चित्तौड़गढ़ किला अपने विशाल आकार के साथ-साथ अपनी जल-प्रबंधन व्यवस्था के लिए भी जाना जाता है। क्योंकि यहां चितौड़गढ़ किले के 14 जलस्रोतों की जानकारी है।
लेकिन यहां के तालाब सिर्फ पानी जमा करने के लिए नहीं बनाए गए थे। बल्कि यह किले के अंदर रहने वाले। चित्तौड़गढ़ किले के राजा, हजारों सैनिकों और आम लोगों के काम आने के लिए भी। किसी जीवनरेखा से कम नहीं थे।
खासकर तब जब किले को चारों तरफ से दुश्मन घेर लेते थे। तब किले में रहने वाले लोग। पानी की कमी पूरी करने के लिए। इन्ही तालाबों, कुंडों ओर जलाशयों का इस्तेमाल करते थे। हालांकि, इस किले में कभी 84 जल निकाय हुआ करते थे।
लेकिन आज इनमें से सिर्फ 22 के आसपास ही बचे हुए हैं। जहां इन तालाबों और कुंडों ने सदियों तक किले के भीतर रहने वाले लोगों और सैनिकों की पानी की ज़रूरत पूरी की थी।
1. चत्रंग मोरी तालाब
स्थापना और अर्थ:- चत्रंग मोरी तालाब का नाम मौर्यवंश के राजा चित्रांगद मोरी के नाम पर रखा गया था। क्योंकि माना जाता है कि 7वीं शताब्दी में। जब चित्तौड़गढ़ किले का निर्माण हुआ था। तब इसी राजा ने चत्रंग मोरी तालाब का निर्माण भी करवाया था।
निर्माण और वास्तुकला:- चत्रंग मोरी तालाब का निर्माण पहाड़ की चट्टानों को काटकर किया गया था। जिससे बारिश का पानी आसानी से इसमें इकट्ठा हो जाया करता था। हालांकि इसमें पत्थरों से बनी सीढ़ियां इसे एक खास पहचान देती हैं।
भूगोल:- चत्रंग मोरी तालाब राजटीला नामक स्थान पर पहाड़ी के एक छोर पर स्थित है। जहां से पूरे किले का नज़ारा साफ दिखाई देता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- चत्रंग मोरी तालाब किले के सबसे पुराने जलस्रोतों में गिना जाता है। इसलिए इसे ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण भी माना जाता है।
वर्तमान स्थिति:- आज चत्रंग मोरी तालाब आंशिक रूप से सूख चुका है। लेकिन इसकी संरचना अब भी पहाड़ी पर देखी जा सकती है।
2. चत्रांग माउरी तालाब
स्थापना और अर्थ:- यह नाम चित्रांग मोरी तालाब का ही दूसरा उच्चारण चत्रांग माउरी तालाब माना जाता है। जो स्थानीय बोली और पुराने दस्तावेज़ों में अलग-अलग तरह से लिखा गया है।
निर्माण और वास्तुकला:- चत्रांग माउरी तालाब का निर्माण भी चट्टानी ज़मीन को काटकर किया गया था। ताकि वर्षा के पानी से जल इकठ्ठा हो सके।
भूगोल:- चत्रांग माउरी तालाब किले के उत्तरी हिस्से की पहाड़ी पर स्थित है। जहां प्राकृतिक ढलान पानी को इस तालाब तक पहुंचाने में मदद करता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- स्थानीय लोग इसे किले के संस्थापक राजा से जोड़कर देखते हैं, इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्व बना हुआ है।
वर्तमान स्थिति:- वर्तमान में चत्रांग माउरी तालाब बारिश के मौसम में ही पानी से भरता है। बाकी समय इसमें नमी और हरियाली देखी जा सकती है।
3. फतेहजी का तालाब
स्थापना और अर्थ:- फतेहजी का तालाब, फतेह प्रकाश महल परिसर से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसलिए इसका नाम भी इसी से लिया गया था।
निर्माण और वास्तुकला:- फतेहजी का तालाब के भीतर एक छोटा भीमगौड़ी तालाब भी बना हुआ है। जो दर्शाता है कि यहां जल-संग्रहण के लिए। कई स्तर पर योजना बनाई गई थी।
भूगोल:- फतेहजी का तालाब, फतेह प्रकाश महल के नज़दीक स्थित है। जो किले के मध्य भाग में आता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- महलों के पास होने के कारण फतेहजी का तालाब राजपरिवार के दैनिक उपयोग में आता रहा होगा। ऐसा इतिहासकार मानते हैं।
वर्तमान स्थिति:- आज फतेहजी का तालाब महल परिसर का एक शांत हिस्सा बन गया है। जहां पर्यटक थोड़ी देर रुककर आराम भी कर सकते हैं।
