Chittorgarh Ke Raja Kaun The | 55 राजाओं के नाम, मौर्य काल से लेकर वर्तमान काल तक के राजा

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मौर्य काल के राजा | Chittorgarh Ke Raja Kaun The

1. चित्रांगद मौर्य

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जन्म और शासनकाल: चित्रांगद मौर्य का शासनकाल सातवीं शताब्दी (लगभग 600-650 ईस्वी) माना जाता है। वही ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार चित्रांगद मौर्य मौर्यवंश के प्रतापी शासक माने जाते है। हालांकि इनके जन्म और मृत्यु की सटीक तारिक उपलब्ध नहीं हैं।

प्रमुख कार्य: चित्रांगद मौर्य ने सातवीं शताब्दी में चित्तौड़गढ़ किले की नींव रखी थी। क्योंकि हमारी जांच पड़ताल द्वारा किए गए ऐतिहासिक अध्ययन से पता चलता है कि इस किले का मूल नाम “चित्रकूट” था। जो चित्रांगद के नाम से ही पड़ा था।

बाद में यह नाम धीरे-धीरे परिवर्तित होकर “चित्तौड़” बन गया, लेकिन मेवाड़ के प्राचीन सिक्कों पर आज भी “चित्रकूट” नाम हमे देखने को मिलता है।

2. विवस्वान मौर्य

ऐतिहासिक स्थिति: विवस्वान मौर्य के बारे में प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत सीमित हैं। लेकिन इनका उल्लेख स्थानीय किंवदंतियों और कुछ जनश्रुतियों में मिलता है। लेकिन शिलालेखों या प्रमाणित इतिहास में इनकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

हमारे शोधकर्ताओं ने चित्तौड़ में कई बार भ्रमण किया है। लेकिन हमे अभी तक विवस्वान मौर्य से संबंधित कोई ठोस पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिल सका है।

गुहिल वंश के राजा (6th–8th Century)

3. राजा गुहिल (गुहादित्य)

जन्म और स्थापना: हमे गुहिल या गुहादित्य का जन्म लगभग 540-550 ईस्वी के बीच देखने को मिला है। इन्होंने लगभग 566 ईस्वी में गुहिल वंश की स्थापना की और नागदा को अपनी राजधानी भी बनाया।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: हमने इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार देखा. गुहिल वल्लभी के राजा शिलादित्य और रानी पुष्पावती के पुत्र थे। ऐसी मान्यता है कि जब विदेशी आक्रमणकारियों ने 524 ईस्वी में वल्लभी पर हमला किया, तो गर्भवती रानी पुष्पावती अम्बा भवानी (सिरोही) की यात्रा पर गई थीं।

वहां एक गुफा में इनका जन्म हुआ था. इसलिए इन्हें गुहिल (गुफा में जन्म) हुआ भी कहा जाता है।

शासनकाल: इनका शासनकाल 566 ईस्वी से लगभग 590 ईस्वी तक देखने को मिलता है।

मृत्यु: हमारे द्वारा लगभग 590-600 ईस्वी के बीच इनकी मृत्यु हुई थी।

4. शिलादित्य (महेंद्र द्वितीय)

ऐतिहासिक पहचान: गुहिल वंश में “शिलादित्य” नाम से महेंद्र द्वितीय को जाना जाता है। हालांकि यह भ्रामक हो सकता है क्योंकि गुहिल के पिता का नाम भी शिलादित्य था।

शासनकाल: हमने देखा की महेंद्र द्वितीय का शासनकाल लगभग 7वीं शताब्दी के मध्य में रहा होगा।

विशेष उल्लेख: हमारे संगठन द्वारा एकत्रित जानकारी के अनुसार, महेंद्र द्वितीय के समय ईडर पर गुहिल वंश का शासन था। इनके पुत्र नागादित्य की हत्या भीलों द्वारा शिकार के दौरान कर दी गई थी, जिसके बाद नागादित्य के पुत्र बप्पा रावल को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया।

5. अपराजित

ऐतिहासिक जानकारी: अपराजित जो गुहिल वंश के प्रारंभिक शासकों में से एक माने जाते है। जिनका शासनकाल लगभग 7वीं शताब्दी के बीच में रहा था।

उत्तराधिकार: शिलालेखों के अनुसार गुहिल के उत्तराधिकारी क्रम में शील, अपराजित, भर्तृभट्ट, अल्लट, नरवाहन आदि शासक हुए।

शासनकाल: हमने जाना इनका शासनकाल लगभग 650-680 ईस्वी (लगभग) रहा था।

6. माणिकराज

ऐतिहासिक स्थिति: माणिकराज के बारे में स्पष्ट ऐतिहासिक जानकारी मौजूद नहीं हैं। हालांकि यह नाम स्थानीय परंपराओं में हमे देखने को है. लेकिन प्रमाणित शिलालेखों में इनका उल्लेख दुर्लभ है। सीधे शब्दो में: यह गुहिल वंश के किसी छोटे शासक या जागीरदार के रूप में होंगे।

7. खुमाण प्रथम

शासनकाल: खुमाण प्रथम का शासनकाल लगभग 8वीं शताब्दी के प्रारंभ में रहा था। वही डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, बप्पा रावल के बाद के शासकों में खुमाण प्रथम का नाम भी आता है।

शासन क्षेत्र: इन्होंने मुख्यतः नागदा क्षेत्र से शासन किया था।

शासनकाल: इनका शासनकाल लगभग 750-780 ईस्वी के बीच देखने को मिला है।

8. खुमाण द्वितीय

ऐतिहासिक स्थिति: हमारे अनुसार खुमाण द्वितीय का शासनकाल 8वीं शताब्दी के मध्य या उत्तरार्ध में रहा होगा। क्योंकि गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, “बप्पा के बाद निम्न शासक हुए। भोज, महेन्द्र, नाग, शिलादित्य, अपराजित, कालभोज, खुम्मान प्रथम, मत्तट, भर्तभट्ट, सिंह, खुम्मान द्वितीय”।

शासनकाल: इनका शासनकाल लगभग 800-830 ईस्वी (अनुमानित) बीच है।

9. खुमाण तृतीय

शासनकाल: खुमाण तृतीय गुहिल वंश के मध्यकालीन शासकों में से एक माने जाते है। जिनका शासनकाल 9वीं शताब्दी में रहा था।

विशेष तथ्य: हमारे संशोधन दल ने पाया कि खुमाण तृतीय के समय गुहिल वंश को कई बाहरी आक्रमणों का सामना करना पड़ा था. लेकिन इन्होंने अपने राज्य की सुरक्षा बनाए रखी थी.

