Maharana Pratap History | देखें: परिचय, पत्नियां, राज्याभिषेक, युद्ध, संग्रहालय और मृत्यु

Maharana Pratap History | देखें: परिचय, पत्नियां, राज्याभिषेक, युद्ध, संग्रहालय और मृत्यु

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इतिहास का परिचय | Maharana Pratap History

महाराणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत 1597 (9 मई 1540 ई.) को। मेवाड़ राज्य (वर्तमान राजस्थान, राजसमंद) के कुम्भलगढ़ किले में हुआ था। जो उस समय मेवाड़ राज्य की एक महत्वपूर्ण सैन्य चौकी मानी जाती थी।

जहां वह सिसोदिया राजपूत वंश के। सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा में पैदा हुए थे। लेकिन उन्हें मेवाड़ के सबसे ताकतवर राजपूतों में से एक माना जाता हैं। जहां महाराणा प्रताप मेवाड़ राज्य के 13वें राजा हुआ करते थे।

वहीं महाराणा प्रताप के पिता का नाम महाराणा उदय सिंह द्वितीय था। जो मेवाड़ के राज्य चित्तौड़गढ़ किले के राजा हुआ करते थे। उनकी माता का नाम जयवंता बाई था। जो पाली के सोनगरा चौहान वंश की राजकुमारी ओर सोनगरा अखेराज की बेटी थीं।

दूसरी ओर, महाराणा प्रताप के परिवार में। कई राजाओं ने जन्म लिया था। जिनमें सबसे पहले बप्पा रावल, राणा हमीर, राणा सांगा और महाराणा कुम्भा जैसे कई महान राजपूत शासक शामिल थे। लेकिन राणा’ के आगे “महाराणा” की उपाधि। केवल महाराणा प्रताप को ही मिली।

जहां 16वीं सदी के बीच में। राजपूत समाज में वीरता, स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा को बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता था। जिसका सीधा प्रभाव महाराणा प्रताप की देखभाल पर भी पड़ा था।

बचपन

मेवाड़ की चलती राजनीति में। जिस समय, महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उस समय बाबर (1526 ई.) पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर। भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रख चुका था। किंतु मेवाड़ राज्य ने अपनी ताकत अभी भी बनाए रखी थी।

महाराणा प्रताप की माँ जयवंता बाई। सिर्फ़ एक माँ ही नहीं थी। बल्कि उनकी पहली गुरु भी थीं। क्योंकि जयवंता बाई (उनकी मां) ने। महाराणा प्रताप को बचपन में ही युद्ध लड़ने का ज्ञान दिया था।

जहां महाराणा प्रताप के लीडर के गुण। बचपन से ही दिखने लगे थे। वो खेल-खेल में ही अपने दोस्तों के लीडर बन जाते थे। उनकी अलग से टीम बना लिया करते थे। और जीतने वालों के लिए। इनाम भी खुद ही तय कर लेते थे।

महाराणा प्रताप का बचपन भीलों के साथ बीता था। ओर भील अपने पुत्र को हमेशा किका कहकर पुकारते थे। इसीलिए महाराणा प्रताप को बचपन में ही। सब उन्हें प्यार से ‘किका’ कहकर पुकारते थे। जहां उन्हें यह नाम भीलों के द्वारा मिला था। जहां वह भीलों के साथ युद्ध लड़ने की कलाओं को भी सीखते थे।

पत्नियां, संताने 

महाराणा प्रताप की 11 पत्नियां थीं। जिनमें महारानी अजबदे पंवार उनकी सबसे प्यारी और पहली पत्नी थीं। अजबदे पंवार से महाराणा प्रताप को एक बेटा हुआ। जिसका नाम अमर सिंह रखा गया था। अमर सिंह की बहादुरी दिवेर युद्ध में देखने को मिलती है।

अजबदे पंवार के अलावा, अमरबाई राठौड़ (बेटा भगवंत सिंह), फूलबाई राठौड़ (बेटा शालिवाहन सिंह), चंपाबाई झाला (बेटा शेखावत सिंह), शाहमती बाई हाड़ा (बेटा गज सिंह) और रत्नाबाई परमार (बेटा राणा भूपाल सिंह) का जन्म हुआ।

वही लखाबाई का बेटा नारायण सिंह था। सूरजबाई सोलंकी का बेटा माल सिंह था। इसके बाद जलोबाई और शत्राबाई के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। इसके अलावा अलीबाई का भी जिक्र भी किया जाता है. लेकिन उनके बच्चों के बारे में भी स्पष्ट जानकारी नहीं है.

इनके अलावा महाराणा प्रताप की ओर भी पत्नियां हुआ करती थीं। लेकिन कुल मिलाकर महाराणा प्रताप के 17 बेटे और 5 बेटियां थीं।

शरीर की विशेषताएं 

ऊँचाई (कद):- महाराणा प्रताप की लम्बाई लगभग 7 फुट 5 इंच (लगभग 225 सेंटीमीटर) हुआ करती थी। जो उस काल के किसी भी सामान्य योद्धा से कहीं गुना ज्यादा थी।

वजन:- उनके खुद के शरीर का वजन करीब 110 से 115 किलोग्राम के बीच था। जो उनकी भारी-भरकम शरीर को दिखाता है।

सीना (छाती):- महाराणा प्रताप के छाती की चौड़ाई लगभग 72 इंच (6 फुट) थी। जो बाकी राजाओं से अलग मानी जा सकती है।

शरीर की बनावट:- उनका शरीर बहुत ही मजबूत, सुडौल और लंबे कद-काठी वाला था। जिसे देखकर दुश्मन भी घबरा जाते थे।

कवच का वजन:- उनके युद्ध-कवच (लोहे का बख्तर) का वजन लगभग 72 किलोग्राम था। जो आज के एक आम आदमी के वजन के बराबर है।

भाला (Copy) का वजन:- उनके भाले का वजन लगभग 80 किलोग्राम से भी ज्यादा था। जिसे वह युद्ध में अकेले ही संभालते थे।

ढाल का वजन:- उनके पीठ की गोल आकार की ढाल। करीब 208 किलोग्राम वजन की थी। जो किसी लोहार की भट्टी में ढली। भारी-भरकम लोहे की पट्टी जैसी थी।

