खजुराहो मंदिरों का इतिहास | देखें परिचय, स्थापना, वास्तुकला, आरतियां, लड़ाइयां, भ्रमण,

खजुराहो मंदिरों का इतिहास | देखें परिचय, स्थापना, वास्तुकला, आरतियां, लड़ाइयां, भ्रमण,

क्या देखना चाहिए...

Table of Contents

परिचय

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

खजुराहों के लोग यह बताया है। कि खजुराहो मंदिरों का इतिहास में खजुराहो को पहले ‘खजूरपुरा’ कहा जाता था। जहां खजुराहों के मंदिर वर्तमान मध्य प्रदेश में स्थित हैं। और यह मंदिर बहुत ही पुराने माने जाते हैं। इसीलिए यूनेस्को ने इन मंदिरों को सन 1986 में विश्व धरोहर यूनेस्को में खजुराहो की लिस्ट 240 की श्रेणी में दर्ज की गई थी हालांकि इन मंदिरों का निर्माण करीब 950 से 1050 ईस्वी के बीच किया गया था। ओर इन्ही 100 सालों के बीच। खजुराहों के 85 मंदिरों को बनवाया गया था।

इन मंदिरों को हिंदू और जैन धर्म दोनों की वास्तुकला में बनाया गया था। ओर उससे भी पहले यहां कुल 85 मंदिर हुआ करते थे। लेकिन अब समय के कारण केवल 25 मंदिर ही शेष बचे हुए हैं। हालांकि यहां के मंदिर 3 अलग अलग हिस्सों में बंटे हुए है। जिनमें यह मंदिर जैन धर्म ओर हिन्दू धर्म दोनों के रूप में माने जाते है।

सनातन (हिंदु धर्म) की आस्था के लिए। 10 मंदिर भगवान विष्णु के बनाए गए थे। 9 मंदिरों का निर्माण भगवान शिव के रूप में करवाया गया था। ओर एक मंदिर सूर्य देवता के लिए बनाया गया था। ओर एक रहस्यमयी मंदिर योगिनी देवियों के लिए बनाया गया था।

दूसरी तरफ, जैन धर्म की आस्था के लिए। 5 मंदिरों का निर्माण दिगंबर जैन तीर्थंकरों के लिए करवाया गया था। खजुराहों के यह सारे मंदिर लगभग 700 साल तक जंगलों में छिपे रहे।

फिर एक अंग्रेज इंजीनियर टी.एस. बर्ट द्वारा। खजुराहों मंदिर की खुदाई से पहले 1838 में इन्हें खोजा गया था। जहां पुराने लेखों में भी खजुराहो का नाम हमे देखने को मिलता है। जिससे पता चलता है कि यह जगह बहुत पुरानी और महत्वपूर्ण रही होगी।

खजुराहो में अब लगभग 25 मंदिर ही बचे हुए हैं। लेकिन यह मंदिर एक छोटी जगह में स्थित हैं। पुराने इतिहास लिखने वाले अल बिरूनी और इब्न बतूता भी शामिल है। जिन्होंने खजुराहो के बारे में बड़े विस्तार से लिखा है। जिनको देखकर यह पता चलता है कि यह जगह कितनी महत्त्वपूर्ण रही होगी।

स्थापना

खजुराहो के मंदिरों को लगभग 950 से 1050 ईस्वी के बीच। चन्देल राजाओं द्वारा बनाए गए थे। जहां यह मंदिर आज बुंदेलखंड में स्थित हैं। जो उस समय चन्देल राजाओं की राजधानी भी हुआ करती थीं। उन्होंने इन शानदार मंदिरों को अपनी ताकत, धर्म में विश्वास, और कला के शौक को दिखाने के लिए बनवाए थे।

उस समय इन मंदिरों को भारतीय नागर शैली वास्तुकला में बनाया गया था। इस शैली में बनाए गए मंदिर का मुख, सूरज उगने की दिशा में होता है। जहां मंदिरों की दीवारों पर भगवान, देवियाँ, अप्सराएँ और जीवन के चार लक्ष्य – धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष – की सुंदर चित्र कला को दर्शाया गया है।

इससे हमें यह पता चलता है. की चंदेल वंश के राजा भगवान शिव (Shiva) को मानते थे। उन्होंने विष्णु (Vishnu) और जैन धर्म के मंदिर भी बनवाए। इससे यह भी पता चलता है कि उस समय के लोग। अलग-अलग धर्मों को मानते थे। और मिल-जुलकर भी साथ रहते थे। इससे यह पता चलता है। की खजुराहो में पहले लगभग 85 मंदिर हुआ करते थे. ओर यह सभी मंदिर एक बहुत बड़े इलाके में फैले हुए थे। पर अब उनमें से केवल 20 से 25 मंदिर ही शेष बचे हुए हैं।

चंदेल वंश के पहले राजा नानुक जिनके शासनकाल (831-845 ई.) के बाद। उनके उत्तराधिकारी तेजस्वी राजाओं ने भी खजुराहो में मंदिर बनवाने का काम जारी रखा। क्योंकि उनके समय में भी कला, धर्म और संस्कृति बहुत आगे बढ़ी।

खजुराहो के मंदिर सिर्फ पूजा करने की जगह नहीं थी। बल्कि यह लोगों के मिलने-जुलने और अपनी बातें कहने का भी जरिया थी। यहां, खजुराहो के मंदिर चंदेल राजाओं की धर्म और कला का अनोखा उदाहरण माना जाता हैं। ओर आज भी यह मंदिर विश्व धरोहर के रूप में मौजूद हैं।

भूगोल

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

खजुराहो, मध्यप्रदेश राज्य के छतरपुर जिले में स्थित है। और यह क्षेत्र बुंदेलखंड क्षेत्र का हिस्सा है। जहां खजुराहो के मंदिर लगभग 24.85 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 79.93 डिग्री पूर्वी देशांतर के बीच बने हुए हैं। जिससे इनकी स्थिति उत्तर भारत के मध्य हिस्से में आती है।

समुद्र तल से इस क्षेत्र की ऊंचाई लगभग 283 मीटर मानी जाती है। इसी वजह से यहां का भूभाग न तो बहुत ऊंचा माना जाता है। और न ही बहुत नीचा माना जाता हैं। बल्कि यहां का भूभाग समतल पठारी इलाके जैसा है। यह स्मारक समूह दक्षिण-पूर्व झांसी से लगभग 175 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहीं पन्ना से खजुराहो की दूरी करीब 40 किलोमीटर है।

इसके अलावा, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से खजुराहो की दूरी लगभग 620 किलोमीटर बैठती है। जिसके चलते यह क्षेत्र उत्तर भारत के पर्यटन मानचित्र में एक अलग पहचान रखता है। यही नहीं, यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है। इसलिए प्रशासनिक दृष्टि से भी इसका महत्व काफी बढ़ जाता है।

खजुराहो का इलाका, विंध्य पर्वत श्रृंखला की तराई में बसा हुआ है। इसी कारण यहां की भूमि पथरीली और लाल मिट्टी से भरी हुई देखने को पाई गई है। हालांकि इस क्षेत्र के आसपास खुदार नदी भी बहती है। जो कभी इन मंदिरों के निर्माण और पानी की जरूरतों को पूरा करने में सहायक रही होगी।

वहीं कुछ दूरी पर केन नदी भी बहती है। जिसके किनारे पन्ना नेशनल पार्क जैसा घना जंगल फैला हुआ है। अगर जलवायु की बात करें तो यहां उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु पाई जाती है। जिसमें गर्मी के मौसम में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। जबकि सर्दियों में यह गिरकर 5 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह जाता है।

इसी बीच बारिश का मौसम जून से सितंबर तक रहता है। जिसमें औसत वर्षा लगभग 1100 मिलीमीटर दर्ज की जाती है। क्योंकि यह क्षेत्र बुंदेलखंड के पठार पर बसा हुआ है। इसलिए यहां की जलवायु शुष्क और गर्म प्रकृति की मानी जाती है। दूसरी ओर, घने जंगल और नदियों की मौजूदगी की वजह से यहां का वातावरण पर्यटकों के लिए अनुकूल भी बन जाता है।

आरतियां, समय और दिनचर्या

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

दिनचर्या का टाइमटेबल

समयगतिविधि
6:00 – 7:00प्रातःकालीन पूजा एवं आरती
8:00 – 12:00मंदिर का दर्शन, भक्तजन की भीड़
12:00 – 13:30दोपहर की पूजा, भोग अर्पित
13:30 – 18:00मंदिर खुला रहता है, दर्शन जारी
18:30 – 20:00संध्या आरती, भजन-कीर्तन
20:00 – 21:00प्रसाद वितरण और मंदिर बंदी
21:00 – 22:00रात्रि पूजा (आंतरिक पुजारी द्वारा)

आरतियां और पूजा का समय

1. सुबह की आरती (सुबह 6:00 से 8:00 बजे के बीच):– खजुराहो के मंदिरों में सुबह की आरती से दिन की शुरुआत होती है। जहां भगवान की मूर्ति के ठीक सामने दिए जलाए जाते हैं। जिसमें धूप-अगरबत्ती को भी शामिल किया जाता हैं। और इन्हीं के साथ मंत्र भी बोले जाते हैं। हालांकि यह रोजाना आरतियां, कुछ विशेष मंदिरों में की जाती हैं। जिसमें कंदरिया महादेव मंदिर, देवी जगदंबा का मंदिर, सूर्य देव (चित्रगुप्त का मंदिर), और पार्श्वनाथ का मंदिर आदि शामिल हैं।

2. दोपहर की पूजा (दोपहर 12:00 से 1:30 बजे): खजुराहो के मंदिरों में दोपहर के समय में हल्की पूजा की जाती है। जिसमें तुलसी, फूल और फल भगवान को चढ़ाया जाता हैं। ओर पुजारी खुद लोग देवताओं को भोग लगाने के बाद। दोपहर की पूजा की शुरुआत करते हैं।

3. शाम की आरती (संध्या 6:30 से 8:00 बजे): शाम की आरती, दिन की सबसे ज़रूरी आरती मानी जाती है। जिसमे दीये, घंटी, शंख के साथ साथ मंत्र भी बोले जाते हैं। इसके अलावा, शाम की आरती में भजन, कीर्तन ओर आरती भी करते हैं । और उसके बाद अंत में मीठा प्रसाद भी बांटा जाता हैं।

4. रात्रि पूजा (रात 9:00 से 10:00 बजे): रात की पूजा करने से पहले। भगवान को आराम करने के लिए। तैयार किया जाता हैं। जिसमें यह पूजा बड़ी शांति से की जाती है। ओर फूल, पत्ते और पानी भगवान को चढ़ाया जाता हैं।

खजुराहो मंदिरों की दिनचर्या

मंदिर की सुबह स्नान और सजावट: पुजारी पहले भगवान की मूर्तियों को रोजाना नहलाते हैं। और फिर फूल, चंदन और रोली से मूर्ति को सजाते हैं। 

ऊँघी और भजन: खजुराहो में सुबह भजन और मंत्रों से मंदिरों का माहौल भक्तिमय हो जाता है।

पूजा और भोग: भगवान को फल, फूल और मिठाई अर्पित की जाती है। 

मंदिर खुलने का समय:  खजुराहो के मंदिर सुबह 6:00 से 7:00 बजे खोले जाते हैं। और रात को 8:00 बजे के बाद मंदिर बंद कर दिए जाते हैं।

विशेष अवसरों पर योग और ध्यान: पुजारी ने बताया, यहां शिवरात्रि, दशहरा और दीपावली जैसे खास दिनों पर मंदिरों में विशेष पूजा और ध्यान होता है।

प्रसाद देना: रोजाना आरती होने के बाद, भक्तों में प्रसाद वितरण किया जाता है।

मंदिरों की प्रमुख आरतियां

1. कंदरिया महादेव मंदिर की आरती: मैंने देखा, Khajuraho Temple Mp ये मंदिर भगवान शिव का है। और यहाँ सुबह और शाम को बड़ी आरती होती है। पत्थर के शिवलिंग पर दिए जलाकर, भजन गाकर पूजा करते हैं।

2. देवी जगदंबा मंदिर की आरती: यहाँ देवी माँ की प्रार्थना करके आरती करते हैं। फूल और दिए चढ़ाते हैं।

