दिलवाड़ा जैन मंदिर के इतिहास का परिचय | Dilwara Jain Temple History
दिलवाड़ा जैन मंदिर जो राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू में स्थित है। जिसका मूल नाम अर्बुदाचल है। जिसे राजस्थान का कश्मीर ओर ताजमहल भी कहा जाता है। वही माउंट आबू से दिलवाड़ा जैन मंदिर की दूरी मात्र ढाई किलोमीटर है।
जहां यह मंदिर भगवान् आदिनाथ तीर्थंकर को समर्पित है। जो मुख्य रूप से यहां आए श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। जहां प्रतिदिन हजारों, लाखों की तादाद में पर्यटक भगवान आदिनाथ तीर्थंकर के दर्शन करने को आते है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर जिसे पांच मंदिरों का समूह भी कहा जाता है। यह शानदार मंदिर जैम धर्म के तीर्थंकरो को समर्पित है। यहां जैन धर्म के कई तीर्थंकर है। जिनमें आदिनाथ जी, नेमीनाथ जी, पार्श्वनाथ जी ओर महावीर नाथ जी मूर्तियां स्थापित है।
मंदिर मुख्य रूप से अपनी अपनी अद्भुत वास्तुकला, जटिल नक्काशी और रहस्यमई विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर का भूगोल
स्थान और ऊँचाई
दिलवाड़ा के जैन मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले में माउंट आबू पर हैं, जो अरावली पर्वतमाला में है। ये मंदिर समुद्र तल से करीब 1,220 मीटर (4,000 फीट) ऊँचाई पर हैं, जिससे यहाँ ठंडी जलवायु है।
इसके भौगोलिक निर्देशांक 24° 36′ 33.50″ उत्तर और 72° 43′ 23.00″ पूर्व हैं।
माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है, जहाँ रेगिस्तान के बीच हरी-भरी पहाड़ियाँ हैं। आसपास की पहाड़ियाँ मंदिरों को खास माहौल देती हैं, और गुरु शिखर यहाँ की सबसे ऊँची चोटी है।
जलवायु और मौसम
माउंट आबू की जलवायु समशीतोष्ण है, गर्मियों में तापमान 20-30°C और सर्दियों में 5-15°C रहता है। नवंबर से मार्च यहाँ आने का सबसे अच्छा समय है, जब मौसम सुहावना होता है। मानसून में भारी बारिश होती है, जो वनस्पति को हरा-भरा बनाती है।
निकटतम स्थल
दिलवाड़ा के जैन मंदिर के आसपास नक्की झील (मानव-निर्मित, 11,000 वर्ग मीटर), माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य (तेंदुआ, भालू, हिरण), और अचलगढ़ किला (8 किलोमीटर दूर) प्रमुख आकर्षण हैं। संगमरमर अम्बाजी (गुजरात) से लाया गया है।
पर्यावरणीय महत्व
मंदिर अरावली की जैव-विविधता वाले क्षेत्र में हैं, जहाँ वन्यजीव अभयारण्य प्राचीन वनस्पतियों की रक्षा करता है। ऊँचाई के कारण यहाँ की हवा शुद्ध और ठंडी है, जो ध्यान के लिए उपयुक्त है। यह स्थल पर्यटन, तीर्थयात्रा और प्रकृति प्रेमियों का केंद्र है.
दिलवाड़ा जैन मंदिर का निर्माण एवं वास्तुशिल्प
दिलवाड़ा जैन मंदिर को बनाने से पहले यह क्षेत्र पूरी तरह से जंगलों में तब्दील था। जो पूरी तरह से अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियों में स्थित है। दिलवाड़ा जैन मंदिरों का निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच माना जाता है।
दिलवाड़ा के जैन मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण। सोलंकी शासकों द्वारा करवाया गया था। वही गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलशाह ने इन मंदिरों को बनवाया। विमलशाह जो सोलंकी राजवंश के अधीन आया करते थे।
सोलंकी राजाओं ने 11वीं ओर 13वीं शताब्दी के दौरान। इस जगह पर कब्जा स्थापित किया था।
कहा जाता है उस वक्त लगभ 50 लाख रुपए देकर। इस जगह को खरीदा था। इसके अलावा विमलशाह को कट्टर जैन माना जाता है। जिन्होंने जैन तीर्थंकरों को सम्मान देने। ओर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए। इन मंदिरों को बनवाया था।
हालांकि विमलशाह चाहते थे। की जैनियों के लिए ध्यान लगाने। ओर उनके अनुष्ठान करने के लिए। एक अच्छी जगह होनी चाहिए। जिसके पश्चात उनके द्वारा दिलवाड़ा जैन मंदिर को बनवाना शुरू किया गया। इन मंदिरों को बनवाने के लिए।
उन्होंने अरावली पर्वतमाला की निकटम पहाड़ी माउंट आबू पर्वत को चुना। जहां का शांत वातावरण ओर ध्यान लगाने के लिए एक खूबसूरत जगह साबित हुई। इसके बाद…
इस मंदिर की निर्माण प्रक्रिया में गुजरात के वडनगर से इंजिनियर को बुलाए गए थे। वही इस मंदिर को बनाने में लगभग 500 राजमिस्त्री ओर लगभग 1200 मजदूरों ने 14 साल में बनाया था। जहां मजदूरों को उनकी सैलरी के रूप में।
सोना और चांदी दिया जाता था। वही इसको बनाने वाला प्रत्येक मजदूर करोड़पति हो चुका था।
मजदूरों को दिन की छुट्टी में 2 घंटे तक का समय दिया जाता। परंतु वह आधे घंटे का ही समय बिताते थे। बचा हुआ शेष 1:30 घंटे का उपयोग उन्होंने दिलवाड़ा के जैन मंदिर के निर्माण कार्य में लगाया। जो जैन वास्तुकला का अद्भुत नमूना है।
वही दूसरी ओर यहां पर काम करने वाले मजदूर। जिनमें वह छेनी ओर हथौड़े की सहायता से जो डिजाइन तैयार करते। उन डिजाइन को बनाने में जो शेष चुना बचता। उस शेष बचे चुने के तोल के बराबर उन्हें वेतन में सोना चांदी दिया जाता।
कहा जाता है इस मंदिर के निर्माण में लगभग 18 करोड़ 53 लाख रुपए का खर्चा आया था। जहां विशाल संगमरमर के पत्थरों को ठीक निकट की अरासुरी पहाड़ी से। हाथी की सहायता से लाया गया था।
दिलवाड़ा जैन मंदिर की वास्तुकला दिखनी में इतनी आकर्षक है। जो प्रतिदिन आए पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां के मंदिरों की भव्यता यहां के वास्तुकारों की भवन निर्माण में निपूर्णता.