तलवार:- उनके तलवार का वजन 25 किलोग्राम से भी ज्यादा था। जिसका इस्तेमाल वह एक हाथ से करते थे।

कुल युद्ध-भार:- इन सभी वजन को जोड़ा जाए। तो युद्ध के समय महाराणा प्रताप लगभग 200 किलोग्राम से भी ज्यादा। वजन लेकर चलते और लड़ते थे।

घोड़े चेतक पर सवारी:- यही 200 किलोग्राम से ज्यादा का वजन लेकर। वह अपने प्रिय घोड़े चेतक पर सवार होकर युद्ध करते थे। जो उनके शरीर की संतुलन-क्षमता को दर्शाता है।

राज्याभिषेक 

महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय की मृत्यु हो जाने के बाद। मेवाड़ राज्य के सिंहासन पर। अब एक नए राजा के बैठने की जरूरत पड़ गई। जहां सबसे पहले, महाराणा उदय सिंह की दूसरी पत्नी के बेटे जगमाल को सिंहासन पर बैठाया गया था।

लेकिन मेवाड़ के कुलीन सरदारों, भीलों और राजपूत योद्धाओं को जगमाल पसंद नहीं आया। फिर सब ने मिलकर महाराणा प्रताप को ही सही उत्तराधिकारी के रूप में चुन लिया।

लेकिन 16वीं सदी (1500-1600 ई.) के बीच। मेवाड़ राज्य का चित्तौड़गढ़ किला। पहले से ही मुगल सम्राट अकबर के कब्जे में था। इसीलिए मेवाड़ राज्य की राजनीति भी। बहुत ही मुश्किलों के बीच चल रही थी।

इसीलिए यह राज्याभिषेक उस समय की मेवाड़ की राजधानी। चित्तौड़गढ़ में न करते हुए। इस राज्याभिषेक को मेवाड़ (वर्तमान उदयपुर) से लगभग 40 किलोमीटर दूर। गोगुन्दा (पहाड़ी इलाके) में ही किया गया।

क्योंकि महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक उस दौर में किया जा रहा था। जब मुगल साम्राज्य पूरे भारत में फैल रहा था। और अकबर भी पूरे भारत को जीतने की कोशिश में लगा हुआ था।

उस वक्त महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक फाल्गुन शुक्ल पक्ष, विक्रम संवत् 1628 (28 फरवरी 1572 ईस्वी) को किया गया था। लेकिन तिलक समारोह से पहले। महाराणा प्रताप ने अपनी कुलदेवी बाण माता के मंदिर में जाकर। वहां पूजा-अर्चना करके माता का आशीर्वाद लिया।

क्योंकि सिसोदिया वंश की आराध्य देवी बाण माता को ही माना जाता था। बाण माता के मंदिर से दोबारा लौटकर गोगुंदा पहुंचे। ओर सबसे पहले महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के पारंपरिक राजमुकुट को अपने सिर पर धारण किया।

जो उस समय सिसोदिया वंश की खास पहचान मानी जाती थी। जहां महाराणा प्रताप ने भी। गुहिल वंश के सिंहासन को संभाला था। क्योंकि गुहिल वंश के सबसे पहले राजा बप्पा रावल को माना जाता है। ओर उन्हीं से सिसोदिया खानदान की शुरुआत हुई थी।

इसके बाद, महाराणा प्रताप के माथे पर कुल पुरोहित ने केसर, चंदन और रोली से तिलक लगाया। जिसे एक नए राजा को लगाने वाला “राजटीका” भी कहा जाता था।

इसी बीच, राज्याभिषेक में भीलों के सरदार कहे जाने वाले। राजा पूंजा भील ने अपने रक्त से महाराणा प्रताप के माथे पर तिलक लगाकर। उनके राज्याभिषेक का स्वागत किया। जो आज भी मेवाड़ के राजचिह्न (कोट ऑफ आर्म्स) में दर्शाया जाता है।

वहीं मेवाड़ के सभी प्रमुख सामंतों जैसे झाला, चुंडावत, शक्तावत सरदारों ने महाराणा प्रताप को नजराना (भेंट) देकर। अपने कर्तव्य की शपथ ली।

जिसके बाद, राजपूत परंपरा के अनुसार मेवाड़ के कुलीन सामंतों (लोगों) ने। अपनी अपनी तलवार निकालकर। महाराणा प्रताप जैसे (नए राजा) के चरणों में रखकर उसे दोबारा उठाया। जो एक नए राजा का आदर करना माना जाता है।

बाद में, क्षत्रिय धर्म के अनुसार महाराणा प्रताप ने भी। भाला, ढाल और तलवार लेकर यह फैसला लिया। कि वह अपने मेवाड़ राज्य की रक्षा अपनी जान से भी ज्यादा करेंगे।

बाद में, राज्याभिषेक के समय सूर्यवंशी ध्वज को फहराया गया था। क्योंकि सिसोदिया वंश खुद को सूर्यवंश की संतान मानता था। महाराणा प्रताप ने भील जनजाति सहित सभी मेवाड़ी सरदारों को एकजुट किया। हालांकि उनके पास कम मात्रा में अस्त्र शस्त्र मौजूद थे।

जहां राज्याभिषेक के बाद महाराणा प्रताप ने। अकबर को यह स्पष्ट संदेश दिया कि मेवाड़ कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करेगा। क्योंकि महाराणा प्रताप ने उसी दिन से अपने संघर्ष की नींव रख दी थी।

जहां महाराणा प्रताप ने भी। अपने राजदूत अकबर के दरबार में कभी नहीं भेजे। जिससे उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान हमेशा बनी रही।

राज्याभिषेक के बाद ही महाराणा प्रताप ने। समाज में ऊंच-नीच की बाधाओं को पार करते हुए। आदिवासी और क्षत्रिय समुदाय को एक साथ जोड़ा दिया। जो उस सदी में अपने आप में एक क्रांतिकारी भरा कदम माना जाता था।

यह राज्याभिषेक इसलिए भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इससे भारत के बाकी राजपूत राजाओं को भी। मुगलों की अधीनता न मानने के लिए सबक मिला।

जहां उस समय काफी राजपूत राजाओं ने मिलकर। मुगलों से विवाह के संबंध बना रखे थे। किंतु महाराणा प्रताप ने। इन सब बातों को इनकार करते हुए। अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखा।

