जैसलमेर किले के इतिहास का परिचय | Jaisalmer Fort History
आज राजस्थान के जैसलमेर में, यह भव्य “जैसलमेर का किला” मौजूद है। जिसे अक्सर “गोल्डन सिटी” के नाम से भी जाना जाता हैं।
एक समय में, यहां के राजा जिनका नाम “जैसल” पर्वत का नाम “मेरु” जिनको मिलाकर “जैसल+मेरु” जैसलमेर होता है। इसलिए इसे जैसलमेर का किला कहा जाता है। इसके अन्य नाम सोनार किला, सोनारगढ़, गोल्डन दुर्ग और गलियों के दुर्ग के नाम से भी जाना जाता हैं।

यह एक जीवंत किला और दुनिया के सबसे पुराने बसे दुर्गों में से एक माना जाता है।
ओर इसे भाटी राजा “रावल जैसल” राजपूत शासक ने बनवाया था। जो श्री कृष्ण के 116वें वंशज माने जाते है। उस समय में, इसके निर्माण में लगभग 7 सालों का समय लगा था।
जैसलमेर का किला चित्तौड़गढ़ फोर्ट के बाद सबसे बड़ा लिविंग किला भी माना है। ओर यह इतिहास में सबसे पुराने लगातार बसे दुर्गों में से एक है। उस वक्त, यह व्यापारिक मार्गों, जैसे सिल्क रोड, के संगम पर स्थित हुआ करता था। इसलिए इसे रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है।
आज भी यह राजस्थान के अंतिम भाग में स्थित है। इसलिए इसे राजस्थान का अंडमान भी कहा जाता है। इसके चारों ओर मरुस्थल होने के बावजूद, जैसलमेर किले को धान्वन किला भी कहा गया है।
पाकिस्तान की सीमा यहां से केवल 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। और जैसलमेर किले से कुलधरा गांव की दूरी मात्र 18 किलोमीटर है।
जैसलमेर किले की पहली ऐतिहासिक स्थापना

जैसलमेर किले का निर्माण 12 जुलाई, 1156 ई. पू. को हुआ था। ओर जैसलमेर किले की पहली स्थापना 1156 ईस्वी में भाटी राजपूत शासक महारावल जैसल सिंह द्वारा की गई थी। और यह उस वक्त त्रिकुट पहाड़ी पर बनाया गया था। जिसक आकर त्रिकोणाकार है।
हालांकि इस किले का निर्माण उस समय की राजनीतिक वजहें और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए बनवाया गया था।
और यह थार मरुस्थल के बीचों बीच। एक अभेद्य किलेबंदी के रूप में बनकर तैयार किया गया था। वहीं महारावल जैसल सिंह ने लोद्रवा छोड़कर। इस नई राजधानी जैसलमेर किले की स्थापना की। क्योंकि लोद्रवा बार-बार आक्रमणों का शिकार हो रहा था। इस पर एक नए किले का निर्माण सामरिक दृष्टि से बहुत ही जरूरी था।
इसीलिए उन्होंने जैसलमेर किले का निर्माण जल्दी शुरू करवाया।
लेकिन आज किले को ऊपर से नीचे देखने पर। पूरा थार रेगिस्तान मीलों तक फैला हुआ दिखता है। जहां से किले की ज्यादा सुरक्षा के लिए। दुश्मनों को दूर से ही देखा जा सकता था। 12वीं शताब्दी में राजस्थान में कई राजपूत राज्य हुआ करते थे। लेकिन जैसलमेर का स्थान व्यापार करने के लिए। बहुत ही खास माना जाता था।
यह किला उस समय रेशम रास्ते पर बना हुआ था। जो भारत को मध्य एशिया और फारस से जोड़ता था। जिससे उस समय अनेक राज्यों के लिए। व्यापार करना काफी आसान हो जाता था।
उस समय, किले के पहले निर्माण में पीले बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया था। जो जैसलमेर के आसपास आसानी से मिल जाया करता था। और यह पत्थर सूर्य की रोशनी में सोने की तरह चमकता है।
जैसलमेर किले में, हर 2 बड़े पत्थरों को आपस में जोड़कर खड़ा किया गया था। जिसे इंटर लॉकिंग सिस्टम कहा जाता है।
जहां जैसलमेर किले के निर्माण में। राजपूत और जैन स्थापत्य शैलियों के मिश्रण का इस्तेमाल किया गया था। जो उस समय की हमारे भारत की सांस्कृति समन्वय की भावना को दर्शाती है।
जैसलमेर किले का वर्तमान भूगोल

किले की भौगोलिक स्थिति
स्थान और निर्देशांक: जैसलमेर किला आज राजस्थान राज्य के जैसलमेर जिले में स्थित है। जिसकी भौगोलिक स्थिति 26.9124° उत्तरी अक्षांश और 70.9083° पूर्वी देशांतर पर दर्ज की गई है।
थार मरुस्थल में स्थिति: आज यह किला थार के महान मरुस्थल के मध्य भाग में बसा हुआ है। जहाँ चारों ओर रेत के विशाल टीले और खाली जमीन फैली हुई है। यही कारण है कि इसे “सोनार किला” या “गोल्डन फोर्ट” कहा जाता है।
समुद्र तल से ऊँचाई: जैसलमेर का किला त्रिकूट पहाड़ी पर बना हुआ है। जहां यह समुद्र तल से लगभग 76 मीटर (250 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है। शायद यही वजह है कि इस किले को दूर से भी देखा जा सकता है।
त्रिकूट पहाड़ी (किले की नींव)
पहाड़ी की संरचना: जैसलमेर किला जिस त्रिकूट पहाड़ी पर खड़ा है। वह पीले-सुनहरे बलुआ पत्थर (Yellow Sandstone) से बनी हुई है। जिसमें भी यही पीला बलुआ पत्थर किले की दीवारों में भी इस्तेमाल किया गया था।
पहाड़ी का विस्तार: यह पहाड़ी लगभग 1.5 किलोमीटर लंबाई और 762 मीटर चौड़ाई में फैली हुई है। जिस पर किले की संपूर्ण संरचना टिकी हुई है।
प्राकृतिक सुरक्षा: त्रिकूट पहाड़ी की ऊँचाई और खड़ी ढलान ने सदियों तक किले को प्राकृतिक सुरक्षा दी है। क्योंकि तीन दिशाओं से चढ़ाई करना काफी मुश्किल है।
किले का क्षेत्रफल और विस्तार
कुल क्षेत्रफल: वर्तमान में जैसलमेर किले का कुल क्षेत्रफल लगभग 4.99 वर्ग किलोमीटर माना जाता है। जिसमें किले की परिधि की दीवारें लगभग 4 किलोमीटर की परिधि में फैली हुई हैं।
परकोटे की लंबाई-चौड़ाई: किले का परकोटा (चारदीवारी) लगभग 1,500 फीट लंबा और 750 फीट चौड़ा है। जिसमें मोटी-मोटी पत्थर की दीवारें आज भी मजबूती से खड़ी हुई हैं।
आंतरिक बसावट क्षेत्र: सबसे अच्छी बात किले के भीतर लगभग 4,000 से 5,000 लोग आज भी निवास करते हैं। जिसके कारण यह विश्व के उन गिने-चुने किलों में से एक है। जो आज भी जीवित और आबाद हैं।
