निर्माण 9वीं–11वीं शताब्दी के बीच माना जाता है।
निर्माण सामग्री: गौमुख जलाशय को पत्थर की प्राकृतिक चट्टानों को काटकर बनाया गया था। जिसमें चूने का लेप इस्तेमाल किया गया था।
निर्माण तकनीक: गौमुख (गाय के मुंह के आकार के) पत्थर से पानी बाहर आता है। जो पहाड़ी से स्वाभाविक बहाव (Natural Spring) का उपयोग करता है।
लेआउट: गौमुख कुंड के चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं। और पास में शिव मंदिर भी बना हुआ है। जो इस जगह को धार्मिक-वास्तुकला का मिश्रण बनाता है।
डिजाइन: जलाशय की दीवारों पर हिंदू देवताओं की उभरी हुई मूर्तियां बनाई गई है।
फतेह प्रकाश महल
फतेह प्रकाश महल अन्य इमारतों से बिल्कुल अलग माना जाता है। क्योंकि यह 20वीं शताब्दी की शुरुआत में महाराणा फतेह सिंह द्वारा बनवाया गया था। जिसमें राजपूत और यूरोपीय (Colonial) दोनों शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है।
निर्माणकाल: फतेह प्रकाश महल का निर्माण लगभग 1885 से 1930 ई. के बीच माना जाता है।
निर्माण सामग्री: फतेह प्रकाश महल में सफेद संगमरमर, लाल बलुआ पत्थर, और यूरोपीय शैली की ईंटों का इस्तेमाल किया गया था।
निर्माण तकनीक: इसके निर्माण में लाइम प्लास्टर और सीमेंट का पहली बार व्यापक उपयोग किया गया था।
डिजाइन: इसे मेहराब यूरोपीय गॉथिक शैली में बनाया गया था। जबकि छत पर छतरियां पूरी तरह राजपूत परंपरा में बनी हुई है।
लेआउट: महल में एक बड़ा दरबार हॉल, गैलरी, और संग्रहालय-कक्ष बनाए गए थे। जिनका उपयोग अब पुरातत्व संग्रहालय के रूप में किया जा रहा हैं।
पर्यटन जगहें
7 प्रवेश द्वार
चित्तौड़गढ़ किले में प्रवेश करने के लिए। पर्यटन को 7 विशाल और भव्य द्वारों से होकर गुजरना पड़ता है. जो इस किले की सुरक्षा व्यवस्था की महानता को दर्शाते हैं।
यह सातों पोल क्रमशः पाडन पोल, भैरों पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल के नाम से जाने जाते हैं। जिनमें से राम पोल मुख्य और अंतिम प्रवेश द्वार है।
पर्यटन महत्व:- ये सातों द्वार मेवाड़ की सैन्य वास्तुकला और रणनीतिक सोच का जीवंत उदाहरण माने जाते हैं। हालांकि इन्हें देखने पर यह भी समझ आता है कि किले की रक्षा कितनी कठिन रही होगी।
क्या देखें:- राम पोल पर बनी हनुमान प्रतिमा और प्राचीन नक्काशी पर्यटक जरूर देखें। क्योंकि यह मेवाड़ कालीन शिल्पकला का बेहतरीन नमूना है।
क्या न करें:- पर्यटक किसी भी द्वार की दीवारों पर कुछ भी न लिखें। और न ही पत्थरों को क्षति पहुंचाएं। मगर फोटोग्राफी करते समय भी सावधानी बरतना जरूरी होता है।
सुझाव:- यदि आप बस या जीप किराए पर लेते है। तो किले में प्रवेश करते समय सभी सातों द्वार आराम से देख सकते हैं।
फतेह प्रकाश संग्रहालय
फतेह प्रकाश संग्रहालय चित्तौड़गढ़ किले के परिसर में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक संग्रहालय माना जाता है। जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा चलाया जाता है।
इस संग्रहालय में मेवाड़ कालीन मूर्तियां, शिलालेख, सिक्के और दैनिक जीवन से जुड़ी कलाकृतियां रखी हुई हैं। जो राजपूत संस्कृति की गहराई को दर्शाती हैं।
एक बार किले में आने के बाद। पर्यटक फतेह प्रकाश संग्रहालय में आना न भूले।
पर्यटन महत्व:- यह संग्रहालय उन पर्यटकों के लिए खास है। जो इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखते हैं। क्योंकि यहां 7वीं से 16वीं सदी तक की दुर्लभ कलाकृतियां रखी गई हैं।
समय:- चित्तौड़गढ़ किले का संग्रहालय शनिवार से गुरुवार तक। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। परंतु शुक्रवार को संग्रहालय बंद रहता है।
टिकट शुल्क:- किले का टिकट ही यहां मान्य होता है। अर्थात अलग से कोई शुल्क नहीं देना पड़ता। हालांकि संग्रहालय के ठीक बार। अलग से टिकिट लेना पड़ सकता है।
क्या देखें:- विशेष रूप से मेवाड़ के राजाओं से जुड़े शस्त्र, मूर्तियां और राजकीय वस्तुएं देखें, जो मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाते हैं।
क्या करें:- गाइड की सेवा जरूर लें। जिससे प्रत्येक वस्तु का ऐतिहासिक महत्व भली-भांति समझ में आ जाए।
क्या न करें:- संग्रहालय के अंदर फ्लैश फोटोग्राफी न ले। और यहां रखी गई किसी भी वस्तुओं को हाथ न लगाएं।
जौहर स्थल
जौहर स्थल वह पवित्र भूमि है। जहां सन् 1303, 1534 और 1568 ई. में राजपूत वीरांगनाओं ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए। अग्नि में प्रवेश किया था।
यह स्थान मेवाड़ की महिलाओं के असाधारण साहस और आत्मसम्मान की अमर गाथा को संजोए हुए है। हालांकि यह आज एक भावनात्मक और संवेदनशील स्थल बन चुका है।
पर्यटन महत्व:- जौहर स्थल राजस्थान के इतिहास में सबसे दर्दनाक और गर्व करने योग्य घटनाओं की याद दिलाता है। जिसे देखकर हर पर्यटक की आंखें नम हो जाती हैं।
आयोजन:- प्रतिवर्ष जौहर मेला आयोजित होता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। किंतु यह मेला विशेष रूप से होली के अवसर पर मनाया जाता है।
समय:- किले के खुलने के समय के अनुसार ही। इस स्थल पर जाया जा सकता है।
क्या करें:- यहां मौन और श्रद्धा के साथ जाएं। तथा इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व को समझें। खासकर रानी पद्मिनी के जौहर के बारे में।
क्या न करें:- इस पवित्र स्थल पर किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार, शोर या कचरा फैलाना बिल्कुल उचित नहीं है।
सुझाव:- शाम के समय यहां आना बेहतर रहता है. क्योंकि उस वक्त वातावरण और भी शांत और भावपूर्ण होता है।
विजय स्तंभ
विजय स्तंभ भारतीय शिल्पकला का एक अनोखा उदाहरण है। जिसे राजस्थान सरकार ने अपने राजकीय चिह्न में भी स्थान दिया हुआ है।
पर्यटन महत्व:- विजय स्तंभ को “भारत का टॉवर ऑफ विक्ट्री” भी कहा जाता है। क्योंकि इसकी हर दीवार हिंदू देवी-देवताओं की नक्काशी से भरी हुई है।
ऊंचाई और दृश्य:- इसकी चोटी पर चढ़ने पर पूरे चित्तौड़गढ़ शहर और किले का विहंगम दृश्य पर्यटक देख सकते है। जो वाकई में अलग नजारा होता है।