ओर उनकी सूक्ष्मपेठ तथा छेनी पर उनके असाधारण अधिकार का परिचय देती है। वही यहां की प्रमुख विशेषता यह भी है। की यहां की सभी छतों द्वारा तोरण मंडपों का उत्कृष्ट शिल्प एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न है।
यहां के प्रमुख 5 मंदिरों के समूह में। 2 विशाल मंदिर है। ओर शेष 3 उनके अनुपूरक है। वही इन मंदिरों की प्रकोष्ठों की छतों की गुंबद वह स्थान स्थान पर उकेरी गई सरस्वती, अंबिका, लक्ष्मी, सर्वेरी, पद्मावती, शीतला आदि देवियों की।
दर्शनीय प्रतिमाएं आदि। यहां के शिल्पकारों की छेनी की निपूर्णता के साक्ष्य वह स्वयं ही प्रस्तुत करते है। यहां के सभी मंदिरों को शैली अलग अलग रूप में प्रस्तुत है। यहां का मुख्य मंदिर और अनेकों मंदिर नागर शैली में निर्मित है.
दिलवाड़ा जैन मंदिर की उत्कीर्ण मूर्तियों ओर कलाकृतियों में शायद ही ऐसा कोई अंश हो। जहां कलात्मक पूर्णता के दर्शन न होते हो। शिलालेखो ओर ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक। प्राचीन काल में यह स्थल आबू नागा जनजाति का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
दिलवाड़ा के जैन मंदिर में प्राचीन राजस्थानी वास्तुकला का एक उत्कृष्ठ उदाहरण है। सभी मंदिरों में लगभग 48 स्तंभ है। जिनमें विभिन्न नृत्य करती महिलाओं की सुंदर मूर्तियां उकेरी गई है।
वही मंदिर का मुख्य आकर्षण “रंगा मंडप” है। जो गुंबद की आकार का छत है। इनकी छतों के बीच में घूमर की तरह ढांचा है। ओर पत्थरों से बनी “विद्या देवी” की 16 मूर्तियां स्थापित है। जीने ज्ञान की देवी कहा जाता है।
वही नक्काशी की विभिन्न डिजाइनों में कमल देवता अमूर्त पराक्रम्श शामिल है। दिलवाड़ा जैन मंदिरों में 5 समान रूप से मंदिर बने हुए है। जिनके नाम विमलशाही मंदिर, लूना वसाही, पित्तलह, पार्श्वनाथ ओर महावीर स्वामी मंदिर है।
यह सभी मंदिर क्रमशः भगवान् आदिनाथ, भगवान् ऋषभ भू, भगवान नेमीनाथ, भगवान महावीर स्वामी ओर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है।
दिलवाड़ा के जैन मंदिर जिनमें 1 मंडप, गर्भगृह, 1 केंद्रीय कक्ष ओर अंतरतम गर्भगृह जहां भगवान का निवास माना जाता है। यहां के मंदिरों में नवचौकी है। जो सजावटी वाली छतों का एक समूह है। कुछ अन्य संरचनाओं में कीर्ति स्तंभ, हस्तक्षेप शिला भी है।
जो अपने जैन मूल्यों ओर सिद्धांतों को दर्शाते है। यहां के मंदिरों में सबसे ज्यादा प्राचीन मंदिर विमलशाही मंदिर को माना जाता है। वही इन मंदिरों की अद्भुत कारीगरी देखने योग्य है।
वही यह अपने ऐतिहासिक महत्व ओर संगमरमर पत्थर पर बारीक नक्काशी की जादूगरी के लिए। पहचाने जाने वाले राज्य सिरोही जिले के। अन्य विश्वविख्यात मंदिरों में शिल्प सौंदर्य जैसा बेजोड़ खजाना है। जैसा दुनिया में ओर कही नहीं आएदेखने को मिलेगा।
जैन मंदिर दिलवाड़ा में तीर्थंकरों के अलावा भी। कई हिन्दू देवी·देवताओं की मूर्ति भी स्थापित है। वही मंदिर का सबसे उत्कृष्ट कला का भाग इसका कला पंडप है।
रंग मंडप जो छोटा है। लेकिन इसकी छत पर बारीक गोलाकार नक्काशी है। छत के मध्य में सुसज्जित घूमर लगा हुआ है। जिसके नीचे 72 तीर्थंकरों की। गोलाकार परिधि में छवियां बनी हुई है।
इसके अलावा जैन भिक्षुओं की 360 छोटी छवियां भी है। वही हस्तक्षाल में सफेद संगमरमर को तराशकर बनाई गई हाथियों की मूर्तियां है। जिनके ठीक पीछे की ओर मंदिर निर्माताओं ओर उनके परिवार के सदस्यों की छवियां भी दिलवाड़ा जैन मंदिर में बनी हुई है।
इनके अलावा भी मंदिर में विसर्जित आले है। जिनमें देवरानी और जेठानी की छवियां हमे देखने को मितली है। जो वस्तुपाल ओर तेजपाल की पत्नियां है।
16वीं शताब्दी में निर्मित मंदिर
16 वीं ओर 17वीं शताब्दी के बीच। एक छोटा मंदिर बनवाया गया था। जो 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को समर्पित है।
वही 18वीं शताब्दी के बीच। सिरोही के कलाकारों ने मंदिर की चित्रकारी की थी। हालांकि यह विमलशाही और लूना वसाही की तरह भव्य नहीं है। लेकिन इस मंदिर में रूपांकनो ओर पशुओं की सुंदर तथा बारीक नक्काशी जरूर है।