बहादुरी, कठिनाइयां

मेवाड़ की आजादी

बादशाह अकबर पहले से पूरे भारत पर कब्ज़ा कर चुका था। ओर उसका अगला पड़ाव मेवाड़ को किसी भी तरह जीतकर। मुगल साम्राज्य में मिलाना था।

हालांकि अकबर को भी मेवाड़ इसलिए चाहिए था। क्योंकि उसका व्यापार गुजरात के समुद्री तट से होता था। ओर उसे हमेशा दिल्ली से आने या जाने के लिए। मेवाड़ वाले रास्ते से होकर गुजरना पड़ता था। जहां उसे हमेशा मेवाड़ में टैक्स देना पड़ता था। इसलिए मेवाड़ को भी जीतना। अकबर के लिए ज़रूरी हो गया।

दूसरी तरफ, महाराणा प्रताप भी मेवाड़ राज्य के राजा थे। जो मेवाड़ को बचाने के लिए खड़े थे। जहां महाराणा प्रताप ने भी खुलकर कह दिया। की मेवाड़ कभी भी मुगलों की अधीनता को स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि अकबर भी महाराणा प्रताप से काफी डरता था।

इसलिए उसने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए। कई हिन्दू राजाओं को भेजा। जिसमें टोडरमल, राजा मान सिंह, जलाल खान और भगवान दास जैसे कई हिंदू राजा महाराणा प्रताप के पास आए।

की अब तो महाराणा प्रताप अकबर की अधीनता को स्वीकार कर ले। ओर मेवाड़ को मुगल साम्राज्य में मिला दे। बाकी मेवाड़ का राजा फिर से महाराणा प्रताप को बना लिया जाएगा। परन्तु मेवाड़ मुगल साम्राज्य के अनुसार चलेगा। इसीलिए यह लोग लगभग आठ बार राणा प्रताप के पास संदेश लेकर आए।

एक बार तो अकबर ने। महाराणा प्रताप को इतना तक कह दिया। की पूरे आधे भारत का राजा महाराणा प्रताप को ही बना दिया जाएगा। लेकिन मेवाड़ को किसी भी तरह वह अकबर को देदे। लेकिन महाराणा प्रताप ने खुलकर कह दिया। कि वह मुगलों के सामने झुकने वाले नहीं है।

हालांकि अकबर भी कभी। राणा प्रताप के सामने नहीं आया। क्योंकि अकबर को डर था। कि महाराणा प्रताप की ताकत ऐसी है। की एक बार वह अकबर पर वार करेगा। तो उसे घोड़े हाथी समेत काट देंगे। ओर अकबर के गुरु ने भी।

उसे हमेशा एक बात समझाया रखी थी। कि अकबर तुम कुछ भी करना मगर महाराणा प्रताप के सामने कभी मत जाना। जिसके बाद, 1582 ईस्वी में अकबर ओर महाराणा प्रताप के बीच। विजयदशमी के दिन दिवेर का युद्ध लड़ा गया।

हालांकि इस युद्ध में अकबर की बुरी तरह हार हुई। युद्ध के बाद, मुगलों को दिवेर से 150 किलोमीटर दूर। अजमेर तक दौड़ा दौड़कर मारा गया। जिसमें अकबर को मेवाड़ छोड़कर भागना पड़ा।

अरावली जंगलों में जीवन 

जब अकबर ने महाराणा प्रताप को पकड़ने की सोची। तो महाराणा ने मेवाड़ की आजादी के लिए। अरावली जंगलों में रहने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि वो अपनी सेना के साथ रहेंगे। और वो भीलों के साथ जंगल में रहने लगे।

जहां उन्होंने अरावली के जंगलों में। उबली सब्जियां और कच्चे भोजन को। खाना शुरू कर दिया। और ज़मीन पर बैठकर भोजन करते थे। उनके पास न तो सिर ढकने के लिए छाता थी। और न ही कभी कभी पैरों में पहनने के लिए जूते थे।

उन्होंने जंगल में बिल्कुल आम जीवन जीने की शुरुआत कर दी। और उसी समय जंगल के सभी भील भी उनके साथ जुड़ गए।

भीलों ने महाराणा प्रताप से हमेशा यह कहा। कि जब भी आपकी आज्ञा होगी। तभी हम मेवाड़ की आजादी के लिए। अपना सिर तक कटवा देंगे। अंतिम जंगलों में उनका जीवन। दिवेर की अरावली की पहाड़ियों (घाटियों) में बीता था।

जहां दिवेर युद्ध से पहले। भामाशाह ने अपनी सारी संपत्ति महाराणा प्रताप को मेवाड़ की आज़ादी के लिए दे दी। महाराणा प्रताप ने दिवेर क्षेत्र के जंगलों में कई लोगों से मुलाकात की।

कहा जाता है कि स्थानीय लोगों, भामाशाह ओर भीलों की मदद से। महाराणा प्रताप ने दिवेर युद्ध को जीता था। और पूरे मेवाड़ को वापस मुगलों (अकबर) से आजाद कराया था।

नीतियां

युद्ध नीति

प्रमुख नीति:- हल्दी घाटी ओर दिवेर युद्ध के समय। महाराणा प्रताप ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति (Guerrilla Warfare) की नीति का इस्तेमाल किया था। जिसमें छोटे-छोटे सैनिक दलों में। दुश्मनों पर अचानक हमला करके। वापस जंगलों में छुप जाना शामिल था। जो गुरिल्ला युद्ध नीति के एक पहलू माने जाते है।

नीति का पहला ज्ञान:- सन् 1568 में जब मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर कब्जा कर रखा था। तब महाराणा प्रताप को पहली बार।

गुरिल्ला युद्ध नीति के बारे में यह समझ आया। कि सीधी लड़ाई लड़ने में जीत पाना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने सबसे पहले अरावली की पहाड़ियों ओर घाटियों की जानकारी इकठ्ठा की। ओर अरावली की पहाड़ियों में लड़ाई लड़ना सही समझा। जहां गुरिल्ला युद्ध नीति का इस्तेमाल जंगलों में किया जा सकता था।