3. चित्रगुप्त मंदिर की आरती: ये मंदिर सूरज भगवान का है। सुबह जब सूरज निकलता है, तब आरती होती है। सूरज भगवान की मूर्ति को दीया दिखाते हैं और जल चढ़ाते हैं।

4. पार्श्वनाथ जैन मंदिर की आरती: मैंने देखा, जैन धर्म के हिसाब से यहां ध्यान करते हैं और ‘नमोकार मंत्र’ बोलते हैं। खास त्योहारों पर जैन तरीके से पूजा करके आरती करते हैं।

अतिरिक्त जानकारी

मेरे अनुसार Khajuraho Temple Mp में पूजा करने का तरीका अलग-अलग हो सकता है। क्योंकि हिन्दू मंदिरों में आरती होती है। जैन मंदिरों में पूजा ध्यान से की जाती है और “नमोकार मंत्र” बोलते हैं। ये सब मंदिर के पुजारी और समिति मिलकर करवाते हैं।

खजुराहो के मंदिरों में आरती और पूजा के बारे में जानना है तो मंदिर के फोन: +91‑755‑2558250, 2558270, 2558271 ई‑मेल: circlebho[dot]asi@nic.in पुजारी या ऑफिस में बात करें। कुछ मंदिर अपनी पूजा की जानकारी सबको नहीं देते।

सुबह से शाम तक, Khajuraho Temple Mp में भगवान की पूजा होती है। भक्त भी इसमें शामिल होते हैं और भगवान की प्रार्थना करते हैं।

दंतकथाएं

1. चंद्रवर्मन के शुरुआत की कहानी

खजुराहों मंदिर की सबसे मशहूर कहानी। चंदेल राजाओं के पहले राजा। चंद्रवर्मन के जन्म की मानी जाती है। जिसमें कहा जाता हैं कि काशी में हेमवती नाम की एक ब्राह्मण की सुंदर बेटी हुआ करती थी। वह एक दिन चाँदनी रात में, एक तालाब में नहा रही थी। तभी चंद्रमा को वह सुन्दर लड़की बहुत सुंदर लगी।

चंद्रदेव ने हेमवती से शादी के बारे में कहा। लेकिन हेमवती ने सामाजिक नियमों का हवाला देते हुए मना कर दिया। तभी चंद्रदेव ने वादा किया कि उनका एक बेटा होगा। ओर वह एक महान योद्धा और राजा बनेगा। फिर चंद्रवर्मन का जन्म हुआ। जिसके बाद में चंदेल वंश की स्थापना हुई।

हालांकि हेमवती ने अपने बेटे को जंगल में छिपाकर पाला। तभी चंद्रदेव ने उसे सपने में बताया। कि चंद्रवर्मन जब 16 साल का हो जाएगा। तो वह एक महान राजा बनेगा। और उसकी याद में एक सुंदर मंदिर भी बनेगा।

2. खजुराहो नाम की शुरुआत

खजुराहो नाम कैसे रखा गया। इसके बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक कहानी है कि यहाँ पहले खजूर के बहुत पेड़ हुआ करते थे। इसलिए इसे ‘खजूरवाहिका’ या ‘खजूरपुरा’ कहा जाता है। इसके बाद, यही नाम बदलकर “खजुराहो” हो गया।

खजुराहो नाम की उत्पत्ति पर कई कहानियाँ कही जाती हैं। दूसरी कहानी के अनुसार, इसे चंद्रदेव के नाम पर “चंद्रपुर” कहा जाता था। जो बाद में “खजुराहो” बन गया।

यहाँ खजूर शब्द के बारे में एक और बात बताई जाती है: लोगों का मानना है कि “खजूर” शब्द संस्कृत के एक शब्द “क्षुद्र” से आया है। जिसका सीधा मतलब होता है “छोटा”। ऐसा माना जाता है कि इस जगह को यह नाम छोटी-छोटी पहाड़ियों की वजह से मिला था।

3. देवताओं का घर होना

खजुराहों को पुरानी कहानियों में देवताओं का घर माना जाता है। क्योंकि यहां इंद्र, वरुण और अग्नि जैसे भगवान रहते थे। इसलिए यहाँ मंदिरों में भगवानों की सुंदर मूर्तियाँ बनाई गई हैं।

एक कहानी है कि जब देवताओं और राक्षसों में लड़ाई हुई थी। तो देवताओं ने इस जगह को अपना घर बनाया और यहाँ तपस्या भी की थी।

4. खजुराहो: अप्सराओं का नाचने का स्थान

खजुराहों को अप्सराओं (स्वर्ग की सुंदर महिलाओं) का नाचने का स्थान भी माना जाता हैं। कहते हैं कि अप्सराएँ यहाँ नाचने आती थीं। इसलिए मंदिरों की दीवारों पर उनकी सुंदर मूर्तियाँ बनाई गई थी। कहा जाता है कि जब चंदेल राजाओं ने। इन मंदिरों का निर्माण करवाया था। तो अप्सराओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि ये मंदिर हमेशा सुंदर दिखेंगे।

5. शिव और पार्वती की लीला वाली जगह

कहा जाता है कि खजुराहो में भगवान शिव और पार्वती। इस जगह पर बहुत खेला करते थे। शिव ने यहाँ तांडव नृत्य किया था। और पार्वती भी उनके साथ थीं। इसलिए यहाँ शिव जी के कई मंदिर बने हुए हैं। जहाँ उनके नाचने के सुंदर चित्र भी बनाए गए हैं।

6. कामदेव की तपस्या वाली जगह

एक कहानी के अनुसार, यहां कामदेव ने तपस्या की थी। जब भगवान शिव ने उन्हें जला दिया था। तब वो यहां आकर दोबारा जन्म लेने के लिए तप करने लगा। इसलिए इस जगह पर प्यार और कामदेव से जुड़ी मूर्तियाँ बहुत उकेरी गई हैं।

7. सात ऋषियों का आश्रम

बहुत पुराने समय में, यह जगह सात बड़े ऋषियों का आश्रम हुआ करता था। कहते हैं कि विश्वामित्र, भारद्वाज और दूसरे ऋषियों ने यहाँ तपस्या की थी। उनके आशीर्वाद से यह जगह बहुत पवित्र और ताकतवर बन गई।

8. गुप्त सुरंगों की कहानी

खजुराहो के लोगों का मानना है कि खजुराहो के नीचे कुछ गुप्त (secret) रास्ते बने हुए हैं। जिनके बारे में कहा जाता हैं। कि पुराने ज़माने में भगवान इन रास्तों से मंदिरों में आते-जाते थे।

वास्तुकला

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

यहां के मंदिर चंदेल वंश के शासनकाल लगभग (900 ईस्वी से 1050 ईस्वी) के बीच बनाए गए थे। वहीं इस पूरे कालखंड में इन मंदिरों का निर्माण नागर शैली में किया गया था। जो उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य की सबसे परिष्कृत शैली मानी जाती है।

खजुराहो के सभी मंदिर मुख्य रूप से महीन दाने वाले बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) से बनाए गए थे। जिसका रंग हल्के बेज से लेकर गुलाबी तक होता है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन मंदिरों के निर्माण में मोर्टार यानी सीमेंट जैसी किसी जोड़ने वाली सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया था।

बल्कि पत्थरों को मोर्टिस-टेनन जोड़ों (एक पत्थर में खांचा और दूसरे में उभार डालकर जोड़ने की तकनीक) और गुरुत्वाकर्षण के सहारे आपस में जोड़ा गया था। इसी वजह से आज भी यह मंदिर हजारों साल के बाद भी अपनी मूल संरचना में खड़े हुए हैं।

उस समय, इन मंदिरों के निर्माण में इस्तेमाल किए जाने वाले। बलुआ पत्थर को मुख्य रूप से पन्ना की खदानों से लाया जाता था। क्योंकि उस समय आधुनिक परिवहन के साधन नहीं हुआ करते थे। इसलिए भारी पत्थरों को लकड़ी के लट्ठों और मानव श्रम की मदद से खींचकर निर्माण स्थल तक पहुंचाया जाता था।

उस समय, कारीगरों ने रस्सी की ज्यामिति, साहुल रेखा (प्लंब लाइन) और हाथ से बनाए गए औजारों की मदद से। इतनी सटीक नक्काशी की थी। जो आज भी वास्तुकला के छात्रों को भी हैरान करती है।

आधार मंच (जगती):- हर मंदिर की ईमारत को, एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया था। जिस निर्माण कला को जगती के नाम से जाना जाता हैं। इससे मंदिर की ऊंचाई और भी ज्यादा आकर्षक दिखाई देती है।

शिखर की संरचना:- मुख्य शिखर के चारों ओर छोटे-छोटे उरुश्रृंग यानी लघु शिखर बनाए गए थे। जिससे पूरा ढांचा किसी पर्वत श्रंखला जैसा दिखाई देता है। यह मेरु पर्वत का प्रतीक माना जाता है।

पंचायतन शैली:- कई मंदिरों में मुख्य गर्भगृह के चारों को।नों पर चार छोटे उपमंदिर बनाए गए थे। जिसे पंचायतन शैली कहा जाता है।

अब हम एक-एक करके खजुराहो के दस मुख्य मंदिरों की वास्तुकला पर गहराई से नज़र डालते हैं।

कंदारिया महादेव मंदिर

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

कंदारिया” शब्द का अर्थ गुफा में रहने वाले “महान भगवान” से माना जाता हैं। कंदारिया महादेव मंदिर को, खजुराहो का सबसे बड़ा और सबसे ऊंचा मंदिर माना गया है। इस मंदिर का निर्माण चंदेल राजा गंडदेव के पुत्र। राजा विद्याधर ने अपने शासनकाल में लगभग (1025 ईस्वी से 1050 ईस्वी) के बीच में बनवाया था।

हालांकि इसके निर्माण के पीछे का कारण यह माना जाता हैं। कि जब महमूद ग़ज़नवी बुंदेलखंड पर आक्रमण करने के लिए। बुंदेलखंड की तरफ बढ़ने लगा। तो विद्याधर ने गजनी के आक्रमणकारी महमूद ग़ज़नवी का डटकर सामना किया था। और उसी जीत की खुशी में कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण करवाया। जहां यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। और भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के अनुसार, इसकी ऊंचाई लगभग 31 मीटर मानी गई है।

प्लिंथ और आधार:- कंदारिया महादेव मंदिर की ईमारत एक विशाल चबूतरे पर खड़ी की गई थी। जिसकी ऊंचाई करीब 4’ मीटर रखी गई। शायद इसी वजह से, यह मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए और भी बड़ा दिखाई देता है।

पांच भागों वाला लेआउट:- कंदारिया महादेव मंदिर में अर्धमंडप, मंडप, महामंडप, अंतराल और गर्भगृह क्रमशः एक के बाद एक जुड़े हुए देखने को मिलते हैं। अंदर की तरफ प्रवेश करते ही। हर कक्ष की छत पिछले वाले से ऊंची दिखाई देती है। जिससे अंदर जाते समय ऊर्ध्वगामी यात्रा का एहसास होता है।

शिखर की बनावट:- कंदारिया महादेव मंदिर के मुख्य शिखर के इर्द-गिर्द 84 लघु शिखर बनाए गए थे। जो कुल मिलाकर पर्वत श्रंखला जैसा दिखाई देते हैं। इसे फ्रैक्टल ज्यामिति का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। क्योंकि गर्भगृह के वर्गाकार आधार का अनुपात हर मंडप की छत में दोहराया गया है।

गर्भगृह:- कंदारिया महादेव मंदिर के अंदर संगमरमर का शिवलिंग स्थापित किया गया था। और गर्भगृह (कमरे, कक्ष) के ऊपर ही सबसे ऊंचा शिखर (चोटी) बिंदु आता है। जो नागर शैली का एक मूल बिंदु माना जाता है।

इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर आठ सौ से ज्यादा मूर्तियां उकेरी गई थी। इसीलिए इसे खजुराहो की वास्तुकला और मूर्तिकला के संगम का सबसे परिपक्व उदाहरण माना जाता है।