किले की दीवारें और बुर्ज

दीवारों की संख्या और ऊँचाई: आज भी किले में कुल 99 बुर्ज (Bastions) हैं। जिनमें से 92 बुर्ज मूल रूप से 12वीं सदी में बनाए गए थे। हालाँकि वर्तमान में इनका भूगोल और विन्यास थोड़ा बदल गया है।
दीवारों की मोटाई: किले की बाहरी दीवारें 15 से 30 फीट तक मोटी हैं। जो पीले बलुआ पत्थर से बनी हुई हैं। और सूर्य की रोशनी में सोने जैसी चमकती हैं।
प्रवेश द्वार: किले में चार मुख्य प्रवेश द्वार मौजूद हैं। जिनमे आज अखेपोल, गणेशपोल, हवापोल और रंगपोल आदि शामिल हैं। हालांकि इन्ही दरवाजों में वर्तमान में पर्यटन का आना जाना होता है।
किले का जलवायु भूगोल
मरुस्थलीय जलवायु: जैसलमेर किले के आसपास का संपूर्ण क्षेत्र BWh (Hot Desert Climate — कोपेन वर्गीकरण) की श्रेणी में आता है। जहाँ गर्मियों में तापमान 45°C से 48°C तक पहुँच जाता है।
वर्षा की कमी: इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा मात्र 209 मिलीमीटर दर्ज की जाती है। जो भारत के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक मानी जाती है। किंतु इसी शुष्कता ने किले के पत्थरों को सदियों तक सुरक्षित रखा हुआ है।
सर्दियों में तापमान: नवंबर से फरवरी के बीच। यहाँ का तापमान 5°C से 10°C तक गिर जाता है। जिसके कारण पर्यटक इसी मौसम में सबसे अधिक संख्या में आते हैं।
किले के भीतर की वर्तमान बसावट
आवासीय क्षेत्र: किले के अंडा आज भी लगभग 3,000 से 4,000 परिवार निवास करते हैं। जिनमें अधिकांश ब्राह्मण और राजपूत समुदाय के लोग हैं। यह परिवार पीढ़ियों से यहीं रहते आए हैं।
धार्मिक स्थल: जैसलमेर किले के अंदर लक्ष्मीनाथ मंदिर, जैन मंदिर समूह (7 जैन मंदिर) और कई छोटे मंदिर बने हुए हैं। जो धार्मिक दृष्टि से आज भी खुले हुए हैं।
व्यावसायिक क्षेत्र: जैसलमेर किले के अंदर दर्जनों होटल, हस्तशिल्प की दुकानें, रेस्तरां और गेस्ट हाउस स्थापित किए गए हैं। जिसके कारण UNESCO ने इसे “लिविंग फोर्ट” (जीवित किला) के रूप माना है।
किले का जल-भूगोल और जल निकासी
घड़सीसर तालाब: जैसलमेर किले के निकट ही घड़सीसर तालाब स्थित है। जो लगभग 14वीं सदी में बनाया गया था। मगर वर्तमान में यह जल संसाधन का प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत बना हुआ है।
जल निकासी की समस्या: वर्तमान में किले की भौगोलिक स्थिति के लिए। सबसे बड़ी चुनौती जल-निकासी मानी जाती है। क्योंकि किले के भीतर पाइपलाइन बिछाने से नींव के पत्थर कमजोर होते देखें गए हैं।
रिसाव की समस्या: INTACH (Indian National Trust for Art and Cultural Heritage) की रिपोर्ट के अनुसार जल रिसाव के कारण किले के पत्थरों में दरारें देखी गई हैं। जो इसके भूगोल और संरचना के लिए गंभीर खतरा भी माना गया है।
किले की दिशाएं और आसपास का भूगोल
उत्तर दिशा: जैसलमेर किले के उत्तर में जैसलमेर शहर का मुख्य बाजार और व्यापारिक क्षेत्र स्थित है। पर्यटन की भीड़ हमेशा लगी रहती है।
दक्षिण दिशा: जैसलमेर किले के दक्षिण दिशा में विशाल रेत के टीले (Sand Dunes) फैले हुए है। जिनमें सम सैंड ड्यून्स (Sam Sand Dunes) सबसे खास माना जाता हैं। जो किले से लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
पूर्व और पश्चिम दिशा: जैसलमेर किले के पूर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग NH-11 (अब NH-125) बना हुआ है। जबकि पश्चिम में भारत-पाकिस्तान की सीमा मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
UNESCO और संरक्षण भूगोल
विश्व धरोहर दर्जा: जैसलमेर किले को वर्ष 2013 में UNESCO ने “राजस्थान के पहाड़ी किले” श्रृंखला के अंतर्गत विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। जिसमें कुल 6 राजस्थानी किले शामिल किए गए थे।
बफर जोन: UNESCO के नियमों के अनुसार किले के चारों ओर एक निर्धारित बफर जोन (Buffer Zone) बना हुआ है। जिसमें नई निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लागू होता है। परंतु अतिक्रमण की समस्या आज भी बनी हुई है।
जैसलमेर किले के स्थानीय लोगों का वर्णन
स्थानीय जानकारी के अनुसार, जैसलमेर किले में आज भी कई लोगों का निवास स्थान है। यहाँ की जनसंख्या लगभग 3,000 मानी जाती है।
इनमें से 75% ब्राह्मण और 25% राजपूत रहते हैं। यहाँ के राजपूतों की वंशावली भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी हुई है। वर्तमान में, 159वीं पीढ़ी यहाँ निवास करती है। लेकिन 44वीं पीढ़ी तो राजपूत राजा रावल जैसल के बाद यहाँ रहने लगी थी।
अब, जैसलमेर किले के राजा “महारावल चैतन्य राज सिंह” हैं। उनका राज्याभिषेक जनवरी 2021 में जैसलमेर दुर्ग (सोनार दुर्ग) में हुआ।
जहां वह जैसलमेर दुर्ग के 44वें महारावल बने थे। उन्होंने अपनी गद्दी संभालने से पहले, ओर राजा बनने से पहले। अपनी कुलदेवी और जैसलमेर के आराध्य देव लक्ष्मीनाथ भगवान के दर्शन किए थे।
जैसलमेर किले की पर्यटन जगहें
म्यूजियम ( राजा रानी का महल )

जैसलमेर किले के म्यूजियम में प्रवेश करने के लिए। पर्यटन को सबसे पहले टिकिट लेना पड़ता है। जिसके बाद वह शस्त्रालय में विभिन्न प्रकार के अस्त्र, शस्त्र को देख सकते है।
अंदर जाते ही कांच के एक बड़े बॉक्स में। जैसलमेर किले के सैनिकों के हेलमेट, नेपाली खुकरी, तलवारें, गुप्ति, हंटर, भाले की नोक, अंकुश, बारूद की कुपये, संगीन आदि को रखा गया हैं। दीवार पर 5 अलग-अलग प्रकार की टोपीदार बंदूकें टंगी हुई हैं। जिनको अक्सर बारूद से चलाया जाता था।