4. रानी पद्मिनी तालाब

स्थापना और अर्थ:- पद्मिनी तालाब रानी पद्मिनी के महल के ठीक सामने स्थित है। इसलिए इसका नाम पद्मिनी तालाब रखा गया था।
निर्माण और वास्तुकला:- पद्मिनी तालाब के बीचों-बीच एक छोटा महल भी बना हुआ है। जिसके बारे में कहा जाता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने यहीं से रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था।
भूगोल:- पद्मिनी तालाब के दक्षिणी किनारे पर एक पुराने महल के खंडहर हैं। जिन्हें खातन रानी का महल कहा जाता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- पद्मिनी तालाब अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और रानी पद्मिनी के जौहर की कहानी से जुड़ा होने के कारण। सबसे ज्यादा चर्चित जलाशयों में शामिल है।
वर्तमान स्थिति:- वर्तमान में पद्मिनी तालाब किले के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में शामिल है। जहां हर दिन सैकड़ों पर्यटक आते रहते हैं।
5. भोळिया तालाब
स्थापना और अर्थ:- भोळिया तालाब चित्तौड़गढ़ किले के छोटे जलस्रोतों में गिना जाता है। जिसका निर्माण आसपास की बस्तियों की पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए किया गया था।
निर्माण और वास्तुकला:- भोळिया तालाब की बनावट बिल्कुल साधारण है। जिसमें पत्थरों से बनी हुई कच्ची दीवारें। पानी को रोकने का काम करती हैं।
भूगोल:- भोळिया तालाब किले के भीतरी इलाकों में स्थित है। जहां छोटी-छोटी बस्तियां आज भी मौजूद हैं।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- बड़े तालाबों की तुलना में भोळिया तालाब का धार्मिक महत्व बहुत कम है। फिर भी यह स्थानीय जल-प्रबंधन व्यवस्था का हिस्सा रहा है।
वर्तमान स्थिति:- आज भोळिया तालाब आंशिक रूप से उपेक्षित अवस्था में है। हालांकि बारिश के मौसम में इसमें पानी भर जाता है।
6. रत्नेश्वर तालाब
स्थापना और अर्थ:- रत्नेश्वर तालाब का निर्माण महाराणा रत्नसिंह ने खुद करवाया था। जो इसी के पास बने हिंगलू आहाड़ा के महलों में रहते थे।
निर्माण और वास्तुकला:- रत्नेश्वर तालाब की बनावट में पत्थर की मजबूत दीवारें और सीढ़ीदार घाट देखे जा सकते हैं। जो उस दौर की निर्माण तकनीक को दर्शाते हैं।
भूगोल:- रत्नेश्वर तालाब किले के उस हिस्से में स्थित है। जहां मेवाड़ शासकों का कभी निवास स्थान हुआ करता था।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- महाराणा रत्नसिंह से जुड़ा होने के कारण। रत्नेश्वर तालाब को मेवाड़ के इतिहास से सीधा संबंध रखने वाला भी माना जाता है।
वर्तमान स्थिति:- आज भी रत्नेश्वर तालाब अपनी मूल संरचना के साथ देखा जा सकता है। हालांकि इसमें जल स्तर मौसम पर निर्भर करता है।
7. भिमलत तालाब
स्थापना और अर्थ:- स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भिमलत तालाब महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। और इसका नाम पांडवों के पुत्र भीम के नाम पर रखा गया था।
निर्माण और वास्तुकला:- भिमलत तालाब प्राकृतिक चट्टानों के बीच बना हुआ है। जिसमें पानी भूमिगत स्रोतों से यहां आता है।
भूगोल:- भीमलत तालाब किले के उस हिस्से में स्थित है। जहां प्राकृतिक चट्टानें और घाटियां ज्यादा देखने को मिलती हैं।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- किंवदंतियों के अनुसार, इस तरह की रचनाएं महाभारत काल की मानी जाती हैं। और पांडव पुत्र भीम से जोड़ी जाती हैं। इसलिए स्थानीय लोग भीमलत कुंड को पवित्र मानते हैं।
वर्तमान स्थिति:- वर्तमान में भीमलत तालाब प्राकृतिक रूप में ही बचा हुआ है, जहां आसपास हरियाली भी देखने को मिलती है।
