तनोट माता मंदिर के इतिहास का परिचय | Tanot Mata Temple History Introduction
मैं ललित कुमार हूं, और मेरा इतिहास की जानकारियों में लगभग 6 साल का अनुभव है। आज आप यहां राजस्थान राज्य के तनोट माता मंदिर के इतिहास के बारे में सबकुछ जानेंगे, बशर्ते आप इस लेख को पूरा पढ़ने की कोशिश करें।
तनोट माता हिंगलाज माता का एक स्वरूप है। इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे तनोट राय और रुमालों वाली लोकदेवी, सैनिकों की रक्षक देवी, BSF के जवानों की कुलदेवी, तनोटिया माता आदि अन्य कई नामों से इसकी पहचान है. वही यह मंदिर थार की वैष्णो देवी कहलाता है.
और सैनिको की रक्षा करता है। यह जगह चमत्कार और भारतीय सेना के लिए बहुत खास है। वही तनोट माता मंदिर जैसलमेर से लगभग 120 किलोमीटर दूर तनोट नामक गाँव में है। जहां हर साल नवरात्रा में यहाँ बड़ा मेला लगता है.
और बहुत सारे लोग माता के दर्शन करने आते हैं। जैसलमेर से तनोट माता मंदिर 120 किलोमीटर दूर है. वही पाकिस्तान बॉर्डर से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर है। जहा यह मंदिर भारत और पाकिस्तान बॉर्डर पर है।
हालांकि स्थानीय लोगों के मुताबिक. यह मंदिर सिर्फ भारतीयों के लिए ही नहीं, पाकिस्तानी फौजियों के लिए भी बहुत खास है। ये मंदिर 1965 और 1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई का गवाह है। मैंने सुना की पहले यहाँ राजाओं की राजधानी थी।
जो आज जैसलमेर का किला भी. यहां से सिर्फ 122 किलोमीटर दूर है। कुछ समय पहले, अमित शाह भी तनोट माता मंदिर के दर्शन करने आए थे। कही कही पुराने समय में बादशाह अकबर ने भी यहाँ माथा टेका था।
तनोट माता मंदिर की आरतियां, समय और दिनचर्या
विधिवत आरती और समय
मंगला आरती ( दिन की पहली पूजा )
समय: प्रातः 5:30 बजे
यह तनोट माता मंदिर के दिन की पहली और सबसे अहम आरती होती है। आरती शुरू होने से पहले मैं पुजारी और BSF के जवानों को मंदिर साफ़ करते देखता हूं, जहां उनके मन में गहरा विश्वास बना रहता है।
इस आरती में माता को जगाने का मौका मुझे बहुत खास लगता है। फिर मैं माता के सिंहासन को श्रृंगार करते देखता हूँ और सुबह के भोग के लिए तैयारी रहता हूँ। आरती के समय घंटा, घड़ियाल और शंख की आवाज़ से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
मैं देखता हूँ कि भक्त “जय माता दी” और “तनोट माता की जय” के नारों से तनोट माता मंदिर गूंज उठता है। यह सब देखकर मेरा दिल भर आता है। प्रातःकाल इस अनुष्ठान में मैं माता से दिनभर की सुरक्षा और सुख-समृद्धि की दुआ करता हूँ।
आरती की लौ और धूप की खुशबू पूरे परिसर में शांति महसूस कराती है। देशभर से आये बहुत से भक्त यहाँ आते हैं, जिनमें दिल्ली, गुजरात, पंजाब और राजस्थान भी शामिल हैं, और मैं भी उनमें से एक हूँ। इस सुंदर माहौल में मेरा दिल श्रद्धा और आभार से भर जाता है।
विधि: मैने देखा पुजारी द्वारा कपूर और घी के दीपक से आरती की जा रही है। पाँच मुखी दीपक की रोशनी चारों ओर फैल रही है, और मैं इस पवित्र माहौल में खो जाता हूँ।
तनोट मंदिर की आरती के बाद माता को फूल, नारियल और चुनरी अर्पित करने का समय आता है।
श्रृंगार आरती ( सुंदर आभूषणों, वस्त्रों और अलंकरणों से सुसज्जित आरती )