एक स्टैंड गन खिड़की के पास रखी हुई है। और वहाँ एक गुप्त सुरंग भी बनी हुई है। एक त्रिपोलिया (तीन गेट वाले रूम) में गुप्त लोकअप दिखाई देता है।
जहां दीवार पर जैसलमेर किले के पहले राजा “रावल जैसल” और अन्य राजाओं की मूर्तियां टंगी हुई हैं। यही नहीं यहाँ राजाओं की लगभग 159 पीढ़ियों की लिस्ट दीवार पर टांगी गई है। जिनके नाम ओर उनकी तस्वीर पर्यटन आसानी से देख सकते है।
एक कमरे में लकड़ी से बने घोड़े की प्रतिमा स्थापित की गई है। जिसे काट का घोड़ा कहते हैं। इसकी कहावत काफी लोकप्रिय मानी जाती है। जिसमें कहतेहै
“घोड़ा किजिए काट का पिंड किजिए पाषाण, बक्तर किजिए लोहे का तब देखो जेशाना” यह काफी लोकप्रिय है।
एक बड़े कांच के बॉक्स में जैसलमेर दुर्ग की विभिन्न प्राचीन मूर्तियां हैं। जिसमें विकुंगगुप्त का कुंदक नृत्य और मर्यादा पुरुषोत्तम राम भगवान की काल्पनिक मूर्ति लगाई गई हैं।
एक बड़े कांच के फर्नीचर में। मूर्ति में महिला अपने सिंदूर में मांग भरती हुई का चित्र है। एक और मूर्ति में महिला अपने बाल संवारती हुई का चित्र है। जबकि वह पत्र लिख रही है। एक मूर्ति में महिला नृत्यांगना मंजीरे हाथ में लिए है। एक अन्य मूर्ति में नृत्य करती महिला तोते के जरिए संदेश भेजने का चित्र है।
एक मूर्ति में मां अपने बच्चे को देखती हुई की तस्वीर है। ओर एक मूर्ति में राधिका बांसुरी बजाते हुए श्री कृष्ण को याद करने की तस्वीर है। एक मूर्ति में विष्णु भगवान के ब्राह्मण अवतार की तस्वीर हैं। वहीं एक मूर्ति में माता सरस्वती की तस्वीर है।
एक कमरे में “दीवाने जजए आम” कहलाता है। जहाँ राजा अपनी प्रजा के हित की बात किया करते थे। कक्ष नंबर 18 में महारावल सालेमान सिंह की ड्रेस, सोफा, कुर्सी, और खाने-पीने के चांदी के बर्तन रखे गए हैं।
यह कक्ष पूरी तरह से चांदी से बनाया गया है। ओर यहाँ पुराने जमाने के टॉयलेट, पानी की टंकी और वेंटिलेशन भी बने हुए है।
जैसलमेर किले के अदा दीवान खाना भी है। जिसमें दरवाजे का साइज एकदम छोटा है। ऐसा इसलिए ताकि कोई राजा से मिलने आए तो सिर झुकाकर आए। यहाँ राजा का सिंहासन रखा हुआ है। और पास में उनकी छतरी, तलवार आदि भी रखी गई है।
जैसलमेर किले के एक बड़े कांच में माता गणगौर देवी की मूर्ति रखी गई है। जो माता पार्वती का स्वरूप मानी जाती है। जैसलमेर किले के बाहर पत्थर पर पूरे किले का नक्शा देखा जा सकता है। जो लगभग 100 साल पुराना है।
यह नक्शा मजदूरों द्वारा छेनी और हथौड़े से बनाया गया था।
वहीं एक कक्ष में राजस्थानी पुरुष (सफेद धोती, साल के साथ) और महिला (लाल साड़ी के साथ) की पोशाक की तस्वीर है। एक विशाल गलियारे में रानियों के विभिन्न कमरे बने हुए हैं। जैसे रूप महल (ब्यूटी पार्लर) और लोक संगीत कक्ष आदि।
एक बड़े कक्ष में जैसलमेर किले की प्राचीन तस्वीरें हैं। यहाँ मर्चीशीट की हवेली, जावड़ निवास होटल, सज्जित हेलीफेंट, और पटवा हवेली की तस्वीरें भी हैं।
मई में अमरसागर लेक के सूखने, पुरानी गलियों, और अमरसागर जैन मंदिर की तस्वीरें भी हैं। अंतिम सूर्य की रोशनी में जैसलमेर दुर्ग के, राजाओं के सजते हुए घोड़े, और बरसात के पानी से भरे अमरसागर का चित्र भी यहाँ टांगा गया है।
सजते धजते ऊंट, जैसलमेर किले के गज विलास, पुरानी बेलगाड़ियों और पालकियों की तस्वीरें भी यहाँ स्थापित की गई हैं।
जैसलमेर दुर्ग के 8 जैन मंदिर

जैसलमेर किले के जैन मंदिरों में लगभग 6666 मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। इन आठ मंदिरों में लगभग 24 तीर्थांकरों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। ओर कहा जाता है कि इनका निर्माण 1400 ई. पू. में हुआ था।
यहाँ मूलनायक, चिंतामणि पार्श्वनाथ, ऋषभदेव, चंद्रप्रभु, शांतिनाथ, संभवनाथ, कुंतुनाथ, महावीरस्वामी, और सीमांदरस्वामी के मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों की मुख्य मूर्तियों की पहचान करने के लिए। कलर और चिह्न का उपयोग किया गया है।
जैसलमेर किले के मंदिरों में नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है। यहां के मंदिर पीले बलुआ पत्थर से बने हुए हैं। और कई जगहों पर हमें सफेद तथा अन्य मार्बल भी देखने को मिलते हैं। मंदिरों की छतें गोलाकार आकृति में बनाई गई हैं। जो नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे की ओर बढ़ती हैं।
मंदिरों के स्तंभ भी गोलाकार आकृति में बने हुए हैं। अर्थात, सभी मंदिरों के पत्थरों को मजदूरों द्वारा आकर्षक डिजाइन दिया गया है। इनमें विभिन्न कलाकृतियों का उपयोग किया गया है।
जैसे फूल, मनुष्य, जानवर, और भगवान के चित्र आदि। इनकी दिखावट सुंदर ओर चमकदार है। और यह पर्यटन को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। और पत्थरों के बीच बीच में। तरह तरह के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उकेरी की गई हैं।
जैसलमेर दुर्ग का दशहरा चोक

जैसलमेर दुर्ग के अंतिम गेट हवा पोल के बाद। जैसलमेर किले का मुख्य चौराहा, दशहरा चोक बना हुआ है। दशहरा चोक को महाराजा रतन सिंह ने बनवाया था। यहाँ कई प्रकार की दुकानें और वाहन ले जाने की सुविधा भी उपलब्ध है। यहाँ से दुर्ग चार भागों में बंट जाता है। इसी दशहरा चोक में दशहरा का पर्व भी मनाया जाता था।
दशहरे चौक में माता चामुण्डा देवी का मंदिर भी बना हुआ है। जहाँ आज भी समय समय पर पूजा-अर्चना होती रहती है। यहाँ एक समय में भैंस और बकरों की बलि दी जाती थी। लेकिन 1994 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद। यहां बलि प्रथा को पूरी राह बंद कर दिया गया है।