8. गौमुख जलाशय
स्थापना और अर्थ:- इसका नाम गौमुख कुंड इसलिए रखा गया है। क्योंकि यहां बहने वाला पानी गाय के मुंह के आकार वाली जगह से पानी बहता है।
निर्माण और वास्तुकला:- गौमुख कुंड एक चट्टान पर बना विशाल और गहरा प्राकृतिक जलाशय है। जिसका आकार ठीक आयताकार है। पानी की एक भूमिगत धारा हमेशा एक छोटी प्राकृतिक गुफा से होकर गौमुख कुण्ड में बहती रहती है।
भूगोल:- गौमुख जलाशय महासती स्थल के पास स्थित है। और इसके पूर्व में जैमल-पत्ता का तालाब भी मौजूद है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- गौमुख कुंड को चित्तौड़गढ़ का तीर्थराज भी कहा जाता है। क्योंकि तीर्थयात्री अपनी यात्रा पूरी करने के लिए यहां आते रहते हैं।
वर्तमान स्थिति:- आज भी गौमुख कुंड में पानी की धारा निरंतर बहती रहती है। इसलिए यह किले के सबसे आकर्षक और पवित्र स्थलों में गिना जाता है।
9. कुकड़ेश्वर तालाब
स्थापना और अर्थ:- कुकड़ेश्वर तालाब का नाम कुकड़ेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ा हुआ माना जाता है। जो इसके ऊपरी हिस्से में बना हुआ है।
निर्माण और वास्तुकला:- कुकड़ेश्वर कुंड और मंदिर दोनों एक साथ बनाए गए थे। जिनके बारे में किंवदंतियों के अनुसार, यह महाभारत काल की रचना मानी जाती है।
भूगोल:- रामपोल से प्रवेश करने के बाद। सड़क उत्तर की ओर मुड़ती है। और वहां से थोड़ी दूर दाहिनी ओर कुकड़ेश्वर कुंड स्थित है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- महादेव मंदिर के साथ होने के कारण कुकड़ेश्वर कुंड धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। और स्थानीय लोग इसे पवित्र जल भी मानते हैं।
वर्तमान स्थिति:- आज भी कुकड़ेश्वर कुंड और मंदिर दोनों मौजूद हैं। और यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए आते रहते हैं।
10. खतान बावड़ी
स्थापना और अर्थ:- खतान बावड़ी खातन रानी से जुड़ी हुई है। जिनके लिए महाराणा क्षेत्रसिंह ने पद्मिनी तालाब के पास महल बनवाया था।
निर्माण और वास्तुकला:- खतान बावड़ी की बनावट में सीढ़ीदार रास्ते देखे जा सकते हैं। जो नीचे जल स्तर तक उतरने के लिए बनाए गए थे।
भूगोल:- खतान बावड़ी पद्मिनी महल के नज़दीक, खातन रानी के महल के खंडहरों के आसपास स्थित है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- खातन रानी के दो पुत्र चाचा और मेरा का नाम इतिहास में देखने को मिलता है। जिन्होंने सन् 1433 में महाराणा मोकल की हत्या कर दी थी। ओर इस वजह से यह बावड़ी मेवाड़ के राजनीतिक इतिहास से जुड़ी हुई मानी जाती है।
वर्तमान स्थिति:- आज खतान बावड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हो चुकी है। फिर भी इसकी संरचना अब भी पहचानी जा सकती है।
11. सूर्य कुंड
स्थापना और अर्थ:- कालिका माता का मंदिर मूल रूप से। पहले एक सूर्य मंदिर हुआ करता था। जिसके प्रमाण के तौर पर आज भी सूर्य की मूर्तियां मौजूद हैं। ओर इसी मंदिर परिसर से जुड़ा सूर्य कुंड भी इसी काल का माना जाता है।
निर्माण और वास्तुकला:- इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में मेवाड़ के गुहिलवंश के राजाओं ने करवाया था। जहां कुंड की बनावट भी उसी दौर की पत्थर निर्माण शैली में देखी जा सकती है।
भूगोल:- यह कुंड कालिका माता मंदिर परिसर के नज़दीक स्थित है। जो किले के ऊंचे हिस्से में आता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- सूर्य देवता से जुड़ा होने के कारण। सूर्य कुंड धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयोग किया जाता रहा है। और बाद में कालिका माता के मेले के दौरान भी इसका महत्व बना रहा।