टिकट शुल्क:- किले के मुख्य टिकट में ही विजय स्तंभ को देखा जा सकता है। परंतु स्तंभ के अंदर की ओर चढ़ने के लिए। अतिरिक्त ₹5 का टिकट लेना होता है।
क्या करें:- स्तंभ के अंदर, ऊपर चढ़ने के लिए। लगभग 157 संकरी सीढ़ियां बनी हुई हैं। इसलिए आरामदायक जूते पहनें और पानी की बोतल साथ रखें।
क्या न करें:- पर्यटन स्तंभ की दीवारों की नक्काशी को छूने या खरोंचने से बचें। मगर फोटोग्राफी के लिए फ्लैश का उपयोग भी न करें।
सुझाव:- सूर्योदय या सूर्यास्त के समय यहां आना सबसे अच्छा रहता है। क्योंकि उस समय की रोशनी में नक्काशी और भी अच्छी दिखती है।
कीर्ति स्तंभ
पर्यटन कीर्ति स्तंभ के बाहरी दीवारों पर। जैन धर्म से जुड़ी अनेक देव प्रतिमाएं को देख सकते हैं। किंतु यह विजय स्तंभ से अधिक प्राचीन माना जाता है।
पर्यटन महत्व:- यह स्तंभ जैन स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। जो 7वीं सदी की मेवाड़ी कारीगरी की गवाही देता है।
धार्मिक महत्व:- जैन धर्मावलंबियों के लिए यह एक पवित्र तीर्थ स्थल है। इसलिए यहां हमेशा श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है।
क्या देखें:- स्तंभ के बाहरी हिस्से पर उकेरी गई सूक्ष्म प्रतिमाएं और अलंकरण पर्यटक अवश्य देखें। क्योंकि यह मध्यकालीन जैन कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
क्या करें:- यहां शांत और सम्मानपूर्ण व्यवहार रखें। तथा जूते उतारकर प्रवेश करें।
क्या न करें:- धार्मिक महत्व के कारण। इस स्थल पर किसी भी प्रकार की अशिष्टता या ऊंची आवाज में बात करना उचित नहीं है।
मीरा बाई मंदिर
मीराबाई का मंदिर पर्यटकों के लिए। वह पवित्र स्थान है। जहां 16वीं सदी की महान कृष्ण भक्त कवयित्री मीराबाई ने अपना अधिकांश जीवन भगवान श्रीकृष्ण की आराधना में बिताया था।
यह मंदिर उत्तर भारतीय शैली में बना हुआ है। और मेवाड़ तथा मारवाड़ की वास्तुकला का संगम दर्शाता है। जिसमें मीरा की भक्ति गाथाएं आज भी जीवित हैं।
पर्यटन महत्व:- यह मंदिर मीराबाई के भक्तों और कविता प्रेमियों के लिए एक अत्यंत भावनात्मक स्थल है। क्योंकि यहां उनकी भक्ति की झलक आज भी महसूस की जा सकती है।
दर्शन समय:- मंदिर प्रतिदिन सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक दर्शनों के लिए खुला रहता है।
क्या देखें:- मंदिर में मीराबाई और भगवान कृष्ण की प्रतिमाएं तथा मंदिर की प्राचीन नक्काशी पर्यटक अवश्य देखें।
क्या करें:- पर्यटक मीराबाई के भजनों को सुनते है। जो अक्सर मंदिर के आसपास गाए जाते हैं। और मन को शांति भी देते हैं।
क्या न करें:- मंदिर परिसर में चप्पल पहनकर प्रवेश न करें। और फोटो खींचने से पहले अनुमति लें।
सुझाव:- शाम की आरती के समय यहां आना सबसे अच्छा माना जाता है। क्योंकि उस समय का वातावरण काफी भक्तिमय हो जाता है।
काली माता का मंदिर
काली माता मंदिर चित्तौड़गढ़ किले के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। ओर यह मंदिर अपनी वास्तुशिल्पीय सुंदरता और धार्मिक महत्व के कारण पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय भी है।
पर्यटन महत्व:- यह मंदिर गुर्जर-प्रतिहार शैली में बना हुआ है। जिसकी बाहरी दीवारें अप्सराओं और देवताओं की सुंदर प्रतिमाओं से सजी हैं। जो आज पर्यटक के लिए खास मानी जाती है।
धार्मिक महत्व:- नवरात्रि और दीपावली के समय यहां हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आते हैं। अतः उस दौरान भारी भीड़ रहती है।
दर्शन समय:- मंदिर प्रतिदिन सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है।
क्या देखें:- मंदिर के गर्भगृह में स्थापित काली माता की अष्टभुजी प्रतिमा और बाहरी दीवारों पर की गई नक्काशी देखना न भूलें।
क्या करें:- मंदिर में प्रवेश से पहले शुद्ध मन और साफ वस्त्रों के साथ जाएं तथा आरती में शामिल भी हों।
क्या न करें:- मंदिर परिसर में चमड़े की वस्तुएं जैसे बेल्ट, पर्स आदि लेकर प्रवेश करना बिल्कुल मना है।
सुझाव:- सुबह की पहली आरती में भाग लेना एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव देता है। क्योंकि उस समय मंदिर का वातावरण पूरी तरह शांत और पवित्र होता है।
जैन मंदिर
चित्तौड़गढ़ किले के परिसर में स्थित जैन मंदिर समूह 11वीं से 15वीं सदी के बीच बनाए गए थे। जो तत्कालीन जैन व्यापारियों की धार्मिक आस्था और समृद्धि का प्रमाण हैं।
किले के अंडा कुल सात जैन मंदिर बने हुए हैं। जिनमें सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ और पहले तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित मंदिर सबसे प्रमुख हैं। किंतु इनमें से ज्यादातर मंदिर में आज भी पूजा की जाती हैं।
पर्यटन महत्व:- यह मंदिर मध्यकालीन जैन स्थापत्य शैली के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं। क्योंकि इनकी बाहरी दीवारों पर उकेरी गई सूक्ष्म कारीगरी देखकर मन अचंभित हो जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:- इन मंदिरों का निर्माण काल 11वीं से 15वीं सदी के बीच माना जाता है। जबकि इनमें से कुछ मंदिर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण (1303 ई.) में क्षतिग्रस्त भी हुए थे।
दर्शन समय:- इन जैन मंदिरों में प्रतिदिन सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं। परंतु जैन त्योहारों के दिन विशेष आयोजन भी यहां होते हैं।
टिकट शुल्क:- किले का मुख्य प्रवेश टिकट ही यहां मान्य होता है। अर्थात अलग से कोई शुल्क नहीं लगता है।
क्या देखें:- मंदिरों की छत पर की गई नक्काशी, तीर्थंकरों की पद्मासन मुद्रा में प्रतिमाएं और मंदिर के स्तंभों पर बनी अप्सराओं की आकृतियां जरूर देखें।
क्या न करें:- मंदिर परिसर में चमड़े की वस्तुएं लेकर प्रवेश करना मना है। और मांसाहार करके न आएं। क्योंकि यह जैन धर्म की मान्यताओं के विरुद्ध है।
सुझाव:- सुबह के समय यहां आना बेहतर रहता है. मगर पर्यटक गाइड की मदद से हर मंदिर का इतिहास और महत्व विस्तार से जान सकते हैं।
कुंभश्याम मंदिर
यह भगवान विष्णु के वराह अवतार का मंदिर है. हालांकि बाद में इसे भगवान कृष्ण (श्यामजी) के रूप में भी पूजा जाने लगा।