शासनकाल: इनका शासनकाल लगभग 850-880 ईस्वी के बीच माना जाता है।

10. मल्लराज

ऐतिहासिक जानकारी: मल्लराज के बारे में सीमित ऐतिहासिक जानकारी पता नही है। लेकिन यह संभवतः 9वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शासन करने वाले गुहिल शासकों में से एक थे।

11. नरवर्मन

शासनकाल: नरवर्मन या नरवाहन गुहिल वंश के प्रमुख शासकों में से एक माने जाते है।

ऐतिहासिक महत्व: कुछ शिलालेखों में इनके बारे में देखने को मिलता है। हालांकि इनके बाद गुहिल वंश की शक्ति में कमी आने लगी थी।

शासनकाल: उनके शासनकाल की बात करें तो लगभग 9वीं-10वीं शताब्दी के बीच रहा है।

12. बाप्पा रावल (कालभोज)

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जन्म: हमने जब पहली बार सुना बप्पा रावल का जन्म लगभग 713-715 ईस्वी में हुआ था। लेकिन इनका वास्तविक नाम कालभोज था।

शासनकाल: हमे इनका शासन काल 734 ईस्वी से 753 ईस्वी तक (लगभग) देखने को मिला है।

प्रमुख उपलब्धि: 734 ईस्वी में बाप्पा रावल ने मौर्य वंश के अंतिम शासक मान मोरी (मानमोरी) को पराजित करके चित्तौड़गढ़ पर अधिकार कर लिया। हमारे संगठन ने चित्तौड़ में बप्पा रावल से संबंधित कई स्मारकों का अध्ययन किया है। जिनमें एकलिंग नाथ मंदिर प्रमुख है।

धार्मिक योगदान: बाप्पा रावल ने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंगजी महादेव का मंदिर बनवाया और स्वयं को एकलिंगजी का दीवान घोषित किया। इसी परंपरा के कारण मेवाड़ के सभी शासक खुद को एकलिंगजी के दीवान मानते थे। और मेवाड़ के राजा बनने से पहले एकलिंगजी की पूजा करते है.

यह बात हमे वर्तमान मेवाड़ राजघरानों में देखी है.

सांस्कृतिक योगदान: बाप्पा रावल ने सोने के सिक्के चलाए, जो उनकी समृद्धि का प्रतीक माने जाते है।

मृत्यु: बाप्पा रावल की मृत्यु लगभग 753 ईस्वी में नागदा में हुई। एकलिंगजी के पास इनकी समाधि आज भी “बप्पा रावल” के नाम से प्रसिद्ध है।

मध्यकालीन मेवाड़ के राजा (8th–13th Century)

13. माणुराज (महेन्द्र प्रथम)

ऐतिहासिक स्थिति: माणुराज या महेन्द्र प्रथम बाप्पा रावल के उत्तराधिकारियों में से एक थे। इनके शासनकाल के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।

शासनकाल: लगभग 753-780 ईस्वी।

14. खेत सिंह

ऐतिहासिक जानकारी: खेत सिंह के बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध है। यह बाप्पा रावल के वंशजों में से एक थे।

शासनकाल: हमे इनका शासनकाल लगभग 8वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देखने को मिला है।

15. अल्लट (आलु-रावल)

शासनकाल: अल्लट का शासनकाल लगभग 953 ईस्वी के आसपास था। इन्हें ख्यातों में “आलु-रावल” कहा गया है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: अल्लट भर्तृभट्ट द्वितीय की राठौड़ वंश की रानी महालक्ष्मी के पुत्र थे। इन्होंने हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह किया।

प्रमुख कार्य: 953 ईस्वी के शिलालेख से प्रमाणित होता है कि अल्लट ने आहड़ में वराह मंदिर की स्थापना की। अल्लट ने आहड़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया और मेवाड़ में सबसे पहले नौकरशाही का गठन किया।

शासनकाल: लगभग 940-960 ईस्वी।

मृत्यु: लगभग 960 ईस्वी।

16. नरवर्मन (द्वितीय)

शासनकाल: नरवर्मन द्वितीय अल्लट के बाद मेवाड़ के शासक बने। इनके शासनकाल में मेवाड़ की शक्ति का ह्रास प्रारंभ हुआ।

विशेष तथ्य: इनके समय से मेवाड़ पर बाहरी आक्रमणों का दबाव बढ़ने लगा।

शासनकाल: लगभग 960-990 ईस्वी।

17. शंखराज

ऐतिहासिक जानकारी: शंखराज के बारे में सीमित जानकारी पता नही है। हालांकि यह गुहिल वंश के मध्यकालीन शासकों में से एक माने जाते थे।

शासनकाल: इनका शासनकाल लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी के बीच रहा था।

18. अमरा सिंह प्रथम

ऐतिहासिक स्थिति: हमे अमरा सिंह प्रथम के बारे में प्रामाणिक ऐतिहासिक जानकारी देखने को नहीं मिली है।

शासनकाल: इनका शासनकाल लगभग 11वीं शताब्दी के बीच रहा है।

19. रतन सिंह प्रथम

ऐतिहासिक महत्व: रतन सिंह प्रथम के बारे में विशेष जानकारी हमे पता नहीं है। लेकिन आपको ध्यान रहे कि रावल रतन सिंह (रानी पद्मिनी के पति) एक अलग शासक थे जो 13वीं-14वीं शताब्दी में हुए।

20. लक्ष्मण सिंह

शासनकाल: लक्ष्मण सिंह गुहिल वंश के रावल शाखा के शासक थे।

शहादत: राणा हम्मीर के दादा लक्ष्मण सिंह अपने पुत्रों के साथ अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। 1303 ईस्वी में चित्तौड़ के प्रथम साके के समय लक्ष्मण सिंह ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था.

मृत्यु: इनकी मृत्यु हमे 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान देखने को मिली।

21. हमीरा (हमीर देव / राणा हम्मीर)

शासनकाल: इनका शासनकाल 1326 ईस्वी से 1364 ईस्वी तक रहा है।

प्रमुख उपलब्धि: इनकी उपलब्धियों में 1326 ईस्वी में सिसोदा ठिकाने के जागीरदार हम्मीर ने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर गुहिल वंश की पुनर्स्थापना की। सिसोदा का जागीरदार होने की वजह से। इन्हें सिसोदिया कहा गया। और गुहिल वंश सिसोदिया वंश के नाम से जाना जाने लगा।

विशेष उपाधि: हम्मीर राणा शाखा का राजपूत था। इसलिए इसके बाद मेवाड़ के सभी शासक राणा/महाराणा कहलाए।

सैन्य उपलब्धियां: हम्मीर ने विषमघाटी पंचानन की उपाधि धारण की। सिंगोली के युद्ध (बांसवाड़ा) में दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक को पराजित किया।

शासन विस्तार: हम्मीर ने 50 वर्षों तक बड़ी योग्यता से शासन करते हुए। अपने राज्य का विस्तार किया। उसी के कठिनाईयों से चित्तौड़ का गौरव पुनः स्थापित हो सका।

मृत्यु: इनकी मृत्यु लगभग 1364 ईस्वी में हुई मानी जाती है.

22. केतरा सिंह (क्षेत्र सिंह)

शासनकाल: केतरा सिंह राणा हम्मीर के बाद मेवाड़ के शासक बने थे।

शासनकाल: इनका शासन काल लगभग 1364-1382 ईस्वी के बीच रहा है।

ऐतिहासिक स्थिति: इनके शासनकाल के बारे में विस्तृत जानकारी सीमित है।

23. लाखा सिंह (लाखा सिसोदिया)

शासनकाल: लगभग 1382-1421 ईस्वी

विशेष तथ्य: लाखा सिसोदिया सिसोदिया वंश के प्रमुख शासकों में से एक थे। इनके शासनकाल में मेवाड़ में स्थिरता और समृद्धि रही।

पारिवारिक संबंध: लाखा के पुत्र राणा मोकल माने जाते हैं। जो बाद में मेवाड़ के शासक भी बने।

24. मोकरा सिंह (राणा मोकल)

जन्म: राणा मोकल का जन्म लगभग 1405 ईस्वी में हुआ था।

शासनकाल: इंका शासन काल लगभग 1421-1433 ईस्वी के बीच रहा है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: राणा मोकल लाखा सिंह के पुत्र थे। इनकी माता का नाम सौभाग्य देवी था।