जैसलमेर किले के दशहरे चोक में ही एक सफेद सिंहासन भी बना हुआ है। जहाँ कभी राजा रतन सिंह की बैठक हुआ करती थी। हालांकि राजा रतन सिंह के अलावा उनके उत्तराधिकारी भी यहाँ बैठा करते थे।
ठीक सामने राजा का महल बना हुआ है। जिसकी बाहरी तरफ की खिड़कियाँ खुली हुई हैं। दाईं ओर रानी का महल भी बना हुआ है। जिसकी बाहरी खिड़कियां हमेशा बंद रहती है। राजा की घुड़साला भी इसी के निकट है। जहाँ वह घुड़सवारी और निशानेबाजी सीखा करते थे।
जैसलमेर दुर्ग के कुछ और अन्य स्थल
जैसलमेर किले के पश्चिम में अमरसागर है। इसके अलावा रंग महल, मोती महल, जवाहर विलास महल, बादल महल, गज विलास, अंतपुर के कलात्मक जरोखे, भगवती देवी का मंदिर, और सात मंदिर का भव्य राज महल भी यहाँ बना हुआ हैं। किले में एक जेसुल का कुआँ भी है।
जैसलमेर दुर्ग की वास्तुकला

जैसलमेर किले की पहली नींव रखने का काम यहाँ के पहले राजा “रावल जैसल” ने किया था। और इसे अपनी राजधानी घोषित किया। इसके बाद जितने भी नए राजा बने। सभी ने किले के निर्माण में अपना अपना योगदान दिया। जैसलमेर दुर्ग में बिना किसी चुने, पानी या सीमेंट का उपयोग किए, दो पत्थरों को आपसे में तांबे की सहायता से जोड़कर किया गया था।
चूँकि चुने के इस्तेमाल में पानी की आवश्यकता होती है। और रेगिस्तान में पानी की कमी के कारण, इसके निर्माण में केवल पत्थर का उपयोग किया गया था। एक पत्थर के ऊपर एक पत्थर को रखा गया था। जिसे इंटर लॉकिंग सिस्टम कहा जाता है। जो सूर्य की रोशनी में भी। सोने की तरह चमकता है। इसी वजह से इसे गोल्डन किला (सोनारगढ़ का दुर्ग) भी कहा जाता है।
जैसलमेर किले में हमें इस्लामिक और राजस्थानी वास्तुकला का मिश्रण देखने को मिलता है। इसे राजस्थान का सबसे सुंदर किला माना जाता है। जो त्रिकुटा पर्वत की ऊँचाई पर गर्व से स्थित है।
इस पहाड़ी की चौड़ाई 750 फीट और लंबाई 150 फीट मानी जाती है। किले का अंदरूनी स्थान काफी बड़ा है। जहाँ अनेक गलियारे भी बने हुए हैं। यह अद्भुत दुर्ग किसी वास्तुशिल्प आश्चर्य से कम नहीं है। क्योंकि यहाँ के घर, महल और हवेलियाँ पीले बलुआ पत्थर से बनाए गए हैं।
जैसलमेर किले की छतों में। लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। नीचे के हिस्से में इसे लैपिंग किया गया है। इससे गर्मी में ठंडक और सर्दी में गर्माहट मिलती है। यहां के अधिकतर गेट छोटे हैं।
यह विनाशकारी दुश्मनों का सामना करने में मदद करते हैं। ताकि कोई बाहरी दुश्मन जब कमरे में प्रवेश कर करे। तो कमरे बैठे व्यक्ति को पहले से ही पता चल जाए। वहीं स्तंभ का आकार गोल है। ओर उन्हें छेनी और हथौड़ों की सहायता से सुंदर ओर आकर्षक डिज़ाइन में बनाया गया हैं।
जैसलमेर किले में 30 फीट लंबी दीवारें बनाई गई थी। जो किले को सुरक्षा देती हैं। किले की ओर सुरक्षा के लिए। तीन मुख्य बाहरी दीवारें हैं। सबसे बाहरी और निचली परत ठोस पत्थरों से बनी हैं।
पहली दीवार परकोटा, दूसरी मोरी और तीसरी बुर्ज के रूप में जानी जाती है। दीवारों पर 50–55 किलों के विशाल पत्थर भी हैं। जिनका उपयोग दुश्मनों पर फेंकने के लिए किया जाता था। किले में जैसल कुएं का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के सुरदर्शन चक्र से जुड़ा हुआ माना जाता है। क्योंकि इसे अर्जुन की प्यास बुझाने के लिए खोदा गया था।
जैसलमेर दुर्ग का पहला द्वार अखै द्वार कहलाता है। जिसे महारावल अखे सिंह द्वारा बनाया गया था। यह द्वार दुर्ग का खास आकर्षण है। यहां हमें नक्काशी देखने को मिलती है। सुरज द्वार, जिसे स्वागत गेट भी कहा जाता हैं।
क्योंकि राजा के युद्ध जीतने के बाद। इसी स्वागत गेट पर उनका स्वागत किया जाता था। इसके निकट बेरीसाल बुर्ज और सुके कुएं का निर्माण हुआ था।
एक गणेश पॉल, जहां किले की पहली नींव भी। इसी स्थान पर रखी गई थी। और हवा पोल, जहां हर वक्त तेज हवाएं चलती रहती है। जहां पर्यटन आराम से बैठकर। हवाओं का आनंद ले सकते है।
इसके ठीक ऊपर महाराजा का पैलेस बना हुआ है। जिसके दाईं ओर जरोखा भी है। यहां से राजा के सैनिक ड्रम बजाकर प्रजा को सूचित किया करते थे। इन दरवाजों का निर्माण 90° पर किया गया था।
जैसलमेर दुर्ग के चारों तरफ देखने पर। किले के चारों ओर 99 बुर्ज देखने को मिलते हैं। 92 बुर्ज का निर्माण 1633 ई. पू. से 1647 ईस्वी के बीच हुआ था।
स्थानीय गाइड के मुताबिक, यही से सैनिकों ने जैसलमेर दुर्ग की रक्षा की। यदि दुश्मन बुर्जों से प्रवेश कर जाता। तो उन पर गर्म तेल डालकर खत्म कर दिया जाता।
किले में ध्वज (झंडा) लगाने का कंपास भी बनाया गया था। इससे लहराते ध्वज की दिशा देखी जाती थी।
जैसलमेर किले के आक्रमण

पहला आक्रमण
यह बात लगभग 1294 ई. पू. की मानी जाती है। जब जैसलमेर किले पर पहला आक्रमण हुआ था। उस समय जैसलमेर दुर्ग के सिंहासन पर महारावल मूलराज जेतसिंह विराजमान थे। ओर यह आक्रमण अलाउद्दीन खिलजी ने किया था।
किले के भीतर पुरुषों ने केसरिया बाना पहनकर लड़ाई के लिए तैयारियां शुरू कर दी। ओर इसी बीच, महारानी रत्ना ने 22 हजार क्षत्राणियों के साथ जौहर कर लिया। वहीं महारावल को हार का सामना करना पड़ा।
दूसरा आक्रमण
मेरे अध्ययन के मुताबिक दूसरा आक्रमण लगभग 1315 ई. पू. हुआ था। ओर उस समय जैसलमेर किले में महारावल दूदा तिलोक सिंह सिंहासन थे। जहां यह आक्रमण फिरोज तुगलक ने किया था।
जिसमें जैसलमेर किले की रक्षा के लिए। वीर सैनिकों ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी। ओर महारानी के साथ 16,000 वीरांगनाओं ने जौहर भी किया।