दिलवाड़ा मंदिर के रहस्य ओर चमत्कार
जैन मंदिर दिलवाड़ा जो अपनी रहस्यमयी विशेषताओं ओर चमत्कारों के लिए भी जाना जाता है। जिनमें यहां के कुछ रहस्य ओर चमत्कार निम्नलिखित है।
अविश्वसनीय संगमरमर नक्काशी
इस मंदिर में हमे संगमरमर के पत्थरों पर की गई जटिल नक्काशी। इतनी सूक्ष्म और सुंदर है कि उकेरी गई जालियां पारदर्शी दिखाई देती हैं। संगमरमर के पत्थरों को इतनी बारीकी से तराशा गया था। की वह आज भी रेशम के कपड़ों की तरह मुलायम ओर चमकदार दिखते है।
दिलवाड़ा जैन मंदिरों के खंभों पर इतनी बारीकी से आकृतियां उकेरी गई थीं कि। जिनमें देखा जाए तो कपड़ो की सिलवटें भी नजर आती है।
पत्थरों का हल्कापन
मंदिर के गुंबदों पर मौजूदा पत्थर। जिनकी दिखावटी बेहद भारी है। हालांकि जब उन्हें स्पर्श किया जाता है। तो वह अपेक्षाकृत हल्के प्रतीत होते है। कहा जाता है यह रहस्य भी शोध का महत्वपूर्ण विषय है।
समितिय वास्तुकला
दिलवाड़ा जैन मंदिर जहां मंदिर के सभी मुख्य भागों को। इस प्रकार से किया गया था। की सूर्य की रोशनी हर एक कोने में आसानी से पहुंच सके। उस समय बिना किसी आधुनिक मशीनरी के मंदिर को इतनी सटीकता से बनाया गया था।
की यदि वर्तमान के इंजीनियर इसे देखे। तो उनके लिए एक चमत्कार साबित होगा।
गुप्त सुरंगों ओर मार्गों का रहस्य
यहां के बारे में। यह भी कहा जाता है। दिलवाड़ा के जैन मंदिर के अंदरूनी हिस्सों में कई महत्वपूर्ण गुप्त सुरंगे ओर मार्ग छिपे हुए है। जिनका उपयोग प्राचीन काल में आपातकालीन स्थिति में किया जाता था।
मंदिर के निर्माण का अद्भुत रहस्य
यहां की मान्यता के मुताबिक। मंदिर का निर्माण कार्य केवल 14वीं शताब्दी में माना जाता हैं। हालांकि इसमें प्रयुक्त शिल्पकला इतनी उन्नत है। की इसकी तुलना हजारों वर्ष पुरानी कला से की जा सकती हैं।
चमत्कारी ऊर्जा
दिलवाड़ा जैन मंदिरों में जब श्रद्धालु तथा भक्तगण प्रवेश करते है। तब उन्हें शांति एवं सकारात्मक ऊर्जा का महसूस ( अनुभव ) होता है। कहा जाता है कि यहां की ऊर्जा विशेष रूप से। आध्यात्मिक साधना के लिए काफी महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर के प्रमुख स्थल
दिलवाड़ा जैन मंदिर ( मंदिर परिसर )
दिलवाड़ा जैन मंदिर की मुख्य प्रतिमा को। 16वीं शताब्दी में मूल मूर्ति की जगह स्थापित किया गया था। जिसका कुल वजन राजस्थानी में 108 मण के बराबर है। जो दो मंत्रियों सुंदर तथा गद्दा की निगरानी में। देव नामक शिल्पी में बनाई गई थी।
दिलवाड़ा के जैन मंदिर की मूर्तियों में कई प्रकार के सोने ओर हीरे जेवरात हमे देखने को मिलते है। वही मंदिर परिसर में आदिनाथ तीर्थंकर भगवान की मुख्य मूर्ति की आंखों में। असली हीरे की बनी हुई है।
ओर गले में बहुमूल्य रत्नों का हार है। जहां बाहर से देखने पर। साधारण सा प्रतीत होता है। यह मंदिर तीर्थंकर आदिनाथ के पीतल की मूर्ति की वजह से। पीतल हार के नाम से जाना जाता है।
दूसरी ओर फूल·पत्तियों ओर अन्य मोहक डिजाइनों से अलंकृत नक्काशीदार छतें, पशु·पक्षियों की शानदार संगमरमरीय आकृतियां, सफेद संगमरमर पर बारीकी से उकेर कर बनाई गई सुंदर बेले, जालीदार नक्काशी से सजे धजे तोरण।
ओर इन सभी से बढ़कर जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं। विमलशाही मंदिर के अष्ट कोणीय कक्ष में स्थित है। यह मंदिर शेष 2 मंदिरों की तरह। अलंकृत तो नहीं है। लेकिन फिर भी इसमें जैन तीर्थंकरों ओर देवी देवताओं की छवियां बनी हुई है।
विमलशाही मंदिर
विमलशाही मंदिर जो दिलवाड़ा जैन मंदिर का प्रसिद्ध मंदिर माना जाता है। यह मंदिर भगवान् ऋषभ देव को समर्पित है। जहां विमलशाही मंदिर का निर्माण गुजरात के राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलशाह ने करवाया था।
विमलशाही का यह मंदिर काफी प्राचीन माना जाता है। जिसका निर्माण कार्य सन् 1031 ईस्वी में हुआ था। जो दिलवाड़ा जैन मंदिरों में सबसे बड़ा ओर मुख्य मंदिर है। जिसके वास्तुकार कीर्तिधर को माना जाता है।