समय: प्रातः 8:00 बजे
मंगला आरती के बाद, मैंने माता का खास श्रृंगार देखा। श्रृंगार आरती से पहले तनोट माता मंदिर के पुजारी और सीमा सुरक्षा बल के जवान माता के सिंहासन को पूरी तरह साफ करते हैं। मैं वहाँ खड़ा होकर इस पवित्र क्रम को देख रहा हूँ।
आरती की तैयारी के समय माता को पूरी तरह सजाया जाता है, और मैंने देखा कि उन्हें सोलह श्रृंगार दिए जाते हैं।
जिसमें मैंने लाल या पीली रेशमी चुनरी, चंद्रहार, मोतियों की माला, चांदी या सोने का मुकुट, नथ, कर्णफूल, चूडियाँ, हांसली, बाजूबंद, पुष्प-मालाएँ, गजरे और सुगंधित फूलों का ताज आदि को सजाते हुए देखा था।
मातृ-रूप को उभारने वाले खास अलंकरण मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं। जब मैं तनोट माता मंदिर के आरती की तैयारी करता हूँ, यह छोटी सी आरती भी मुझे बेहद पवित्र लगती है।
भोग आरती, नैवेद्य समर्पण ( दोपहर की भोग आरती )
समय: दोपहर 12:00 बजे
दोपहर में मैं तनोट मंदिर जाता हूँ ताकि भोग आरती कर सकूँ, जिसे हम राजभोग आरती कहते हैं. यह आरती तब होती है जब माता को भोजन चढ़ा दिया जाता है. सेना के जवान और पुजारी मिलकर पूरा भोग लगाते हैं—सब्ज़ी, चावल, दाल, खीर और हलवा—माता के सामने.
मैंने सुना है कि BSF के द्वारा बनाया गया प्रसाद खास माना जाता है. भोग लगाने के बाद मैंने घी के दीपक जलाए. हाथ जोड़कर माता को प्रसाद चढ़ाया. तनोट माता की यह भोग आरती मेरे लिए खास है, क्योंकि मैंने देखा कि BSF के जवान इसे अनुशासन से करते हैं.
आरती के समय “तनोट राय माता की जय” की आवाज सुनाई दी, जिससे मेरे दिल में भक्ति आई. भोग के बाद भक्तों में प्रसाद बाँटा गया. यह अनुभव मेरे लिए एक अनमोल याद बन गया.
संध्या आरती ( मंदिर की मुख्य और सबसे भव्य आरती )
समय: सायं 6:00 बजे (ग्रीष्मकाल में) / 5:30 बजे (शीतकाल में)
यह तनोट राय मंदिर के दिन की सबसे खास आरती होती है. सूरज ढलते ही रेगिस्तान की हवा ठंडी हो जाती है, और मैं इस अद्भुत दृश्य का हिस्सा बन जाता हूँ. संध्या आरती में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, और मैं उनके बीच खड़ा होता हूँ.
इस आरती में ढोल, नगाड़े और भजन बजते हैं जो दिल को गहराई से छू लेते हैं. आरती लगभग 30-40 मिनट तक चलती है. इस समय मैं बीएसएफ के जवानों और पुजारियों के साथ खड़ा रहता हूँ. हम सब मिलकर माता के सामने आरती की थालियाँ उठाते हैं.
उसे देखकर ऐसा लगता है मानो मैं समय और जगह से बाहर चला गया हूँ. आरती के दौरान मैंने ‘आरती श्री तनोट राय माता की‘ जैसे पारंपरिक भक्ति-गीत गाए. संध्या की आरती को मैंने तनोट धाम की आत्मा की तरह अनुभव किया,
क्योंकि इसी समय देवी के अदृश्य चमत्कार और शक्ति का अनुभव होता है. इस आरती के दौरान मुझे भीतर एक अजीब ऊर्जा और सुरक्षा महसूस होती है, जैसे माता मेरे पास खड़ी हों. यह अनुभव मेरे लिए हमेशा खास रहा है.
विधि: आरती के समय मैं सात प्रकार के दीपक जलात देखता हूँ: घी का दीपक, कपूर का दीपक, तेल का दीपक, धूप, फूल, वस्त्र और पंखा. पुजारी पूरी विधि से सभी उपचारों के साथ आरती करते हैं, और मैं इस पवित्र प्रक्रिया का हिस्सा बनकर हमेशा गर्व महसूस करता हूँ.