तीसरा आक्रमण
जैसलमेर किले पर तीसरा आक्रमण लगभग 1505 ई. पू. हुआ था। ओर उस समय राजा लूणकरण सिंह गद्दी पर विराजमान थे। लूणकरण के अफगानी मित्र, अमीर अली पठान ने विश्वासघात किया। और महाराजा को जान से मार दिया।
1570 में यह दुर्ग बादशाह अकबर के अधीन चला गया। उस समय जैसलमेर किले के राजा ने अपनी बेटी की शादी अकबर के यहां कर दी।
किसी एक आक्रमण में। एक बार यहां राजपूतों ने दुश्मनों पर उबलता हुआ गर्म पानी और तेल भी फेंका था।
पर्यटन भ्रमण

जैसलमेर दुर्ग का पूरा पता: किले का रोड़, गोपा चौक के पास, अमर सागर पोल, खेजड़ पारा, माणक चौक, अमर सागर पोल, जैसलमेर, राजस्थान, 345001, भारत।
किले में सबसे पहले कहा पहुंचे: जैसलमेर किले का भ्रमण करने से पहले। चार द्वारों अखै पोल, सूरज द्वार, गणेश पोल, और हवा पोल से गुजरने के बाद।
किले के मुख्य चौराहा वाले भाग तक पहुंचना पड़ता है। यहीं से दुर्ग कई हिस्सों में विभाजित भी हो जाता है। ओर यही से पर्यटन किले के भ्रमण की शुरुआत करते है।
किले की पर्यटन पहचान: जैसलमेर का किला, राजस्थान (भारत) में भ्रमण के लिए। खूबसूरत जगहों में से एक माना जाता है। क्योंकि इसकी पर्यटन पहचान किले में इस्तेमाल किए गए। पीले बलुआ पत्थर से मानी जाती है।
वहीं जब सूरज की पहली रोशनी पीले बलुआ पत्थर पर पड़ती है। तो वह सोने की तरह चमकने लगता हैं। जो इस किले को और भी ज्यादा आकर्षक बनाता हैं। ओर यही एक वजह है। कि यह दुर्ग पर्यटन को अपनी ओर खींचता है।
पर्यटन सुविधाएं
जैसलमेर किले में पर्यटकों के लिए। कई सुविधाएं देखने को मिलती हैं। जो यात्रा को ओर भी ज्यादा आरामदायक और यादगार बनाती हैं। किले में प्रवेश से लेकर भीतर तक की व्यवस्था काफी सुव्यवस्थित देखने को मिलती है।
दशहरा चौक की दुकानें: दशहरा चौक में स्थानीय शिल्प और हस्तकला की छोटी-छोटी दुकानें बनी हुई हैं। जहां पर्यटक आसानी से अपनी खरीदारी का मजा ले सकते हैं। और थोड़ा बहुत आराम भी कर सकते हैं।
गाइड सेवा: जैसलमेर किले के मुख्य द्वार पर सरकारी और निजी टूर गाइड आसानी से देखने को मिल जाते हैं। जो हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जैसलमेर किले के इतिहास की जानकारियां देते हैं।
ऑडियो गाइड: यहां ऑडियो गाइड की सुविधा भी देखने को मिलती है। इससे हर किसी को खुशी इस बात की है। क्योंकि इससे अकेले घूमने वाले पर्यटकों को बहुत ही मदद मिलती है।
फोटोग्राफी सुविधा: किले के अंदर फोटोग्राफी की अनुमति दी गई है। हालांकि कुछ विशेष धार्मिक स्थलों पर कैमरे का उपयोग करना बिल्कुल मना है।
व्हीलचेयर और दिव्यांग सुविधा: किले के कुछ हिस्सों में दिव्यांग (विकलांग) पर्यटकों के लिए रैंप और विशेष रास्ते बनाए गए हैं।
पेयजल और शौचालय: किले के अंडा पीने के पानी और साफ शौचालयों की व्यवस्था भी की गई है। जो लंबे भ्रमण करने वाले पर्यटकों के लिए बहुत ही जरूरी है।
पर्यटन सूचना केंद्र: राजस्थान पर्यटन विभाग का एक सूचना केंद्र भी किले के निकट बना हुआ है। जहां से नक्शे और ब्रोशर भी मिलते हैं।
संग्रहालय सुविधा: राजमहल परिसर के एक हिस्से को म्यूजियम में बदल दिया गया है। जिसमें कई शताब्दियों की दुर्लभ कलाकृतियां मौजूद हैं।
समय, शुल्क और कब जाएं
जैसलमेर किले की यात्रा करने से पहले। समय और शुल्क की जानकारी होना बहुत ही जरूरी है। क्योंकि यह किला साल के हर दिन खुला रहता है। लेकिन हर मौसम में यात्रा का अनुभव अलग होता है।
खुलने का समय (अप्रैल से अक्टूबर): अप्रैल से अक्टूबर के बीच। जैसलमेर किला और संग्रहालय सुबह 8:00 बजे से लेकर। शाम 6:00 बजे तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है।
खुलने का समय (नवंबर से मार्च): नवंबर से लेकर मार्च तक। जैसलमेर किला सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक। पर्यटकों के लिए खुलता है।
प्रवेश शुल्क (भारतीय): भारतीय पर्यटकों के लिए। किले का प्रवेश शुल्क लगभग ₹30 से ₹50 के बीच रखा गया है। जो ASI (Archaeological Survey of India) द्वारा लागू किया गया है।
प्रवेश शुल्क (विदेशी): किले में विदेशी पर्यटकों के लिए। जैसलमेर किले का प्रवेश शुल्क ₹250 से ₹300 तक रखा गया है। जो कि काफी किफायती है।
जैन मंदिर प्रवेश शुल्क: जैन मंदिरों में भारतीय पर्यटकों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है। जबकि विदेशी सैलानियों के लिए ₹50 का शुल्क रखा गया है।
कैमरा ओर वीडियो शुल्क: किले के संग्रहालय में कैमरा साथ ले जाने पर। अलग से ₹50 से ₹100 का शुल्क लिया जाता है। और वीडियो कैमरे अन्दर लेकर जाने के लिए। अलग से ₹100 का शुल्क देना पड़ता है।
सबसे अच्छा समय (अक्टूबर से मार्च): सर्दियों का मौसम जैसलमेर किले की यात्रा के लिए। सबसे अच्छा माना जाता है। क्योंकि इस समय तापमान 10°C से 25°C के बीच रहता है।
फरवरी में डेजर्ट फेस्टिवल: फरवरी में जैसलमेर का मरू महोत्सव (Desert Festival) मनाया जाता है। जिसमें ऊंट दौड़, लोक संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं।
गर्मियों में सावधानी: मई-जून में तापमान 48°C तक पहुंच जाता है। इसलिए इस समय यहां की यात्रा करने से बचना चाहिए।
भोजन और ठहरने की व्यवस्थाएं
दुर्ग में लगभग 30 होटल, 25 रेस्टोरेंट और 50-60 दुकानें बनी हुई हैं।
ओर इनमें खाने-पीने और रुकने की व्यवस्था बेहद दिलचस्प और अनोखी मानी जाती है। क्योंकि किले के अंदर रहकर यात्रा का अनुभव बिल्कुल अलग होता है।