जहां वह अचानक मुगलों पर हमला करते थे। और फिर तुरंत पहाड़ी इलाकों में छिप जाते थे। मुगलों को पहाड़ी इलाकों में लड़ना पसंद नहीं था। इसलिए महाराणा प्रताप को लड़ने का ज्यादा फायदा मिल जाता था

उद्देश्य:- गुरिल्ला युद्ध नीति का मुख्य उद्देश्य यह था। की दुश्मन की बहुत ही ज्यादा सेना को थका थकाकर मारना। उन्हें जंगलों में ही उलझा देना। और फिर पीछे से छिपकर अचानक हमला करना। ताकि अपनी खुद की मेवाड़ की सैन्य शक्ति को लंबे समय तक बचाया जा सके।

इस्तेमाल:- गुरिल्ला युद्ध नीति का इस्तेमाल 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के युद्ध में उन्होंने पहाड़ी दर्रों और संकरे रास्तों का उपयोग करके मुगल सेना को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। हालांकि उनके पास केवल 20,000 सैनिक थे। जबकि मुगल सेना में 80,000 से भी ज्यादा सैनिक शामिल थे।

इसके बाद महाराणा ने गुरिल्ला युद्ध नीति का इस्तेमाल। फिर से 1582 ईस्वी के दिवेर युद्ध में किया था। जहां महाराणा ने जंगल से बाहर निकलर। अचानक मुगलों पर हमला किया था।

दिवेर युद्ध में ही उन्होंने मुगलों की सेना के खाने और हथियारों पर भी हमला किया। ताकि वो कमज़ोर होकर। पीछे हटने पर मजबूर हो जाएं। यही नहीं ज़रूरत पड़ने पर। उन्होंने दिवेर युद्ध में स्थानीय राजाओं से दोस्ती भी की। जो भाईचारे की नीति के तहत मानी जाती है।

और अपनी सेना को और भी ज्यादा मज़बूत बनाया। ताकि दुश्मनों के बारे में गुप्त बातों का पता चल सके। ओर उन पर नज़र भी रखी जा सकें। इसके अलावा, महाराणा प्रताप ने कई बार।

नकली सेना बनाकर और झूठी खबरें फैलाकर दुश्मनों को धोखा भी दिया। ताकि दुश्मनों को सीधा भड़काया जा सके। कई बार तो वह दुश्मनों पर सीधा हमला करते। ओर कुछ समय के लिए फिर से पहाड़ी इलाकों में छिप जाते थे। ताकि मुगलों की सेना में हमेशा डर बना रहे।

फायदे:- गुरिल्ला युद्ध नीति का फायदा उठाकर। महाराणा प्रताप ने कम सैनिकों और कम साधनों के बावजूद भी। दुश्मन की बड़ी सेना को रोकना में कामयाब हुए। किंतु मेवाड़ की सैन्य शक्ति भी नष्ट नहीं हुई। गुरिल्ला युद्ध नीति का फायदा उठाकर। महाराणा प्रताप ने दिवेर युद्ध में जीत हासिल की थी।

परिणाम:- गुरिल्ला युद्ध नीति के परिणाम यह हुए। की मुगल सेना 1576 से 1596 तक। 20 वर्षों तक लगातार महाराणा को जंगलों में खोजती रही। परंतु उन्हें कभी पकड़ नहीं पाई।

प्रभाव:- गुरिल्ला युद्ध नीति को आगे चलकर। छत्रपति शिवाजी महाराज (1630–1680) ने भी। इसी गुरिल्ला नीति को अपनाकर। औरंगजेब की भारी सेना को तबाह कर दिया था।

समझदारी, भाईचारे की नीति

प्रमुख नीति:- महाराणा ने भाईचारे की नीति से। मेवाड़ के सभी सरदारों, भील जनजाति और पड़ोसी राज्यों से भी अच्छे सम्बन्ध बनाएं। जिसमें जाति और धर्म से ऊपर उठकर। सभी जाती, धर्म के लोगो को एक साथ रखा गया।

नीति का पहला ज्ञान:- भाईचारे की नीति के बारे में। महाराणा प्रताप को तब पता चला। जब सन् 1572 में मेवाड़ का सिंहासन मिलते ही। उन्हें यह समझ आया कि मुगलों से अकेले लड़ना काफी मुश्किल है।

इसलिए उन्होंने भील समुदाय के सरदार। राणा पूंजा भील को अपना खास सेनापति बनाया। ओर मेवाड़ के बाकी सरदारों को भी अपने साथ शामिल किया।

उद्देश्य:- महाराणा प्रताप ने भाईचारे की नीति से। मुगल साम्राज्य की बढ़ती ताकत को कम करने के लिए। अपनी खुद की स्थानीय ताकतों (भीलों, कुलीन सरदारों, रिश्तेदारों, आपसी लोगो) को अपने साथ रखना शुरू किया। और अकबर के समझदारी वाले कार्यों को तोड़ना शुरू किया।

इस्तेमाल:- भाईचारे की नीति का इस्तेमाल तब किया गया। जब अकबर ने चार बार हिंदू राजाओं को। जिनमें जलाल खान (1572), मानसिंह (1573), भगवान दास (1573), और टोडरमल (1573) महाराणा के पास भेजकर।

उन्हें समझौते पर राजी करने की कोशिश की। किंतु महाराणा ने हर बार समझौता करने से स्पष्ट मना कर दिया। की मेवाड़ कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करेगा।

फायदे:- भाईचारे की नीति का इस्तेमाल तब हुआ। जब भील जनजाति का साथ मिलने से। मेवाड़ की सेना में जंगल-युद्ध के जानकार सैनिक शामिल हो गए। जिससे गुरिल्ला रणनीति और मजबूत हुई।

परिणाम:- भाईचारे की नीति से। मेवाड़ की जनता में। एकता का भाव पैदा हुआ। और सभी वर्ग के लोगों ने। महाराणा के साथ खड़े होकर। मुगलों का विरोध शुरू किया।

प्रभाव:- आज भी राजस्थान के भील समुदाय महाराणा प्रताप को अपना भाईचारा मानते हैं।

शासन नीति

प्रमुख नीति:- विकेंद्रीकृत (राज्य ओर छोटी सरकारों द्वारा लिए जाने वाले फैसले) प्रशासन नीति (Decentralized Administration) अपनाई। जिसमें स्थानीय सरदारों को अपने-अपने इलाकों में शासन चलाने का अधिकार दिया।