हत्या: 1433 ईस्वी में राणा मोकल की षड्यंत्रपूर्वक हत्या कर दी गई। इनके हत्यारों में महपा पंवार और अक्का प्रमुख थे।

मृत्यु: उनकी मृत्यु लगभग 1433 ईस्वी के बीच हुई थी।

उत्तराधिकारी: राणा मोकल की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कुंभा गद्दी पर बैठे थे।

स्वर्ण युग के राजा (15th–16th Century)

25. राणा कुंभा (महाराणा कुंभकर्ण)

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जन्म: काफी बार सुना है राणा कुंभा का जन्म 1423 ईस्वी में मेवाड़ के सिसोदिया वंश में हुआ था।

शासनकाल: राणा कुम्भा का शासनकाल 1433 ईस्वी से 1468 ईस्वी तक (लगभग 35 वर्ष) रहा है।

राजगद्दी पर बैठना: अपने पिता राणा मोकल की हत्या के बाद। 1433 ईस्वी में मात्र 10 वर्ष की आयु में राणा कुंभा मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठे थे।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: राणा कुंभा राणा मोकल के पुत्र माने जाते है। इनकी माता का नाम सौभाग्य देवी था। इनके तीन संता ने मानी जाती है। जिनमें दो पुत्र उदा सिंह और राणा रायमल तथा एक पुत्री रमाबाई (वागेश्वरी) मानी जाती है।

प्रमुख सैन्य विजय:

  1. सारंगपुर का युद्ध (1437 ईस्वी) – मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम को पराजित कर 6 माह तक बंदी बनाकर रखा था।
  2. बदनोर का युद्ध (1457 ईस्वी) – गुजरात और मालवा की संयुक्त सेना को पराजित किया था।
  3. अर्बली का युद्ध – मारवाड़ के राव जोधा को पराजित किया था।

स्थापत्य कला: हमारे शोधकर्ताओं ने राणा कुंभा द्वारा बनाए गए। कई स्मारकों की जांच की है। श्यामलदास के “वीर विनोद” के अनुसार, राणा कुंभा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था। जिनमें कुंभलगढ़, अचलगढ़, मचान दुर्ग, भौमट दुर्ग, बसंतगढ़ प्रमुख माने जाते हैं।

विजय स्तंभ: 1437 ईस्वी में सारंगपुर विजय के उपलक्ष में चित्तौड़ में विजय स्तंभ (120 फीट ऊंचा, 9 मंजिला, 157 सीढ़ियां) का निर्माण करवाया था। यह राजस्थान की प्रथम इमारत मानी जाती है। जिस पर 15 अगस्त 1949 को एक रुपये का डाक टिकट जारी किया गया था।

साहित्यिक योगदान: राणा कुंभा बड़े विद्यानुरागी माने जाते हैं। उन्होंने “संगीत राज”, “चंडीशतक” और “गीतगोविंद” जैसे ग्रंथों की रचना और व्याख्या की । वह नाट्यशास्त्र के ज्ञाता और वीणावादन में कुशल हुआ करते थे।

उपाधियां: छापगुरु, रायरायन/रायरासो/राणेरासो (विद्वानों का आश्रयदाता), अश्वपति (कुशल घुड़सवार), हिंदू सुरतान (मुस्लिम शासकों द्वारा दी गई) आदि शामिल है।

मृत्यु: 1468 ईस्वी में कुंभलगढ़ के मामादेव कुंड पर इनके पुत्र उदा (उदयकरण सिंह) ने पितृहत्या कर दी की। कहा जाता है कि राणा कुंभा उन्माद नामक रोग से पीड़ित हो गए थे। जिसका लाभ उठाकर उदा ने यह घृणित कार्य किया।

26. राणा रायमल

जन्म: राणा रायमल का जन्म लगभग 1450 ईस्वी के आसपास हुआ था। हालांकि इनके सटीक जन्म तिथियां ऐतिहासिक दस्तावेजों में उपलब्ध नहीं हैं।

शासनकाल: 1473 ईस्वी से 1509 ईस्वी तक, लगभग 36 वर्ष तक रायमल ने मेवाड़ पर शासन किया।

राजगद्दी पर बैठना: रायमल अपने पिता राणा कुंभा के उत्तराधिकारी नहीं माने जाते हैं। बल्कि वह उदय सिंह प्रथम (उदा) के छोटे भाई थे। और राणा कुंभा की हत्या उनके पुत्र उदय सिंह प्रथम ने की थी। जबकि वे भगवान एकलिंगजी से प्रार्थना कर रहे थे।

उदा ने पांच वर्षों तक शासन किया था। लेकिन वह एक कमजोर शासक साबित हुआ। हमारे शोधकर्ताओं द्वारा चित्तौड़गढ़ में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि इस अवधि में मेवाड़ ने अबू और अजमेर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र खो दिए थे।

पारिवारिक विवरण: रायमल ने मारवाड़ के राव जोधा की बेटी शृंगारदेवी से विवाह किया था। जिससे उन्हें कई संतानें हुईं। रायमल के 13 पुत्र और 2 पुत्रियां थीं। जिनमें पृथ्वीराज, जयमल, राजसिंह और संग्रामसिंह (राणा सांगा) प्रमुख थे।

प्रमुख युद्ध और उपलब्धियां: रायमल के शासनकाल में मालवा के शासक घियास शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। इसके बाद घियास शाह के सेनापति जफर खान ने भी आक्रमण किया था।

लेकिन वह मंडलगढ़ और खैराबाद में पराजित हुआ था। वही दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने भी रायमल के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। जिसमें सुल्तान की हार हुई थी।

उत्तराधिकार का संघर्ष: रायमल के पुत्रों में सिंहासन के उत्तराधिकार को लेकर भयंकर संघर्ष हुआ था। सबसे योग्य पुत्र पृथ्वीराज को धोखे से जहर देकर मार दिया गया, जबकि जयमल युद्ध में मारे गए। इन घटनाओं के बाद अंततः सबसे छोटे पुत्र संग्रामसिंह (राणा सांगा) को उत्तराधिकारी बनने का मौका मिला।

मृत्यु: राणा रायमल की मृत्यु 1509 ईस्वी में हुई, जिसके बाद राणा सांगा मेवाड़ के शासक बने।

27. राणा सांगा (संग्राम सिंह)

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जन्म: हमे पता है राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को चित्तौड़ दुर्ग में हुआ था। हालांकि कुछ स्रोतों में 1484 ईस्वी का भी उल्लेख हमे देखने को मिलता है।

पूरा नाम और वंश: हालांकि इनका पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह था। और यह राणा कुंभा के पोते तथा महाराणा प्रताप के दादा थे। इनके पिता का नाम राणा रायमल और माता का नाम रानी रतन कुंवर थीं।

शासनकाल: इनका शासनकाल हमे 1509 ईस्वी से 1527 ईस्वी तक देखने को मिला है। जिसमे लगभग 18 वर्षों तक राणा सांगा ने मेवाड़ पर शासन किया था।

राज्याभिषेक की परिस्थितियां: राणा सांगा अपने पिता के 13 पुत्रों में सबसे छोटे माने जाते है। हालांकि सबसे पहले राज्य की प्राप्ति पृथ्वीराज के लिए संभव थी। उसके पश्चात जयमल तथा राजसिंह को राज्य का अधिकार मिल सकता था।