लक्ष्मण मंदिर

लक्ष्मण मंदिर खजुराहो का सबसे पुराना और सबसे सुरक्षित मंदिर माना जाता है। इसका निर्माण चंदेल राजा यशोवर्मन ने करवाया था। और यह लगभग 930 से 954 ईस्वी के बीच बनकर तैयार हुआ था। जहां यह मंदिर भगवान वैकुंठ विष्णु को समर्पित है।

पंचायतन योजना:- लक्ष्मण मंदिर के मुख्य गर्भगृह के चारों कोनों पर चार छोटे उपमंदिर बनाए गए थे। जो अपने आप में लघु शिखर, मंडप और गर्भगृह जैसी पूर्ण संरचना रखते हैं।

सांधार शैली:- लक्ष्मण मंदिर का गर्भगृह, एक स्तंभों वाली गैलरी से घिरा हुआ है। जिससे भक्त प्रदक्षिणा यानी परिक्रमा कर सकते हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल लक्ष्मण मंदिर के बाद बने मंदिरों में भी किया गया था।

आंतरिक क्रम:- लक्ष्मण मंदिर के अर्धमंडप से प्रवेश करने के बाद। मंडप, महामंडप, अंतराल और अंत में गर्भगृह आता है। जहां हर मंडप की छत पिरामिड आकार (छोटी से बड़ी) में क्रमशः बड़ी होती जाती है।

जगती पर अलंकरण:- लक्ष्मण मंदिर की ईमारत जिस ऊंचे चबूतरे पर बनाई गई थी। उस पर हाथी, घोड़े, युद्ध के दृश्य और जुलूस की एक लंबी शृंखला उकेरी (बनाई) गई है।

खजुराहो के सभी मंदिरों में लक्ष्मण मंदिर ही। एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है। जिसमें सभी चार उपमंदिर और जगती अपने मूल रूप में आज भी सुरक्षित (बचे हुए) हैं।

विश्वनाथ मंदिर

विश्वनाथ मंदिर का निर्माण चंदेल राजा धंग ने करवाया था। और यह पूरी तरह लगभग 999 ईस्वी में बनकर तैयार हुआ था। इस मंदिर के शिलालेख में मंदिर के वास्तुकार का नाम चिच्छा (या चिच्चा) दर्ज किया गया है। जो खजुराहो के किसी भी मंदिर में वास्तुकार का नाम मिलने का दुर्लभ उदाहरण है।

मूल पंचायतन ढांचा:- मूल रूप से, विश्वनाथ मंदिर भी चार उपमंदिरों (छोटे मंदिरों) से घिरा हुआ था। लेकिन आज इनमें से केवल दो ही शेष बचे हुए हैं।

लेआउट क्रम:- विश्वनाथ मंदिर में भी प्रवेश द्वार से शुरू होकर। मंदिर के अंदर की ओर मंडप, महामंडप और फिर गर्भगृह तक की श्रृंखला बनाई गई है। जो लक्ष्मण मंदिर और कंदारिया महादेव मंदिर, दोनों की मिलती जुलती शैली को दर्शाती है।

नंदी शालिका:- विश्वनाथ मंदिर के मुख्य गर्भगृह के ठीक सामने। पूर्व दिशा में नंदी की एक अलग प्रतिमा बनाई गई है। ताकि नंदी शिवलिंग की ओर मुख किए हुए स्थापित रह सके।

तीन पंक्तियों में नक्काशी:- विश्वनाथ मंदिर के बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, सुरसुंदरियों और दैनिक जीवन के दृश्यों को। तीन क्षैतिज पंक्तियों में व्यवस्थित किया गया है।

वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर लक्ष्मण मंदिर और कंदारिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी माना जाता है। क्योंकि इसमें दोनों की शैलीगत विशेषताएं साथ-साथ दिखाई देती हैं।

जगदम्बी मंदिर

जगदम्बी मंदिर, कंदारिया महादेव मंदिर के साथ ही एक ही विशाल जगती पर बनाया गया था। जहां इस मंदिर का निर्माण लगभग 1000 से 1025 ईस्वी के बीच हुआ था। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि इस मंदिर के द्वार के ऊपर विष्णु भगवान की तस्वीरों को देखते हुए। यह माना जाता है कि यह मंदिर कभी विष्णु भगवान का मंदिर हुआ करता था। लेकिन समय के चलते यहां देवी पार्वती की प्रतिमा को स्थापित कर दिया गया।

त्रि-खंड डिज़ाइन:- जगदम्बी मंदिर 3 मुख्य भागों में बंटा हुआ है। जिसमे महामंडप, अंतराल और गर्भगृह, आदि शामिल हैं। हालांकि जगदम्बी मंदिर में प्रदक्षिणा पथ नहीं बनाया गया था। बाकी इस मंदिर को कंदारिया महादेव के मंदिर से भी अलग कर देता।

समतल छत:- जगदम्बी मंदिर के महामंडप की छत चौकोर और अपेक्षाकृत सरल है। जबकि पास के चित्रगुप्त मंदिर की छत अष्टकोणीय और अधिक अलंकृत है। इससे यह पता चलता है कि जगदम्बी मंदिर को। चित्रगुप्त मंदिर से भी पहले बनाया होगा।

मूर्तियों की तीन पंक्तियां:- जगदम्बी मंदिर के बाहर की तरफ की दीवारों पर। तीन पंक्तियों में मूर्तियां बनाई गई हैं। जिसमे नीचे की दो पंक्तियों में मुख्यतः विष्णु से जुड़े प्रसंग हैं। जबकि सबसे ऊपरी पंक्ति में मिथुन दृश्य अधिक दिखाई देते हैं।

ऊंचा चबूतरा:- जगदम्बी मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया था। जिससे इसकी दिखावट और भव्यता, एकसाथ दिखाई देती है।

यह मंदिर आकार, अनुपात और सजावट, इन तीनों में चित्रगुप्त मंदिर से काफी मिलता-जुलता दिखाई देता है। इसीलिए दोनों मंदिरों का निर्माण एक समय में माना जाता है।

चित्रगुप्त मंदिर

चित्रगुप्त मंदिर खजुराहो का एक इस इकलौता मंदिर माना जाता है। जो सूर्य देव को समर्पित है। जहां एक ऐसे शिलालेख से पता चलता है। की यह मंदिर, 23 फरवरी 1023 ईस्वी के आसपास बनकर तैयार हुआ था। ओर इस मंदिर को, जगदम्बी मंदिर के ठीक उत्तर में, उसी शैली में बनाया गया था।

वास्तु योजना:- चित्रगुप्त मंदिर में, प्रदक्षिणा पथ के अलावा गर्भगृह, एक वेस्टिब्यूल (अंतराल), ट्रांसेप्ट सहित महामंडप और एक प्रवेश द्वार बनाया गया था।

अष्टकोणीय छत:- चित्रगुप्त मंदिर के महामंडप की छत अष्टकोणीय आकार में बनाई गई थी। जो जगदम्बी मंदिर की चौकोर छत से। बहुत ज्यादा अलंकृत और परिष्कृत मानी जाती है।

दो बालकनियां:- चित्रगुप्त मंदिर में दो बालकनियां बनाई गई थी। हालांकि इसकी छत की ऊंचाई खजुराहो के बड़े मंदिरों जितनी प्रभावशाली नहीं है।

गर्भगृह की प्रतिमा:- चित्रगुप्त मंदिर के गर्भगृह में सात घोड़ों वाले रथ पर सवार सूर्य देव की खड़ी प्रतिमा स्थापित की गई थी। और प्रवेश द्वार की चौखट पर भी सूर्य की तीन छोटी प्रतिमाएं उकेरी गई हैं।

चूंकि इसकी छत जगदम्बी मंदिर से अधिक विकसित है। इसलिए वास्तुविदों का मानना है कि चित्रगुप्त मंदिर को जगदम्बी मंदिर के बाद में बनाया होगा।

मतंगेश्वर मंदिर

मतंगेश्वर मंदिर को, खजुराहो के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। जिसको चंदेल शासक चंद्र देव के शासनकाल लगभग (9वीं से 10वीं शताब्दी) के बीच बनवाया गया था। वहीं इस मंदिर की खास बात यह है। कि यह खजुराहो का इकलौता ऐसा मंदिर है। जहां आज भी रोजाना पूजा होती रहती है।

सादा वर्गाकार ढांचा:- दूसरे खजुराहो मंदिरों को देखते हुए। मतंगेश्वर मंदिर की बाहरी और भीतरी दीवारें बिना नक्काशी के साधारण तरीके से बनाई गई थी। यहां तक कि शिखर पर भी कोई अलंकरण नहीं है।

विशाल शिवलिंग:- मतंगेश्वर मंदिर के अंदर लगभग 8’ फीट ऊंचा शिवलिंग स्थापित किया गया था। जो चमकीले पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया था। वहीं इस मंदिर का निर्माण एक ऊंचे चबूतरे पर किया गया था। जिसकी ऊंचाई करीब 1.2 मीटर और व्यास लगभग 7.6 मीटर है।

छत की तकनीक:- मतंगेश्वर मंदिर के अंदर की तरफ के छत को। संकेंद्रित वलयों को एक-दूसरे के ऊपर सजाकर बनाया गया था। जो एक अष्टकोणीय आधार पर टिकी हुई है। इस आधार को चार जोड़ी स्तंभों का सहारा मिला हुआ है।

प्रारंभिक शैली का उदाहरण:- मतंगेश्वर मंदिर का डिज़ाइन भी। ब्रह्मा मंदिर जैसे शुरुआती दौर के मंदिरों से मिलता-जुलता दिखाई देता है। जो खजुराहो के मंदिरों की वास्तुकला के विकास क्रम को समझने में मदद करता है।

इस मंदिर की सादगी ही इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती है। क्योंकि यहां अलंकरण से ज्यादा जोर आध्यात्मिक गंभीरता पर दिया गया प्रतीत होता है।

वराह मंदिर

वराह मंदिर को, खजुराहो के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। जिसे लगभग (900 से 925 ईस्वी) के बीच बनाया गया था। जहां यह मंदिर, भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित है। और इसकी बनावट बाकी मंदिरों से काफी अलग मानी जाती है।

खुला मंडप ढांचा:- वराह मंदिर के चारों तरफ कोई दीवार नहीं बनाई गई। बल्कि यह मंदिर एक आयताकार खुले मंडप के रूप में बनाया गया था। जिसकी छत घटते-क्रम में स्तरों वाली पिरामिडनुमा है।

चौदह स्तंभ:- वराह मंदिर की पूरी ईमारत 14 सादे स्तंभों पर टिकाई गई थी। जो इसे बाकी अलंकृत मंदिरों में से एकदम अलग शैली देती है।

कमल छत:- वराह मंदिर के अंदर की छत पर। एक बड़ा कमल पुष्प बनाया गया था। जिसे भगवान विष्णु के हाथ में मौजूद कमल का प्रतीक माना जाता है।

मूर्ति की स्थापना:- वराह मंदिर के मंडप के बीचों बीच। एक विशाल, पूर्णतः पशु रूप वाली वराह प्रतिमा स्थापित की गई थी। ताकि यहां आने वाले भक्त उसकी भी परिक्रमा कर सकें।

क्योंकि इस मंदिर में कोई दीवारें नहीं बनाई गई। इसलिए इसे खजुराहो की शुरुआती और सरल निर्माण तकनीक का अच्छा उदाहरण माना जाता है।

नंदी मंदिर

नंदी मंदिर को, विश्वनाथ मंदिर परिसर का ही एक हिस्सा माना जाता है। जिसका निर्माण कार्य 11वीं शताब्दी की शुरुआत में किया गया था। जहां यह मंदिर, शिव के वाहन नंदी को समर्पित है।

चतुर्भुज मंच:- नंदी मंदिर को, एक क्रॉस के आकार वाले चतुर्भुज चबूतरे पर बनाया गया था। जो दिखने में एक क्रॉस-क्वाड्रेट संरचना जैसा दिखाई देता है।

दीवार रहित संरचना:- नंदी मंदिर में भी वराह मंदिर की तरह कोई दीवार नहीं बनाई गई थी। इसी कारण, इस मंदिर में स्थापित की गई। नंदी की विशाल प्रतिमा हर दिशा से देखी जा सकती है।