इसके अलावा भी इसका पुनः निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच माना जाता है। विमल शाही इस मंदिर का निर्माण जैन साधु·संतो ओर तपस्वियों के लिए। एक शांतिपूर्ण साधना स्थल के रूप में उसका निर्माण करवाया गया था।
लूना वसाही मंदिर
लूना वसाही मंदिर, जो दिलवाड़ा के जैन मंदिर का प्रसिद्ध मंदिर माना जाता हैं। इस मंदिर में भगवान् आदिनाथ ओर शांतिनाथ की प्रतिमा स्थापित है। यह 11वीं ओर 13वीं शताब्दी के बीच।
चालुक्य राजाओं वस्तुपाल और तेजपाल 2 भाइयों द्वारा सन् 1231 ईस्वी में। लूना वसाही मंदिर का निर्माण करवाया गया था। तथा इन दोनों भाइयों की देखरेख में ही। मंदिर का निर्माण पूर्ण रूप से हुआ था।
तथा इन दोनों भाइयों को महान् भवन निर्माता माना जाता है। कुशल प्रशासक होने के अलावा। उन्हें बहादुर योद्धा भी माना जाता हैं। कहा जाता है इन दोनों भाइयों ने। जन कल्याण पर बहुत धन खर्च किया था।
वही इन दोनों भाइयों की पत्नियों ने यहां पर हाथियों की विशाल मूर्तियां बनवाई थी। जिस कारण इसे देवरानी और जेठानी का मंदिर भी कहा जाता है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर के अंतर्गत। इस मंदिर का निर्माण तेजपाल की पत्नी अनुपमा देवी ओर उसके पुत्र लूणसिवा के आध्यात्मिक कल्याण के लिए करवाया गया था। हालांकि इस मंदिर की डिजाइन भी विमलशाही मंदिर की तरह ही है।
परंतु इसकी सजावट कई बेहतर है। जिसमें इस मंदिर का निर्माण भी। सफेद संगमरमर को तराशकर बनाया गया था। जहां मंदिर परिसर में लगभग देवी देवताओं की लगभग 360 प्रतिमाएं स्थापित है।
खरतर वासाही मंदिर
दिलवाड़ा के जैन मंदिरों के अंतर्गत। इस मंदिर का निर्माण लगभग 13वीं शताब्दी में हुआ था। कहा जाता है इसका निर्माण कार्य “मांडलिक” नामक राजा के शासनकाल में हुआ था।
वही इसका प्रमुख निर्माण जैन संत “खरतार गच्छ” के अनुयायियों द्वारा करवाया गया था। जिसके चलते इस मंदिर का नाम खरतर वासाही मंदिर पड़ा। यहां भगवान् पार्श्वनाथ की मूर्ति पद्मासन में स्थापित है। जो ध्यान साधना का प्रतीक मानी जाती है।
मुख्य रूप से यह मंदिर अपनी भव्यता ओर उत्कृष्ट नक्काशी के लिए जाना जाता हैं। जहां मंदिर के मुख्य भाग ( गर्भगृह ) में भगवान पार्श्वनाथ की भव्य प्रतिमा स्थापित है। वही पार्श्वनाथ मंदिर के चारों तरफ 14वीं शताब्दी में बनी।
सुन्दर चित्र ओर शिल्पकला हमे देखने को मिलती है। दिलवाड़ा जैन मंदिर के खंभों, दीवारों ओर छतों पर अत्यधिक सूक्ष्म और जटिल नक्काशी की गई है। इस मंदिर का सबसे आकर्षक हिस्सा। इसकी छत को माना जाता है।
जहां पर उकेरी गई। कमल पुष्प की आकृति देखके वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
महावीर स्वामी मंदिर
दिलवाड़ा मंदिर में। महावीर स्वामी मंदिर का निर्माण साल 1582 ईस्वी में करवाया गया था। जो यह मंदिर भगवान् महावीर स्वामी को समर्पित है। जहां मंदिर के गर्भगृह में भगवान महावीर स्वामी की एक काफी सुंदर पद्मासन मुद्रा में स्थापित मूर्ति है।
हालांकि यह मंदिर बाकी मंदिरों की तुलना में काफी छोटा मंदिर है। वही मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी बेहद खूबसूरत वह अद्भुत है। इस मंदिर का निर्माण कार्य व्यापारी परिवार के द्वारा माना जाता है।
जो भगवान महावीर के प्रति अपनी श्रद्धा और आस्था व्यक्त करना चाहते थे। जहां आज भी मंदिर को ध्यान ओर साधना का केंद्र माना जाता है। वही मंदिर की दीवारों पर 18वीं शताब्दी में बनाई गई। रंगीन चित्रकलाएं ( भित्तिचित्र ) इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है।
पीतलहर आदिश्वर मंदिर
दिलवाड़ा जैन मंदिर में। दिलवाड़ा का पीतलहर आदिश्वर मंदिर। यहां के प्रमुख जैन मंदिरों में एक है। जहां इस मंदिर का प्रमुख आकर्षण 8 फीट ऊंची ओर लगभग 4 टन वजनी भगवान आदिनाथ ( ऋषभदेव ) की विशाल मूर्ति है। जिसे पीतल ( ब्रास ) धातु से बनाया गया था।