हालांकि, परिस्थितियां सांगा के अनुकूल होती गईं। और पृथ्वीराज की मृत्यु धोखे से जहर की गोलियां खाने से हो गई। और जयमल सोलंकी से युद्ध करते हुए मारे गए। जब रायमल मृत्यु शैया पर थे। तो 27 वर्षीय सांगा को अजमेर से आमंत्रित कर मई 1509 ईस्वी में राणा सांगा का राज्याभिषेक कर दिया गया।

शारीरिक चुनौतियां: हमारे संगठन द्वारा एकत्रित जानकारी के अनुसार पाया गया। की राणा सांगा अपने जीवन में अनेक युद्ध लड़े और उनके शरीर पर 80 से अधिक घाव थे। खासकर खानवा के युद्ध में। घायल अवस्था में थे राणा सांगा।

तभी उनकी एक आंख, एक हाथ और एक पैर घायल हो गया था। हालांकि इसके बावजूद भी वह लड़ते रहे। इसलिए उन्हें ‘मानवों का खंडहर’ भी कहा जाता था।

प्रमुख युद्ध:

खातोली का युद्ध (1517 ईस्वी): खातोली का युद्ध राणा सांगा और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के मध्य 1517 ईस्वी में लड़ा गया था। हालांकि इस युद्ध में राणा सांगा ने बहुत वीरता से लोदी सेना को पराजित किया था।

गागरोन का युद्ध (1519 ईस्वी): 1519 में हुए गागरोन युद्ध में राणा सांगा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को हराया था।

ईडर का संघर्ष (1520 ईस्वी): 1520 में सांगा ने ईडर सिंहासन पर रायमल की स्थापना की। और गुजरात के अहमदनगर और विसनगर के शहरों को जीत लिया था।

बयाना का युद्ध (1527 ईस्वी): सन 1527 में राणा सांगा ने बयाना के युद्ध में मुगल सम्राट बाबर की सेना को हराया था।

खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ईस्वी): यह राणा सांगा और बाबर के बीच सबसे महत्वपूर्ण युद्ध था। जिसमे इस युद्ध में राणा सांगा घायल हो गए थे। हमारे संगठन के इतिहासकारों के अनुसार, यह युद्ध भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुआ था।

पारिवारिक जीवन: हमने सुना है राणा सांगा का विवाह रानी कर्णावती से हुआ था। जिसमे उनके चार पुत्र देखने को हमे मिले है। जिसमे भोजराज, रतन सिंह द्वितीय, विक्रमादित्य सिंह और उदय सिंह द्वितीय आदि शामिल है।

मृत्यु की परिस्थितियां: हमारे भारतीय इतिहास की एक सबसे बड़ी बात यह भी है। की खानवा के युद्ध में सांगा बेहोश हो गए थे। जहां से उनकी सेना उन्हें किसी सुरक्षित जगह ले गई थी। वही होश में आने के बाद उन्होंने फिर से लड़ने की ठानी और चित्तौड़ नहीं लौटने की कसम खाई।

कुछ सामंत जो हमारे राजा राणा सांगा से लड़ाई नहीं चाहते थे। उन्होंने राणा सांगा को जहर दे दिया था। जिसके चलते 30 जनवरी 1528 में कालपी में उनकी मृत्यु हो गई।

अंतिम संस्कार: सांगा को कालपी से माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) ले जाया गया था। वही रास्ते में बसवा (दौसा) में रात का पड़ाव डाला गया। लेकिन उसी की याद में बसवा में आज भी सांगा का चबूतरा बना हुआ है। जहां माण्डलगढ़ में सांगा का अंतिम संस्कार किया गया।

मुगल संघर्ष काल के राजा (16th–19th Century)

28. रतन सिंह द्वितीय

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: रतन सिंह द्वितीय राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनकी माता रानी कर्णावती थीं। इनका जन्म लगभग 1510-1515 ईस्वी के मध्य हुआ होगा।

शासनकाल: रतन सिंह द्वितीय ने 1528 से 1531 ईस्वी तक, केवल तीन वर्षों तक ही मेवाड़ पर शासन किया।

राज्याभिषेक: राणा सांगा के देहांत के बाद उनका पुत्र रतन सिंह द्वितीय उनका उत्तराधिकारी और मेवाड़ का महाराणा बना।

शासन की चुनौतियां: रतन सिंह द्वितीय के शासनकाल में मेवाड़ बाहरी आक्रमणों और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा था। उनके पिता की मृत्यु के बाद राज्य कमजोर स्थिति में था।

मृत्यु: रतन सिंह द्वितीय की मृत्यु 1531 ईस्वी में हुई। उनकी असामयिक मृत्यु के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन संभवतः उनकी मृत्यु अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई।

29. विक्रमादित्य सिंह (बिक्रमादित्य सिंह)

जन्म: विक्रमादित्य सिंह राणा सांगा के द्वितीय पुत्र थे, जिनका जन्म लगभग 1512-1518 ईस्वी के बीच हुआ होगा।

शासनकाल: 1531 से 1536 ईस्वी तक, विक्रमादित्य ने लगभग पांच वर्षों तक मेवाड़ पर शासन किया।

राज्याभिषेक: रतन सिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद विक्रमादित्य सिंह मेवाड़ के शासक बने।

प्रमुख संकट: विक्रमादित्य सिंह के शासनकाल के दौरान गुजरात के बहादुर शाह ने 1534 में चित्तौड़गढ़ पर हमला कर दिया था। इस आक्रमण के कारण राणा सांगा की दूसरी रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी, जो इतिहास में प्रसिद्ध है।

उत्तराधिकार: विक्रमादित्य के शासनकाल में उनके छोटे भाई उदयसिंह को सुरक्षा के लिए बूंदी भेज दिया गया था। हमारे संगठन के अध्ययन के अनुसार, विक्रमादित्य एक दुर्बल शासक थे, जो मेवाड़ की गरिमा को बनाए रखने में असफल रहे।

मृत्यु: 1537 में बनवीर नामक व्यक्ति ने विक्रमादित्य का गला घोंटकर हत्या कर दी। बनवीर ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया और उदयसिंह की भी हत्या का प्रयास किया, लेकिन धाय मां पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह को बचा लिया।

30. उदय सिंह द्वितीय (महाराणा उदयसिंह)

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जन्म: राणा उदयसिंह का जन्म 4 अगस्त 1522 ईस्वी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग में हुआ था। ये राणा सांगा और रानी कर्णावती के चौथे पुत्र थे।

बचपन की कठिनाइयां: इनका जन्म इनके पिता की मृत्यु के बाद हुआ था और गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ को नष्ट कर दिया था। उदयसिंह को कर्तव्यपरायण धाय पन्ना के साथ बनवीर से रक्षा के लिए जगह-जगह शरण लेनी पड़ी थी।

राज्याभिषेक: 1540 में कुम्भलगढ़ किले में उदयसिंह का राजतिलक किया गया और मेवाड़ का राणा बनाया गया। 1537 में बनवीर को पराजित कर उन्होंने मेवाड़ पर पुनः अधिकार किया।

शासनकाल: उदयसिंह 1537 ईस्वी (वास्तविक रूप से 1540 ईस्वी) में मेवाड़ के राणा हुए और 28 फरवरी 1572 ईस्वी तक शासन किया, लगभग 32-35 वर्षों तक।