स्थिति और दिशा:- नंदी मंदिर, ठीक विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह के सामने बनाया गया था। ताकि नंदी की प्रतिम हमेशा शिवलिंग की ओर मुंह करते हुए दिखे।

अलंकरण:- नंदी मंदिर के स्तंभों और चबूतरे पर पशु-पक्षियों और मानव आकृतियों की बारीक नक्काशी की गई थी। जो इसे एक साधारण वाहन-शालिका से कहीं अधिक कलात्मक बना देती है।

नंदी मंदिर दिखने में काफी छोटा ओर साधारण लगे। लेकिन इसकी स्थिति और दिशा-निर्धारण, दोनों ही नागर शैली की धार्मिक अक्ष व्यवस्था का पालन करते हैं।

पार्वती मंदिर

पार्वती मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित। एक छोटा उपमंदिर माना जाता है। जिसका निर्माण लगभग (950 से 1000 ईस्वी) के बीच किया गया था। यह मंदिर, विश्वनाथ मंदिर परिसर के उपमंदिरों में से एक माना जाता है।

छोटा गर्भगृह:- पार्वती मंदिर में केवल गर्भगृह और एक प्रवेश पोर्च ही मूल संरचना का हिस्सा हैं। दुर्भाग्य से पोर्च का अधिकांश हिस्सा समय के साथ। अब नष्ट हो चुका है। और आज केवल गर्भगृह का चबूतरा ही बचा हुआ है।

तपता हुआ शिखर:- पार्वती मंदिर का सबसे प्रमुख हिस्सा उसका ऊंचा, धीरे-धीरे पतला होता हुआ शिखर है। जिसके शीर्ष पर आमलक बना हुआ है।

द्वार की सजावट:- पार्वती मंदिर के गर्भगृह के द्वार के ऊपरी मेहराब पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव, तीनों की मूर्तियां बनाई गई थी।

पुनर्स्थापन:- समय के साथ पार्वती मंदिर काफी टूट गया था। इसलिए इसके गर्भगृह को बाद में फिर में बनवाया गया।

पार्वती मंदिर आकार में भले ही छोटा हो। लेकिन इसकी वास्तु योजना विश्वनाथ मंदिर जैसे बड़े परिसरों के भीतर उपमंदिरों की भूमिका को समझने में मदद करती है।

गणेश प्रतिमा

खजुराहो में भगवान गणेश को समर्पित। कोई एक बड़ा स्वतंत्र मंदिर नहीं बना हुआ है। बल्कि गणेश जी की यहां उपस्थिति। छोटे उपमंदिरों और आलों (niches) में प्रतिमा के रूप में देखने को मिलती है। जो पंचायतन शैली की वास्तुकला की एक खासियत है।

कोने के उपमंदिर:- लक्ष्मण मंदिर जैसे पंचायतन मंदिरों के मुख्य गर्भगृह के चारों कोनों पर बने उपमंदिरों में से एक में गणेश जी सहित अन्य देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई थी।

आले में मूर्तिकला:- लक्ष्मण मंदिर के महामंडप की दक्षिणी बाहरी दीवार पर एक आले में नृत्य करते हुए गणेश जी की मूर्ति बनाई गई थी। जो खजुराहो की दिशा-आधारित प्रतिमा व्यवस्था का हिस्सा मानी जाती है।

दिशा का महत्व:- नागर शैली की परंपरा के अनुसार, गणेश जी की प्रतिमा को अक्सर उत्तर दिशा में स्थापित किया जाता है। जबकि यम जैसे देवता को दक्षिण दिशा में स्थापित किया जाता हैं।

लघु शिखर संरचना:- खजुराहो के इन छोटे उपमंदिरों में भी अपने स्वतंत्र विमान, शिखर, मंडप और गर्भगृह होते हैं। बस आकार में यह मुख्य मंदिर से बहुत छोटे होते हैं।

इस तरह गणेश जी को समर्पित स्थल, खजुराहो में स्वतंत्र मंदिर के बजाय। बड़े मंदिरों की समग्र वास्तु योजना का ही एक अभिन्न हिस्सा बनकर उभरता हुआ दिखाई देता है।

रहस्य, चमत्कार

25 मंदिर बचे रहने का रहस्य

खजुराहो का सबसे बड़ा रहस्य यह माना जाता है। की यहां कभी कुल 85 मंदिर हुआ करते थे। लेकिन उन 85 मंदिरों में से। आज केवल 20 से 25 मंदिर ही शेष बचे हुए हैं। क्योंकि छतरपुर जिला प्रशासन के अभिलेखों के अनुसार भी। उन्होंने खजुराहो स्थल पर कभी 85 मंदिर होने का दावा किया है। जिसमें यहां का रहस्य यह बना हुआ है। जो हमेशा इतिहासकारों को परेशान करता रहा है। की बाकी ब बचे हुए 60 मंदिर अचानक कहा चले गए।

कही सैकड़ों वर्षों तक जंगल और झाड़ियों में छिपे रहने की वजह से। बाकी मंदिर पूरी तरह नष्ट तो नहीं हो गए। वहीं कुछ मंदिर पर, जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हमला किया था। तब कुछ मंदिरों को तोड़ा भी गया था। हालांकि खजुराहो का मुख्य समूह इन मुस्लिम आक्रमणकारियों से काफी हद तक बचा रहा था।

वहीं कुछ प्राकृतिक आपदाओं जैसे वर्षा, आंधी और मिट्टी के कटाव की वजह से। कई इन मंदिरों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया हो। हालांकि, आज भी पुरातत्व विभाग की खुदाई में समय-समय पर। मंदिरों के पुराने अवशेष देखने को मिलते रहते हैं। जिससे उनके अंदर यह उम्मीद जगी रहती है। कि शायद आगे आने वाले समय में। बाकी खोए हुए मंदिर भी मिल सके।

कामुक मूर्तियों का रहस्य

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

यहां के मंदिरों के बाहरी दीवारों पर। कामक्रिया के अलग-अलग आसन को दिखाने वाली। सैकड़ों मूर्तियां उकेरी (बनाई) गई थी।

जिसमें से सिर्फ, कंदरिया महादेव मंदिर ही एक ऐसा मंदिर है। जिसमें, 600 से ज्यादा ऐसी आकृतियां वाली मूर्तियां बनाई गई। जिन मूर्तियों में मैथुन मुद्राओं का बारीक चित्रण किया गया था। हालांकि इसके पीछे का रहस्य यह माना जाता रहा है। की एक मंदिर परिसर के अंदर ऐसी मूर्तियां क्यों बनवाई गईं थीं।

कुछ लोगों का यह कहना हैं। कि यह मूर्तियां तांत्रिक पूजा-पद्धति से जुड़ी हुई रही होगी। ओर उस समय में काफी प्रचलित भी हुआ करती थी। कुछ लोगों का भ्रम यह है। कि जब बौद्ध धर्म तेजी से फैल रहा था। तब चंदेल शासकों ने हिंदू धर्म को आकर्षक बनाने के लिए इन मूर्तियों का निर्माण करवाया था। ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा मंदिर को देखने आएं। और फिर मंदिर के अंदर जाकर भगवान के दर्शन भी करें।

वही लोगो की विचारधारा से यह भी पता चलता है। कि यह मूर्तियां मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दर्शाती हैं। इसलिए काम को भी जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा मानकर इन मूर्तियों में दिखाया गया था। ओर इसी वजह से आज तक कोई भी। इतिहासकार इस रहस्य का एक सही और एक समान उत्तर नहीं दे पाया है।

आक्रमणकारियों से बचने का चमत्कार

मध्यकाल में हुए आक्रमणों के दौरान। भारत के कई प्राचीन मंदिरों को तोड़ा गया था। मगर चमत्कार की बात यह है। की खजुराहो का मुख्य मंदिर समूह काफी हद तक। उन बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित बचा रहा। हालांकि इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह। इसका भौगोलिक स्थान माना जाता है। क्योंकि यह जगह, पन्ना-छतरपुर वाले मार्ग पर मुख्य रास्तों से कुछ ही मील दूर। घने जंगलों के बीच में स्थित है।

इसीलिए यह कहा जा सकता है। की खजुराहो कोई बड़ा व्यापारिक या सैन्य मार्ग नहीं रहा होगा। ओर कई आक्रमणकारियों की सेनाएं इस दिशा में नहीं गईं होगी। जिसके चलते यहां के मंदिर सुरक्षित रहे होंगे। दूसरी बात, घने जंगल में होने के कारण। खजुराहों मंदिरों को बाहरी दुनिया की नजरों से लंबे समय तक छिपाए रखा। इसीलिए यहां कोई भी आक्रमणकारी पहुंच नहीं सका।

तीसरी बात, इस क्षेत्र के निवासियों ने भी समय-समय पर इन मंदिरों की रक्षा करने की कोशिश की होगी। जिससे यहां के मंदिर पूरी तरह से नष्ट होने से बच गए। ओर किसी भी तरह का कोई भी आक्रमणकारी समय के चलते यहां पहुंच नहीं सका।

लेकिन 17वीं शताब्दी में, जब मुगल शासक औरंगजेब ने। खजुराहो के पास बीजामंडल मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बना दी थी। मतलब, उस समय मुगल शासक औरंगजेब ने आसपास के इलाकों में तोड़फोड़ जरूर की थी। मगर चमत्कार की बात यह है। की फिर भी खजुराहो के मंदिर समूह हजार साल की जलवायु और उपेक्षा झेलने के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से बचा रहा।

आधुनिक तकनीक के 100 वर्षों में निर्माण का चमत्कार

हजारों साल पहले, खजुराहो के मंदिरों के निर्माण में। किसी भी क्रेन, मशीन या आधुनिक औजारों का सहारा नहीं लिया गया था। जो यहां के निर्माण की वास्तुकला में अपने आप में एक चमत्कार से कम नहीं माना जाता हैं। क्योंकि यहां सभी मंदिरों का निर्माण लगभग 9वीं शताब्दी (950 ईस्वी) से शुरू होकर। आगे के 100 वर्षों में करवाया गया था।

जिसमें कंदरिया महादेव मंदिर की ऊंचाई लगभग 107’ फीट रखी गई थी। और इसका हर हिस्सा बेहद बारीकी से तराशा गया था। जो खजुराहो के मंदिरों के 100 वर्षों के निर्माण का अच्छा चमत्कार माना जाता हैं।

दूसरी बात, खजुराहो का हर मंदिर, एक ऊंचे और मजबूत चबूतरे पर बनाया गया था। जबकि सामान्य मंदिरों की तरह इन्हें चारदीवारी में बंद नहीं रखा गया। जो कि यहां के निर्माण का अद्भुत चमत्कार है। तीसरी बात, यह है कि सिर्फ एक ही मंदिर की दीवारों पर 650 से ज्यादा मूर्तियां उकेरी गई थी। जो आज भी अपनी बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं। जो अपने आप में आज के बिना किसी उपकरण के चमत्कार माना जाता है।

खजुराहों में बने मंदिरों वाले कालखंड के समय। देश के कई अन्य हिस्सों में भी मंदिरों का निर्माण चल रहा था। जिनमें कोणार्क, भुवनेश्वर, पुरी, आबू और तंजौर आदि शामिल है। इसीलिए इतिहासकार इस पूरे युग को मंदिर-युग भी कहते हैं। क्योंकि इतने कम समय में, बिना किसी आधुनिक तकनीक के इतनी सटीकता के साथ इतने भव्य मंदिर बना देना। आज भी वास्तुकारों और इंजीनियरों के लिए शोध का विषय बना हुआ है।

बीजामंडल मंदिर का अनसुलझा रहस्य

खजुराहो से कुछ ही दूरी पर स्थित। बीजामंडल मंदिर आज भी अपने आप में एक बड़ा रहस्य बना हुआ है। जहां इस मंदिर की लंबाई लगभग 34 मीटर मानी जाती है। जो खजुराहो के सबसे बड़े मंदिर कंदरिया महादेव से भी लंबा मंदिर है। फिर भी इसकी अब तक पूरी खुदाई नहीं हो पाई है।

पहला कारण, पुरातत्व विभाग ने आज तक इस मंदिर की पूरी ईमारत को जमीन से बाहर नहीं निकाला है। इसलिए इसका असली आकार अब भी अनुमान ओर निचली जमीन पर टिका हुआ है। जिसके चलते इस मंदिर के रहस्य का पता लगाना अभी बाकी है।