यह मंदिर इंडो-आर्यन शैली में बना हुआ है. और चित्तौड़गढ़ किले के सबसे बड़े मंदिरों में से एक माना जाता है. जिसे देखकर मेवाड़ के राजाओं की धार्मिक श्रद्धा का अनुमान लगाया जा सकता है।
पर्यटन महत्व:- यह मंदिर मेवाड़ काल की वास्तुकला का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। जिसमें उत्तर भारतीय नागर शैली के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
ऐतिहासिक महत्व:- मीराबाई ने अपने शुरुआती जीवन में इसी मंदिर में भगवान कृष्ण की उपासना की थी. इसलिए यह मंदिर मीरा से भी जुड़ा हुआ है।
दर्शन समय:- मंदिर सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। किंतु दोपहर 12 से 3 बजे के बीच कुछ समय के लिए बंद होता है।
क्या देखें:- मंदिर का शिखर, गर्भगृह में स्थापित वराह और विष्णु की प्रतिमाएं तथा बाहरी दीवारों पर की गई देव-अप्सरा मूर्तियां देखने योग्य हैं।
क्या करें:- मंदिर में प्रवेश से पहले जूते-चप्पल बाहर उतारें और शुद्ध मन से दर्शन करें।
क्या न करें:- मंदिर के शिखर या दीवारों पर चढ़ने या खरोंच लगाने की कोशिश बिल्कुल न करें।
सुझाव:- शाम की आरती के समय यहां आना। एक विशेष धार्मिक अनुभव देता है। जो मन को गहरी शांति से भर देता है।
रानी पद्मिनी महल
रानी पद्मिनी महल चित्तौड़गढ़ किले के दक्षिणी भाग में एक सुंदर झील के किनारे स्थित है। इतिहास में यह महल इसलिए प्रसिद्ध है।
क्योंकि यहीं पर अलाउद्दीन खिलजी ने एक दर्पण में रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था. जिसके बाद उसने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और 1303 ई. में भयंकर युद्ध हुआ।
पर्यटन महत्व:- यह महल रानी पद्मिनी की अद्वितीय सुंदरता और वीरता की गाथा के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है। हालांकि यहां का शांत झील वाला वातावरण भी मन मोह लेता है।
वास्तुकला:- महल की संरचना तीन भागों में बंटी हुई है। जहां मुख्य महल, झील के बीच का जल महल और उत्तरी महल है। जो तीनों मिलकर एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
समय:- किले के खुलने के समय के अनुसार अर्थात सुबह 9:45 से शाम 6:30 बजे तक यहां जाया जा सकता है।
टिकट:- मुख्य किले का टिकट ही यहां के लिए मान्य है। किंतु महल के अंदर जाने की अनुमति सीमित है।
क्या देखें:- झील के बीच में बने जल महल का दृश्य और महल से दिखती किले की प्राचीर का नजारा अत्यंत सुंदर है।
क्या न करें:- झील में पत्थर न फेंकें और महल की दीवारों पर कुछ न लिखें। परंतु झील के किनारे बने रास्ते पर सावधानी से चलें। क्योंकि वह फिसलन भरा हो सकता है।
सुझाव:- सूर्यास्त के समय इस महल का दृश्य अत्यंत मनोरम होता है। क्योंकि झील में महल का प्रतिबिंब देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है।
कुंभा महल
कुंभा महल चित्तौड़गढ़ किले का सबसे बड़ा और सबसे कीमती महल है। जहां यह उस समय मेवाड़ के राजपरिवार का मुख्य निवास स्थान हुआ करता था.
किंतु अब यह खंडहर अवस्था में है। जो फिर भी अपनी भव्यता से पर्यटकों को हैरान करता है।
पर्यटन महत्व:- इस महल में महाराणा कुंभा की वीरता, स्थापत्य प्रेम और प्रशासनिक सोच की झलक पर्यटक देखते है। क्योंकि उन्होंने अपने इस महल को। एक किले के अंदर पूरे नगर की तरह विकसित किया था।
ऐतिहासिक संदर्भ:- मीराबाई का जन्म भी कुंभा महल परिसर में ही हुआ था। और उन्होंने अपने बचपन का कुछ समय यहीं बिताया था. इसलिए यह महल मीरा के भक्तों के लिए भी बेहद खास माना जाता है।
वास्तुकला:- महल में हाथी दरवाजा, दीवान-ए-आम, जनाना महल और कई कक्ष बनाए गए थे। जो मेवाड़ी राजपूत स्थापत्य शैली के अलग ही नमूने हैं।
समय:- किले के साथ सुबह 9:45 से शाम 6:30 बजे तक इस महल को देखा जा सकता है।
क्या देखें:- महल का हाथी दरवाजा, जनाना महल की नक्काशीदार खिड़कियां और महल से दिखता किले का विहंगम दृश्य पर्यटक जरूर देखें।
क्या न करें:- महल के जीर्ण-शीर्ण हिस्सों पर चढ़ने या दीवारों को धकेलने की गलती न करें। मगर बच्चों को भी टूटे हिस्सों से दूर रखें।
सुझाव:- एक अनुभवी स्थानीय गाइड के साथ इस महल को देखना बेहद फायदेमंद रहता है। क्योंकि इसके हर कोने से जुड़ी कोई न कोई रोचक ऐतिहासिक घटना है।
रतन सिंह महल
रतन सिंह महल, रानी पद्मिनी महल के निकट ही बनाया गया था. यह महल उस काल की राजपूत स्थापत्य शैली का प्रतिनिधित्व करता है।
जिसमें मोटी दीवारें, संकरी सीढ़ियां और खुले आंगन राजपूत जीवनशैली की विशेषताओं को दिखाते हैं।
पर्यटन महत्व:- यह महल पर्यटक को उस दौर की याद दिलाता है। जब चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की राजधानी हुआ करता था. और यहां के राजा अपनी वीरता तथा न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे।
ऐतिहासिक तथ्य:- महाराणा रतन सिंह ही वह राजा माने जाते थे. जिनकी पत्नी रानी पद्मिनी हुआ करती थीं. और जिनके शासनकाल में 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था।
वास्तुकला:- महल में बने कक्ष, आंगन और बुर्ज मेवाड़ी सुरक्षात्मक स्थापत्य कला के नमूने हैं। जो यह बताते हैं कि उस समय महल कैसे बनाए जाते थे।
समय:- किले के सामान्य दर्शन, समय के अनुसार यहां प्रवेश किया जा सकता है।
क्या देखें:- महल की ऊपरी मंजिल से दिखता रानी पद्मिनी महल और झील का दृश्य बेहद खूबसूरत लगता है।
क्या न करें:- महल के खंडहर हिस्सों में अकेले न जाएं। और अंधेरे कक्षों में टॉर्च के बिना प्रवेश न करें।
सुझाव:- रतन सिंह महल और रानी पद्मिनी महल को एक साथ ही देखना सबसे बेहतर रहता है। क्योंकि दोनों एक ही ऐतिहासिक कहानी के दो अलग अलग पहलू हैं।
गौमुख कुंड
गौमुख कुंड चित्तौड़गढ़ किले के पश्चिमी भाग में एक प्राकृतिक जलाशय है। जिसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां एक चट्टान से पानी गाय के मुख (गौमुख) के आकार की धारा में निकलता है।