उदयपुर की स्थापना: उदयसिंह उदयपुर शहर के संस्थापक थे। उन्होंने अरावली के घने जंगलों में नदी की बाढ़ रोककर उदयसागर नामक सरोवर का निर्माण किया और वहीं अपनी नई राजधानी उदयपुर बसाई।

अकबर का आक्रमण (1567-68): जब लगा कि चित्तौड़गढ़ अब नहीं बचेगा, तब जयमल और पत्ता आदि वीरों के हाथ में उसे छोड़ उदयसिंह अरावली के घने जंगलों में चले गए। इस निर्णय को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन कई विद्वानों का मानना है कि यह एक सामरिक निर्णय था।

पारिवारिक जीवन: उदयसिंह की सबसे बड़े पुत्र महाराणा प्रताप थे, जो पहली पत्नी महारानी जयवंता बाई से थे। कुछ किंवदंतियों के अनुसार उदयसिंह की कुल 22 पत्नियां और 56 पुत्र और 22 पुत्रियां थीं। उनकी सबसे पसंदीदा पत्नी धीरबाई भटियानी थीं, जिनसे जगमाल सिंह का जन्म हुआ।

उत्तराधिकार विवाद: मृत्यु के समय राणा उदयसिंह ने अपने छोटे पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था, लेकिन राज्य दरबार के अधिकांश सरदार यह नहीं चाहते थे। इसलिए राज्यदरबारियों ने जगमाल को हटाकर महाराणा प्रताप को गद्दी पर बैठाया।

मृत्यु: राणा उदयसिंह की मृत्यु 28 फरवरी 1572 में हुई थी, उस समय उनकी अवस्था 50 वर्ष थी।

31. महाराणा प्रताप सिंह

जन्म: महाराणा प्रताप सिंह का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1597 तदनुसार 9 मई 1540 को कुम्भलगढ़ में हुआ था।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: महाराणा प्रताप उदय सिंह द्वितीय और जयवंता बाई के ज्येष्ठ पुत्र थे। बचपन में उन्हें “कीका” के नाम से पुकारा जाता था।

राज्याभिषेक: 1 मार्च 1572 को गोगुंदा में 32 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप को मेवाड़ का महाराणा का ताज पहनाया गया। हालांकि उनके पिता ने जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किया था, लेकिन सरदारों ने प्रताप को चुना।

शासनकाल: 1572 ईस्वी से 19 जनवरी 1597 ईस्वी तक, लगभग 25 वर्षों तक महाराणा प्रताप ने मेवाड़ पर शासन किया।

हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576 ईस्वी): यह महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच सबसे प्रसिद्ध युद्ध था। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने अपने प्राण देकर बचाया और शक्ति सिंह ने अपना अश्व देकर महाराणा को बचाया। इस युद्ध में प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई।

संघर्ष और पुनर्स्थापना: बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर मेवाड़ में कोई परिवर्तन नहीं कर सका। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 ईस्वी में हुआ। इसके बाद महाराणा प्रताप ने अपने राज्य की सुख-सुविधा में ध्यान दिया।

नई राजधानी: महाराणा प्रताप ने डूंगरपुर के पास चावंड में एक नई राजधानी का निर्माण किया।

पारिवारिक जीवन: महाराणा प्रताप की 11 पत्नियां और 17 संतानें थीं। उनके सबसे बड़े पुत्र महाराणा अमर सिंह प्रथम थे, जो महारानी अजबदे पंवार से थे।

मृत्यु की परिस्थितियां: 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई। धनुष की प्रत्यंजा चढ़ाते हुए चोटिल हो जाने के कारण 56 वर्ष 8 माह की आयु में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई।

मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया: महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत दुःख हुआ क्योंकि हृदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था।

32. महाराणा अमर सिंह प्रथम (अमर सिंह द्वितीय)

जन्म: अमर सिंह का जन्म 16 मार्च 1559 को चित्तौड़ में महाराणा प्रताप और महारानी अजबदे पंवार के घर पर हुआ था।

शासनकाल: 19 जनवरी 1597 ईस्वी से 26 जनवरी 1620 ईस्वी तक, लगभग 23 वर्षों तक अमर सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

राज्याभिषेक: महाराणा प्रताप के बाद अमर सिंह का राज्याभिषेक 19 जनवरी 1597 ईस्वी को चावंड में हुआ।

मुगलों के साथ संघर्ष: राणा अमर सिंह प्रथम ने अपने जीवन में मुगलों के साथ लगातार 17 युद्ध लड़े, एक भी नहीं हारे। जहांगीर ने कई सेनापतियों को मेवाड़ के विरुद्ध भेजा:

  1. शहजादा परवेज (1605)
  2. महावत खां (1608)
  3. अब्दुल खान (1609)
  4. राजा बसु (1611)
  5. शहजादा खुर्रम/शाहजहां (1613-1615)

मुगल-मेवाड़ संधि (1615 ईस्वी): लगातार युद्धों और शाहजहां के दो वर्षीय आक्रमण के बाद मेवाड़ की स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी। महाराणा अमर सिंह ने 1615 में मुगल-मेवाड़ संधि की। इस संधि के अनुसार:

  • चित्तौड़ किला मेवाड़ को वापस मिला, लेकिन किले की मरम्मत नहीं की जा सकती थी
  • उदयपुर मेवाड़ राज्य की राजधानी बना रहा
  • डूंगरपुर और बांसवाड़ा के शासक मेवाड़ के जागीरदार बने

विवादास्पद निर्णय: अमर सिंह की इस संधि को लेकर विवाद है। उनके पुत्र करण सिंह ने इस संधि का विरोध किया था। हमारे संगठन के विद्वानों का मानना है कि यह संधि परिस्थितियों की मजबूरी थी, क्योंकि मेवाड़ लगातार युद्धों से जर्जर हो चुका था।

अंतिम वर्ष: संधि के बाद अमर सिंह ने सारा राजकाज अपने पुत्र करण सिंह के हाथों में दे दिया और अंतिम पांच वर्ष महा सतियां प्रांगण में भगवत आराधना में गुजारे।

मृत्यु: महाराणा अमर सिंह प्रथम का निधन 26 जनवरी 1620 को हुआ। उनकी छतरी आहड़ की महा सतियां में बनी पहली छतरी है।

33. करण सिंह (महाराणा करण)

शासनकाल: 1620 ईस्वी से 1628 ईस्वी तक, लगभग 8 वर्षों तक करण सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: करण सिंह महाराणा अमर सिंह प्रथम के पुत्र थे। ये मुगल-मेवाड़ संधि के कट्टर विरोधी थे और अपने पिता के इस निर्णय से नाखुश थे।

शासन की चुनौतियां: करण सिंह के शासनकाल में मेवाड़ को मुगल संधि की शर्तों के अनुसार चलना पड़ा। उन्होंने राज्य की आंतरिक व्यवस्था को सुधारने पर ध्यान दिया।

मृत्यु: करण सिंह की मृत्यु 1628 ईस्वी में हुई।

34. जगत सिंह प्रथम (जगतराज सिंह)

शासनकाल: 1628 ईस्वी से 1652 ईस्वी तक, लगभग 24 वर्षों तक जगत सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

प्रमुख कार्य: जगत सिंह प्रथम एक शांतिप्रिय और निर्माण-प्रिय शासक थे। उन्होंने उदयपुर में जगदीश मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी उदयपुर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

मुगलों के साथ संबंध: जगत सिंह ने मुगलों के साथ संधि की शर्तों का पालन किया और मेवाड़ में शांति बनाए रखी।