दूसरा कारण, मुगलकाल के समय औरंगजेब के शासन के दौरान। औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़कर यहां आलमगीर मस्जिद बना दी थी। लेकिन इस मंदिर की खुदाई के बाद पता चला कि यह मंदिर पहले कभी हिन्दू मंदिर हुआ करता था। तीसरा कारण, सन 1991 में एक रात को हुई तेज बारिश के कारण। मस्जिद की एक दीवार नीचे गिर गई। जिससे 300 साल से भी पहले छिपी। हिंदू मूर्तियां अचानक सबके सामने आकर दिखाई देने लगी।

इसी घटना के पश्चात, पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने जांच की शुरुआत कर दी। और यह साबित हुआ कि यह असल में एक प्राचीन हिंदू मंदिर हुआ करता था। फिर भी आज तक इस मंदिर का पूरा स्वरूप, इसकी सही उम्र और इसके भीतर छिपी। बाकी मूर्तियां पूरी तरीके से सामने नहीं आ सकी हैं। यही अधूरापन बीजामंडल को खजुराहो क्षेत्र का सबसे बड़ा अनसुलझा रहस्य बना देता है। जिस पर आज भी जांच पड़ताल जारी है।

लड़ाइयां (युद्ध, आक्रमण, हमले)

चंदेल वंश का शासन 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक माना जाता है। जिसमें वह बुंदेलखंड क्षेत्र पर राज किया करते थे। जिसमें उन्होंने सबसे पहले अपनी राजधानी को खजुराहो में बसाया था। उसके बाद, दूसरी राजधानी सेना के रूप में कालिंजर किले को बसाया था। ओर तीसरी राजधानी राजनीति के कारण महोबा नगर को बसाया था। उस समय खजुराहो, चंदेलों की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जानी जाती थीं।

इसलिए उस कालखंड में युद्ध का सीधा असर। इन मंदिरों पर पड़ता था। जो चंदेल शासकों को झेलना पड़ता था। जहां 10वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी के बीच। चंदेलों को कई बार बाहरी आक्रमणों और आंतरिक संघर्षों का सामना करना पड़ा था। जिसकी वजह से खजुराहो की सुरक्षा व्यवस्था भी समय-समय पर खतरे में आती रही।

खजुराहों में जैसे ही चंदेल राजाओं का शासन कमज़ोर पड़ने लगा। वैसे ही दूसरी तरफ, खजुराहों मंदिरों पर एक के बाद एक आक्रमण होना शुरू हो गए। जिनमें सबसे पहला आक्रमण…

महमूद गजनवी का प्रथम आक्रमण (1019-20 ई.)

महमूद गजनवी ने सन् 1019-20 ई. में चंदेलों के शासक विद्याधर के खिलाफ अपना पहला बड़ा अभियान छेड़ा था। हालांकि इस अभियान में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। वहीं कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल ने। महमूद गजनवी से बिना युद्ध लड़े। गजनवी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।

वहीं कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल के आत्मसर्मपण करने की यह बात। जब विद्याधर को पता चली। तो विद्याधर, शासक राज्यपाल के खिलाफ बहुत क्रोधित हुआ। क्योंकि राज्यपाल के आत्मसर्मपण करने से राष्ट्र का बहुत अपमान हुआ। जिसके चलते विद्याधर को काफी परेशानी हुई। जिसके बाद, विद्याधर ने एक ठोस भरा कदम उठाते हुए।

अपने ग्वालियर के सामंत, ग्वालियर के कच्छपघात राजा अर्जुन को कन्नौज भेजा। ओर उस राजा अर्जुन से उस राज्यपाल का वध करवा दिया। इसी घटना के बाद महमूद गजनवी बुंदेलखंड की ओर बढ़ने लगा। तभी महमूद गजनवी ने विद्याधर की विशाल सेना को देखा। जिसमें हजारों पैदल सैनिक, घुड़सवार और सैकड़ों हाथी शामिल थे।

तो महमूद गजनवी विद्याधर की विशाल सेना को देखकर। वहीं सोच में पड़ गया। जहां दोनों सेनाएं आमने-सामने तो आई। परंतु कोई निर्णायक युद्ध नहीं हुआ। क्योंकि रात होते ही विद्याधर ने रणनीतिक चालाकी दिखाते हुए। अपनी सेना को पीछे हटा ली। जिसके बाद, महमूद गजनवी भी फिर से गजनी लौट गया। इतिहासकार इसे चंदेलों की कूटनीतिक सफलता मानते हैं। क्योंकि चंदेलों ने बिना युद्ध लड़े। खजुराहो के मंदिर इस आक्रमण से सुरक्षित बचा लिए।

महमूद गजनवी का द्वितीय आक्रमण (1022 ई.)

पहले आक्रमण के असफल (कोई युद्ध न लड़ने) के बाद। महमूद गजनवी ने फिर से, 1022 ई. में विद्याधर को दंडित करने के उद्देश्य से दोबारा चढ़ाई की थी। उसने सबसे पहले ग्वालियर के पर्वतीय दुर्ग (ग्वालियर किले) पर घेराबंदी की। जहां ग्वालियर किले की घेराबंदी में महमूद गजनवी का 4 दिनों तक संघर्ष चलता रहा।

जिसके बाद, ग्वालियर के दुर्गपति (दुर्गपाल) ने. महमूद गजनवी को 35 हाथियों को भेंट करके संधि कर ली। इसके बाद, महमूद गजनवी कालिंजर किले की ओर बढ़ा। हालांकि कालिंजर किला चंदेलों का सबसे मजबूत और अभेद्य दुर्ग माना जाता था।

जहां मुस्लिम इतिहासकारों का दावा है। कि महमूद गजनवी ने कालिंजर पर जीत हासिल कर ली थी। जबकि भारतीय स्रोतों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच संधि हो गई थी। जिसके बाद, महमूद बिना दुर्ग जीते दोबारा गजनी लौट गया। इस घटना के बाद विद्याधर और महमूद गजनवी के बीच मित्रता के संबंध स्थापित हो गए। जो सन् 1029 ई. तक बने रहे। यही कारण है कि खजुराहो के मंदिर इस दूसरे आक्रमण से भी बचे रहे।

तुमुल का युद्ध (1182-83 ई.)

12वीं शताब्दी के अंत में चंदेल और चौहान वंशों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। हालांकि इस संघर्ष के प्रमुख कारण। अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान की साम्राज्य फैलाने की इच्छा। और दूसरा कारण, दोनों राज्यों के बीच पुरानी दुश्मनी का यह परिणाम था।

जिसके चलते, पृथ्वीराज चौहान ने। सन् 1182-83 ई. में चंदेलों की राजधानी महोबा पर आक्रमण करके उसे लूट लिया। इसी युद्ध में उस समय के चंदेल शासक परमर्दिदेव के दो वीर सेनापति आल्हा और ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए। जिनकी शौर्यगाथा आज भी लोकगीतों में गाई जाती है।

हालांकि परमर्दिदेव ने अगले कुछ वर्षों में चौहानों को हराकर। अपने खोए हुए क्षेत्र पुनः प्राप्त कर लिए थे। जहां यह संघर्ष खजुराहो से थोड़ी दूर महोबा में हुआ था। फिर भी इसका प्रभाव पूरे चंदेल साम्राज्य की सैन्य शक्ति पर पड़ा था। जिससे आने वाले वर्षों में तुर्की आक्रमणों का सामना करना चंदेलों के लिए कठिन होता गया। मगर उस समय, खुजराहों के मंदिर को कोई हानि नहीं हुई। शायद, इस युद्ध में लड़ने वाले दोनों पक्ष के राजा हिन्दू थे।

कुतुबुद्दीन ऐबक का आक्रमण (1202-03 ई.)

13वीं शताब्दी की शुरुआत में चंदेल वंश को सबसे बड़ा झटका तब लगा था। जब सन् 1202-03 ई. में मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने। अपने साथी सेनापति इल्तुतमिश के साथ मिलकर कालिंजर दुर्ग पर चढ़ाई कर दी थी। जहां लंबे समय तक चली यह चढ़ाई ओर घेराबंदी के बाद।

अंततः परमर्दिदेव को हार माननी ही पड़ी। और उसने कालिंजर की संधि स्वीकार करते हुए। मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली। कुछ स्रोतों के अनुसार, ऐसा भी कहा जाता है। की ऐबक के सामने परमर्दिदेव के इस समर्पणकारी व्यवहार से नाराज होकर। परमर्दिदेव के अपने ही मंत्रियों ने उसकी हत्या कर दी थी।

इसी अभियान के दौरान, ऐबक ने कालिंजर, महोबा और खजुराहो तीनों पर अपना अधिकार जमा लिया। और महोबा तथा कालपी क्षेत्र में जमकर लूटपाट भी मचाई। यही वह घटना मानी जाती है। जिसने खजुराहो के मंदिरों को पहली बार सीधे तौर पर मुस्लिम सत्ता के अधीन ला दिया।

सिकंदर लोदी का विध्वंस अभियान (1495 ई.)

यह बात खजुराहो इतिहास-स्रोतों में दर्ज की गई हैं। की 1495 ईस्वी में लोदी वंश के शासक सिकंदर लोदी ने। एक सैन्य अभियान चलाकर खजुराहो के मंदिरों का बड़े स्तर पर विनाश करवाया था। जिसमे खजुराहों के कुछ मंदिर ओर कुछ मंदिरों को मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया गया था।

लेकिन कही कही ऐसा भी कहा जाता है। की सिकंदर लोदी का मध्य भारत में अभियान जरूर हुआ था। लेकिन उसके द्वारा खजुराहों के मंदिर के नष्ट न करने की बात कही जाती है।

यह समझना भी बहुत महत्वपूर्ण है। कि 1495 ई. आते आते। खजुराहो वैसा समृद्ध राजनीतिक और धार्मिक केंद्र नहीं रहा। जैसा चंदेलों के शासनकाल में हुआ करता था।

स्थल (घूमने की जगहें)

कंदारिया महादेव मंदिर

कंदारिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह का सबसे बड़ा मंदिर माना जाता हैं। जहां यह मंदिर जगदम्बी और चित्रगुप्त मंदिरों के पास बना हुआ है। इसलिए मुख्य प्रवेश द्वार से अंदर की तरफ आते ही। अंदर का रास्ता एकदम पक्का ओर साफ माना जाता है। जहां बच्चे ओर बुजुर्ग आसानी से पैदल चलकर यहां तक पहुंच सकते है। जिसके बाद, मंदिर भी दिखाई देने लगता है।

मंदिर के अंदर जाते ही। सबसे पहले शिवलिंग दिखाई देता है। जिसके दर्शन करना न भूले। जबकि बाहरी दीवारों को देखने पर। देवी-देवताओं, अप्सराओं और मिथुन मूर्तियों की पंक्तियां। एक के बाद एक सजी हुई देखने को मिलती हैं। यहां आने वाले हर पर्यटक को मंदिर की जगती यानी ऊंचे चबूतरे पर चढ़कर पूरे शिखर की बनावट को जरूर देखना चाहिए। क्योंकि यही वह हिस्सा माना जाता है। जो मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला का सबसे प्रभावशाली उदाहरण हुआ करता था।

यहां लाइसेंसशुदा गाइड आसानी से मिल जाते हैं। जो हर मूर्ति और नक्काशी के पीछे की कहानी को बड़ी गहराई से समझाते हैं। इसके अलावा किराए पर ऑडियो गाइड डिवाइस भी उपलब्ध रहता है। जिसे अकेले घूमने वाले पर्यटक इस्तेमाल कर सकते हैं।

मंदिर परिसर में जगह-जगह छायादार पेड़ और बैठने की व्यवस्था की गई है। जिससे लंबी यात्रा के बाद कुछ देर आराम भी किया जा सकता है। फोटोग्राफी की अनुमति है, मगर गर्भगृह के भीतर फ्लैश करने से बचना चाहिए। क्योंकि इससे प्राचीन पत्थर की सतह को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