वही पीतलहर मंदिर का नाम इसकी विशाल प्रतिम के स्वरूप में रखा गया था। क्योंकि यहां की मूल भाषा में पीतल का मतलब पीतल ( ब्रास ) होता है। वही मूर्ति की अद्भुत संरचना ओर इसका वजन। इसे भारत की सबसे बड़ी धातु निर्मित जैन मूर्तियों में से होने का संकेत देती है।
मूर्ति के निर्माण कार्य में धातु ढलाई ( Metal Casting ) कि अधिकांश उन्नत तकनीकी का इस्तेमाल किया गया था। जो उस कालखंड के सबसे होनहार कारीगरों की कला का उत्कृष्ठ उदाहरण है।
यह बात 15वीं शताब्दी के अंतर्गत की है। जब अहमद नगर के सुल्तान बेगड़ा के मंत्री “भामाशाह” के द्वारा। दिलवाड़ा जैन मंदिरों में “पीतलहर” मंदिर का निर्माण करवाया गया था। जो तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ( ऋषभदेव ) को समर्पित है। यह मंदिर दिलवाड़ा के प्रमुख 5 मंदिरों में से एक होने के किए प्रसिद्ध है। ओर विशेष विशेषताओं की वजह से जाना जाता है।
यह वही भामाशाह है। जिन्होंने मेवाड़ की संपूर्ण आजादी के लिए। अपनी पुरखों की संपति वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप को समर्पित कर दी थी।
इसके पश्चात् भामाशाह द्वारा बनाए जा रहे। कई मंदिरों का काम तो अधूरा ही रह गया। जिन्हें वर्तमान में भी देखा जा सकता है।
चौमुख मंदिर
दिलवाड़ा के जैन मंदिर जहां पर 15वीं शताब्दी के अंत में। 4 मंदिर का निर्माण हुआ। जो 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भगवान को समर्पित है। 3 मंजिला ओर 1 कघोरे वाला। चौमुख मंदिर को खरतार वसाही भी कहा जाता है।
यह मंदिर अन्य मंदिरों की तुलना में सबसे ऊंचा है। वही अन्य मंदिर संगमरमर से बने है। तो वहीं चौमुख मंदिर भूरे बलुआ पत्थर से बना हुआ है। अथवा मंदिर परिसर में मौजूद अधिकांश आकृतियां संघवी मंडालीक नामक व्यक्ति।
ओर उसके परिवार के सदस्यों ने दान की थी। तथा तीनों मंजिलों के गर्भगृह में चार मुख वाली आकृतियां ओर पैदा होने वाले तीर्थंकरों की माताओं के 14वें सपनो का चित्रण है। को इस मंदिर की विशेषताओं को दर्शाती है।
इसके अलावा मंदिर के बाहरी दीवारों पर। जैन देवी·देवताओं के चित्रण है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर के आरती की दिनचर्या
दिलवाड़ा जैन मंदिर में। प्रत्येक दिन नियमित वह विधिवत रूप से। जैन परंपराओं के मुताबिक पूजा अर्चना ओर आरती की जाती है। क्योंकि यह जैनों के पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। यहां की आरती ओर धार्मिक अनुष्ठान विशेष विधि·विधान के रूप में संपन्न होती है।
दिलवाड़ा जैन मंदिरों में आरती की प्रतिदिन दिनचर्या निम्नलिखित है…
प्रातः कालीन पूजा तथा आरती
- प्रतिदिन दिलवाड़ा जैन मंदिर का पट सुबह लगभग 6:00 बजे खुलता है।
- सर्वप्रथम यहां मंदिर सजावटी एवं स्वच्छता देखी जाती हैं
- इसके पश्चात् मुख्य प्रतिमाओं का अभिषेक ( स्नान ) करवाया जाता है। जिसे जलाभिषेक कहा जाता है।
- अभिषेक हो जाने के ठीक बाद। भगवान पार्श्वनाथ, आदिनाथ, महावीर स्वामी आदि की मुख्य मूर्तियों पर चंदन, केसर ओर पुष्प अर्पित किए जाते है।
- लगभग ठीक 8:00 बजे भव्य मंगल आरती का आयोजन किया जाता है। जिसमें भक्तगण भक्ति गीतों के साथ भगवान का गुणगान आदि करते है
दोपहर की पूजा
- दोपहर के समय दिलवाड़ा मंदिर में ध्यान साधना ओर धार्मिक प्रवचन आयोजित किया जाता है।
- इस समय अनेक भक्त विशेष रूप से स्वाध्याय ( धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन ) करते है।
संध्याकालीन आरती
- लगभग श्याम के समय ठीक 5:00 बजे Dilwara Ka Jain Mandir के अंतर्गत पुनः भगवान की पूजा पर संध्या आरती का आयोजन किया जाता है।
- वही इस आरती के अंतर्गत विशेष मंत्रोच्चार, दीप जलाना और भक्तों का भजन कीर्तन शामिल होता है।
रात्रिकालीन शयन आरती
वही Dilwara Ka Jain Mandir के पट बंद करने से पहले। भगवान् को शयन आरती समर्पित की जाती है। जिसके सौम्य स्वर में शांतिपूर्ण भजन ओर आरती गाई जाती है।