यह कुंड सदियों से किले की जल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। किंतु धार्मिक दृष्टि से भी इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
पर्यटन महत्व:- यह कुंड प्राकृतिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से कीमती है। क्योंकि इस कुंड का जल सदियों से कभी नहीं सूखा और यह मेवाड़ की जल प्रबंधन व्यवस्था का अनोखा उदाहरण है।
धार्मिक महत्व:- स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस कुंड के जल में स्नान करने से पापों का नाश होता है। इसलिए श्रद्धालु यहां विशेष अवसरों पर स्नान करने के लिए आते हैं।
समय:- किले के खुलने के समय के साथ यहां भी आया जा सकता है। हालांकि सुबह के वक्त यहां का दृश्य सबसे मनोरम होता है।
क्या देखें:- गौमुख से निकलती जलधारा, कुंड के आसपास बनी प्राचीन प्रतिमाएं और कुंड तक जाने वाली सीढ़ियां देखना न भूलें।
क्या करें:- कुंड के पास जाते समय सावधानी बरतें और संभव हो तो यहां शांत मन से बैठकर। इस प्राकृतिक स्थल की सुंदरता का आनंद लें।
क्या न करें:- कुंड के पवित्र जल में कचरा या पूजन सामग्री न फेंकें। मगर जानवरों को भी पानी पीने से न रोकें।
सुझाव:- मानसून के बाद अक्टूबर-नवंबर में यहां आना सबसे अच्छा रहता है। क्योंकि उस समय कुंड पूरी तरह भरा होता है। और पानी बिल्कुल साफ दिखता है।
भीमलत कुंड
भीमलत कुंड चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित। बहुत ही प्राचीन जलाशय है। जिसके बारे में मान्यता है कि इसे महाभारत काल में पांडव भीम ने अपनी गदा से जमीन में मारकर बनाया था।
जिसमें से स्वयं जल फूट पड़ा था। यह कुंड ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों दृष्टियों से कीमती है। हालांकि इसके आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी पर्यटकों को बेहद पसंद आता है।
पर्यटन महत्व:- भीमलत कुंड उन पर्यटकों के लिए विशेष रूप से आकर्षक है। जो पौराणिक कथाओं में रुचि रखते हैं। क्योंकि यहां भीम से जुड़ी प्राचीन लोककथाएं आज भी प्रचलित हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य:- कुंड के चारों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें और हरियाली है। जो इसे किले के बाकी हिस्सों से अलग एक शांत और एकांत स्थल बनाती हैं।
समय:- किले के भ्रमण समय के दौरान। यहां पहुंचा जा सकता है। परंतु मानसून में पानी अधिक होने पर यहां जाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
क्या देखें:- कुंड की प्राकृतिक संरचना, चारों ओर की विशाल चट्टानें और कुंड में झांकने पर दिखता पानी का नीला रंग मन को सुकून देता है।
क्या करें:- कुंड के आसपास बैठकर शांत वातावरण का आनंद जरूर लें। और स्थानीय गाइड से इससे जुड़ी पौराणिक कहानियां सुनें।
क्या न करें:- कुंड के पास जाते समय फिसलन भरी चट्टानों पर बिना सावधानी के न चढ़ें। और छोटे बच्चों को कुंड के किनारे अकेला न छोड़ें।
सुझाव:- भीमलत कुंड और गौमुख कुंड को एक ही दिन में देखना सबसे बेहतर रहता है। मगर अपने साथ पर्याप्त पानी और आरामदायक जूते जरूर रखें।
युद्ध, आक्रमण, हमलें
चित्तौड़गढ़ किला तीन बड़ी लड़ाइयों और जौहर के लिए बहुत मशहूर है। जो राजपूत इतिहास की बहुत दुखद घटना है।
आला उद्दीन खिलजी का आक्रमण (1303)
यह बात 1303 ईस्वी की है. जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने. पद्मिनी के पति राणा रतन सिंह पर हमला किया. तो चित्तौड़गढ़ का किला फिर से चर्चा में आया। जहां अलाउद्दीन मेवाड़ के तमाम संसाधनों को खत्म करने. रतन सिंह की ताकत को खत्म करना और उनके धन को लूटना चाहता था।
अलाउद्दीन पहले से ही रानी पद्मिनी की सुंदरता से मोहित हो गया था। क्योंकि रानी पद्मिनी के पति राजा रतन सिंह के दरबार में। राघव चेतन नाम का एक तांत्रिक हुआ करता था।
जिसने अपनी तंत्र शक्ति का गलत इस्तेमाल किया था। जब रानी पद्मिनी को राघव चेतन के बारे में पता चला। की राघव चेतन अपनी तंत्र शक्ति का गलत इस्तेमाल कर रहा है। तो पद्मिनी ने रतन सिंह से कहकर। राघव चेतन को चित्तौड़गढ़ दरबार से बाहर निकाल दिया। जहां राघव चेतन दिल्ली जाकर।
अलाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मिनी की सुंदरता। ओर चित्तौड़गढ़ किले के सारे खुफिया राज (चित्तौड़गढ़ की शक्ति) अलाउद्दीन खिलजी को बता लेता है। इसलिए उसने चित्तौड़ को घेर लिया और किले पर हमला कर दिया. और अंत में जीत गया।
उस समय, रानी पद्मिनी और बाकी महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने (आत्मसम्मान) के लिए जौहर किया (खुद का बलिदान) दिया।
जहां रानी पद्मिनी ने जौहर किया था. उस जगह को आज बगीचे में बदल दिया गया है, जहाँ हर साल मेवाड़ के राजपूत जमा होते हैं. और रानी पद्मिनी और बाकी महिलाओं के लिए हवन करते हैं।
बहादुर शाह का आक्रमण (1535)
1535 में, जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने. चित्तौड़गढ़ किले पर हमला किया. तब मेवाड़ पर विक्रमादित्य का शासन था। लेकिन विक्रमादित्य अपने चित्तौड़गढ़ शासन को ठीक से नहीं चला पा रहे थे.
तभी मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ़ के लिए। एक नए राजा की जरूरत थी. जहां उस वक्त नए राजा के रूप में। नन्ही अवस्था में राणा उदय सिंह की चर्चा होती रही।
तब एक पारिवारिक सदस्य बनवीर। जो खुद सत्ता की लालच में आकर। अगले राजा उदय सिंह के बनने से पहले। खुद उदय सिंह को मरने की साजिश रचता है।
हालांकि ऐसे मुश्किल समय में, उनके छोटे भाई राणा उदय सिंह को बचाने की जिम्मेदारी। अब रानी कर्णावती पर आ गई। लेकिन उदय सिंह की नन्ही अवस्था में देखभाल करने वाली पन्ना धाय या धाय मां ने। उदय सिंह को लेकर कुंभलगढ़ किले तक पहुंच गई।
दूसरी तरफ, रानी कर्णावती जो उस समय। राजधानी चित्तौड़गढ़ से मेवाड़ राज्य को बचाना चाहती थी।
जहां रानी कर्णावती ने, राजपूत सरदारों और हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी। लेकिन रानी कर्णावती के द्वारा। यह मांगी गई मदद नाकामयाब रही। जब रानी कर्णावती को लगा कि वह युद्ध में हार सकती है.