नीति का पहला ज्ञान:- सन् 1576 में हल्दीघाटी जैसे भयानक युद्ध लड़के के बाद। जब महाराणा को जंगलों में रहना पड़ा था। तब उन्होंने चावंड को अपनी नई राजधानी बना दी। और वहां से अपने शासन प्रशासन की शुरुआत की।

उद्देश्य:- शासन नीति का मतलब है। की प्रजा को यह विश्वास दिलाना कि उनका राजा अभी भी जीवित है। वह अपने शासन के काम पर है। और मेवाड़ का शासन अभी भी चल रहा है।

इस्तेमाल:- चावंड में न्यायालय, कर-संग्रह और सैन्य भर्ती की व्यवस्था कायम की। जिससे मेवाड़ की अंदर की व्यवस्था बनी रहे।

फायदे:- सन् 1582 में दिवेर के युद्ध में जीत के बाद। महाराणा ने मेवाड़ के 36 में से 32 मुगल चौकियों को खत्म करके। अपने मेवाड़ राज्य में वापस शामिल कर लिया। जो उनकी शासन नीति की एक खास पहचान है।

परिणाम:- मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक अकबरनामा में लिखा है। कि महाराणा मेवाड़ राज्य से बहुत ही प्यार करते थे।

प्रभाव:- मेवाड़ की शासन नीति को देखकर। बाद में बने राजाओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।

अर्थव्यवस्था नीति

महाराणा प्रताप के समय चल रहे युद्ध में भी। उन्होंने मेवाड़ की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया। क्योंकि उन्होंने वन-आधारित और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी।

प्रमुख नीति:- अर्थव्यवस्था नीति में उन्होंने स्थानीय उत्पादन और आत्मनिर्भरता की नीति को अपनाया। जिसमें स्थानीय कारीगरों, किसानों और व्यापारियों को राज्य से फायदा मिल सका।

नीति का पहला ज्ञान:- सन् 1576 के बाद, जब मुगलों ने मेवाड़ के कुछ व्यापार होने वाले नगरों को छीन लिया। तब महाराणा को यह समझ आया। कि जंगलों में भी अर्थव्यवस्था को चलाई जा सकती है।

उद्देश्य:- लंबे युद्ध लड़ने के लिए। सैन्य वस्तुओं और धन को इकठ्ठा करना। किंतु साथ ही अपनी प्रजा को भूख और गरीबी से भी बचाना।

इस्तेमाल:- चावंड की राजधानी में शिल्पकारों को बुलाकर हथियार, कपड़े और बर्तन बनाने का काम शुरू करवाया। जिसमें स्थानीय वन-संसाधनों का उपयोग किया गया।

फायदे:- चावंड की नई राजधानी एक समृद्ध सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बन गया था। जहां चावंड चित्रकला शैली (Chawand School of Painting) का जन्म हुआ।

परिणाम:- जंगल में रहते हुए भी। मेवाड़ की अर्थव्यवस्था की स्थिति टिकी रही। और सेना को लगातार खाने पीने का सामान मिलता रहा।

प्रभाव:- महाराणा की यह अर्थव्यवस्था नीति। आज की स्थानीय आत्मनिर्भरता (Local Self-Reliance) की अवधारणा से जुड़ी हुई है।

समाज, जनजातीय एकता

महाराणा प्रताप की सामाजिक नीति। 16वीं आदि की बहुत ही आगे की सोच वाली मानी जाती हैं। जब उन्होंने जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर। सभी समुदायों को बराबरी का दर्जा दिया।

प्रमुख नीति:- जनजातीय समावेश नीति (Tribal Inclusion Policy)। जिसमें भील, मीणा और अन्य आदिवासी समुदायों को राज्य तक सम्मान और सेना में बराबरी का दर्जा दिया गया था।

नीति का पहला ज्ञान:- सन् 1572 में गद्दी संभालते ही महाराणा ने यह देखा कि राजपूत सरदारों की संख्या सीमित है, इसलिए उन्होंने भील समुदाय को सेना में शामिल किया।

उद्देश्य:- समाज के लोगों में एकता बनाए रखना। और हर जाती में भेदभाव को मिटाकर। एक मजबूत जन-सेना तैयार करना।

इस्तेमाल:- भील योद्धा राणा पूंजा को सेना का प्रमुख सेनापति बनाया गया था। जो उस काल की अभूतपूर्व घटना मानी जाती थी। क्योंकि तब आदिवासियों को राजकीय पदों से दूर रखा जाता था।

फायदे:- भील योद्धा जंगल-युद्ध, तीरंदाजी और पहाड़ी रास्तों में लड़ने के लिए बड़े माहिर थे। जिनकी वजह से गुरिल्ला नीति से युद्ध लड़ सके।

परिणाम:- मेवाड़ के समाज के लोगों में एकता बड़ी। और सभी वर्गों ने एकजुट होकर मुगलों का सामना किया।

प्रभाव:- राजस्थान की जाती ओर जनजातीय संस्कृति में। महाराणा प्रताप की छवि आज भी एक न्यायप्रिय और समावेशी राजा के रूप में है।

संस्कृति देखरेख नीति

महाराणा प्रताप केवल एक योद्धा ही नहीं माने जाते थे। अपितु वह मेवाड़ की संस्कृति, कला और परंपरा के सच्चे देखरेख करने वाले भी माने जाते है। क्योंकि उन्होंने युद्धकाल में भी कला, साहित्य और शिक्षा को नई ऊंचाई दी।

प्रमुख नीति:- सांस्कृतिक पहचान संरक्षण नीति (Cultural Identity Preservation)। जिसमें चित्रकारों, कवियों, बड़े लोगों और शिल्पकारों को राज्याश्रय (राज्य में स्थान) दिया गया था।

नीति का पहला ज्ञान:- सन् 1585 में चावंड को नई राजधानी बनाने के बाद। महाराणा प्रताप ने देखा कि मुगलों की ताकत से। मेवाड़ की कला और भाषा खतरे में आ गई है। इसलिए उन्होंने चावंड में कला-केंद्र स्थापित किया।

उद्देश्य:- मेवाड़ की संस्कृतिक पहचान को। मुगलों की ताकत से बचाना। और आगे आने वाली पीढ़ी के लिए। इतिहास और हमारी परंपरा को सुरक्षित रखना।