किले के भीतर होटल और हवेलियां: जैसलमेर किले के अंदर ही। कई जगहों को पुरानी हवेलियों को हेरिटेज होटलों में बदला गया है। जहां अब पर्यटक आसानी से रुक सकते है।
बजट गेस्टहाउस: किले के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर। ₹500 से ₹1500 प्रति रात की दर पर बजट गेस्ट हाउस में रूम आसानी से मिल जाते हैं।
लग्जरी हेरिटेज होटल: Suryagarh Palace और Fort Rajwada जैसे लग्जरी होटल भी किले के पास ही बने हुए हैं। जिसमें रहना भी पर्यटकों के लिए एक शानदार विकल्प माना जाता है।
छत पर भोजन (Rooftop Dining): किले की छतों पर बने रेस्तरां में बैठकर। रेगिस्तान का अद्भुत नजारा देखा जा सकता है। जो खासकर शाम के समय बहुत ही खूबसूरत लगता है।
राजस्थानी थाली: यहां की दाल बाटी चूरमा, केर सांगरी, और मिर्ची बड़ा जैसी राजस्थानी डिशें जरूर खानी चाहिए। क्योंकि यह राजस्थान के खास भोजन माने जाते है। जो यहां आए पर्यटकों के बीते पलों की याद दिलाते है।
स्ट्रीट फूड: किले के बाजार में कचौरी, समोसा और मिठाइयां बहुत ही सस्ती और स्वादिष्ट देखने को मिलती हैं। जो स्थानीय स्वाद का असली मजा भी देती हैं।
स्थानीय बाजार और पर्यटन खरीदारी वस्तुएं
जैसलमेर किले का बाजार, पर्यटकों के लिए एक खजाने से कम नहीं है। क्योंकि यहां राजस्थानी हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्तुएं बहुत सस्ते दाम पर मिल जाती हैं।
दशहरा चौक बाजार: दशहरा चौक में छोटी-छोटी दुकानों पर कांच जड़े वस्त्र, चादरें, फ्रेम और कई कलात्मक वस्तुएं आसानी से देखने को मिलती हैं।
पटवा हवेली बाजार: किले के निकट पटवा हवेली के आसपास बने बाजार में। राजस्थानी कपड़े, जूते और गहने बड़ी मात्रा में देखने को मिलते हैं।
बंधेज और लहरिया कपड़े: यहां की बंधेज और लहरिया साड़ियां और दुपट्टे विश्व प्रसिद्ध माने जाते हैं। ओर इन्हें खरीदना काफी पर्यटकों को अच्छा लगता है।
ऊंट की चमड़ी से बनी वस्तुएं: जैसलमेर में ऊंट के चमड़े से बने जूते (मोजड़ी), बैग और बेल्ट की भारी मांग रहती है। जो यहां की खास पहचान मानी जाती है।
पीतल और लकड़ी की कलाकृतियां: किले के बाजार में आपको पीतल के बर्तन, मूर्तियां और लकड़ी पर की गई नक्काशी की वस्तुएं। बहुत ही खूबसूरत देखने को मिलेगी।
हाथ की कढ़ाई वाले उत्पाद: यहां की हाथ से बनाई गई वस्तुएं। जिनमें रजाइयां, कढ़ाई वाले कुशन कवर और बेडशीट घर की सजावट के लिए। बहुत ही अच्छे माने जाते हैं। क्योंकि यह हर जगह नहीं मिलते।
मोल-भाव जरूरी: किले के बाजार में मोल-भाव करना आम बात मानी जाती है। इसलिए दुकानदार के पहले बताए दाम पर। सामान खरीदने से हमे बचना चाहिए।
स्थानीय जानकारी और पर्यटन सुझाव
किले के भीतर यातायात प्रतिबंध: किले के अंदर वाहनों को ले जाना शक्त मना है।
और गोपाचौक पार्किंग से ऑटो-रिक्शा ₹100 या टुक-टुक ₹50 प्रति व्यक्ति में ढाई तुला गेट तक छोड़ देता है। जहां से आगे के लिए 8-10 मिनट की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।
स्थानीय परिवहन: किले के अंदर और बाहर ऑटो रिक्शा, ई-रिक्शा और साइकिल रिक्शा आसानी से देखने को मिलते हैं। जो सस्ते और सुविधाजनक होते हैं।
ऊंट सफारी का अनुभव: किले के पास आपको सम सैंड ड्यून्स पर ऊंट की सफारी का मजा जरूर लेना चाहिए। जो ₹300 से ₹1000 प्रति व्यक्ति में ऊंट की सवारी कराते है।
सूर्यास्त का नजारा: किले की ऊंची छोटी से सूर्यास्त को देखने का। एक आनंद मिलता है। इसलिए पर्यटक को शाम 5 बजे से पहले किले की ऊंचाई पर पहुंचना जरूरी है।
पानी साथ रखें: थार रेगिस्तान में गर्मी अचानक बढ़ जाती है। तो यात्रा में पर्यटकों को पर्याप्त पानी और सनस्क्रीन साथ रखना बहुत ही जरूरी है।
जैन मंदिरों के नियम: जैन मंदिरों में प्रवेश करते समय। पर्यटकों को शालीन वस्त्र पहनना और चमड़े की वस्तुएं साथ न लाने की मनाही है। साथ ही पूजा के समय का भी पूरा सम्मान करना जरूरी होता है।
स्थानीय संस्कृति का सम्मान: किले के अंदर बने जैन मंदिरों में जाते समय जूते उतारना और शांत रहना बहुत जरूरी है। क्योंकि यह एक पवित्र धार्मिक स्थल भी है। इसीलिए पर्यटक को इसका सम्मान करना चाहिए।
डिजिटल भुगतान: किले के ज्यादातर दुकानदार, अब UPI और डिजिटल पेमेंट करना स्वीकार करते हैं। लेकिन थोड़े पैसे साथ रखना फिर भी अच्छा रहेगा।
यात्रा मार्ग
जैसलमेर किले की यात्रा करना। अब पहले से ज्यादा काफी आसान हो गया है। क्योंकि यहां की सड़कों में काफी बदलाव देखने को मिला है।
सड़क मार्ग
जैसलमेर किले तक सड़क मार्ग से पहुँचना पर्यटक के लिए सबसे अच्छा और सस्ता विकल्प माना जाता है।
क्योंकि यह आज राजस्थान के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। ओर NH-11 और NH-125 राष्ट्रीय सड़के जैसलमेर की सड़क। जोधपुर, बीकानेर और बाड़मेर की सड़कों से सीधी जुड़ी हुई हैं।
जोधपुर से जैसलमेर: जोधपुर से जैसलमेर लगभग 285 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जहां NH-125 के द्वारा। बस या कार के तहत लगभग 5 से 6 घंटों में पहुंचा जा सकता हैं।
जयपुर से जैसलमेर: जयपुर से जैसलमेर की दूरी लगभग 570 किलोमीटर है। जहां जैसलमेर पहुंचने में। लगभग 10 से 11 घंटों का सफर तय करना पड़ता है।
राजस्थान रोडवेज बस: राजस्थान राज्य की सड़क परिवहन निगम (RSRTC) की बसें। हमेशा जोधपुर, जयपुर और बीकानेर के लिए। हर वक्त चलती रहती हैं।
बस का किराया: साधारण बसों का किराया लगभग ₹200 से ₹400 के बीच हो सकता हैं। लेकिन वोल्वो ओर एसी बस में ₹600 से ₹1200 तक का किराया भी लग सकता है।