वर्तमान स्थिति:- आज सूर्य कुंड मंदिर परिसर का एक हिस्सा बना हुआ है। जहां श्रद्धालु दर्शन के दौरान रुकते हैं।
12. रत्नेश्वर कुंड
स्थापना और अर्थ:- रत्नेश्वर कुंड रत्नेश्वर तालाब के साथ ही जुड़ा हुआ माना जाता है। जिसका संबंध महाराणा रत्नसिंह से है।
निर्माण और वास्तुकला:- रत्नेश्वर कुंड की बनावट में भी पत्थर के घाट और जल-संग्रहण के लिए बनाई गई दीवारें शामिल हैं। जो तालाब की संरचना से मेल खाती हैं।
भूगोल:- रत्नेश्वर कुंड हिंगलू आहाड़ा के महलों के नज़दीक स्थित है। जहां मेवाड़ के शासक रहा करते थे।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- राजसी निवास के पास होने के कारण। रत्नेश्वर कुंड का उपयोग राजपरिवार की दिनचर्या में जल स्रोत के रूप में होता रहा होगा।
वर्तमान स्थिति:- वर्तमान में रत्नेश्वर कुंड तालाब की संरचना के साथ ही देखा जा सकता है। और यह किले के ऐतिहासिक जल-स्रोतों में भी गिना जाता है।
13. भिमलात कुंड
स्थापना और अर्थ:- भिमलात कुंड भिमलत तालाब के नाम पर ही रखा गया था। और इसे भी महाभारत काल की मान्यताओं से जोड़ा जाता है।
निर्माण और वास्तुकला:- भिमलात कुंड का पानी प्राकृतिक स्रोत से आता है। जिससे यह आज भी एक प्राकृतिक जलाशय जैसा दिखता है।
भूगोल:- भिमलात कुंड किले के उस हिस्से में स्थित है। जहां चट्टानी इलाका और प्राकृतिक ढलान ज्यादा है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- भिमलात कुंड को पांडव पुत्र भीम से जोड़े जाने के कारण। स्थानीय लोग इसे पूजनीय भी मानते हैं। और इसके आसपास कई कहानियां प्रचलित हैं।
वर्तमान स्थिति:- आज भी भिमलात कुंड अपनी प्राकृतिक अवस्था में मौजूद है। हालांकि बड़े पर्यटन स्थलों की तुलना में यहां भीड़ कम रहती है।
14. भिरन गोली
स्थापना और अर्थ:- भिरन गोली किले के उन छोटे जल-स्रोतों में शामिल है। जो किले के 84 जलाशयों की पुरानी सूची का हिस्सा रहे हैं।
निर्माण और वास्तुकला:- भिरन गोली की बनावट भी अन्य छोटे कुंडों जैसी साधारण और पारंपरिक शैली में बनी हुई है। जिसमें पत्थर की दीवारें पानी को रोकने का काम करती हैं।
भूगोल:- भिरन गोली के भीतरी और कम घूमे जाने वाले हिस्सों में स्थित है। जहां स्थानीय लोग ही आते-जाते हैं।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व:- बड़े जलाशयों की तुलना में इसका दर्ज इतिहास सीमित है। फिर भी यह किले की पुरानी जल-व्यवस्था की कड़ी मानी जाती है।
वर्तमान स्थिति:- वर्तमान में भिरन गोली जलस्रोत समय के साथ उपेक्षित हो गया है। और इस पर विस्तृत जानकारी के लिए। स्थानीय इतिहासकारों और ASI के रिकॉर्ड से ही पुष्टि हो सकती है।
15. चितौड़गढ़ किले के 14 जलस्रोतों की जानकारी पर निष्कर्ष
चित्तौड़गढ़ किला, जिसे जल दुर्ग के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि चित्तौड़गढ़ किले के तालाब सिर्फ पुराने जलाशय ही नहीं माने जाते हैं।
बल्कि यह उस जमाने की समझदारी और हुनर की मिसाल भी हैं। जहां 12वीं से 16वीं सदी के बीच बने ये तालाब, कुंड और बावड़ियां सिर्फ पानी जमा करने के लिए नहीं बनाए गए थे।
बल्कि यह युद्ध के वक्त किले में रहने वाले लोगों के लिए भी काम आते थे। क्योंकि यह उस समय भी धार्मिक आस्था का हिस्सा भी थे। और यह तालाब वास्तुकला में भी कमाल के नमूने माने जाते हैं।
गौमुख, पद्मिनी तालाब, खतान बावड़ी इन सबने 1303, 1535 और 1567 की घेराबंदियों के दौरान किले के लोगों की प्यास बुझाई थी। ओर इन जलाशयों ने कभी भी किले में रहने वाले लोगों में पानी की कमी नहीं आने दी।
16. 8 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: चित्तौड़गढ़ किले में कुल कितने तालाब हैं?