- रात्रिकालीन आरती के पश्चात्। मंदिर के द्वार लगभग 8:00 बजे बंद कर दिए जाते है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर का इतिहास
महाभारत के समय आबू पर्वत में। महर्षि वशिष्ठ के आगमन का उल्लेख हमे देखने को मिलता है।
इसी प्रकार जैन शिलालेखो के मुताबिक। जैन धर्म के संस्थापक भगवान् महावीर स्वामी ने जैन मंदिर दिलवाड़ा के निवासियों को उपदेश दिया था।
यह बात साल 1311 ईस्वी की है। जब अल्लाहु दीन खिलची के आक्रमण के चलते। मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। जिसके बाद मंदिर का पुनः निर्माण कराया गया था।
संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी
कहा जाता है भारत देश के प्रथम प्रधानमंत्री। पंडित जवाहर लाल नेहरू। तथा पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी यहां के दर्शन किए थे। इसके बाद देश के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ओर राजीव गांधी सहित।
अनेक सियासी अस्थियां इस दिलवाड़ा जैन मंदिर को देखने। तथा यहां के दर्शन करने के लिए पधारे थे।
प्राचीन ओर प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने। भारत के ताजमहल के बाद dilwara ka jain mandir की व्याख्या की थी। जिनके तहत इस मंदिर को राजस्थान का ताजमहल कहा गया था।
दिलवाड़ा जैन मंदिर के भ्रमण की जानकारी
सर्वोत्तम समय और टिप्स
अक्टूबर-मार्च सबसे अच्छा समय है, जब तापमान 10-25°C रहता है। गर्मियों में दोपहर में जाने से बचें। पानी की बोतल साथ रखें और आरामदायक जूते पहनें। दान-पत्रिका से मंदिर के संरक्षण में मदद करें। यह यात्रा आध्यात्मिक शांति और कला का अनुभव देती है।
दर्शन का समय और नियम
दिलवाड़ा जैन मंदिर में पर्यटकों के लिए दोपहर 12:00 से शाम 5:00-6:00 बजे तक खुला है, जबकि जैन श्रद्धालुओं को सुबह 6:00 से शाम 6:00 बजे तक जाने की अनुमति है। सोमवार को कुछ मंदिर बंद हो सकते हैं। प्रवेश निःशुल्क है, दान स्वैच्छिक है।
महिलाओं को विमल वसाही मंदिर के गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं है। शालीन वस्त्र पहनना जरूरी है: शॉर्ट्स और स्लीवलेस टॉप वर्जित हैं। मंदिर में मौन रखें, चमड़े के जूते उतारें, और खाना-पीना नहीं लाएँ। फोटोग्राफी मना है।
सुविधाएँ और सहायता
दिलवाड़ा जैन मंदिरों में व्हीलचेयर रैंप, पानी, शौचालय, और प्राथमिक सहायता किट हैं। निःशुल्क गाइड (हिंदी/अंग्रेजी) उपलब्ध है। 200+ वाहनों की पार्किंग है और सीसीटीवी सुरक्षा है। आसपास एटीएम और चाय स्टॉल हैं।
जैन धर्मावलंबियों के लिए धरमशाला (₹500-2000/रात) और शाकाहारी भोजन है। इमरजेंसी: 108। मौसम ऐप चेक करें (मानसून में फिसल)।
रहने-खाने की व्यवस्था
माउंट आबू में कई होटल हैं: बजट (₹1500-3000) से लेकर लक्ज़री (₹8000+) तक। जैन शाकाहारी भोजन आसानी से मिलता है। मंदिर के पास पार्किंग की सुविधा है।
भ्रमण की योजना
पूर्ण भ्रमण के लिए 1.5-2 घंटे लगते हैं। शुरुआत विमल वसाही से करें, फिर लून वसाही, पिथलिसाह, खरतर वसाही और महावीर वसाही जाएँ। मंदिर में निःशुल्क गाइड हैं जो नक्काशी की जानकारी देते हैं।
कम भीड़ के लिए दोपहर 12-2 बजे या सप्ताह के दिनों में जाएँ। बारिश में फिसलन से सावधान रहें। आसपास नक्की झील (1 किमी) या गुरु शिखर (15 किमी) जा सकते हैं।
आसपास की अन्य आकर्षण
माउंट आबू में नक्की झील (बोटिंग), सनसेट पॉइंट, और हनी हिल गार्डन हैं। अचलगढ़ किला (8 किमी) और माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य ट्रेकिंग के लिए अच्छे हैं। शाम को बाजार में स्थानीय हस्तशिल्प खरीदें।
माउंट आबू जैन मंदिर पहुंचने का यात्रा मार्ग
किराया अग्रिम बुक (IRCTC/RedBus/Ola)। पहाड़ी रास्ते पर सीट बेल्ट जरूर बाँधें।
| शहर | दूरी (किमी) | बस किराया (₹) | समय (घंटे) |
|---|---|---|---|
| उदयपुर | 160 | 300-600 | 3-4 |
| अहमदाबाद | 220 | 500-900 | 4-5 |
| जयपुर | 500 | 800-1500 | 9-10 |
| सिरोही | 85 | 100-200 | 1.5-2 |
स्थानीय परिवहन साधन