तो उसने बाकी राजपूत महिलाओं के साथ। जौहर करने का फैसला किया। उस हमले में बहुत सारे सैनिक भी मारे गए।
बादशाह अकबर का आक्रमण (1567)
यह बात 1567 ईस्वी की है। जब मुग़ल बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ किले पर आक्रमण किया या चित्तौड़गढ़ को घेर लिया था। उस समय, मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ के राजा महाराणा उदय सिंह द्वितीय थे।
राणा उदय सिंह ने अकबर से सीधे युद्ध लड़ने की बजाय. पीछे हटकर लड़ाई लड़ने की नीति अपनाई। क्योंकि उस वक्त उदय सिंह अपने वंश को आगे बढ़ाने की सोच में थे। जहां उन्होंने अपने बेटे महाराणा प्रताप को लेकर।
अरावली की पहाड़ियों, घाटियों (वर्तमान उदयपुर) में शरण ले ली। जहां उन्होंने एक नए शहर उदयपुर की स्थापना की। पीछे मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ किले की रक्षा जयमल राठौड़ और कल्ला जी राठौड़ पर छोड़ दी।
जहां जयमल राठौड़ और कल्ला जी राठौड़ आखिर सांस तक लड़े। अकबर के इस आक्रमण में जयमल ने कल्ला जी के कंधों पर बैठकर युद्ध किया। ओर यह युद्ध उन्होंने अंतिम सांस तक लड़ा। जहां किले के द्वार पर जयमल राठौर ओर कल्ला जी राठौर वीरगति को प्राप्त हुए।
अकबर के इस आक्रमण के चलते। किले की सेना भी बड़ी वीरता से लड़ी। जिसमें हजारों वीरांगनाओं का जौहर भी माना जाता है। लेकिन अंत में सभी को हार का सामना करना पड़ा। ओर अकबर की सेना किसी भी तरह चित्तौड़गढ़ किले पर कब्जा कर लेती है। ओर एक बार फिर यह किला अकबर के अधीन आ जाता है।
तीन बार किले में जौहर हुआ था। पहली बार रानी पद्मिनी ने किया था। फिर रानी कर्णावती ने, और अकबर के समय में भी महिलाओं ने जौहर किया। इससे इस किले का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया।
इतिहास
चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास राजपूतों की वीरता, त्याग, तपस्या और बलिदान की कहानियों से भरा हुआ है।
जहां शक्ति में महाराणा प्रताप, भक्ति में मीरा बाई, त्याग में पन्ना धाई, और बलिदान में रानी पद्मिनी का नाम जाना जाता है। चित्तौड़गढ़ किले को देखने पर। सबसे पहले रानी पद्मिनी का ‘जौहर’ की कहानी दिखती है।
आज चित्तौड़गढ़ का किला सिर्फ एक किला नहीं है। बल्कि ये राजपूतों की महानता की कहानियों से जुड़ा हुआ है। जिसे इतिहास में कहां गया है। की यह किला त्याग, प्रेम, भक्ति, आत्मसमर्पण और बलिदान का किला है.
पर्यटन भ्रमण
पर्यटन सुविधाएं
चित्तौड़गढ़ किले में हर साल लाखों पर्यटन। यहां भ्रमण करने के लिए आते है। ओर उन्हें किले में का तरह की सुविधाएं देखने को मिलती है।
टिकट काउंटर और प्रवेश व्यवस्था:- किले के मुख्य प्रवेश द्वार पर ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) का टिकट काउंटर बनाया गया है। जहां से यहां आने वाले पर्यटक। आसानी से टिकट लेकर किले में प्रवेश कर सकते हैं।
ऑडियो गाइड सुविधा:- ASI द्वारा किले में हिंदी और अंग्रेजी में ऑडियो गाइड की सुविधा की गई है। ऑडियो के द्वारा हर स्मारक की जानकारी। पर्यटक को बड़ी गहराई से देखने को मिलती है।
गाइड सेवा:- यहां प्रशिक्षित स्थानीय गाइड भी देखने को मिलते हैं। जो किले की के इतिहास की जानकारियों को अच्छी तरह से बताते हैं। हालांकि गाइड की फीस 300 से 600 रुपये तक हो सकती है।
वाहन की सुविधा:- किले का इलाका बहुत बड़ा होने के कारण। यहां इलेक्ट्रिक बग्गी (गाड़ियां) और टॉय ट्रेन की सुविधा भी की गई है। जिससे बुजुर्ग और बच्चे भी आसानी से पूरा किला देख सकते हैं।
पीने का पानी और शौचालय:- किले परिसर में कई स्थानों पर पानी की व्यवस्था की गई है। और साफ शौचालय भी बनाए गए है।
पार्किंग सुविधा:- किले के नीचे बड़ी पार्किंग की जगह बनी हुई है। जहां दो पहिया, चार पहिया और बसों को आसानी से खड़ा किया जा सकता हैं।
समय, शुल्क, कब जाएं
चित्तौड़गढ़ किला पूरे साल भर खुला रहता है। लेकिन सही समय पर जाना। पर्यटन के लिए भ्रमण को दोगुना बेहतर बना सकता है। ओर यहां हम समय और शुल्क से जुड़ी पूरी जानकारी नीचे दे रहे है।
किले का खुलने और बंद होने का समय:- चित्तौड़गढ़ किले के खुलने का समय सुबह 9:45 बजे ओर बंद होने का समय शाम 5:00 बजे तक है।
इसके बीच पर्यटक यहां किसी भी वक्त आ सकते है। हालांकि शाम के समय किले में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन भी किया जाता है। जिसमें भी पर्यटक भाग ले सकते है।
प्रवेश शुल्क (2024–25 के अनुसार):
- भारतीय नागरिक (वयस्क):- भारतीय नागरिकों के लिए चित्तौड़गढ़ किले का प्रवेश शुल्क ₹40 प्रति व्यक्ति रखा गया है।
- विदेशी पर्यटक:- विदेशी नागरिकों के लिए चित्तौड़गढ़ किले का प्रवेश शुल्क ₹600 प्रति व्यक्ति रखा गया है।
- 15 वर्ष से कम बच्चे:- 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए। किले में प्रवेश करना बिल्कुल फ्री है।
- SAARC देशों के नागरिक:- SAARC देशों के नागरिकों का प्रवेश शुल्क ₹40 प्रति व्यक्ति रखा गया है।
लाइट एंड साउंड शो:- यह शो शाम 7:30 बजे तो हिंदी भाषा में होता है। और रात 8:45 बजे अंग्रेजी भाषा में आयोजित होता है। जिसका शुल्क किले के शुल्क से बिल्कुल अलग लिया जाता है।
सर्वश्रेष्ठ समय (Best Time to Visit):- अक्टूबर से मार्च के बीच का समय। सबसे अच्छा माना जाता है। क्योंकि इन महीनों में यहां का तापमान 15°C से 28°C के बीच रहता है। और मौसम भी सुखद होता है।
मानसून में भ्रमण:- जुलाई–सितंबर में किला बिल्कुल हरा-भरा होता है। हालांकि बारिश के समय किले के रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं। इसलिए चलते वक्त सावधानी बरतना जरूरी है।
गर्मियों में भ्रमण:- अप्रैल से जून के बीच। किले का तापमान 42°C तक पहुंच जाता है। इसलिए शायद यह समय पर्यटन के लिए अच्छा नहीं होगा।
भोजन, ठहरने की व्यवस्थाएं
चित्तौड़गढ़ में पर्यटकों के लिए। हर खर्चे में रुकने और खाने पीने की अच्छी व्यवस्था की गई है। जिसमें बजट होटल से लेकर। हेरिटेज होटल तक सब कुछ शामिल है।
ठहरने के विकल्प:
हेरिटेज और लग्जरी होटल:- Hotel Castle Bijaipur, Padmini Haveli जैसे हेरिटेज होटल में अच्छी व्यवस्था देखने को मिलती हैं। जहां रात का किराया ₹2,500 से ₹8,000 तक के बीच हो सकता है।
मध्यम बजट होटल:- Hotel Pratap Palace, Hotel Meera जैसे होटल में ₹800 से ₹2,000 में अच्छी सुविधाएं देखने को मिलती हैं।