मृत्यु: जगत सिंह की मृत्यु 1652 ईस्वी में हुई।

35. शहाबद्दीन / अरी सिंह (राज सिंह प्रथम)

ऐतिहासिक भ्रम: “शहाबद्दीन” या “अरी सिंह” नाम से कोई स्वतंत्र शासक मेवाड़ के इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। यह संभवतः राज सिंह प्रथम का ही कोई विकल्प नाम हो सकता है।

36. जग्बन्धन सिंह

ऐतिहासिक स्थिति: जग्बन्धन सिंह के बारे में विस्तृत ऐतिहासिक जानकारी सीमित है। यह नाम पारंपरिक वंशावलियों में मिलता है, लेकिन प्रमाणित इतिहास में इनके शासनकाल के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

37. राज सिंह प्रथम

शासनकाल: 1652 ईस्वी से 1680 ईस्वी तक, लगभग 28 वर्षों तक राज सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

उपनाम: राज सिंह को “राज राजेश्वर” और “राज रत्नाकर” की उपाधियां मिली थीं।

मुगलों के साथ संघर्ष: राज सिंह ने औरंगजेब की नीतियों का विरोध किया। उन्होंने औरंगजेब द्वारा लगाए गए जजिया कर का विरोध किया और कई छोटे युद्धों में मुगल सेना का सामना किया।

प्रमुख कार्य: राज सिंह के शासनकाल में कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य हुए। उन्होंने राजसमंद झील का निर्माण करवाया और राज प्रशस्ति (विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति) का निर्माण करवाया।

मृत्यु: राज सिंह की मृत्यु 1680 ईस्वी में हुई।

38. जय सिंह

शासनकाल: 1680 ईस्वी से 1698 ईस्वी तक, लगभग 18 वर्षों तक जय सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

औरंगजेब के साथ संबंध: जय सिंह के शासनकाल में औरंगजेब दक्षिण भारत में व्यस्त था, इसलिए मेवाड़ पर दबाव कम रहा।

मृत्यु: जय सिंह की मृत्यु 1698 ईस्वी में हुई।

39. राज सिंह द्वितीय

शासनकाल: 1754 ईस्वी से 1761 ईस्वी तक, लगभग 7 वर्षों तक राज सिंह द्वितीय ने मेवाड़ पर शासन किया।

ऐतिहासिक स्थिति: इस समय तक मुगल साम्राज्य कमजोर हो चुका था और मराठों का प्रभाव बढ़ रहा था।

मृत्यु: राज सिंह द्वितीय की मृत्यु 1761 ईस्वी में हुई।

40. अरि सिंह द्वितीय

शासनकाल: 1761 ईस्वी से 1773 ईस्वी तक, लगभग 12 वर्षों तक अरि सिंह द्वितीय ने मेवाड़ पर शासन किया।

मराठों के साथ संबंध: अरि सिंह के समय मराठों का प्रभाव राजस्थान में बढ़ रहा था। मेवाड़ को मराठों को नियमित रूप से कर देना पड़ता था।

मृत्यु: अरि सिंह द्वितीय की मृत्यु 1773 ईस्वी में हुई।

41. हम्मीर सिंह द्वितीय

शासनकाल: 1773 ईस्वी से 1778 ईस्वी तक, लगभग 5 वर्षों तक हम्मीर सिंह द्वितीय ने मेवाड़ पर शासन किया।

छोटा शासनकाल: हम्मीर सिंह द्वितीय का शासनकाल बहुत छोटा रहा।

मृत्यु: हम्मीर सिंह द्वितीय की मृत्यु 1778 ईस्वी में हुई।

42. राम सिंह द्वितीय (भीम सिंह)

ऐतिहासिक भ्रम: “राम सिंह” और “भीम सिंह” के बारे में कुछ ऐतिहासिक भ्रम है। भीम सिंह मेवाड़ के एक महत्वपूर्ण शासक थे।

भीम सिंह का शासनकाल: 1778 ईस्वी से 1828 ईस्वी तक, लगभग 50 वर्षों तक भीम सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि: 1818 में भीम सिंह ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि की, जिससे मेवाड़ ब्रिटिश संरक्षण में आ गया।

प्रमुख कार्य: भीम सिंह ने उदयपुर में कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य करवाए।

मृत्यु: भीम सिंह की मृत्यु 1828 ईस्वी में हुई।

43. जेवन सिंह (जवान सिंह)

शासनकाल: 1828 ईस्वी से 1838 ईस्वी तक, लगभग 10 वर्षों तक जेवन सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

ब्रिटिश प्रभाव: जेवन सिंह के शासनकाल में मेवाड़ पूरी तरह से ब्रिटिश संरक्षण में था।

मृत्यु: जेवन सिंह की मृत्यु 1838 ईस्वी में हुई।

44. सरदार सिंह (फतेह सिंह)

ऐतिहासिक भ्रम: “फतेह सिंह” और “सरदार सिंह” दोनों अलग-अलग शासक थे।

सरदार सिंह का शासनकाल: 1838 ईस्वी से 1842 ईस्वी तक, केवल 4 वर्षों तक सरदार सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

मृत्यु: सरदार सिंह की मृत्यु 1842 ईस्वी में हुई।

आधुनिक मेवाड़ के राजा (19th–21st Century)

45. स्वरूप सिंह

शासनकाल: 1842 ईस्वी से 1861 ईस्वी तक, लगभग 19 वर्षों तक स्वरूप सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

1857 का विद्रोह: स्वरूप सिंह के शासनकाल में 1857 का भारतीय विद्रोह हुआ। मेवाड़ ने ब्रिटिश सरकार का साथ दिया।

मृत्यु: स्वरूप सिंह की मृत्यु 1861 ईस्वी में हुई।

46. शंभू सिंह (भूपाल सिंह)

शंभू सिंह का शासनकाल: 1861 ईस्वी से 1874 ईस्वी तक, लगभग 13 वर्षों तक शंभू सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

सुधारवादी शासक: शंभू सिंह ने अपने शासनकाल में कई सुधार किए।

मृत्यु: शंभू सिंह की मृत्यु 1874 ईस्वी में हुई।

47. सज्जन सिंह (भागवत सिंह)

सज्जन सिंह का शासनकाल: 1874 ईस्वी से 1884 ईस्वी तक, लगभग 10 वर्षों तक सज्जन सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

प्रमुख कार्य: सज्जन सिंह ने सज्जनगढ़ पैलेस (मानसून पैलेस) का निर्माण करवाया।

मृत्यु: सज्जन सिंह की मृत्यु 1884 ईस्वी में हुई।

48. फतेह सिंह

शासनकाल: 1884 ईस्वी से 1930 ईस्वी तक, लगभग 46 वर्षों तक फतेह सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

दिल्ली दरबार (1903 और 1911): फतेह सिंह ने दिल्ली दरबार में भाग लिया, जहां भारतीय राजाओं को सम्मानित किया गया।

राष्ट्रवादी झुकाव: फतेह सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते थे।

मृत्यु: फतेह सिंह की मृत्यु 1930 ईस्वी में हुई।

49. भूपाल सिंह

शासनकाल: 1930 ईस्वी से 1955 ईस्वी तक, लगभग 25 वर्षों तक भूपाल सिंह ने मेवाड़ पर शासन किया।

भारत की स्वतंत्रता: भूपाल सिंह के शासनकाल में भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली।