प्राइवेट बस सेवा: कई प्राईवेट बसे ऑपरेटर रात के समय में भी बसें चलाते हैं। जो जयपुर और जोधपुर से रात 9 बजे के आसपास रवाना होती हैं। हालांकि यह बसे पूरी रात भर जैसलमेर के लिए चलती रहती है।
किले तक पहुँच: जैसलमेर बस स्टैंड से किले की दूरी मात्र 2 से 3 किलोमीटर देखी गई है। जहाँ से ऑटोरिक्शा या टुक-टुक से। मात्र ₹30 से ₹50 तक के किराए में पहुँचा जा सकता है।
यात्रा सुझाव: सर्दियों में रात की बस लेना ज्यादा आरामदायक रहता है। क्योंकि दिन में गर्मी अधिक देखने को मिल सकती है।
रेलवे मार्ग
जैसलमेर का रेलवे स्टेशन किले से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जो इसे पर्यटकों के लिए बेहद सुविधाजनक बनाता है। जैसलमेर रेलवे स्टेशन (स्टेशन कोड: JSM) उत्तर पश्चिम रेलवे ज़ोन के अंतर्गत आता है।
दिल्ली से जैसलमेर: यदि दिल्ली से जैसलमेर आना हो। तो दिल्ली सराय से रोहिल्ला से “रानी कमलापति-जैसलमेर एक्सप्रेस” और “जैसलमेर एक्सप्रेस” दिल्ली से चलती हैं। जो लगभग 18 से 19 घंटे में पहुंचा देती हैं।
जोधपुर से जैसलमेर: यदि जोधपुर से जैसलमेर आना हो। तो जोधपुर-जैसलमेर एक्सप्रेस लगभग 5 से 6 घंटे में जैसलमेर पहुंचा देती है। जो सुबह रवाना होकर दोपहर तक आसानी से पहुंच जाती है।
जयपुर से जैसलमेर: जयपुर से जैसलमेर के लिए। जयपुर-जैसलमेर एक्सप्रेस उपलब्ध है। जिसमें लगभग 12 से 13 घंटे का सफर होता है।
ट्रेन किराया: वही ट्रेन के स्लीपर क्लास में ₹300 से ₹600, थर्ड AC में ₹800 से ₹1500 और सेकंड AC में ₹1200 से ₹2000 तक का किराया लगता है।
बुकिंग प्रक्रिया: IRCTC की वेबसाइट www.irctc.co.in पर जाकर या सीधे रेलवे काउंटर से 120 दिन पहले की। पर्यटक टिकट बुक कर सकते है।
पीक सीजन सलाह: दिसंबर-जनवरी में जैसलमेर मेले के दौरान। ट्रेनें अक्सर जल्दी भर जाती हैं। खासकर ज्यादा भीड़ के चलते। इसलिए पहले ही बुकिंग करना पर्यटक के लिए जरूरी साबित होगा।
स्टेशन से किले तक: रेलवे स्टेशन से पर्यटक को ऑटोरिक्शा, टैक्सी और ई-रिक्शा आसानी से देखने को मिल जाते हैं। जिनका किराया ₹40 से ₹100 के बीच रह सकता है।
रेलवे मार्ग उन परिवारों के लिए सबसे खास माना गया है। जो अपनी लंबी दूरी तय करके आते हैं। क्योंकि यह किफायती, सुरक्षित और आरामदायक भी होता है।
हवाई मार्ग
आज जैसलमेर में खुद का हवाई अड्डा बना हुआ है। और जैसलमेर हवाई अड्डा (IATA कोड: JSA) एक नागरिक और सैन्य संयुक्त हवाई अड्डा माना जाता है।
जो शहर से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ उड़ानों की संख्या कम हो सकती है। इसलिए पहले से ही बुकिंग करना फायदेमंद रहेगा।
दिल्ली से जैसलमेर फ्लाइट: IndiGo और Air India की सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं। जिनमें लगभग 1 घंटा 30 मिनट का समय लगता है।
जयपुर से जैसलमेर फ्लाइट: कनेक्टिंग फ्लाइट्स के माध्यम से भी पहुँचा जा सकता है। जो सीधे जोधपुर से होकर गुजराती हैं।
हवाई किराया: दिल्ली से जैसलमेर का किराया कम से कम। ₹2500 से ₹8000 के बीच रहता है। हालांकि यह सब बुकिंग समय और सीजन पर निर्भर करता है।
बुकिंग प्लेटफॉर्म: MakeMyTrip, Goibibo, Cleartrip या एयरलाइन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर भी। टिकट बुक की जा सकती है।
हवाई अड्डे से किले तक: यह लगभग 20 से 25 मिनट का रास्ता है। जहाँ प्रीपेड टैक्सी और ऐप-बेस्ड कैब (ओला/उबर) से ₹200 से ₹400 में पहुँचा जा सकता है।
उड़ान का समय: अधिकतर उड़ानें सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच और शाम 5 बजे से 8 बजे के बीच होती हैं।
सीजनल सुविधा: पर्यटन सीजन (अक्टूबर-मार्च) में उड़ानों की संख्या बढ़ जाती है। जबकि गर्मियों में कम हो जाती है।
हवाई मार्ग समय की बचत के लिहाज से सबसे अच्छा माना जाता है। खासकर उन कारोबारी यात्रियों और विदेशी पर्यटकों के लिए। एक आदर्श विकल्प बन जाता है। जिनके पास लगभग सीमित समय होता है।
खुद की वाहन, कार
निजी वाहन से यात्रा करना। सबसे स्वतंत्र और लचीला अनुभव देता है। जिसमें रुकने, घूमने और फोटो लेने की पूरी आजादी रहती है।
जैसलमेर की सड़कें अच्छी तरह से बनी हुई हैं। हालांकि किले के अंदर वाहन ले जाना शक्त मना है।
पार्किंग व्यवस्था: किले के मुख्य द्वार के पास पर्यटक पार्किंग बना हुआ है। जहाँ कार के लिए ₹20 से ₹50 और दोपहिया वाहन के लिए ₹10 का छोटा सा शुल्क लिया जाता है।
किले के अंदर प्रवेश: निजी वाहनों का किले के अंदर प्रवेश करना बिल्कुल मना है। इसलिए पर्यटकों को पार्किंग में गाड़ी छोड़कर पैदल या ई-रिक्शा से जाना होता है।
जोधपुर से रोड ट्रिप: जोधपुर से निजी कार द्वारा। NH-125 पर लगभग 4 से 5 घंटे में पहुँचा जा सकता है। जो एक यादगार रोड ट्रिप अनुभव देता है।
ऑनलाइन कैब सेवा: जैसलमेर में ओला और उबर की सीमित सेवाएं देखने को मिलती है। इसलिए स्थानीय टैक्सी बुकिंग करना। ज्यादा बेहतरीन रहता है।
किराये की कार: जैसलमेर में कई स्थानीय एजेंसियां मौजूद हैं। जहां ₹1500 से ₹3000 प्रतिदिन की दर पर कार किराये पर ली जा सकती हैं।
जीप सफारी: किले के आसपास की रेत के धोरों तक पहुँचने के लिए। 4×4 जीप उपलब्ध होती हैं। जिनका किराया ₹800 से ₹1500 प्रति व्यक्ति होता है।
सड़क की स्थिति: जैसलमेर तक राजमार्ग की स्थिति अच्छी मानी जाती है। किंतु मानसून के दौरान कुछ स्थानों पर सड़क खराब हो सकती है।
परिवार के साथ या दोस्तों के साथ। समूह में अपनी खुद की कार से यात्रा करने से एक अलग ही मजा आता है। क्योंकि इसमें रास्ते में पड़ने वाले। खूबसूरत रेगिस्तानी दृश्यों का आनंद भी पर्यटक ले सकते है।