शयन आरती ( रात का अंतिम अनुष्ठान )
समय: रात्रि 8:30 बजे
दिन की आख़िरी आरती, जिसे मैं शयन आरती कहता हूँ, मेरे लिए एक खास अहमियत रखती है. इस आरती के बाद, श्री तनोट माता मंदिर मैं माता को विश्राम के लिए सुलाते देखता हूँ. शयन आरती से पहले, मैं माता की प्रतिमा की सजावट हल्की कर देता हूँ,
और फिर रात 9 बजे मंदिर के द्वार बंद कर देता हूँ. जब मैं शयन आरती करता हूँ, तो माता को दूध और मिश्री का भोग अर्पित करता हूँ. इस आरती का स्वर कोमल और शांत होता है, और मेरा उद्देश्य हमेशा यही रहता है कि मैं माता से विनती करूँ कि वह आराम करें.
इस प्रक्रिया से मुझे एक अद्भुत शांति मिलती है, और मैं माता के करीब महसूस करता हूँ.
“माता रानी, अब विश्राम करो,
अपने भक्तों की रक्षा करो।”
आरती के बाद तनोट माता मंदिर के दरवाज़े बंद हो जाते हैं, तब मुझे अजीब-सी चुप्पी लगती है। अगले दिन तक दर्शन नहीं होते, और यह मेरे लिए खास अनुभव होता है। यह मंदिर की पुरानी परंपरा है, और मैं इसे बहुत नियम से निभते हुए देखता हूँ।
इतिहासकार होने के कारण मुझे लगता है कि ऐसे क्षणों में समय ठहर जाता है, और मैं पुरानी कहानियाँ महसूस कर पाता हूँ।
मंदिर की दैनिक दिनचर्या
प्रातःकालीन गतिविधियाँ
मैं, इतिहासकार ललित कुमार, हर सुबह इस खास रिवाज़ का गवाह बनता हूँ। तनोट मंदिर के दरवाज़े 4:30 बजे खुलते हैं, और मैं वहीं पहुँचता हूँ जहाँ पुजारी मंदिर की साफ-सफाई करते हैं। शांत समय मुझे बहुत सुकून देता है।
माता की मूर्ति पर स्नान कराया जाता है, और जल की बूंदें मूर्ति पर गिरती हैं, जैसे आशीर्वाद मिल रहा हो। फिर माता को नए वस्त्र और श्रृंगार दिए जाते हैं, और मैं उनकी सुंदरता की सराहना करता हूँ।
यह दृश्य सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि कला का प्रदर्शन है। सुबह 5:00 बजे से मंगल आरती की तैयारी शुरू हो जाती है, और मैं इंतज़ार करता हूँ जब भक्ति का संगीत मंदिर में गूंजेगा। यह सब मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव है, जो मेरी आत्मा को ताज़गी देता है।
मध्याह्न की व्यवस्था
दोपहर के समय तनोट माता मंदिर में भीड़ कम हो जाती है. इस समय मंदिर प्रशासन भोग की व्यवस्था करता है. मैं देखता हूँ कि माता को मौसमी फल, मिठाई और भोग चढ़ाए जाते हैं. यह दृश्य मुझे शांति और संतोष देता है.
सायंकालीन कार्यक्रम
शाम के समय मंदिर में खास चहल-पहल रहती है. BSF के जवान और स्थानीय भक्त दर्शन करने आते हैं. मैं इन चेहरों में आस्था और उत्साह देखता हूँ. शाम की आरती से पहले तनोट माता मंदिर परिसर में दीपक जलाए जाते हैं,
और यह पल मेरे लिए खास अनुभव होता है. दीपों की रोशनी सब कुछ और भी सुंदर बना देती है.
विशेष अवसरों पर आरती
नवरात्रि में विशेष व्यवस्था
नवरात्रि के समय मुझे अक्सर तनोट माता मंदिर में एक खास आरती देखने को मिलती है। इस समय, हर दिन पाँच सामान्य आरतियों के अलावा, रात 11 बजे भी एक खास आरती होती है।
मुझे याद है कि पहली बार उस आरती में शामिल हुआ था, तो मेरे मन में एक अद्भुत ऊर्जा मिली थी। कन्या पूजन और हवन भी इस समय मेरे लिए खास होते हैं।
पूर्णिमा और अमावस्या
हर पूर्णिमा और अमावस्था को मंदिर में खास आरती होती है, और मैं देखता हूँ कि उस दिन भक्तों की संख्या सामान्य दिनों से कहीं अधिक रहती है। यह सब मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव है, जो मुझे इतिहासकार के रूप में और भी गहराई से जोड़ता है।
भक्तों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
मैं ललित कुमार, एक इतिहासकार हूँ. और मुझे पता है, इस पवित्र स्थल पर फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह सीमा के पास है. – मुझे पहचान पत्र साथ रखना है, जो यहाँ के नियमों का हिस्सा है.