मेवाड़ का भारत में विलय: 1949 में भूपाल सिंह ने मेवाड़ रियासत को भारतीय गणराज्य में विलय करने की घोषणा की।

मृत्यु: भूपाल सिंह की मृत्यु 1955 ईस्वी में हुई।

50. भागवत सिंह (महाराणा)

शासनकाल: 1955 ईस्वी से 1984 ईस्वी तक, भागवत सिंह मेवाड़ के अंतिम शासक/उत्तराधिकारी थे (यद्यपि केवल औपचारिक रूप से, क्योंकि 1971 में भारत सरकार ने राजाओं की प्रिवी पर्स समाप्त कर दी)।

पर्यटन विकास: भागवत सिंह ने उदयपुर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मृत्यु: भागवत सिंह की मृत्यु 1984 ईस्वी में हुई।

51. अरविंद सिंह मेवाड़ (आधुनिक वंशज)

जन्म: 1944 ईस्वी

उत्तराधिकार: अरविंद सिंह भागवत सिंह के पुत्र हैं और वर्तमान में सिसोदिया वंश के मुखिया हैं।

वर्तमान भूमिका: अरविंद सिंह मेवाड़ उदयपुर के सिटी पैलेस के ट्रस्टी हैं और मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में सक्रिय हैं।

52. लक्ष्मण सिंह द्वितीय (लक्ष्य सिंह)

ऐतिहासिक स्थिति: “लक्ष्मण सिंह द्वितीय” नाम से कोई स्वतंत्र शासक मेवाड़ के प्रमाणित इतिहास में दर्ज नहीं है। यह संभवतः किसी राजकुमार या छोटे शासक का नाम हो सकता है।

53. हरी सिंहजी

ऐतिहासिक स्थिति: “हरी सिंहजी” के बारे में प्रमाणित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह नाम संभवतः स्थानीय परंपराओं में मिलता है।

54. महेंद्र सिंहजी

ऐतिहासिक स्थिति: “महेंद्र सिंहजी” के बारे में भी विस्तृत ऐतिहासिक जानकारी सीमित है।

55. विश्वराज सिंह मेवाड़ (चित्तौड़गढ़ मेवाड़ के वर्तमान राजा)

विश्वराज सिंह मेवाड़ का जन्म 18 मई 1969 को हुआ था। वह महेंद्र सिंह मेवाड़ के पुत्र है। ओर माता का नाम महारानी निरुपमा कुमारी है। जो टेहरी गढ़वाल राज्य की राजकुमारी भी हैं। विश्वराज सिंह मेवाड़ महाराणा प्रताप के वंशज है।

जिनका राजतिलक 25 नवंबर 2024 को। चित्तौड़गढ़ किले के फतेह प्रकाश महल में किया गया था। जहां वह चित्तौड़गढ़ मेवाड़ के 77वें महाराणा के रूप में सिंहासन पर बैठे।

इसके अलावा भी, विश्वराज सिंह मेवाड़ राजस्थान राजसमंद के नाथद्वारा विधानसभा के विधायक भी है।

निष्कर्ष

हमारी खोजबीन में यह जाना कि चित्तौड़गढ़ का इतिहास केवल एक किले की कहानी नहीं, बल्कि यह राजपूत शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान की जीवंत गाथा है, जिसमें सातवीं सदी से लेकर सोलहवीं सदी तक के राजाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर इस धरती को गौरवशाली बनाया।

हमने देखा कि मोरी वंश से लेकर गुहिल-सिसोदिया वंश तक, चित्तौड़गढ़ पर शासन करने वाले हर राजा ने अपनी तरह से इस किले और राज्य को संवारा, किंतु मुगल और सुल्तानों के आक्रमणों ने इस गढ़ को तीन बार साक्षी बनाया — जौहर और साका का।

हमको लगा कि बप्पा रावल (713 ई.) से शुरू हुई यह वीरगाथा, महाराणा प्रताप (1572–1597 ई.) तक आते-आते संसार के सबसे महान स्वतंत्रता संग्रामों में से एक बन चुकी थी, जिसमें हल्दीघाटी का युद्ध आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से अंकित है।

हमारी खोजबीन में यह भी पता चला कि राणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप — ये तीन नाम चित्तौड़गढ़ के इतिहास की रीढ़ हैं, क्योंकि इन्होंने न केवल युद्ध लड़े, बल्कि कला, स्थापत्य और संस्कृति को भी संरक्षित किया।

हम जब चित्तौड़गढ़ के इतिहास की गहराई में गए, तो यह स्पष्ट हुआ कि यहाँ का हर पत्थर, हर बुर्ज और हर दरवाज़ा किसी न किसी राजा की वीरता और किसी न किसी रानी के जौहर की याद दिलाता है, जो आज भी करोड़ों भारतीयों को प्रेरणा देता है।

20 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. चित्तौड़गढ़ का सबसे पहला राजा कौन था?

उत्तर: हमारी खोजबीन में यह जाना कि चित्तौड़गढ़ का सबसे पहला ज्ञात शासक चित्रांगद मोरी था, जिसने सातवीं सदी में इस किले की नींव रखी, किंतु बाद में बप्पा रावल ने 713 ई. में इसे मोरी वंश से जीतकर गुहिल वंश की स्थापना की।

प्रश्न 2. बप्पा रावल कौन थे और उनका चित्तौड़गढ़ से क्या संबंध था?

उत्तर: हमने सुना कि बप्पा रावल मेवाड़ के गुहिल वंश के महान संस्थापक थे, जिन्होंने 713 ई. में चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया।

हालांकि कुछ इतिहासकार उन्हें कालभोज नाम से भी जानते हैं और उनका शासनकाल राजपूत गौरव का प्रारंभिक काल माना जाता है

प्रश्न 3. चित्तौड़गढ़ पर कितनी बार आक्रमण हुए?

उत्तर: हमको जब पता चला तो जाना कि चित्तौड़गढ़ पर तीन प्रमुख आक्रमण हुए —

1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी,
1535 ई. में गुजरात के बहादुर शाह,
और 1568 ई. में मुगल बादशाह अकबर द्वारा, जिसमें हर बार यहाँ की वीरांगनाओं ने जौहर किया और राजपूत योद्धाओं ने साका किया।

प्रश्न 4. राणा कुंभा कौन थे और उनकी क्या उपलब्धियाँ थीं?

उत्तर: हमने देखा कि महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.) चित्तौड़गढ़ के सबसे महान राजाओं में गिने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने विजय स्तंभ का निर्माण करवाया और 32 किलों का निर्माण कराया, अपितु वे एक कुशल संगीतकार और लेखक भी थे।

प्रश्न 5. राणा सांगा का इतिहास में क्या महत्व है?

उत्तर: हमारी खोजबीन में पता चला कि महाराणा सांगा (1508–1527 ई.) वह योद्धा थे जिनके शरीर पर 100 से अधिक घाव थे और एक आँख, एक हाथ खो जाने के बावजूद वे युद्ध करते रहे, लेकिन 1527 ई. में खानवा के युद्ध में बाबर से पराजय के बाद उनका स्वास्थ्य टूट गया।

प्रश्न 6. महाराणा प्रताप का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: हमने जाना कि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ई. को कुंभलगढ़ दुर्ग, राजस्थान में हुआ था, जिनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय थे, हालांकि उनका बचपन चित्तौड़गढ़ और उसके आसपास के क्षेत्रों में बीता।

प्रश्न 7. हल्दीघाटी का युद्ध कब और किसके बीच हुआ था?