लक्ष्मण मंदिर

लक्ष्मण मंदिर को खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के वैकुंठ स्वरूप का है। जिसमे 3 मुख वाली प्रतिमा स्थापित की गई हैं। यहां तक पहुंचने के लिए। यह मंदिर खजुराहो के मंदिर समूह में। मुख्य दरवाजे से अंदर की तरफ आने के बाद। वराह और कंदारिया महादेव मंदिर के बीच बना हुआ। लक्ष्मण मंदिर साफ दिखाई देने लगता हैं। यहां पहुंचने के बाद, किसी प्रकार का कोई अलग टिकट की जरूरत नहीं पड़ती है। क्योंकि यहां टिकिट, पूरे पश्चिमी समूह का एक ही प्रवेश टिकट सभी नौ मंदिरों के लिए लागू होता है।

यहां आकर पर्यटन मंदिर के आधार पर बनी पट्टिका में सैन्य जुलूस, हाथी, घोड़े और युद्ध के चित्र बनाए हुए देख सकते हैं। इसके अलावा, बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं के साथ-साथ दैनिक जीवन के दृश्य भी नक्काशी में कैद किए हुए देखे जा सकते हैं। वहीं दर्शन के दौरान, मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी सुंदर द्वार-शाखाओं को ध्यान से देखना भी चाहिए। क्योंकि इनमें गंगा-यमुना की प्रतिमाएं तराशी गई हैं। जो दिखने में ऐसी है। जैसे यहां आने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत करती हो।

पर्यटकों की सुविधाओं में, यहां बैठने की जगह, छायादार स्थान और साफ-सुथरे मार्ग बने हुए हैं। इसके साथ ही, मंदिर परिसर में तैनात सुरक्षा कर्मी हर दिन मंदिर की निगरानी करते रहते हैं। जिससे पर्यटक बिना किसी वजह के आराम से घूम सकते हैं। दूसरी तरफ, शाम के समय इसी लक्ष्मण मंदिर में हिंदी और अंग्रेजी भाषा में रोजाना लाइट एंड साउंड शो का आयोजन होता है। जिसमें खजुराहो के इतिहास को कहानी के रूप में दिखाया जाता है। इसलिए दिन में मंदिर के दर्शन के बाद। पर्यटन शाम का यह कार्यक्रम भी देख सकते है।

विश्वनाथ मंदिर

विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव का है। ओर यह मंदिर पंचायतन शैली में बना हुआ है। जिसमें मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर छोटे उप-मंदिर भी बने हुए हैं। हालांकि इन उप·मंदिरों में वर्तमान समय में कुछ ही मंदिर पूरी तरह बचे हुए हैं। विश्वनाथ मंदिर पश्चिमी समूह के भीतर। लक्ष्मण मंदिर और नंदी मंदिर के बीच बना हुआ है। इसलिए घूमते समय यह मंदिर रास्तों के बीचों बीच पड़ता है। और यहां पहुंचने के लिए कुछ ही मिनट में पैदल दूरी तय करके पहुंचा जा सकता हैं।

विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर को भी देखा जा सकता है। जिससे दोनों मंदिरों का दर्शन एक साथ किया जा सकता है। मंदिर में प्रवेश करते ही गर्भगृह में शिवलिंग के दर्शन करना न भूले। दूसरी ओर, मंडप की छत पर ज्यामितीय नक्काशी को देखा जा सकता है। जो बहुत ही बारीकी से की गई है।

बाहरी दीवारों पर अष्ट दिक्पालों यानी आठों दिशाओं के रक्षक देवताओं की मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं। जिन्हें गाइड की मदद से समझना आसान हो जाता है। मंदिर की सीढ़ियों के दोनों ओर हाथियों की प्रतिमाएं भी देखी जा सकती हैं। जो यहां के प्रवेश द्वार को और भी ज्यादा भव्य बना देती हैं।

मंदिर के आसपास काफी सुविधाएं की गई है। जिसमें छायादार बैठने की जगह और साफ पैदल चलने के रास्ते बने हुए है। इसके अलावा परिसर में जगह-जगह सूचना पट्ट भी लगे हुए हैं। जिन पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मंदिर का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है। जिससे बिना गाइड के यहां आने वाले पर्यटक भी बुनियादी जानकारी को पढ़ पाते हैं।

जगदम्बी मंदिर

जगदम्बी मंदिर पश्चिमी समूह के अंदर जाते ही। कंदारिया महादेव मंदिर के ठीक बगल में दिख जाता है। इसलिए दोनों मंदिरों का दर्शन एक साथ भी किया जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए मुख्य द्वार से अंदर की ओर आने के बाद। बाईं तरफ बढ़ने पर थोड़ा सा पैदल रास्ता चलते ही। यह मंदिर दिखाई देने लगता हैं।

जहां मंदिर में जाते ही सबसे पहले। गर्भगृह में स्थित माता पार्वती की प्रतिमा के दर्शन जरूर करें। इसके बाद, मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन पट्टियों में बनी मूर्तियों को देखें। जिनमें देवी-देवताओं के साथ-साथ मिथुन दृश्य के चित्र शामिल हैं। जो खजुराहो शैली की खास पहचान मानी जाती है। यहां घूमते समय मंदिर के मंडप की छत पर बनी कमल के फूल जैसी नक्काशी को जरूर देखे। क्योंकि यह हिस्सा अक्सर आम पर्यटकों की नजर से छूट जाता है।

दूसरी ओर इस मंदिर में भी बाकी मंदिरों की तरह ही। अच्छी व्यवस्था की गई है। जिसमे छायादार रास्ते, बैठने की जगह और मंदिर की सुरक्षा निगरानी शामिल है। वहीं मंदिर के आसपास हरी घास का मैदान भी बना हुआ है। जिसमें यहां आने वाले पर्यटक अपने परिवार के साथ बैठकर। आराम भी कर सकते हैं। ओर मंदिर का नजारा भी देख सकते हैं। जहां यह जगह फोटोग्राफी लेने वाले पर्यटकों के लिए भी काफी अच्छी मानी जाती हैं।

चित्रगुप्त मंदिर

चित्रगुप्त मंदिर, सूर्य देव का बना हुआ मंदिर है। इसीलिए इसे खजुराहों के बाकी मंदिरों से अलग और खास माना जाता है। यह मंदिर जगदम्बी मंदिर के उत्तर दिशा में बना हुआ है। ओर यहां तक पहुंचने के लिए। टिकिट लेने वाली खिड़की से अंदर की तरफ बाई दिशा में चलना होता है। जिसमे मंदिर तक पांच से सात मिनट के समय में पैदल चलकर आसानी से पहुंचा जा सकता है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता। मंदिर के गर्भगृह में स्थित सूर्य देव की प्रतिमा है। जिन्हें रथ पर 7 घोड़ों पर सवार करता हुआ दिखाया गया है। जिनके दर्शन करना न भूले। वहीं मंदिर के बाहरी दीवारों पर बनी। शिकार के दृश्य, नृत्य करती अप्सराएं और सैन्य जुलूस की नक्काशी जरूर देखें। जिससे उस दौर के सामाजिक जीवन की झलक हमें आज देखने को मिलती है।

यहां की सुविधाओं में, मंदिर के ठीक सामने खुला हरा मैदान बना हुआ है। जिसमें पेड़ों की छाया भी देखने के लिए मिल जाती है। जहां पर्यटक बैठकर आराम कर सकते हैं। मंदिर में तैनात कर्मचारी सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं। जिससे घास हमेशा हरी-भरी और साफ नजर दिखाती है। मंदिर के पास सूचना पट्ट पर इसका संक्षिप्त इतिहास हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखा गया है। जिससे अकेले घूमने वाले पर्यटक भी बिना गाइड के बुनियादी जानकारी हासिल कर सकते हैं।

मतंगेश्वर मंदिर

मतंगेश्वर मंदिर को खजुराहो के सबसे प्राचीन मंदिरों में माना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव का बना हुआ है। और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है। कि यह आज भी जीते जागते मंदिरों में शामिल है। इसीलिए यहां हर रोज पूजा नहीं होती है। मतंगेश्वर मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही। करीब ढाई मीटर ऊंचा विशाल शिवलिंग स्थापित किया हुआ देखने को मिलता है। जिसे खजुराहो क्षेत्र के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है।

यह मंदिर पश्चिमी समूह के मुख्य परिसर से बाहर, लक्ष्मण मंदिर के ठीक पास में बना हुआ है। इसलिए यहां पहुंचने के बाद। कोई अलग टिकट की जरूरत नहीं पड़ती हैं। बल्कि खजुराहों का मुख्य टिकट ही यहां लागू होता है। इसीलिए कोई भी पर्यटक यहां किसी भी समय आकर दर्शन कर सकता है। जहां महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष मेला भी लगता है। जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यहां मंदिर में घूमते समय, मंदिर के प्रांगण में लगे प्राचीन शिलालेख भी देखने को मिलते हैं। जो मंदिर के इतिहास से जुड़ी जानकारी इकठ्ठा किए हुए हैं।

यहां आने के बाद। पर्यटकों को जूता स्टैंड, हाथ-मुंह धोने के लिए पानी की व्यवस्था और छोटी दुकानें देखने को मिलती हैं। जहां वह पूजा की सामग्री खरीद सकते हैं। ओर मंदिर के आसपास खुला आंगन भी बनाया गया है। जहां श्रद्धालु या पर्यटक कुछ देर बैठकर ध्यान या आराम भी कर सकते हैं। वहीं सुरक्षा के लिए यहां हमेशा स्थानीय कर्मचारी मौजूद रहते हैं। जो मंदिर की सुरक्षा करते है। ओर इन स्थानीय सुरक्षा कर्मचारियों से दर्शन के दौरान। किसी भी तरह की परेशानी नहीं होती है।

वराह मंदिर

वराह मंदिर, जो भगवान विष्णु के वराह यानी शूकर अवतार का बना हुआ है। जिसमें एक विशाल एकाश्म यानी एक ही पत्थर से तराशी गई वराह प्रतिमा स्थापित की हुई देखने को मिलती है। यह मंदिर पश्चिमी समूह के शुरुआती दौर के मंदिरों में शामिल है। जहां यह मंदिर लक्ष्मण मंदिर के ठीक सामने की तरफ बना हुआ है। सबसे खास बात यह है। कि इस विशाल प्रतिमा की पूरी सतह पर छोटी-छोटी सैकड़ों आकृतियां बनी हुई देखी जा सकती हैं। जिनमें देवी-देवता, ऋषि और पौराणिक पात्र शामिल हैं। जो सृष्टि के हर हिस्से का प्रतीक माने जाते हैं।

यही बारीक नक्काशी इस मंदिर को परिसर के बाकी मंदिरों से अलग बनाती है। यहां पहुंचने के लिए। मुख्य दरवाजे से अंदर की ओर आते ही। सीधी दिशा में कुछ कदम चलने के बाद। वराह मंदिर दिखाई देने लगता है। जहां पर्यटकों के लिए, यहां छायादार बैठने की जगह और साफ-सुथरा पैदल चलने का रास्ता बना हुआ है। क्योंकि यह मंदिर खुला हुआ रहता है। इसलिए यह मंदिर फोटोग्राफी के लिए। अच्छे स्थलों में गिना जाता है। और सुबह की धूप में प्रतिमा की नक्काशी विशेष रूप से साफ देखने को मिलती है।

नंदी मंदिर

नंदी मंदिर विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने की ओर बना हुआ है। जिसमें भगवान शिव के वाहन नंदी बैल की विशाल प्रतिमा बीचों बीच स्थापित की गई है। हालांकि यह प्रतिमा दिखने में इतनी बड़ी है। कि इसे दूर से देखने पर। यह आसानी से देखी जा सकती है। जहां यह मंदिर पंचायती योजना में बन हुआ है। इसलिए इसका निर्माणकाल भी विश्वनाथ मंदिर जितना ही पुराना। करीब 1002 ईस्वी के आसपास का माना जाता है।

यहां पहुंचने के लिए, जैसे ही कोई पर्यटक विश्वनाथ मंदिर के बाहर की ओर निकलता है। तो उसे सामने की ओर नंदी मंदिर साफ साफ दिखाई देने लगता है। क्योंकि यहां दोनों मंदिरों के बीच की दूरी बहुत ही कम है। जहां इस मंदिर में नंदी के दर्शन करना काफी शुभ माना जाता है। इसलिए श्रद्धालु भी यहां आकर सबसे पहले नंदी के दर्शन करते है। इसके बाद, यहां घूमते समय मंडप के खंभों पर बनी हुई। छोटी नक्काशी को भी ध्यान से देखे। क्योंकि इसमें भी सूक्ष्म बेल-बूटे और ज्यामितीय आकृतियां की गई हैं।