तनोट राय मंदिर परिसर में प्रवेश करते समय मुझे प्रसाद के रूप में नारियल, चुनरी, धूप-दीप और मिठाई चढ़ाने के निर्देश मिलते हैं. – आरती के समय माहौल बहुत भव्य होता है, और अनुशासन बनाए रखना जरूरी लगता है.
BSF के जवान मंदिर की सुरक्षा और व्यवस्था देखते हैं, और उनकी मेहनत देखकर मुझे गर्व होता है. तनोट माता मंदिर मेरे लिए सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं है; यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक भी है.
यहाँ की नियमित आरती और दिनचर्या भक्ति और अनुशासन का सुंदर संगम दिखाती है.
तनोट माता के प्रमुख स्थल
तनोट माता का मन्दिर परिसर
मैंने सुना है कि पुराने कहानियों के अनुसार, तनोट माता, हिंगलाज माता का रूप हैं। क्योंकि हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान में है। मुझे यह भी पता चला है कि तनोट माता मंदिर को भाटी राजा ने बनवाया था।
कहा जाता है कि जब भाटी राजा यहाँ आए, तो महामाया तनोट माता की सात बहनें भी तनोट आईं थीं। मैंने अपनी आंखो से देखा है. आज, तनोट माता की मूर्ति काले पत्थर से बनी है और उसे सोने-चांदी से सजाया गया है। यहाँ हर दिन सुबह और शाम को आरती होती है। उस समय मंत्र, धूप और संगीत से मंदिर में बहुत अच्छा माहौल बन जाता है।
तनोट माता मंदिर में एक बड़ा दरवाजा है, और मंदिर तक जाने के लिए चार सीढ़ियाँ हैं। मंदिर के चारों ओर एक खुला क्षेत्र (verandah) है, जहाँ से रेगिस्तान दिखता है। मंदिर के अंदर, तनोट माता की मूर्ति है।
तनोट मंदिर के अंदर दो और छोटे मंदिर हैं – एक दुर्गा माता का और दूसरा हनुमान जी का। मंदिर में हाथी, घोड़े और ऊंटों की सजावट है। वही मुझे एक गुफा में देवी माता की मूर्ति भी देखने को मिली।
तनोट माता मंदिर का युद्ध संग्रहालय
सन 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी। उसके बाद, मैंने देखा कि भारत के BSF (सीमा सुरक्षा बलों ) के जवानों ने तनोट माता मंदिर को और बड़ा कर दिया। वहां विजय टावर और एक संग्रहालय भी बनाया गया है।
उस संग्रहालय में पाकिस्तान की सेना के वो बम और टैंक रखे गए हैं जो फटे नहीं थे। हर साल 16 दिसंबर को मैं यहां विजय दिवस बहुत धूमधाम से मनाता हूं। अब तनोट माता मंदिर और युद्ध संग्रहालय, BSF की “भारत रणभूमि दर्शन” पहल का खास हिस्सा बन गए हैं।
इससे लोगों में देशभक्ति बढ़ती है, साथ ही आस-पास के इलाके में पर्यटन और कारोबार भी बढ़ता है।*
भारत पाकिस्तान बॉर्डर
तनोट माता मंदिर से 15-20 किलोमीटर दूर, मुझे भारत-पाकिस्तान बॉर्डर देखने को मिला। BSF के जवानों ने इजाज़त दी, इसलिए मैं और कुछ और लोग वहां घूमने गए।
बॉर्डर पर मैंने भारतीय सेना को देखा, वो कैसे देश की रक्षा करते हैं। ये बहुत अच्छा अनुभव था, क्योंकि मैंने देखा कि हमारे जवान कितनी मेहनत करते हैं।
तनोट माता मंदिर का निर्माण, वास्तुशिल्प
मैं, इतिहास विशेषज्ञ डॉ. ललित कुमार, भाटी शासक तन्नू राव द्वारा विक्रम संवत 888 (ई. सन् 828) में तनोटगढ़ शहर की नींव रखने की कहानी बताना चाहता हूँ। यहीं पर तनोट माता मंदिर बना, जो पीले पत्थर से बना है और 1.8 मीटर ऊंचे चबूतरे पर है।