माउंट आबू बस स्टैंड से ऑटो-रिक्शा (₹50-100), ई-रिक्शा (₹30-50), टैक्सी (₹200-300) या साइकिल रिक्शा उपलब्ध हैं। फिट लोग पैदल (1 किमी, 30-45 मिनट) चल सकते हैं। जीप सफारी या लोकल बसें घुमावदार रास्तों पर चलती हैं।
मंदिर परिसर में निःशुल्क पार्किंग है (कार ₹20/घंटा)।
सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचने का तरीका
राष्ट्रीय राजमार्ग 62 (एनएच-62) से सिरोही (84.9 किमी) या उदयपुर (160 किमी), अहमदाबाद (220 किमी), जयपुर (500 किमी) से जुड़ता है। जीआरएसआरटीसी वॉल्वो/डीलक्स बसें (₹400-800 उदयपुर से) और प्राइवेट बसें हर दिन चलती हैं।
निजी कार से अरावली की घुमावदार सड़कें सुंदर दृश्य देती हैं; ईंधन स्टेशन हैं। माउंट आबू बस डिपो से स्थानीय बस/ऑटो (₹20-50) मिलती हैं।
रेल मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचने का तरीका
दिलवाड़ा जैन मंदिर के निकटतम रेलवे स्टेशन आबू रोड (28 किलोमीटर) है, जहाँ से दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, जोधपुर, जयपुर के लिए सीधी ट्रेनें (जैसे आबू जनशताब्दी) हैं। स्टेशन से माउंट आबू तक जीआरएसआरटीसी बस (₹50-100, 45-60 मिनट),
शेयर्ड टैक्सी (₹100-150) या निजी टैक्सी (₹800-1200) मिलती हैं। माउंट आबू बस स्टैंड से मंदिर तक ऑटो (₹50-100, 5-10 मिनट) या पैदल (30 मिनट) जा सकते हैं। ट्रेनें सुबह-शाम मिलती हैं, अग्रिम बुकिंग जरूरी है।
हवाई मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचने का तरीका
दिलवाड़ा के जैन मंदिर के निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर का महाराणा प्रताप एयरपोर्ट है, जो लगभग 160-185 किलोमीटर दूर है। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद से दैनिक उड़ानें हैं।
एयरपोर्ट से माउंट आबू तक टैक्सी (₹3000-5000, 3-4 घंटे) या बस (₹300-500, 4-5 घंटे) ले सकते हैं। दूसरा विकल्प अहमदाबाद एयरपोर्ट (220-230 किलोमीटर) है, जहाँ टैक्सी (₹4000-6000, 4-5 घंटे) या राज्य परिवहन बसें चलती हैं।
माउंट आबू पहुँचकर मंदिर 2.5-3 किमी दूर है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर पर निष्कर्ष
दिलवाड़ा जैन मंदिर राजस्थान के माउंट आबू में है और जैन धर्म के महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। ये मंदिर 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच चालुक्य वंश के समय बने हैं और अपनी जटिल संगमरमर की नक्काशी और खास वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं।
ये मंदिर समूह पाँच मुख्य मंदिरों से बना है, जहाँ हर मंदिर किसी विशेष जैन तीर्थंकर को समर्पित है। दिलवाड़ा मंदिरों की वास्तुकला मरु-गुर्जर शैली की बेहतरीन मिसाल है, जिसमें सफेद संगमरमर की सुंदर नक्काशी है।
मंदिर की दीवारों, स्तंभों, छतों और द्वारों पर कमल, फूल, नृत्य करती देवियाँ, पशु-पक्षी और तीर्थंकरों के जीवन के चित्र हैं। विमल वसाही मंदिर, जो इनमें सबसे प्रमुख है, 1026 ईस्वी में बना और इसकी नक्काशी इतनी बारीक है कि पत्थर रेशम जैसा लगता है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शिल्पकला का भी अद्भुत उदाहरण हैं। इनका निर्माण करीब 14 वर्षों में लगभग 1500 कारीगरों और 1200 श्रमिकों ने किया।
मंदिर की छतों पर कमल के फूल, नृत्यांगनाएँ, और तीर्थंकरों के शुभ स्वप्नों के चित्र हैं. जो जैन धर्म के आध्यात्मिक तत्वों को दिखाते हैं।
यहाँ की शांति, देवता मूर्तियाँ, और सुंदर कलाकृतियाँ श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करती हैं।
संक्षेप में, दिलवाड़ा जैन मंदिर जैन धर्म का आध्यात्मिक केंद्र हैं और भारतीय स्थापत्य कला और संगमरमर की नक्काशी का एक ऐतिहासिक धरोहर हैं। ये मंदिर माउंट आबू की पहाड़ियों में एक अनोखा सांस्कृतिक और धार्मिक अनुभव प्रदान करते हैं,
जो इतिहास, कला और धर्म को एक साथ समेटे हुए हैं।
दिलवाड़ा मंदिर पर 15 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. दिलवाड़ा जैन मंदिर कहाँ हैं?