इस्तेमाल:- कवि दुरसा आढ़ा जैसे साहित्यकारों को जगह दी गई थी। जिन्होंने महाराणा की वीरगाथाएं भी लिखीं थी। मगर इनके साथ ही मेवाड़ की लोकसंस्कृति को भी नई ऊंचाई दी गई थी।

फायदे:- चावंड की नई राजधानी में चित्रकला शैली का जन्म हुआ। जो राजस्थानी चित्रकला की एक महत्वपूर्ण शाखा बन गई। और आज भी प्रसिद्ध है।

परिणाम:- महाराणा के काल में रचा गया साहित्य। राजस्थानी वीरगाथा साहित्य की नींव बन गया। जिसमें देशभक्ति और स्वाभिमान के भाव भरे हैं।

प्रभाव:- आज भी राजस्थान में जो लोक-गीत, लोक-कथाएं और चित्रकला की परंपरा जीवित है। उसकी जड़ें महाराणा प्रताप के काल से भी जुड़ी हुई हैं।

युद्ध

हल्दी घाटी का युद्ध 1576 ईस्वी

यह युद्ध अकबर और महाराणा प्रताप के बीच। 1576 ईस्वी में मेवाड़ के हल्दी घाटी दर्रे (वर्तमान राजस्थान राजसमंद) नामक स्थान पर लड़ा गया था। इसलिए इस युद्ध को हल्दी घाटी का युद्ध कहा जाता हैं।

इस युद्ध में अकबर की तरफ से सेनापति मानसिंह ओर आसफ खां थे। दूसरी ओर महाराणा प्रताप की तरफ से सेनापति हकीम खां सूरी थे। जहां अकबर की सेना में 80,000 से 1,00,000 सैनिक शामिल थे। जिनके पास हाथी, घुड़सवार ओर तोपखाना भी शामिल थे।

जबकि महाराणा प्रताप के पास केवल 15,000 से 20,000 सैनिक ही थे। जिनमें भील जनजाति के धनुष चलाने वाले। अच्छे खासे योद्धा शामिल थे। युद्ध से पहले महाराणा प्रताप ने कहा था। की “एक आदमी पांच को खत्म कर सकता है।

इसी बीच दोनों राज्यों के बीच रणभूमि में युद्ध हुआ। हालांकि यह युद्ध ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सका। इसीलिए यह युद्ध कुछ घंटों में ही खत्म हो गया। वहीं युद्ध में महाराणा प्रताप भी। बुरी तरह घायल हो चुके थे। जिनके शरीर में काफी सारी चोटें लग चुकी थी। ओर उनके पास लड़ने की ताकत भी। बहुत ही कम रह गई।

इसलिए उन्होंने अंत में, लड़ाई का मैदान छोड़ने का फैसला किया। जहां महाराणा प्रताप अपने प्यारे घोड़े चेतक पर बैठकर। वहां से रवाना हो गए। लेकिन अकबर और मानसिंह के आगे। कभी भी झुके नहीं।

जहां अकबर भी यह चाहता था। की किसी भी तरह महाराणा प्रताप को। घुटने टेका दे या उन्हें बंदी बनाकार के अपने दरबार में पेश कर दे।

दिवेर का युद्ध 1582 ईस्वी

दिवेर का युद्ध, हल्दी घाटी युद्ध के 5 साल बाद। मेवाड़ के दिवेर नामक छोटे से गांव (आज का राजस्थान राजसमंद से 70 किलोमीटर दूर दिवेर) की अरावली की पहाड़ियों, जंगलों की घाटियों में लड़ा गया था।

दिवेर का युद्ध, हल्दी घाटी युद्ध से भी ज़्यादा भयानक हुआ था। क्योंकि इतिहास में इसके बारे में ज़्यादा किसी को पता नहीं है। लेकिन फिर भी यह युद्ध अकबर और महाराणा प्रताप सिंह के बीच। 1582 ईस्वी में लड़ा गया था। जहां दिवेर युद्ध को हल्दी घाटी युद्ध का दूसरा भाग भी कहा जाता हैं।

1582 ईस्वी में महाराणा प्रताप अकबर से लड़ते लड़ते। दिवेर की अरावली पहाड़ियों के जंगलों की घाटियों में आकर छुप गए थे। जहां अकबर के सेनापति सुल्तान खान ने उन्हें पकड़ने के लिए। जंगल के चारों तरफ से 4 चौकियां बनाकर घेर दिया।

उसी दिन “टीका दौड़” का त्यौहार भी चल रहा था। जिसमें योद्धा युद्ध लड़ने के लिए तैयार होते थे। ताकि इस त्यौहार पर कोई छोटा मोटा युद्ध लड़ लिया जाए।

लेकिन इस त्यौहार पर मेवाड़ के सभी भील और सरदार महाराणा प्रताप सिंह के साथ मिलकर। मुगलों पर हमला करने के लिए तैयार हो गए। हालांकि दिवेर की इसी चौकी पर सबसे ज्यादा मुगलों की सेना ठहरी हुई थी।

जो लगातार जंगलों की तरफ देख रही थी। ओर महाराणा प्रताप को पकड़ने की कोशिश कर रही थी।

सबसे पहले महाराणा प्रताप ने। दिवेर की सबसे बड़ी चौकी पर तैनात लाखों मुगलों पर अचानक हमला किया। जिसमें महाराणा प्रताप के अचानक हमले से मुगलों की सेना में अफरा-तफरी मच गई। ओर इसमें बहुत सारे मुगल सैनिक को काट दिया गया। जिसमें जिन्दा बचे मुगलों ने महाराणा प्रताप के आगे घुटने टेक दिए।

कुछ मुगलों को डर के मारे। राजस्थान के दिवेर से लेकर। 100 किलोमीटर की दूरी अजमेर शहर तक दौड़ा डोडा कर मारा गया। युद्ध खत्म होने के बाद। अकबर इस युद्ध में बुरी तरह हार गया। ओर महाराणा प्रताप ने दोबारा।

इस युद्ध के बाद मेवाड़ को फिर से जीत लिया। महाराणा प्रताप के बेटे अमरसिंह ने भी। मुगलों को भगाने में मदद की। कहते हैं कि महाराणा प्रताप ने। दिवेर के इसी युद्ध में भारी भरकम अकबर के सेनापति। बहलोल खान को घोड़े समेत तलवार से दो टुकड़ों में अलग कर दिया था।