उत्तर: हमको लगा यह जानना जरूरी है कि हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. को।

महाराणा प्रताप और मुगल सेनापति मान सिंह के बीच लड़ा गया था।

जिसमें महाराणा प्रताप ने अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर अदम्य साहस दिखाया

प्रश्न 8. चित्तौड़गढ़ का पहला जौहर कब हुआ था?

उत्तर: हमने सुना कि चित्तौड़गढ़ का पहला जौहर 1303 ई. में हुआ था।

जब अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया और रानी पद्मिनी ने हजारों वीरांगनाओं के साथ जौहर कर अपने सम्मान की रक्षा की।

किंतु यह घटना आज भी राजपूत इतिहास की सबसे मार्मिक स्मृति है।

प्रश्न 9. अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर कब आक्रमण किया था?

उत्तर: हमारी खोजबीन में यह जाना कि मुगल बादशाह अकबर ने 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया,

जिसमें जयमल और फत्ता ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए प्राण दिए और 8,000 से अधिक राजपूत योद्धाओं ने साका किया,

जो इतिहास की तीसरी और अंतिम बड़ी लड़ाई थी।

प्रश्न 10. राणा उदय सिंह द्वितीय ने चित्तौड़गढ़ छोड़कर उदयपुर क्यों बसाया?

उत्तर: हमने देखा कि महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने अकबर के 1567 ई. के आक्रमण से पहले ही 1559 ई. में उदयपुर नगर की स्थापना की,

क्योंकि चित्तौड़गढ़ की रक्षा लगातार कठिन होती जा रही थी, हालांकि इसे कुछ इतिहासकारों ने विवादास्पद निर्णय भी माना है।

प्रश्न 11. विजय स्तंभ का निर्माण किसने और क्यों करवाया?

उत्तर: हमको पता चला कि विजय स्तंभ का निर्माण महाराणा कुंभा ने 1448 ई. में मालवा और गुजरात की संयुक्त सेना पर विजय की खुशी में करवाया था।

जिसमें यह 37 मीटर ऊँचा स्मारक हिंदू देवी-देवताओं की सैकड़ों मूर्तियों से सुसज्जित है।

प्रश्न 12. चित्तौड़गढ़ के किस राजा ने सबसे लंबा शासन किया?

उत्तर: हमारी खोजबीन में यह सामने आया कि महाराणा कुंभा ने लगभग 35 वर्षों (1433–1468 ई.) तक शासन किया।

और इस दौरान उन्होंने कला, स्थापत्य एवं सैन्य शक्ति में जो योगदान दिया, वह मेवाड़ के इतिहास में अद्वितीय माना जाता है।

प्रश्न 13. चित्तौड़गढ़ का किला कब यूनेस्को विश्व धरोहर बना?

उत्तर: हम जब गए तो जाना कि चित्तौड़गढ़ किले को 2013 ई. में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया गया।

क्योंकि यह राजस्थान के उन छह पहाड़ी किलों में शामिल है।

जो अपनी अनूठी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए विश्वविख्यात हैं

प्रश्न 14. रानी पद्मावती का चित्तौड़गढ़ से क्या संबंध था?

उत्तर: हमने सुना कि रानी पद्मावती (या पद्मिनी) राजा रत्नसिंह की पत्नी थीं,

जिनकी सुंदरता की चर्चा मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी रचना पद्मावत (1540 ई.) में की है।

हालांकि उनके ऐतिहासिक अस्तित्व पर विद्वानों में मतभेद हैं।

प्रश्न 15. मीराबाई का चित्तौड़गढ़ से क्या नाता था?

उत्तर: हमको लगा यह जानना जरूरी है कि मीराबाई कृष्णभक्त संत कवयित्री थीं।

जिनका विवाह चित्तौड़गढ़ के राजकुमार भोजराज से हुआ था

और वे चित्तौड़गढ़ के राजमहल में रहीं, किंतु भक्ति और पारिवारिक विरोध के कारण अंततः वे वृंदावन और द्वारका चली गईं।

प्रश्न 16. गोरा और बादल कौन थे?

उत्तर: हमारी खोजबीन में यह जाना कि गोरा और बादल राजपूत योद्धा थे जो रानी पद्मिनी के चाचा और भतीजे थे।

जिन्होंने 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध में असाधारण वीरता दिखाई और प्राण देकर अपनी स्वामिभक्ति को अमर कर दिया।

प्रश्न 17. जयमल और फत्ता कौन थे?

उत्तर: हमने देखा कि जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया वे दो वीर योद्धा थे।

जिन्होंने 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के समय घायल होने के बावजूद चित्तौड़गढ़ की अंतिम सांस तक रक्षा की।

जिसके कारण अकबर ने आगरा किले में उनकी हाथी पर सवार मूर्तियाँ स्थापित करवाईं।

प्रश्न 18. चित्तौड़गढ़ के राजाओं में सबसे पराक्रमी राजा कौन माना जाता है?

उत्तर: हमने जाना कि इतिहासकारों और जन-मानस दोनों में महाराणा प्रताप को।

चित्तौड़गढ़ और मेवाड़ का सबसे पराक्रमी राजा माना जाता है।

क्योंकि उन्होंने मुगल साम्राज्य की अधीनता स्वीकार नहीं की और जंगलों में रहकर भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखा।

प्रश्न 19. चित्तौड़गढ़ का किला कितना पुराना और कितना बड़ा है?

उत्तर: हमको पता चला कि चित्तौड़गढ़ का किला लगभग 1,500 वर्ष पुराना है।

और यह 700 एकड़ (280 हेक्टेयर) क्षेत्र में फैला हुआ है।

जिसमें 7 विशाल द्वार, 65 ऐतिहासिक संरचनाएं, 4 महल, 19 मुख्य मंदिर और 20 जलाशय मौजूद हैं।

प्रश्न 20. चित्तौड़गढ़ के राजाओं की विरासत आज कैसे जीवित है?

उत्तर: हम जब चित्तौड़गढ़ गए तो महसूस किया कि यहाँ के राजाओं की विरासत विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, राणा कुंभा महल, मीराबाई मंदिर और पद्मिनी महल के रूप में आज भी जीवित है।

हालांकि यह सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं बल्कि हर भारतीय के स्वाभिमान और शौर्य की पहचान है।

Author (India World History)

  • मेरा नाम ललित कुमार (रवि) है। और में फिलहाल N.H.8, भीम, राजसमंद, राजस्थान में रह रहा हूँ।

    में खुद को एक इतिहासकार कहूं. तो शायद गलत नही होगा. क्योंकि इतिहास के विषयों की दुनिया ने मुझे इतना अनुभव दिया है।

    की मुझे अलग से एक इतिहासकार बनने की पढ़ाई या उसके खिलाफ अध्ययन करने की जरूरत नहीं है।

    इसीलिए मैं, फिलहाल हमारी कंपनी इंडिया वर्ल्ड हिस्ट्री पर. खुद को मुख्य लेखक और इतिहास का शोधकर्ता समझता हूँ।

    यही नहीं मैंने भारतीय पब्लिक स्कूल (BPS) चौधरी चरण सिंह कॉलोनी नवलगढ़ रोड़ सीकर से 12TH की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।

    इतिहास विषयों की जानकारियों में मेरे पास. 2026 से पहले 4 वर्षो का अनुभव शामिल हैं।

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