उत्तर: दिलवाड़ा जैन मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले में माउंट आबू से 2.5 किलोमीटर दूर है। ये माउंट आबू की पहाड़ियों में हैं।
प्रश्न 2. दिलवाड़ा जैन मंदिर कब बने?
उत्तर: ये मंदिर 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच बने, कुछ 16वीं शताब्दी तक। मुख्य मंदिर 1031 ईस्वी में बनना शुरू हुआ।
प्रश्न 3. दिलवाड़ा मंदिर किस राजवंश से जुड़े हैं?
उत्तर: इन्हें गुजरात के सोलंकी (चालुक्य) शासकों के मंत्रियों ने बनवाया। बाद में वास्तुपाल-तेजपाल भाइयों ने योगदान दिया।
प्रश्न 4. दिलवाड़ा में कितने मुख्य मंदिर हैं?
उत्तर: यहाँ पाँच मुख्य मंदिर हैं: विमल वसाही, लून वसाही, पिथलिसाह वसाही, खरतर वसाही और महावीर वसाही।
प्रश्न 5. विमल वसाही मंदिर किसे समर्पित है?
उत्तर: यह प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है और 1031 ईस्वी में विमल शाह द्वारा बनवाया गया। इसमें सुंदर संगमरमर की नक्काशी है।
प्रश्न 6. लून वसाही मंदिर की विशेषता क्या है?
उत्तर: यह 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ को समर्पित है, 1231 ईस्वी में वास्तुपाल-तेजपाल द्वारा बनवाया गया। इसमें 72 स्तंभों पर जटिल नक्काशी है।
प्रश्न 7. पिथलिसाह वसाही मंदिर कब बना?
उत्तर: यह तीसरे तीर्थंकर ऋषभनाथ को समर्पित है, 1468-1472 ईस्वी में बना। इसमें पार्श्वनाथ की मूर्तियाँ हैं।
प्रश्न 8. खरतर वसाही मंदिर की ऊँचाई क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर: यह सबसे ऊँचा मंदिर है, 1458-59 ईस्वी में बनाया गया, पार्श्वनाथ को समर्पित। इसमें चार मंडप हैं।
प्रश्न 9. महावीर वसाही मंदिर छोटा क्यों है?
उत्तर: यह 24वें तीर्थंकर महावीर को समर्पित है, 1582 ईस्वी में बना। यह अन्य मंदिरों से छोटा है लेकिन चित्रकारी में बेहतरीन है।
प्रश्न 10. दिलवाड़ा जैन मंदिरों की वास्तुकला शैली क्या है?
उत्तर: ये मरु-गुर्जर शैली में श्वेत संगमरमर से बने हैं, दीवारों-स्तंभों पर कमल, नृत्यांगनाएँ, और पशु-पक्षी की नक्काशी है।
प्रश्न 11. दिलवाड़ा जैन मंदिर में दर्शन का समय क्या है?
उत्तर: सुबह 6 बजे से 1 बजे तक और शाम 5 बजे से 7 बजे तक। विमल वसाही में महिलाओं का प्रवेश नहीं है।
प्रश्न 12. दिलवाड़ा जैन मंदिर में प्रवेश शुल्क कितना है?
उत्तर: कोई प्रवेश शुल्क नहीं है, लेकिन पवित्रता बनाए रखने के नियमों का पालन करना जरूरी है।
प्रश्न 13. दिलवाड़ा जैन मंदिर कैसे पहुँचें?
उत्तर: माउंट आबू बस स्टैंड से टैक्सी या ऑटो में 5-10 मिनट लगते हैं। उदयपुर एयरपोर्ट 160 किमी दूर है।
प्रश्न 14. दिलवाड़ा जैन मंदिरों का निर्माण कितने कारीगरों ने किया?
उत्तर: लगभग 1500 कारीगरों और 1200 श्रमिकों ने 14 वर्षों में बनाए, संगमरमर अबू की खदानों से लाया गया।
प्रश्न 15. दिलवाड़ा जैन मंदिर क्यों विश्व प्रसिद्ध हैं?
उत्तर: ये सूक्ष्म संगमरमर कारीगरी के लिए प्रसिद्ध हैं, जहाँ पत्थर रेशम जैसा लगता है; ये जैन आध्यात्मिकता और भारतीय शिल्पकला का प्रतीक हैं।