उत्तर: किले में करीब 84 जल संरचनाएं बने हुए हैं। जिनमें तालाब, कुंड और बावड़ियां आदि शामिल है।
लेकिन कुछ जलाशय प्रमुख है। जैसे पद्मिनी तालाब, चत्रंग मोरी, भोळिया तालाब, फतेहजी का तालाब और रत्नेश्वर तालाब आदि।
लेकिन इनमें से हर एक की हालत आज भी अच्छी नहीं है।
प्रश्न 2: गौमुख जलाशय क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर: गौमुख की खासियत है इसकी संरचना। क्योंकि गौमुख कुण्ड में यहां घिरने वाला पानी। गाय के मुख (आकृति) से निकलता है।
जो हिंदू मान्यताओं में भी बहुत ही पवित्र माना जाता है। ओर यह एक प्राकृतिक झरना भी कहलाता है। और यहां का पानी पूरे सालभर बहता रहता है।
गर्मियों में पानी कम जरूर हो जाता है। लेकिन इसकी आध्यात्मिक अहमियत कभी भी कम नहीं होती हैं।
प्रश्न 3: पद्मिनी तालाब का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर: पद्मिनी तालाब को रानी पद्मिनी से जोड़कर देखा जाता है। ओर कहा जाता है, 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने इसी पानी के किनारे रानी पद्मिनी की परछाई देखी थी।
हालांकि यह तालाब ठीक पद्मिनी महल के सामने बना हुआ है। और जायसी की ‘पद्मावत’ में भी इसका जिक्र देखने को मिलता है।
प्रश्न 4: खतान बावड़ी की गहराई कितनी है?
उत्तर: खतान बावड़ी की गहराई लगभग 80 से 100 फीट के बीच है। ओर यह राजस्थान की गिनी-चुनी सबसे गहरी बावड़ियों में इसका नाम आता है।
क्योंकि खतान बावड़ी 15वीं सदी में महाराणा कुम्भा के वक्त बनाई गई थी।
जहां इसकी सीढ़ियां भी कई मंजिलों तक जाती हैं। हालांकि अब निचली मंजिलें सुरक्षा के चलते बंद कर दी गई हैं।
प्रश्न 5: चित्तौड़गढ़ के तालाबों में पानी का स्रोत क्या था?
उत्तर: इन जलाशयों में पानी का सबसे बड़ा स्रोत था मानसून का पानी। खास नालियों और रास्तों से बारिश का पानी इकट्ठा होता था।
कुछ जगहों, खासकर गौमुख में, भूमिगत झरने भी हैं।जो सालभर पानी देते हैं। बाकी के तालाब गर्मियों में बारिश के पानी पर ही टिके रहते थे।
प्रश्न 6: क्या चित्तौड़गढ़ किले के तालाबों का धार्मिक महत्व भी है?
उत्तर: बिल्कुल, चित्तौड़गढ़ किले के तालाबों से धार्मिक महत्व भी जुड़ा हुआ है। जिनमें गौमुख, कुकड़ेश्वर तालाब, सूर्य कुंड, रत्नेश्वर तालाब आदि। इन सबके पास पुराने मंदिर बने हुए हैं।
महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा और दूसरे त्योहारों पर यहां पूजा-पाठ होता रहता था। लेकिन अब यह परंपराएं थोड़ी कम जरूर हो गई हैं। लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुईं है।
प्रश्न 7: तालाबों की वर्तमान स्थिति कैसी है?
उत्तर: तालाबों की हालत आजकल ठीक नहीं है। गंदगी, गाद और उपेक्षा की वजह से कई तालाब बदहाल हैं।
फिर भी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग कुछ-कुछ मरम्मत करता रहता है। लेकिन सच कहें तो बड़े स्तर पर काम होना अभी भी बाकी है।
हां, कुछ स्थानीय लोग भी अपनी तरफ से तालाबों को ठीक करने में जुटे हुए हैं। लेकिन जरूरत अभी भी काफी है।
प्रश्न 8: क्या चित्तौड़गढ़ किले के तालाबों को पर्यटक देख सकते हैं?
उत्तर: हां, ज्यादातर तालाब पर्यटकों के लिए खुले हुए हैं। जिन्हें पर्यटक यहां आकर आसानी से देख सकते है।
खासकर पद्मिनी तालाब और गौमुख जलाशय तो टूरिस्ट स्पॉट बन चुके हैं।
किले में जाने के लिए भारतीयों को 50 रुपये और विदेशियों को 600 रुपये तक का टिकट देना पड़ता है। सुबह 9:30 से शाम 5:30 बजे तक किला खुला रहता है।
बस, कुछ जगहें सुरक्षा के चलते अब बंद भी कर दी गई हैं।