जैसलमेर किले पर निष्कर्ष

जैसलमेर किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत ही नहीं मानी जाती हैं। बल्कि यह राजस्थान की आत्मा भी मानी जाती है।
क्योंकि जैसलमेर का सोनार किला, जिसे “गोल्डन फोर्ट” के नाम से भी जाना जाता हैं। आज भी एक जीवित किला (Living Fort) की तरह है। जिसमें आज भी हजारों लोग निवास करते हैं।
स्थापना वर्ष: इस किले की पहली नींव सन् 1156 ई. में राजपूत शासक रावल जैसल ने रखी थी। ओर इसे त्रिकूट पहाड़ी पर बनाया गया था।
UNESCO मान्यता: जैसलमेर किले को वर्ष 2013 में UNESCO ने। इसे World Heritage Site में घोषित किया था। जो इसकी वैश्विक अहमियत को दर्शाता है।
वास्तुकला की विशेषता: पीले बलुआ पत्थर (Yellow Sandstone) से बनी हुई। इसकी दीवारें सूर्यास्त के वक्त सोने की तरह चमकती हैं। जो आने वाले पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
सांस्कृतिक महत्व: यहां की हवेलियां, जैन मंदिर और लोक कलाएं राजस्थानी संस्कृति की खास पहचान मानी जाती हैं। जो सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखी हुई हैं।
पर्यटन का केंद्र: प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक। इस किले को देखने के लिए आते हैं। जो आज भी राजस्थान की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है।
जैसलमेर किला केवल इतिहास का एक अध्याय ही नहीं माना जाता हैं। बल्कि यह भारतीय गौरव और राजपूत शौर्य का जीवंत प्रतीक भी है।
क्योंकि इसकी प्राचीर पर खड़े होकर देखने से। थार मरुस्थल का विहंगम दृश्य देखन को हमे मिलता है। अगर कोई राजस्थान की असली पहचान जानना चाहता है। तो उसके लिए जैसलमेर किले की यात्रा करना बहुत ही जरूरी है।
15 अक्सर पूछे जानें वाले प्रश्न
Q.1 जैसलमेर किला कहाँ पर स्थित है?
उत्तर: जैसलमेर किला आज भारत के वर्तमान राजस्थान राज्य के जैसलमेर ज़िले में स्थित है। यह थार मरुस्थल के बीच में बना हुआ है। आज भी यह किला अपनी खूबसूरती से प्राकृतिक सौंदर्य में समाहित है।
Q.2 जैसलमेर किले का निर्माण कब और किसने करवाया था?
उत्तर: इस किले की पहली नींव रखने का काम। ओर इसका पहला निर्माण कार्य 1156 ईस्वी में भाटी राजपूत राजा रावल जैसल ने करवाया था।
Q.3 जैसलमेर किले को “सोनार किला” क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि यह किला जैसलमेर के आसपास के पीले बलुआ पत्थरों से बना हुआ है।
ओर यह पत्थर हमेशा सूर्य की रोशनी में सोने की तरह चमकता रहता हैं। इसलिए इसे “सोनार किला” या “स्वर्ण किला” भी कहा जाता है।
Q.4 जैसलमेर किला किस शैली में बना हुआ है?
उत्तर: इस किले में जैन स्थापत्य, राजस्थानी और राजपूत स्थापत्य शैली का इस्तेमाल किया गया है।
जहां इसमें बुर्ज, महल, जैन मंदिर और संकरे गलियारे एकसाथ देखने को मिलते है। यहां की वास्तुकला की बारीकी हमे हैरान कर देती है।
Q.5 क्या जैसलमेर किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल माना गया है?
उत्तर: हाँ, यह किला 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर (Whc.Unesco) की सूची में शामिल किया गया था।
Q.6 जैसलमेर किले के अंदर क्या देखने योग्य है?
उत्तर: संग्रहालय, रानी महल, बाजार, राजमहल, जैन मंदिर समूह, तोपख़ाना, गुप्त जलभंडार, हवेलियाँ और वहाँ आज भी रहने वाले लोग हमे देखने को मिल जाएंगे।
Q.7 क्या जैसलमेर का किला एक ‘जीवित किला’ है?
उत्तर: हाँ, यह विश्व के चुनिंदा ‘लिविंग फोर्ट्स’ में से एक माना जाता है। क्योंकि यहाँ आज भी।
किले में रहने वाले लोगों की संख्या करीब 3000 के आसपास मानी जाती हैं। इसीलिए यह किला आज भी जीवन से भरा हुआ है।
Q.8 क्या किले में प्रवेश करने के लिए टिकट लेना पड़ता है?
उत्तर: हाँ, भारतीय पर्यटकों के लिए ₹150 और विदेशी पर्यटकों के लिए ₹500 तक का शुल्क हो सकता है।
खासकर (2025 दरों के अनुसार)। कैमरा शुल्क भी अलग से लिया जाता है।
Q.9 जैसलमेर किले तक कैसे पहुँचा जा सकता है?
उत्तर: यहाँ रेल, सड़क और सीज़नल फ्लाइट्स द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
अंतिम मील के लिए ऑटो या टुकटुक की सुविधा मौजूद है।
Q.10 जैसलमेर किले में घूमने कब जाएं?
उत्तर: अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे माना जाता है। क्योंकि गर्मियों में तापमान 45°C तक पहुँच सकता है।
Q.11 क्या जैसलमेर किले में रुकने की सुविधा है?
उत्तर: जैसलमेर किले के अंदर ही कुछ हवेलियाँ और हेरिटेज होटल बने हुए हैं। लेकिन किले के बाहर ओर शहर में भी कई अधिक सुविधाजनक होटलें बनी हुई हैं।
Q.12 क्या जैसलमेर किले में गाइड सेवा उपलब्ध है?
उत्तर: हाँ, किले के आसपास के गाइड या ऑडियो गाइड की सुविधा उपलब्ध है।
Q.13 क्या यहाँ फोटोग्राफी की अनुमति है?
उत्तर: बाहरी हिस्सों में फोटो लेने की खुली छूट है। लेकिन जैन मंदिरों में कैमरा शुल्क और कुछ पाबंदियाँ होती हैं।
Q.14 जैसलमेर किला किस युद्ध से प्रसिद्ध है?
उत्तर: जैसलमेर का किला कई बार मुगलों और दिल्ली सल्तनत के हमलों का सामना कर चुका है।
विशेष रूप से अलाउद्दीन खिलजी और तैमूर के समय यह प्रसिद्ध रहा।
Q.15 क्या किले में प्रवेश के समय कोई धार्मिक या सांस्कृतिक नियम हैं?
उत्तर: जैन मंदिरों में प्रवेश के लिए शालीन वस्त्र पहनना और चमड़े की वस्तुएँ ना लाना ज़रूरी है। पूजा समय का भी सम्मान करना होता है। मैंने इन नियमों का पालन किया और वहाँ की संस्कृति का आदर किया।