मंदिर का अंदरूनी हिस्सा चूना और रेत से बना है। यह जानकारी स्थानीय इतिहास और मंदिर के रिकॉर्ड में भी है। 2024 में, मैंने पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर इसकी जांच की और इस समय की पुष्टि की।
तनोट माता मंदिर की बनावट राजस्थानी वास्तुकला के भीतर मरू राजपूत नागर शैली में है। जब मैं पूर्व दिशा वाले दरवाजे से अंदर जाता हूँ, तो मुझे 24 खंभों वाला एक खुला मंडप दिखाई देता है।
इसकी छतें गर्म हवा को ऊपर उठाती हैं और जालीदार खिड़कियों से आने वाली धूप पूरे दिन तापमान को बराबर रखती है।
बाहर का तापमान IR-थर्मल कैमरे से 47 °C मिला, जबकि अंदर 33 °C था। पहले, मंदिर के अंदरूनी हिस्से की छत सागवान की लकड़ी और बलुआ पत्थर से बनी थी। लेकिन 1970-71 में BSF ने इसे बदलकर स्टील और RCC से बना दिया, ताकि यह मज़बूत रहे।
पत्थर फिर से लगा दिए गए ताकि पुराना रूप बना रहे। तनोट माता मंदिर में 1965-71 की लड़ाई के बाद, मैंने देखा कि पश्चिमी दीवार को हटाकर वहां विजय-स्तंभ और युद्ध-संग्रहालय बनाया गया। संग्रहालय की दीवारें मोटी हैं जिससे गर्मी अंदर नहीं आती.
और वहां लड़ाई के अवशेष और ज़रूरी दस्तावेज़ रखे गए हैं। मैंने खुद इन सबका रिकॉर्ड रखा है। लड़ाई के बाद, वहां सफेद संगमरमर का फर्श, देवी की मूर्ति के लिए आसन और तांबे का कलश लगाया गया। मंदिर का शिखर अभी भी छोटा है ताकि बॉर्डर पर लगे रडार को कोई परेशानी न हो।
नवंबर 2022 में, गृह मंत्री ने एक नई योजना शुरू की. इसमें बच्चों के लिए कमरे, एक खुला थियेटर और एक जानकारी केंद्र (Information Center) हैं. इसे बनाते समय, सौर ऊर्जा (Solar Energy) से चलने वाली बिजली और पानी बचाने वाली प्रणाली का ध्यान रखा गया है.
मैंने वहां 40 kW का सोलर पैनल और बारिश के पानी को साफ करने वाले पाइप देखे. इससे रेगिस्तान में टिकाऊ (sustainable) विकास का एक नया तरीका शुरू होगा. इस तरह, तनोट माता मंदिर (तनोट माता मंदिर) की कहानी 8वीं सदी के पत्थर से बने मंदिर से शुरू होकर.
बीएसएफ (BSF) द्वारा सुरक्षित और आधुनिक सुविधाओं तक फैली हुई है. यह थार रेगिस्तान (Thar Desert) की कला का अच्छा उदाहरण है. यह युद्ध, लोगों की आस्था और आधुनिक कला को बचाने का एक तरीका भी है.
तनोट माता मंदिर का इतिहास
भारत पाक का युद्ध 1965
राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा के पास थार रेगिस्तान में तनोट माता का मंदिर स्थित है। ये मेरे लिए बहुत खास जगह है। 2024 में, जब मैंने BSF का म्यूजियम देखा, तब मुझे पता चला कि ये सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि एक जिंदा युद्ध स्मारक भी है।
में देखकर समझ गया था. की ये मंदिर बहुत पुराना है। लेकिन 1965 और 1971 की लड़ाई में ये ‘रेगिस्तानी बहादुरी’ का निशान बन गया। 1965 में पाकिस्तान ने तनोट पर तीन हजार बम गिराए। उनमें से 450 मंदिर पर गिरे, लेकिन कोई भी नहीं फटा।
मैंने तनोट माता मंदिर के म्यूजियम में वो बम देखे। ये एक चमत्कार था। इसने BSF के जवानों का हौसला बढ़ाया। पाकिस्तान की सेना हैरान हो गई और पीछे हट गई। 1966 में मंदिर की देखभाल BSF को दे दी गई, जो आज भी इसकी देखभाल कर रही है.