पर्यटक सुविधाओं में यहां छांव के लिए मंडप की छत खुद ही काफी होती है, इसके अलावा आसपास बैठने के लिए पत्थर के चबूतरे भी बने हैं। यह जगह बच्चों के साथ आए परिवारों के बीच खास लोकप्रिय है, क्योंकि नंदी की विशाल प्रतिमा बच्चों को आसानी से आकर्षित कर लेती है और फोटो खिंचवाने के लिए भी यह एक बेहतरीन स्थान माना जाता है।

पार्वती मंदिर

पार्वती मंदिर को पश्चिमी समूह के छोटे ओर महत्वपूर्ण मंदिरों में गिना जाता है। जो विश्वनाथ और नंदी मंदिर परिसर के ठीक करीब बना हुआ है। यहां पहुंचने के लिए, विश्वनाथ और नंदी मंदिर की ओर से थोड़ा उत्तर दिशा में चलना पड़ता है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा 2 से 3 मिनट का समय लगता है। जहां पार्वती मंदिर में भीड़ हमेशा कम देखने को मिलती हैं।

जहां पर्यटकों के लिए, मंदिर के पास हरी घास का छोटा मैदान भी बना हुआ है। जहां मैदान में बैठकर पूरे पश्चिमी समूह का वातावरण देखा जा सकता है। मंदिर के बाहर साफ पैदल रास्ता, छायादार पेड़ ओर सुरक्षा निगरानी की व्यवस्था भी की गई हैं।

भ्रमण

खजुराहो मंदिरों का इतिहास

प्रवेश समय, शुल्क

वैसे तो खजुराहो के मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुले रहते हैं। लेकिन ASI का आधिकारिक समय 08:00 से शाम 6:00 तक रखा गया है।

पश्चिमी समूह के मंदिर (Western Group): खजुराहो के पश्चिमी समूह के मंदिरों का समय। सुबह 08:00 से लेकर शाम 6:00 तक का रखा गया है। ओर इन सभी पश्चिमी समूह के मंदिरों को हफ्ते के 7 दिनों तक खुला रखा जाता हैं।

पूर्वी समूह के मंदिर (Eastern Group): खजुराहों के पूर्वी समूह के मंदिरों का समय सुबह 08:00 से शाम 6:00 तक रखा गया हैं।

दक्षिणी समूह के मंदिर (Southern Group): खजुराहो के दक्षिणी समूह के मंदिरों का समय सुबह 08:00 से शाम 6:00 तक रखा गया है।

खजुराहो पुरातत्व संग्रहालय: पुरातत्व संग्रहालय का समय मंगलवार से लेकर रविवार तक सुबह 10:00 से शाम 7:00 तक रखा गया हैं। वहीं यह संग्रहालय सोमवार को बंद कर दिया जाता है।

लाइट एंड साउंड शो: लाइट एंड साउंड शो का कार्यक्रम शाम के समय होता है। इसी लिए, मौसम के अनुसार इसका समय बदलता रहता है। इसीलिए एक बार टिकट काउंटर से पुष्टि करना जरूरी है।

प्रवेश शुल्क: यह शुल्क 2025–2026 का बताया गया है। लेकिन ASI के द्वारा समय समय पर इन शुल्क में बदलाव कर दिए जाते हैं। इसीलिए एक बार ASI की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर। खुजराहों मंदिरों के वर्तमान समय का पता लगाया जा सकता हैं।

मंदिर समूहभारतीय नागरिकविदेशी नागरिकबच्चे (15 वर्ष से कम)
पश्चिमी समूह₹40₹600निःशुल्क
पूर्वी समूह₹30–35₹500–550निःशुल्क
दक्षिणी समूह₹25₹400निःशुल्क
पुरातत्व संग्रहालय₹10₹250निःशुल्क
लाइट एंड साउंड शो₹250₹700

कब जाए

सर्वोत्तम समय: खजुराहो घूमने के लिए। अक्टूबर से मार्च का समय भी। काफी अच्छा माना जाता है। क्योंकि सर्दियों का मौसम ठंडा ओर सुहावना रहता हैं। जिसमें तापमान 5°C से 27°C के बीच रहता है। ओर दिन में सुहावना और रात में ठंडा हो जाता है।

गर्मी (अप्रैल–जून): गर्मियों के मौसम में खजुराहो का तापमान 28°C से 45°C तक चला जाता है। जहां दोपहर में भ्रमण करना काफी मुश्किल हो जाता हैं।

मानसून (जुलाई–सितंबर): मानसून के मौसम में खजुराहो का तापमान 24°C से 32°C के बीच रहता है। जिसमें हल्की बारिश, आर्द्रता अधिक और हरियाली ज्यादा रहती है। जिसके चलते यहां का वातावरण काफी सुंदर दिखाई देता हैं।

सुझाव, अन्य जानकारी: मंदिरों का भ्रमण सुबह 08:00 से 11:00 या शाम 3:00 से 5:00 के बीच करें। ताकि दोपहर को पड़ने वाली तेज धूप और भीड़ से बचा जा सके। हालांकि सुबह जल्दी पहुंचने से भीड़ कम रहती है। और फोटोग्राफी लेने के लिए रोशनी भी अच्छी रहती है।

वहीं खजुराहों में साल के हर फरवरी महीने में खजुराहो नृत्य महोत्सव का आयोजन होता है। जिसमें देश भर के मशहूर शास्त्रीय नर्तक मंदिर परिसर की पृष्ठभूमि में अपनी प्रस्तुति देते हैं।

पर्यटक सुविधाएं

गाइड सेवा: मंदिर के बाहर स्थानीय गाइड मौजूद रहते हैं। जो हिंदी ओर अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में भी। खजुराहो मंदिरों के इतिहास की जानकारियों के बारे में बताते है। कुछ गाइड के नाम यहां दिए जा रहे है। जिनके नाम का पता खजुराहो मंदिरों के पास बनी दुकानों से पूछताछ करके लगाया जा सकता है।

खजुराहो मंदिर के पहले गाइड का नाम Rajesh Agrawal है। ओर उनका रजिस्ट्रेशन स्टेटस अभी सक्रिय है। और वह गाइड के रूप में अपना काम कर रहे है। उनकी गाइड रजिस्ट्रेशन 30 अक्टूबर 2027 तक चलने वाली है।

इसी तरह, दूसरे गाइड का नाम Kamlesh Kumar Pushpad हैं। जिनका रजिस्ट्रेशन स्टेटस 30 अक्टूबर 2027 तक चलने वाला है। तीसरे गाइड का नाम Mahendra Khare हैं। जिनका रजिस्ट्रेशन स्टेटस फिलहाल चालू गाइड में दर्ज हैं।

इनके अलावा, खजुराहो मंदिर के आसपास ओर भी बहुत से गाइड है। जिनके नाम Daya Ram Sahu, Avadhesh Kumar Kaushik, Rajrishi Tripathi, Shekh Bali Mohammad ओर Sandeep Kushwaha आदि शामिल है।

पार्किंग: पश्चिमी खजुराहों मंदिर समूह (Western Group of Temples) ओर पूर्वी मंदिर समूह (Eastern Group) के 2 से 3 पार्किंग बनाए गए है। जहां किसी भी तरह का वाहन (कार ओर बस) पार्किंग में खड़ा किया जा सकता हैं। यहां वाहन के प्रकार के अनुसार। पार्किंग का शुल्क ₹50 से ₹100 तक लिया जाता है।

ऑडियो गाइड: ASI के द्वारा ऑडियो गाइड की सुविधा उपलब्ध की गई है। जिसका शुल्क मंदिर के प्रवेश द्वार पर। किराए के रूप में अलग से लिया जाता हैं।

पीने का पानी: मंदिर परिसर के अंदर और बाहर पेयजल की व्यवस्था।

शौचालय: स्वच्छ शौचालय परिसर के पास उपलब्ध।

विश्राम कक्ष: MP Tourism द्वारा संचालित विश्राम कक्ष और छायादार बैठक क्षेत्र।

फोटोग्राफी: मंदिरों के बाहरी हिस्से में फोटोग्राफी की अनुमति; अंदर प्रतिबंधित।

व्यंजन, निवास

व्यंजन:·

नामव्यंजनकीमत
Maharaja Cafe & Restaurantनॉर्थ इंडियन थाली, वेज बिरयानी₹100 से ₹120
Zaheer Paratha & Lassi Cornerपराठा, लस्सी₹50–₹150
Pandit Ji Restaurant and Parcel Centerफास्ट फूड, नॉर्थ इंडियन भोजन₹100–₹200
Lala ji ki rasoi pure vegवेज थाली, सब्जी-रोटी₹80–₹180
Shiv Mahima Restaurantवेज थाली, दाल-रोटी/सब्जी₹80–₹200
Raja Cafe Restaurantइंडियन/कॉन्टिनेंटल भोजन, नाश्ता₹300–₹500
La Bella Italia Restaurantपिज्जा, इटालियन/नॉर्थ इंडियन भोजन₹200–₹400
Mediterranean Café and Restaurantइटालियन भोजन, पिज्जा/पास्ता₹300–₹600
Flavours Cafe Multi Cuisine Restaurantइंडियन, चाइनीज/कॉन्टिनेंटल₹250–₹500
Pinch Of Saltइंडियन भोजन, पंजाबी/नॉर्थ इंडियन₹300–₹600
The Lalit Temple View – Restaurantमल्टी-कुजीन, इंडियन/कॉन्टिनेंटल₹800–₹2,000
Ramada Khajuraho – Restaurantइंडियन, कॉन्टिनेंटल/मल्टी-कुजीन₹800–₹2,000
Clarks Khajuraho – Restaurantइंडियन, कॉन्टिनेंटल/मल्टी-कुजीन₹700–₹1,800
Raja Cafe – Premium/Continentalयूरोपियन/कॉन्टिनेंटल, तंदूरी/इंडियन₹500–₹1,000
La Bella Italia – Premium Italianपिज्जा, पास्ता/इटालियन भोजन₹400–₹1,000

कम बजट के व्यंजन:· कम बजट में खजुराहों के पास। शिव महिमा रेस्टोरेंट, जहीर पराठा & लस्सी कॉर्नर, पंडित जी रेस्टोरेंट एंड पार्सल सेंटर, गुरु कृपा ओर लाल जी की रसोई प्योर वेज स्थित है। जहां वेज थाली, दाल, सब्जी, रोटी, चावल, समोसा ओर कचोरी आदि व्यंजन रखा गया है। जिसका शुल्क ₹50 से ₹300 तक लिया जाता है।

2. मध्यम बजट के व्यंजन:· मध्यम बजट में खजुराहों के पास। राजा कैफे रेस्टोरेंट, मेडिटरेनियन कैफे एंड रेस्टोरेंट ओर फ्लावर्स कैफे मल्टी क्यूज़ीन रेस्टोरेंट स्थित हैं। जहां के व्यंजन का शुल्क ₹300 से ₹1200 तक लिया जाता हैं।

3. हाय बजट के व्यंजन:· हाय बजट में खजुराहों के पास। लिविंट बाय चंदेला, होटल हार्मनी खजुराहो, होटल खजुराहो आई. एन. एन, होटल लेक व्यू खजुराहो, होटल कैसा दी विलियम, श्री कृष्णा जंगल रिसॉर्ट स्थित है। जहां के व्यंजन का शुल्क ₹1000 से ₹4000 तक लिया जाता हैं।