विरासत

संग्रहालय

महाराणा प्रताप म्यूज़ियम (हल्दीघाटी राजसमन्द)

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के समय की “बिरदावली” है। हालांकि यह एक प्राइवेट जगह है। जहाँ तीन एकड़ में पुरानी चीज़ें दिखाई गई हैं। यहाँ 16वीं सदी के भाले, कटार और चेतक घोड़े के कवच भी हैं।

यहां हर शाम को एक बार 6:30 बजे। लाइट और साउंड शो होता है। जिसमें हल्दी घाटी युद्ध के बारे में दिखाया जाता है। मिट्टी के मॉडल और रोबोट भी हैं। जो पुराने इतिहास को बताते हैं। यहां ASI द्वारा बनाए गए युद्ध के नक्शे भी देखे जा सकते हैं।

प्रताप गौरव केंद्र, टाइगर हिल, उदयपुर

महाराणा प्रताप गौरव केंद्र 2016 में शुरू हुआ था। जिसमें प्रवेश करने के लिए। जून 2024 से टिकिट का शुल्क 50 रुपए कर दिया गया है। ताकि ज्यादा से ज्यादा छात्रों को। एकबार देखने का मौका मिल सके।

आज यह 25 एकड़ में फैला हुआ “राष्ट्रीय तीर्थ” है। जो मेवाड़ राजपरिवार और वीएचपी समर्थ ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है। इसमें 57 फीट ऊंची महाराणा प्रताप की मूर्ति स्थापित की गई है।

प्रताप गौरव केंद्र के अंदर प्रवेश करने पर। आठ गैलरी दिखाई देती हैं। जिनमें ऑडियो, 3D फिल्म और टच स्क्रीन भी शामिल हैं। जहां पुरानी चीजें जैसे सिक्के और महाराणा प्रताप के बारे में जानकारी दिखाई जाती है।

अब 2023-24 में एक लेजर शो भी शुरू हुआ था। जो महाराणा प्रताप की कहानी बताता है।

(महाराणा प्रताप स्मारक, संग्रहालय), मोती मगरी फतेह सागर, उदयपुर

यह 18वीं सदी का एक पहाड़ी स्मारक है। यहां देखने का मुख्य आकर्षण 11 फीट ऊँची ‘प्रताप-चेतक’ की कांसे की मूर्ति संग्रहालय में बनी हुई है।

यहां कुम्भलगढ़ और चित्तौड़गढ़ किले के युद्ध के चित्र। भामाशाह और झाला मान की मूर्तियाँ कांच के अंदर स्थित है।

पैनल जानकारी के लिए। यह रोज सुबह 7:30 से रात 8:00 तक खुला रहता है। यही नहीं शाम को लाइट और साउंड शो में राजपूतों की वीरता की कहानी दिखाई जाती है। यह सबकुछ आसान भाषा में दिखाया जाता है।

प्रयत्न ‘ महाराणा प्रताप संग्रहालय’ (सिटी पैलेस शस्त्रागार उदयपुर)

ज़ेनाना महल में एक संग्रहालय बना हुआ है। ओर यह वर्ष 1974 से खुला हुआ है। यहाँ महाराणा प्रताप का 3.6 किलोग्राम का खाण्डा (तलवार), स्टील की ढाल, और उनके घोड़े का पूरा कवच रखा गया है। जिनको अंग्रेजों के पत्रकारों ने भी बहुत अच्छा बताया है।

जहां हथियारों का एक खास कमरा भी बनाया गया है। जिसमें तापमान भी अच्छा रहता है। इसमें पुराने शिलालेख और मुग़लों की तलवारें भी रखी गई हैं।

मृत्यु, अंतिम पल

महाराणा प्रताप 19 जनवरी 1597 ईस्वी को। चावंड किले (मेवाड़ की राजधानी) में एक दुखद घटना घटकर सामने आई। महाराणा प्रताप अपने घोड़े पर सवार होकर। मेवाड़ की राजधानी चावंड किले में वापस आ रहे थे।

तभी उन्होंने एक घायल बाघ की तरफ दौड़ते हुए। अपने घोड़े को रोकने की कोशिश की। जहां उन्हें उस बाघ से गंभीर रूप से घायल होना पड़ गया। उसी रात को शरीर में घाव के खुलने से। उनके शरीर के अंदर का खून बहने लगा।

कुछ दिन तक तो महाराणा प्रताप बेहोशी की हालात में रहे। जहां उनका इलाज लगातार चलता रहा। लेकिन घाव ज्यादा होने के चलते। अंत में उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप सिंह का अंतिम संस्कार बंडोली नाले के पास किया गया था। जहां आज भी उनकी समाधि स्थल चावंड के जंगलों में बनी हुई है।

मृत्यु के समय, महाराणा प्रताप 56 साल के थे। आधुनिक डॉक्टर रीमा हुजा (Alumni) के कहा है। अंत में उनकी हालत खराब हो गई थी। और दिल और सांस लेने में तकलीफ होने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी मृत्यु चावंड किले के कमरा नंबर 14 में हुई थी। जहां आज भी, सरकारी विभाग ने वहाँ नीम की लकड़ी का पलंग, लाल रंग की चादर, तांबे के बर्तन और आयुर्वेदिक दवाइयों कोभी रखा हुआ हैं।

लेकिन मरते वक्त महाराणा प्रताप ने। अपने बेटे अमर सिंह से यह बात कही थी। की “चित्तौड़ किला मुगलों के पास है, पर अपना सम्मान कभी मत छोड़ना।”

निष्कर्ष

जन्म और परिचय:- महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था। जबकि उनका निधन 19 जनवरी 1597 को हुआ।

हल्दीघाटी का युद्ध:- 18 जून 1576 को हुए हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना से वीरता पूर्वक लोहा लिया। हालांकि संख्या में कम होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी।

जंगलों में संघर्ष:- युद्ध के बाद उन्होंने अपने परिवार सहित अरावली के जंगलों में कठिन जीवन बिताया था। किंतु मेवाड़ की रक्षा का संकल्प कभी नहीं छोड़ा।

मेवाड़ की पुनर्प्राप्ति:- अपने अदम्य साहस और कूटनीति से उन्होंने 1585 से 1597 के बीच। मेवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों को पुनः स्वतंत्र करा लिया। जो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

भामाशाह का योगदान:- भामाशाह ने अपनी समस्त संपत्ति महाराणा को समर्पित की, जिससे उन्हें सेना को फिर से संगठित करने में मदद मिली।

राष्ट्रीय प्रेरणा:- महाराणा प्रताप आज भी भारतीय स्वतंत्रता, देशभक्ति और स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं।

विरासत और स्मृति:- उदयपुर में स्थित मोती मगरी स्मारक और प्रताप गौरव केंद्र उनकी वीरता की याद को जीवित रखते हैं। क्योंकि उनका जीवन हर पीढ़ी को प्रेरित करता है।

13 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. महाराणा प्रताप कौन थे?