बजट गेस्ट हाउस और धर्मशाला:- किले के आसपास ₹300 से ₹600 में कई धर्मशालाएं और सस्ते गेस्ट हाउस बने हुए हैं। जो पर्यटन के लिए बहुत उपयोगी माने जाते हैं।
भोजन के विकल्प:
स्थानीय ढाबे और रेस्तरां:- किले के पास और शहर में दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्जी, लाल मांस और मिर्ची बड़ा जैसे पारंपरिक राजस्थानी व्यंजन आसानी से देखने को मिलते हैं।
थाली व्यवस्था:- यहां ₹150 से ₹350 में भरपूर राजस्थानी थाली देखने को मिल जाएंगी। जिसमें बाजरे की रोटी, राब, केर-सांगरी की सब्जी और छाछ शामिल होती है।
किले परिसर के भीतर:- किले के अंदर छोटे खाने-पीने के स्टॉल बने हुए हैं। जहां से पानी, नींबू पानी, चाय और नाश्ता खाया जा सकता है। परंतु बड़े भोजन के लिए शहर में ही जाना अच्छा रहता है।
स्थानीय बाजार, पर्यटन खरीदारी वस्तुएं
चित्तौड़गढ़ का बाजार राजस्थानी हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्तुओं के लिए पूरे देश में मशहूर है। जहां आप अपने घर के लिए बेहतरीन वस्तुएं खरीद सकते हैं।
मुख्य बाजार स्थान:- सेंट्रल मार्केट (मुख्य चौक), सुभाष बाजार और किले के प्रवेश द्वार के पास की दुकानें खरीदारी के लिए बनी हुई हैं।
प्रमुख खरीदारी वस्तुएं:
राजस्थानी लघुचित्र (मिनिएचर पेंटिंग):- यहां के कलाकारों के द्वारा बनाई गई। हस्तनिर्मित पेंटिंग्स ₹200 से ₹5,000 तक की कीमत पर मिलती हैं। जो राजपूत और मेवाड़ इतिहास को दर्शाती हैं।
मेवाड़ी कपड़े और बंधेज:- रंगीन बंधेज साड़ी, दुपट्टे और पगड़ियां यहां की पहचान मानी जाती हैं। जिनकी कीमत ₹300 से ₹2,000 तक होती हैं।
चांदी और मेटल क्राफ्ट:- पारंपरिक राजपूती चांदी के आभूषण, कड़े और मेटल वर्क के शोपीस काफी मशहूर माने जाते हैं।
मिट्टी के खिलौने और मूर्तियां:- किले के आसपास के कुम्हारों द्वारा बनाए गए। मिट्टी के खिलौने और राणा प्रताप, महारानी पद्मावती की मूर्तियां पर्यटक अपने यादगार के रूप में लेकर जाते हैं।
मसाले और खाद्य पदार्थ:- मेथी पापड़, राजस्थानी मसाले और मिर्ची के अचार भी यहां से खरीदे जा सकते हैं।
मोलभाव की आदत रखें:- यहां दुकानदार सामान बेचने से पहले। कस्टमर को ज्यादा भाव बताते है। इसलिए पर्यटक खरीदारी करने से पहले। एक-दो दुकानों में तुलना जरूर करें।
पर्यटन सुझाव
यदि कोई पर्यटक चित्तौड़गढ़ किले में पहली बार आता है। तो उन्हें कुछ जरूर बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। ताकि उनकी यात्रा ओर भी ज्यादा आसान ओर यादगार बन सके।
सुबह जल्दी जाएं:- यदि पर्यटक चित्तौड़गढ़ किले पर सुबह 10 बजे से पहले पहुंचेंगे। तो यह उनके लिए सबसे अच्छा समय रहेगा। क्योंकि इस समय भीड़ भी कम रहेगी। और फोटोग्राफी के लिए दिन की रोशनी भी अच्छी रहेगी।
आरामदायक जूते पहनें:- किले में चढ़ाई और काफी हद तक पैदल चलना पड़ सकता है। इसलिए स्पोर्ट्स शूज या फ्लैट चप्पल पहनना जरूरी होगा।
पानी और नाश्ता साथ रखें:- किले का भ्रमण करने में कम से कम 3 से 5 घंटे का समय लग सकता है। इसलिए हमेशा पानी की बोतल और हल्का नाश्ता जरूर साथ रखें।
सनस्क्रीन और टोपी:- राजस्थान की तेज धूप से बचने के लिए। सनस्क्रीन, टोपी या स्कार्फ जरूर साथ रखना चाहिए।
लाइट एंड साउंड शो बुकिंग:- शो की बुकिंग हमेशा पहले से ऑनलाइन करना चाहिए। क्योंकि पर्यटन की सीटें सीजन में जल्दी भर जाती हैं।
मोबाइल नेटवर्क:- किले की ऊंचाई पर कुछ जगहों में नेटवर्क कम मिल सकता है। इसलिए जरूरी नक्शे और जानकारी पहले से डाउनलोड करके पर्यटक अपने साथ रखें।
सुरक्षा का ध्यान रखें:- किले की दीवारों और बुर्जों के पास सेल्फी लेते समय सावधान रहना भी जरूरी है। क्योंकि कई जगह रेलिंग नहीं बनी हुई है।
यात्रा मार्ग
सड़क मार्ग
चित्तौड़गढ़ किला राजस्थान के सबसे बेहतरीन ओर खूबसूरत। पर्यटन स्थलों में से एक माना जाता है। ओर यहां सड़क मार्ग से पहुंचना। सबसे सुलभ और किफायती विकल्प माना गया है।
राष्ट्रीय राजमार्ग NH-76 और NH-27 इस शहर को राजस्थान के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जोड़ता हैं। जिससे यहां की यात्रा करना बहुत आसान हो जाता है।
उदयपुर से दूरी और समय:- उदयपुर से चित्तौड़गढ़ की दूरी लगभग 115 किलोमीटर है। जिसे तय करने में करीब 2 से 2.5 घंटे का समय लगता हैं।
जयपुर से दूरी और समय:- जयपुर से चित्तौड़गढ़ लगभग 310 किलोमीटर दूर है। और सड़क मार्ग से इसे तय करने में। लगभ 5 से 6 घंटे का समय लगता है।
अजमेर से दूरी:- अजमेर से यह दूरी करीब 185 किलोमीटर है। जो लगभग 3.5 घंटे में पूरी की जा सकती है।
बस सेवाएं:- राजस्थान राज्य परिवहन निगम (RSRTC) की बसें जयपुर, उदयपुर, अजमेर, कोटा और भीलवाड़ा से नियमित रूप से चित्तौड़गढ़ बस स्टैंड तक चलती रहती हैं।
बस किराया:- साधारण बस का किराया ₹80 से ₹250 तक माना गया है। जबकि वोल्वो/एसी बस में ₹300 से ₹600 तक खर्च हो सकते है।
यात्रा सुविधा:- सड़क मार्ग पर ढाबे, पेट्रोल पंप और विश्राम स्थल बने हुए हैं। जिससे लंबी दूरी की यात्रा भी आरामदायक रहती है।
राजस्थान पर्यटन विभाग (tourism.rajasthan.gov.in) के अनुसार सड़क मार्ग से चित्तौड़गढ़ आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक मानी जाती है। क्योंकि यह मार्ग हर मौसम में अच्छा रहता है।
रेलवे मार्ग
रेल मार्ग भी चित्तौड़गढ़ पहुंचने का दूसरा सबसे अच्छा और सस्ता साधन है। क्योंकि चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन एक प्रमुख जंक्शन है। जो देश के कई बड़े शहरों से अच्छी यह जुड़ा हुआ है।
रेलवे स्टेशन:- चित्तौड़गढ़ जंक्शन (COR) किले से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जिससे किले तक पहुंचना बेहद आसान हो जाता है।
दिल्ली से ट्रेन:- दिल्ली से चित्तौड़गढ़ के लिए चेतक एक्सप्रेस और मेवाड़ एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें चलती रहती हैं। जिनका किराया ₹200 से ₹1500 तक (श्रेणी अनुसार) हो सकता है।
मुंबई से ट्रेन:- मुंबई से भी सीधी ट्रेन सेवा भी उपलब्ध है। जो लगभग 14 से 16 घंटे में चित्तौड़गढ़ पहुंचा देती है।
उदयपुर से ट्रेन:- उदयपुर से चित्तौड़गढ़ की ट्रेन यात्रा केवल 2 घंटे की है। और किराया ₹50 से ₹300 के बीच रहता है।