निवास:·

नामसुविधाएं कीमत
Hotel HarmonyWi-Fi, AC/Non-AC कमरे₹1,300–₹2,000
Hotel Isabel PalaceWi-Fi, AC कमरे/बालकनी₹2,000–₹3,500
Hotel ZenWi-Fi, रेस्टोरेंट₹1,500–₹2,500
Hotel SuryaWi-Fi, रेस्टोरेंट₹1,500–₹2,500
Hotel SiddharthWi-Fi, रेस्टोरेंट₹1,500–₹2,500
Clarks Khajurahoस्विमिंग पूल, Wi-Fi₹3,500–₹5,500
Ramada Khajurahoस्विमिंग पूल, स्पा/रेस्टोरेंट₹4,000–₹6,000
Radisson Hotel Jass Khajurahoस्विमिंग पूल, रेस्टोरेंट/बार₹6,000–₹8,000
The Lalit Temple Viewमंदिर दृश्य, पूल/स्पा₹6,000–₹10,000
Hotel Chandelaस्विमिंग पूल, गार्डन/रेस्टोरेंट₹4,000–₹7,000
The Lalit Temple View Khajuraho Temple Viewस्पा,पूल₹8,000–₹12,000
Ramada KhajurahoPremium/Suite पूल, स्पा/लक्जरी सुविधाएं₹8,000–₹15,000
Clarks KhajurahoSuite पूल व्यू, बड़े Suite कमरे₹15,000
Radisson Hotel JassPremium Room/Suite स्विमिंग पूल, प्रीमियम सेवाएं₹10,000–₹20,000
Sarai at Toriaनेचर लॉज अनुभव, भोजन/सफारी₹15,000

नोट: खजुराहो के पास होटलों के शुल्क। अक्सर मौसम, पर्यटक सीजन, कमरे के प्रकार, टैक्स और ऑनलाइन ऑफर के अनुसार बदले जा सकते हैं।

कम बजट में होटल/गेस्ट हाउस:· कम बजट में एमपीटी जंकार (MPT Jhankar) में एक रात के निवास करने का शुल्क ₹2,290 तक रखा गया है। दूसरी ओर, MP Tourism द्वारा संचालित बुनियादी सुविधाएं के साथ। ग्रेसफुल खजुराहो (Graceful Khajuraho) में निवास करने का शुल्क ₹1,500 से ₹2,500 रखा गया है। स्थानीय बाजार के पास निजी गेस्ट हाउस में एक रात का निवास का शुल्क ₹800 से 1,500 के बीच रखा गया हैं।

मध्यम बजट में:· मध्यम बजट में होटल चंद्रा महल में एक दिन का निवास करने का शुल्क। ₹2,500 से 4,000 के बीच रखा गया है। जिसमे एसी के कमरे ओर रेस्तरां शामिल है। वहीं होटल सिंधिया में एक दिन के निवास करने का शुल्क ₹3,000 से 5,000 तक रखा गया हैं। जिसमें पूल और बाग़ आदि शामिल हैं।

हाय बजट में:· हाय बजट में लग्जरी रिजॉर्टद ललितेंद्र खजुराहो में एक दिन के निवास करने का शुल्क ₹6,000 से ₹10,000 के बीच तक रख गया है। जिसमें स्पा, पूल, रेस्तरां ओर मल्टी-कुजीन की सुविधाएं देखने को मिलती हैं। वहीं रामादा खजुराहो में रुकने के एक दिन का शुल्क ₹5,000 से ₹8,000 तक के बीच रखा हुआ है। जिसमें आधुनिक सुविधाएं भी रखी हुई है।

बुकिंग सुझाव: अक्टूबर से मार्च तक का समय पीक सीजन का होता है। जिसके चलते यहां भीड़ बहुत ही ज्यादा रहती है। इसलिए यहां निवास करने के लिए। कम से कम 2 से 3 सप्ताह पहले ही ऑनलाइन होटल बुक करवाना जरूरी हो सकता हैं।

यात्रा मार्ग

सड़क मार्ग

खजुराहो के मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग 75 (NH 75) पर स्थित है। यह मार्ग सतना, महोबा, छतरपुर और बमीठा होते हुए। सीधे झांसी तक जुड़ा हुआ है। दूरी की दृष्टि से देखा जाए। तो सतना लगभग 116 किलोमीटर, महोबा लगभग 70 किलोमीटर, झांसी लगभग 230 किलोमीटर, ग्वालियर लगभग 280 किलोमीटर, भोपाल लगभग 375 किलोमीटर और इंदौर लगभग 565 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग का पर्यटक महत्त्व इसलिए अधिक माना जाता है। क्योंकि मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (MPSTDC) और निजी बस ऑपरेटर सतना, महोबा, झांसी, ग्वालियर और भोपाल जैसे शहरों से नियमित बस सेवाएं चलती रहती हैं।

यह उन पर्यटकों के लिए अच्छा विकल्प माना जाता है। जो बजट यात्रा को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। इसके अतिरिक्त, सड़क मार्ग से यात्रा करने पर पर्यटकों को बुंदेलखंड क्षेत्र के ग्रामीण परिदृश्य, स्थानीय बाजार और छोटे कस्बों की सांस्कृतिक झलक देखने का अवसर प्राप्त होता है। जो हवाई या रेल यात्रा में संभव नहीं होता। सड़क मार्ग विशेष रूप से समूह यात्रा, धार्मिक पर्यटन दलों और बजट पर्यटकों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।

रेलवे मार्ग

खजुराहो का अपना रेलवे स्टेशन बनाया गया है। जिसका रेलवे स्टेशन कोड KURJ रखा गया है। और यहां का रेलवे स्टेशन उत्तर मध्य रेलवे (North Central Railway) क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हालांकि खजुराहो रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख शहरों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है। फिर भी यह पर्यटकों के लिए एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।

नई दिल्ली से खजुराहो के लिए। खजुराहो-हजरत निजामुद्दीन एक्सप्रेस रोजाना नियमित रूप से चलती रहती है। जिसमें लगभग 10 से 11 घंटे का समय लगता है। इसके इलावा, खजुराहो रेलवे स्टेशन (KURJ) रूट में खजुराहो इंदौर एक्सप्रेस, महामना एक्सप्रेस और आद्रा वंदे भारत जैसी ट्रेनें भी चलती हैं। जिनसे भोपाल, इंदौर और वाराणसी जैसे शहरों से आया जा सकता है।

दूसरा सतना रेलवे स्टेशन के माध्यम से। चेन्नई, वाराणसी मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों से भी खजुराहो तक पहुंचा जा सकता है। तीसरा, खजुराहो से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर। महोबा जंक्शन भी बनाया गया है। जो खजुराहो आने वाले पर्यटकों के लिए। महोबा जंक्शन देश के कई अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है। चौथा, झांसी रेलवे जंक्शन भी बनाया गया है। जो दिल्ली मुंबई से आने वाले पर्यटकों के लिए अच्छा विकल्प है।

हवाई मार्ग

खजुराहो का हवाई अड्डा (IATA कोड: HJR) है। जो खजुराहों शहर के केंद्र से मात्र लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जहां से किराए के वाहन या रेंट के वाहन बुक करके कुछ ही मिनटों में खजुराहो पहुंचा जा सकता हैं। ओर यह हवाई अड्डा देश के सबसे सुविधाजनक पर्यटक हवाई अड्डों में से एक माना जाता है। ओर इस हवाई अड्डा से दिल्ली, वाराणसी, इंदौर, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों के लिए उड़ाने देखने को मिलती है।

अक्टूबर 2025 में इंडिगो एयरलाइंस द्वारा। दिल्ली-खजुराहो-वाराणसी रूट पर नई सीधी उड़ानों की सेवा शुरू कर दी गई है। जिसमें दिल्ली से खजुराहो की उड़ान का समय लगभग 1 घंटा 15 मिनट है। यह सेवा सप्ताह में निर्धारित दिनों पर ही संचालित होती है। और पर्यटन सीजन को ध्यान में रखते हुए। इसकी अवधि आगे भी बढ़ाई जाती रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. खजुराहो मंदिर कहाँ स्थित है?

उत्तर खजुराहों के मंदिर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के खजुराहो में स्थित है।

प्रश्न 2. खजुराहों मंदिरों का निर्माण किसने करवाया था?

उत्तर इन मंदिरों का निर्माण चंदेल वंश के राजाओं ने 950 से 1050 ईस्वी के बीच करवाया था।

प्रश्न 3. खजुराहो में मंदिरों का समूह कितना हैं?

उत्तर यहाँ मंदिरों के तीन मुख्य मंदिर समूह हैं। पश्चिमी मंदिर, पूर्वी मंदिर, और दक्षिणी मंदिर।

प्रश्न 4. खजुराहो में किस-किस धर्म के मंदिर बने हुए हैं?

उत्तर यहाँ हिंदू और जैन दोनों धर्मों के मंदिर बने हुए हैं।

प्रश्न 5. खजुराहो में कितने मंदिर अभी भी मौजूद हैं?

उत्तर पहले खजुराहो के चंदेल राजाओं ने लगभग 85 मंदिरों का निर्माण करवाया था। लेकिन जब इन मंदिरों को खोजा गया। ओर इनकी खुदाई हुई तो 20-25 ही देखने को मिले।

प्रश्न 6. खजुराहों मंदिरों की वास्तुकला की शैली क्या है?

उत्तर यह मंदिर उत्तर भारतीय की नागर शैली में बनाए गए थे।

प्रश्न 7. खजुराहो मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण क्या है?

उत्तर इनका सबसे बड़ा आकर्षण अद्भुत मूर्तिकला, खासकर देवी-देवताओं, अप्सराओं और कामुक आकृतियों के लिए यह जाने जाते हैं।

प्रश्न 8. खजुराहों का सबसे प्रसिद्ध मंदिर कौन सा हैं?

उत्तर यहां के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में। कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, और देवी जगदंबिका मंदिर जाने जाते हैं।

प्रश्न 9. क्या खजुराहो के मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल हैं?

उत्तर हाँ, खजुराहो के मंदिरों को 1986 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला है।

प्रश्न 10. मंदिरों के निर्माण में कौन सी सामग्री का इस्तेमाल हुआ था?

उत्तर यहां के मंदिरों को बनाने के लिए। मुख्य रूप से बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया था।

प्रश्न 11. यह मंदिर किस दिशा में स्थित हैं?

उत्तर लगभग सभी मंदिर पूर्व दिशा में बने हुए हैं। ताकि सूर्य की किरणें गर्भगृह तक पहुँच सकें।

प्रश्न 12. यह मंदिर कब तक टीके रहे?

उत्तर 12वीं सदी तक यहाँ पूजा होती रही। लेकिन उसके बाद ये खंडित होने लगे।

प्रश्न 13. यहाँ घूमने में कितना समय लगता है?

उत्तर पूरे मंदिर समूह को देखने में कम से कम 6 घंटे और अच्छे से समझने के लिए पूरा दिन भी बिताया जा सकता हैं।

प्रश्न 14. क्या यहाँ गाइड उपलब्ध हैं?

उत्तर हाँ, यहां सरकारी मान्यता प्राप्त गाइड्स मंदिर परिसर में मौजूद रहते हैं। जिन्हें खजुराहों मंदिरों के इतिहास और शिल्प के बारे में काफी जानकारियों के बारे में पता होता हैं।

प्रश्न 15. यहां का प्रवेश शुल्क और समय क्या है?

उत्तर यहां पश्चिमी समूह के मन्दिरों को देखने के लिए प्रवेश शुल्क लिया जाता है। बाकी समूहों में प्रवेश मुफ्त है। ओर यह मंदिर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुले रहते हैं।

Author (India World History)

  • मेरा नाम ललित कुमार (रवि) है। और में फिलहाल N.H.8, भीम, राजसमंद, राजस्थान में रह रहा हूँ।

    में खुद को एक इतिहासकार कहूं. तो शायद गलत नही होगा. क्योंकि इतिहास के विषयों की दुनिया ने मुझे इतना अनुभव दिया है।

    की मुझे अलग से एक इतिहासकार बनने की पढ़ाई या उसके खिलाफ अध्ययन करने की जरूरत नहीं है।

    इसीलिए मैं, फिलहाल हमारी कंपनी इंडिया वर्ल्ड हिस्ट्री पर. खुद को मुख्य लेखक और इतिहास का शोधकर्ता समझता हूँ।

    यही नहीं मैंने भारतीय पब्लिक स्कूल (BPS) चौधरी चरण सिंह कॉलोनी नवलगढ़ रोड़ सीकर से 12TH की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।

    इतिहास विषयों की जानकारियों में मेरे पास. 2026 से पहले 4 वर्षो का अनुभव शामिल हैं।

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