उत्तर: महाराणा प्रताप मेवाड़ राज्य के सबसे पहले चित्तौड़गढ़ किला। फिर नई राजधानी चावंड किले के एक राजपूत राजा थे।

उनका जन्म 1540 में हुआ था। ओर उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले। पूरे मेवाड़ राज्य को मुगलों से आजाद करवाया था।

 प्रश्न 2. हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ?

उत्तर: हल्दीघाटी का युद्ध 1576 में हुआ था। जिसमें महाराणा प्रताप मेवाड़ को बचाने के लिए। मुगलों के खिलाफ खड़े हुए थे। 

प्रश्न 3. हल्दीघाटी और दिवेर की लड़ाई में क्या फर्क है?

उत्तर: हल्दीघाटी की लड़ाई का कोई खास नतीजा नहीं निकला। लेकिन दिवेर युद्ध की लड़ाई में।

महाराणा प्रताप ने मुगलों को हराकर। मेवाड़ को वापस जीत लिया। 

प्रश्न 4. महाराणा प्रताप की सेना में कौन-कौन शामिल थे?

उत्तर: उनकी सेना में सेनापति हकीम खां सूरी, राजपूत, जंगलों के भील, कुछ जाट और मुसलमान योद्धा भी शामिल थे।

इससे पता चलता है कि मेवाड़ की आजादी के लिए। कितने योद्धा उनके युद्ध में शामिल हुए थे।

प्रश्न 5. प्रताप की आर्थिक और सामाजिक नीतियाँ क्या थीं?

उत्तर: महाराणा प्रताप ने पानी बचाने के लिए कई झीलें बनवाईं और लोगों को कर वसूली में छूट दी। इससे लोगों का भला हुआ और इलाके का विकास भी हुआ।

प्रश्न 6. चेतक कौन था? उसने क्या किया?

 उत्तर: चेतक महाराणा प्रताप का सबसे बहादुर ओर प्रिय घोड़ा था। जिसने हल्दीघाटी की लड़ाई में घायल होने के बाद भी।

अपने स्वामी महाराणा प्रताप की जान बचाई। लेकिन आज भी चेतक की याद में। हल्दी घाटी में एक स्मारक भी बना हुआ है। 

प्रश्न 7. महाराणा प्रताप कैसे मरे?

उत्तर: महाराणा प्रताप की मृत्यु जनवरी 1597 में चावंड में हुई। उनकी मृत्यु युद्ध में लगे घाव के कारण हुई।

लेकिन ज्यादातर इतिहासकार उनकी मृत्यु बाघ के शिकार होनी से भी बताते है।

प्रश्न 8. महाराणा प्रताप की कितनी पत्नियाँ और बच्चे थे?

उत्तर: महाराणा प्रताप की 11 पत्नियाँ थीं। उनके सबसे बड़े बेटे का नाम अमर सिंह था। उनके कुल 17 बेटे और 5 बेटियाँ थीं। 

प्रश्न 9. क्या लोग महाराणा प्रताप का सम्मान करते हैं?

उत्तर: हाँ, लोग आज भी उनका बहुत सम्मान करते हैं। उन्हें उनकी बहादुरी के लिए ‘हिंदु वीर शिरोमणी’ कहा जाता है।

आज, राजस्थान और पूरे भारत में। उन्हें आजादी के दीवाने का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न 10. महाराणा प्रताप की जयंती कब मनाई जाती है?

उत्तर: महाराणा प्रताप की जयंती ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। यह दिन मई या जून के महीने में आता है।

प्रश्न 11. क्या महाराणा प्रताप शाकाहारी थे?

 उत्तर: कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वह शाकाहारी थे। लेकिन राजपूत होने के नाते उन्हें मांसाहारी कहना ही सही रहेगा।

प्रश्न 12. क्या चावंड में कोई यादगार जगह है?

उत्तर: हाँ, चावंड में उनका कमरा और समाधि स्थल बनी हुई है। उन्हें सुरक्षित रखने के लिए। समय समय पर इनका ध्यान भी रखा जाता है।

प्रश्न 13. महाराणा प्रताप आज भी लोकप्रिय क्यों हैं?

उत्तर: उनकी छुपकर लड़ने की कला, लोगों का साथ पाने का तरीका और इज्जत से जीने की सीख। आज भी हमें आगे बढ़ने में मदद करती है।

Author (India World History)

  • मेरा नाम ललित कुमार (रवि) है। और में फिलहाल N.H.8, भीम, राजसमंद, राजस्थान में रह रहा हूँ।

    में खुद को एक इतिहासकार कहूं. तो शायद गलत नही होगा. क्योंकि इतिहास के विषयों की दुनिया ने मुझे इतना अनुभव दिया है।

    की मुझे अलग से एक इतिहासकार बनने की पढ़ाई या उसके खिलाफ अध्ययन करने की जरूरत नहीं है।

    इसीलिए मैं, फिलहाल हमारी कंपनी इंडिया वर्ल्ड हिस्ट्री पर. खुद को मुख्य लेखक और इतिहास का शोधकर्ता समझता हूँ।

    यही नहीं मैंने भारतीय पब्लिक स्कूल (BPS) चौधरी चरण सिंह कॉलोनी नवलगढ़ रोड़ सीकर से 12TH की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।

    इतिहास विषयों की जानकारियों में मेरे पास. 2026 से पहले 4 वर्षो का अनुभव शामिल हैं।

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