जयपुर से ट्रेन:- जयपुर-चित्तौड़गढ़ के बीच। कई पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें चलती रहती हैं। जिनका सफर लगभग 4 से 5 घंटे का होता है।
सुविधाएं:- रेलवे स्टेशन पर वेटिंग रूम, कैंटीन, ऑटो और टैक्सी सेवाएं देखने को मिलती हैं।
Indian Railways की IRCTC वेबसाइट पर ट्रेन टाइमटेबल और टिकट बुकिंग की पूरी जानकारी मिल जाती है। जो रेल यात्रा को और भी ज्यादा आसान बनाती है।
हवाई मार्ग
हवाई मार्ग से चित्तौड़गढ़ आने वाले पर्यटकों के लिए। निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर का महाराणा प्रताप हवाई अड्डा (UDR) बना हुआ है। क्योंकि चित्तौड़गढ़ में अभी कोई खुद का व्यावसायिक हवाई अड्डा नहीं बनाया गया है।
निकटतम हवाई अड्डा:- महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, उदयपुर — चित्तौड़गढ़ से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर बना हुआ है।
उड़ान सेवाएं:- दिल्ली, मुंबई, जयपुर और अहमदाबाद से उदयपुर के लिए इंडिगो, एयर इंडिया और स्पाइसजेट की नियमित उड़ानें चलती रहती हैं।
हवाई किराया:- दिल्ली से उदयपुर का हवाई किराया ₹1500 से ₹6000 तक (सीजन अनुसार) अलग अलग होता है।
उदयपुर से चित्तौड़गढ़ तक:- हवाई अड्डे से चित्तौड़गढ़ पहुंचने के लिए। पर्यटकों को टैक्सी या बस से 2 से 2.5 घंटे का सफर करना पड़ता है।
दूसरा विकल्प:- जयपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (JAI) भी एक विकल्प है। जो चित्तौड़गढ़ से लगभग 310 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
अतिरिक्त जानकारी:- हवाई अड्डे पर प्री-पेड टैक्सी काउंटर से सीधे चित्तौड़गढ़ के लिए टैक्सी बुक की जा सकती है।
Airports Authority of India की वेबसाइट पर उड़ान अनुसूची और हवाई अड्डे की सुविधाओं की जानकारी भी पर्यटक देख सकते है।
खुद के वाहन लाना
खुद की गाड़ी से चित्तौड़गढ़ किला घूमना सबसे स्वतंत्र और आरामदायक सहारा माना जाता है। क्योंकि इसमें पर्यटक अपनी सुविधा के अनुसार। समय तय कर सकते हैं। और किले के हर कोने को आराम से भी देख सकते हैं।
पार्किंग सुविधा:- किले के मुख्य प्रवेश द्वार के पास सरकारी पार्किंग स्थल बना हुआ है। जहां दोपहिया और चारपहिया दोनों तरह के वाहन खड़े किए जा सकते हैं।
पार्किंग शुल्क:- दोपहिया वाहन के लिए ₹10 से ₹20 और कार के लिए ₹30 से ₹50 तक का शुल्क अलग से रखा गया है।
सड़क की स्थिति:- किले तक जाने वाली सड़क पक्की और चौड़ी बनी हुई है। जिससे कार, बाइक और बड़े वाहन आसानी से ऊपर तक जा सकते हैं।
पेट्रोल पंप:- चित्तौड़गढ़ शहर में कई पेट्रोल पंप देखने को मिलते हैं। मगर किले के ऊपर कोई पेट्रोल पंप नहीं है। इसलिए पहले ही टंकी भरवा लेना अच्छा रहता है।
ध्यान देने योग्य बात:- किले के अंदर कुछ संकरे (घुमावदार) रास्ते बने हुए हैं। जहां बड़े वाहन चलाने में सावधानी बरतना जरूरी है।
यात्रा का सबसे अच्छा समय:- किले की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच है। वहीं खुद की गाड़ी से किले की यात्रा करना ओर भी ज्यादा बेहतर रहता है।
किराए के वाहन लाना
जो पर्यटक चित्तौड़गढ़ किले के भ्रमण के लिए। खुद की गाड़ी नहीं लाना चाहते है। ओर नहीं सरकारी परिवहन या प्राइवेट गाड़ियों पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
उनके लिए किराए के वाहन से आना सबसे अच्छा विकल्प रहेगा। क्योंकि इससे किले और आसपास के पर्यटन स्थलों को एक ही दिन में घुमा जा सकता है।
ऑटो रिक्शा:- रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से ऑटो रिक्शा किले तक आसानी से मिल जाते हैं। जिनका किराया ₹80 से ₹150 तक रहता है।
टैक्सी सेवा:- चित्तौड़गढ़ में स्थानीय टैक्सी और कैब सेवाएं उपलब्ध हैं। जिनसे पूरे दिन का टूर ₹800 से ₹1500 में बुक किया जा सकता है।
ओला/उबर:- Ola और Uber ऐप पर भी चित्तौड़गढ़ में कैब बुकिंग की जा सकती है। हालांकि इनकी उपलब्धता सीमित मात्रा में हो सकती है।
बाइक और स्कूटर रेंटल:- शहर में कुछ दुकानों से ₹300 से ₹500 प्रतिदिन की दर पर दोपहिया वाहन किराए पर देखने को मिलते हैं।
गाइड के साथ वाहन:- कुछ टूर ऑपरेटर गाइड सहित वाहन पैकेज भी देते हैं। जो पहली बार आने वाले पर्यटकों के लिए बेहद फायदेमंद होते है।
अतिरिक्त सुझाव:- किराए की गाड़ी लेते समय पहले से रेट तय कर लेना जरूरी है। और रसीद भी जरूर लेनी चाहिए। ताकि बाद में कोई झगड़ा न हो।
निष्कर्ष
चित्तौड़गढ़ किला कभी मेवाड़ राज्य की राजधानी हुआ करता है। जिस पर लगभग 50 से ज्यादा। राजपूत राजाओं ने शासन या चित्तौड़गढ़ के राजा भी रहे।
7वीं या 8वीं शताब्दी में। गुहिल वंश के शासक बप्पा रावल ने। चित्तौड़गढ़ किले से मानमोरी को हराकर। इस किले को जीतकर यहां अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।
तब से यह किला गुहिल वंश (वर्तमान सिसोदिया वंश) के पास चला गया। जिसके बाद चित्तौड़गढ़ किले पर सिसोदिया खानदान के।
कई राजाओं ने राज भी किया था। जिनमें महाराणा सांगा, राणा कुम्भा, राणा हमीर, राणा उदय सिंह, ओर महाराणा प्रताप जैसे कई शासक रहे।
चित्तौड़गढ़ किले की पहली ऐतिहासिक स्थापना कई कालखंडों में शुरू हुई। ऐसा भी कहा जाता है। की महाभारत के समय में भी यहां एक छोटा सा किला होने का दावा भी किया जाता है।
दूसरी स्थापना मौर्य के शासनकाल में भी। इस जगह की स्थापना मानी जाती है। लेकिन किले की मूल स्थापना 7वीं शताब्दी में मानी जाती हैं। जब चित्रागंद मौर्य ने इस किले की नींव रखी। ओर उन्हीं के नाम पर इस किले का चित्तौड़गढ़ भी रखा गया था।
समय समय पर चित्तौड़गढ़ के कई राजा बनते गए। ओर उन सभी ने मिलकर चित्तौड़गढ़ किले के विकास में। अपना अपना महत्वपूर्ण योगदान भी दिया।
जहां किले की इमारतों में 84 जलाशय, रानी पद्मिनी महल, रतन सिंह महल, कुम्भा महल, काली माता का मंदिर, 8 जैन मंदिर, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, जौहर स्थल आदि जगहों की इमारतें विभिन्न कालखंडों में बनाई गई।
हालांकि आज के समय, चित्तौड़गढ़ किला भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में शामिल है। जहां भारत से ही नहीं। बल्कि विदेशी पर्यटन भी किले की खूबसूरत इमारतें, वास्तुकला, संग्रहालय, किले का इतिहास जानने के लिए आते है।
20 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: चित्तौड़गढ़ किले को कब और किसने बनवाया?
उत्तर: चित्तौड़गढ़ किले की पहली ऐतिहासिक स्थापना 7वीं सदी में हुई थी। जहां इसे सबसे पहले चित्रागंद मौर्य ने बनवाया था।
हालांकि महाभारत काल में यहां किला। मौर्य काल में चित्तौड़गढ़ का उल्लेख किया गया है।
प्रश्न 2: चित्तौड़गढ़ किले की दीवार कितनी लंबी हैं?
उत्तर: चित्तौड़गढ़ किले की दीवारें ओर इस किले का क्षेत्रफल लगभग 13 किलोमीटर में हैं।
प्रश्न 3: किले के मुख्य दरवाजे कौन कौन से हैं?
उत्तर: किले में 7 बड़े प्रवेश द्वार (दरवाजे) बनवाए गए थे। जो किले की सुरक्षा करते थे।
जिनमें पाडन पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़न पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल आदि शमिल है। जिनमें राम पोल से किले में प्रवेश किया जाता है।
प्रश्न 4: विजय स्तंभ क्यों खास माना जाता है?
उत्तर: राणा कुम्भा ने इसे 1448 में मालवा के सुल्तान महमूद गजनवी की हार ओर अपनी जीत की खुशी में बनवाया था। यह लगभग 37 मीटर ऊंचा है।
प्रश्न 5: पद्मिनी महल का इतिहास क्या है?
उत्तर: क्योंकि इसी रानी पद्मिनी महल से अलाउद्दीन खिलजी ने। रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था।
जो इतिहास की एक घटना मानी जाती है।
प्रश्न 6: गौमुख कुण्ड में पानी कहाँ से आता है?
उत्तर: पहाड़ की चट्टानों से बहता हुआ। प्राकृतिक पानी का बहाव गौमुख कुंड में जा गिरता है।
जिससे गौमुख कुंड में जल हमेशा भरा रहता है। यहां का पानी पिछले 1400 सालों से पीने लायक है। जिसका इस्तेमाल उपचार के लिए भी किया जाता है।
प्रश्न 7: चित्तौड़गढ़ किले में पानी का इंतजाम कैसे किया जाता था?
उत्तर: किले में एक समय, 84 जलाशय ओर पानी के कुंड हुआ करते थे। जहां बारिश के पानी को इकठ्ठा किया जाता था।
वहीं ज़मीन के नीचे बने टैंकों, सीढ़ी वाले कुओं और चूना पत्थर के फिल्टर से भी इकट्ठा किया जाता था।
प्रश्न 8: चित्तौड़गढ़ किले के संग्रहालय में क्या खास है?
उत्तर: चित्तौड़गढ़ किले के संग्रहालय (Museums Of India) में। राजपूत और मुगल समय के सिक्के, हथियार, पुराने लेख और मूर्तियाँ रखी हुई है।
प्रश्न 9: लाइट एंड साउंड शो कब होता है?
उत्तर: यह शो शाम को 7:00 बजे शुरू होता है। ओर इसकी कहानी पद्मश्री नरेंद्र कोहली ने लिखी है।
प्रश्न 10: किले में जाने की टिकट कितने की है?
उत्तर: भारतीयों के लिए ₹40 रखा गया है। जबकि विदेशी नागरिकों के लिए ₹600 रखा गया है।
हालांकि बच्चों से किसी भी तरह का कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता है।
प्रश्न 11: चित्तौड़गढ़ किले तक कैसे पहुँचे?
उत्तर: सड़क मार्ग (NH 48/58) चित्तौड़गढ़ किले तक जा सकते हैं।
चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन (COR) 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
चित्तौड़गढ़ किले का सबसे नजदीकी उदयपुर हवाई अड्डा (महाराणा प्रताप) 120 किलोमीटर दूर है।
प्रश्न 12: ऑडियो/वीआर गाइड कहाँ मिलेगा?
उत्तर: पाडल पोल पर QR कोड स्कैन करके अपने फोन पर ASI का ऑडियो और वीआर गाइड डाउनलोड कर सकते हैं।
प्रश्न 13: चित्तौड़गढ़ किले के पास रुकने की जगह कहाँ है?
उत्तर: किले के पास ही शाही हवेलियाँ, पुराने होटल और सस्ते होम स्टे हैं। जहाँ पर्यटक आराम से ठहर सकते हैं।
प्रश्न 14: किले की सुरक्षा कैसी है?
उत्तर: किले की सुरक्षा ASI और पुलिस करती है। मुख्य जगहों पर कैमरे भी लगे हुए हैं।
प्रश्न 15: किला घूमने का सबसे अच्छा समय कौनसा है?
उत्तर: अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे अच्छा माना जाता है। क्योंकि इस समय मौसम भी ठंडा रहता है।
हालांकि सुबह 9:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक घूमना अच्छा रहता है। क्योंकि इस वक्त किले में भीड़ कम रहती है।
प्रश्न 16: क्या किले में पार्किंग है?
उत्तर: हाँ, किले के मुख्य द्वार के पास चरखी चौक में पार्किंग है। जहां एक दिन के पार्किंग की फीस 10 से 20 रुपए तक है।
प्रश्न 17: किले के आसपास खाना कहा मिलता है?
उत्तर: किले के बाहर ही छोटे रेस्टोरेंट और ठेले बने हुए हैं। जहाँ पर राजस्थानी खाना मिलता है।
प्रश्न 18: क्या चित्तौड़गढ़ किले में फोटो खींच सकते हैं?
उत्तर: हाँ, पर्यटक कहीं भी फोटो खींच सकते हैं। ड्रोन से फोटो लेने के लिए ASI की अनुमति लेनी पड़ती है।
प्रश्न 19: भीड़ के समय टिकट कैसे लें?
उत्तर: सर्दियों (दिसंबर-जनवरी) में बहुत भीड़ होती है। ऑनलाइन टिकट बुक करने से समय बचेगा।
प्रश्न 20: बच्चों और बूढ़ों के लिए क्या सुविधा है?
उत्तर: रास्ते में बैठने के लिए बेंच, छाया और पानी के फव्वारे बने हुए हैं। बुजुर्गों के लिए अलग से रेंट पर गाड़ी भी बुक की जा सकती है।