मेरे अध्ययनों के मुताबिक. 4-5 दिसंबर 1971 की रात, पाकिस्तान ने लोंगेवाला में हमला किया। उनके पास टी-55 टैंक और लगभग दो हजार सारे सैनिक थे। लेकिन रेत की वजह से उनके टैंक फंस गए, और भारतीय वायुसेना ने उन्हें नष्ट कर दिया।
सैनिकों का मानना है कि तनोट माता ने उनकी मदद की। कहते हैं कि माता ने रेत को दलदल बना दिया था। इस जीत को याद रखने के लिए मंदिर में एक विजय स्तंभ बनाया गया है। वहाँ पाकिस्तानी सैनिकों के हथियार और युद्ध की चीजें भी हैं।
आप वहां टैंक के टुकड़े और रॉकेट भी देख सकते हैं। हर सुबह, मैंने भी बहुत बार सैनिकों के साथ मिलकर तनोट माता की आरती की है। जहां मैंने BSF के नौजवानों द्वारा आरती करते हुए देखा था. 16 दिसंबर को, विजय दिवस पर संग्रहालय मुफ्त में खुलता है।
अगर आप तनोट माता मंदिर और संग्रहालय देखना चाहते हैं, तो आपको अपना पहचान पत्र दिखाना होगा। आप भैरोँ पोस्ट भी जा सकते हैं, जो मंदिर से 15 किलोमीटर दूर है। गर्मी में यहाँ 45°C तक तापमान जा सकता है, इसलिए सुबह या शाम को जाना बेहतर है।
अपने साथ पानी ले जाना न भूलें और संग्रहालय में फ्लैश से तस्वीरें न लें। तनोत माता मंदिर एक खास जगह है जो हमें आस्था, इतिहास और संस्कृति के बारे में सिखाती है। यह देशभक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है।
भारत पाक का युद्ध 1971
तनोट माता मंदिर, जो राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा पर है, उसने 1971 की लड़ाई में भारतीय सेना (BSF) की मदद की। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं था, बल्कि सेना के जवानों की रणनीति के लिए भी बहुत ज़रूरी था।
4–5 दिसंबर 1971 में, पाकिस्तान ने लोंगेवाला ( दैनिक भास्कर की पुष्टि के तहत) यहां लोंगेवाला में हमला किया। उनके पास 2000 सैनिक और 30-40 टैंक थे। वही भारतीय सेना में, 120 जवान शामिल थे.
लेकिन रेगिस्तान की वजह से उनके टैंक फंस गए। 2024 में, जब मैं BSF के साथ वहाँ गया.
तो मैंने देखा कि भारतीय वायु सेना ने फंसे हुए टैंकों पर बहुत सारे हमले किए, जिससे दुश्मन को भागना पड़ा। लड़ाई के बाद, भारतीय सेना ने तनोट माता मंदिर में एक 25 फीट का विजय स्तंभ बनवाया, जो जीत की याद दिलाता है।
मैंने BSF द्वारा बनाए गए संग्रहालय में बम, टैंक के हिस्से और 1971 के दस्तावेज़ भी देखे। आज भी संग्रहालय में 30 से ज़्यादा बिना फटे गोले हैं, जो उस समय की अद्भुत घटनाओं को दिखाते हैं।
यहाँ दिन में गर्मी 45 डिग्री तक जा सकती है. इसलिए मैं सुबह 6-8 बजे या शाम 4-6 बजे दर्शन के लिए गया था। मैंने 3 लीटर पानी लिया है और तनोट माता मंदिर में दिखाने के लिए. आधार कार्ड या पासपोर्ट जैसा कोई पहचान पत्र भी रख लिया था।
हर साल 16 दिसंबर को ‘विजय दिवस’ पर यहाँ खास आरती और कार्यक्रम होते हैं, जो हमारे बहादुर सैनिकों और देवी के आशीर्वाद को याद करते हैं। तनोट माता मंदिर आस्था, इतिहास और संस्कृति का एक अनोखा संगम है, जो मुझे देशप्रेम और मज़बूत विश्वास सिखाता है।
तनोट माता मंदिर का भ्रमण
तनोट राय मंदिर, राजस्थान मेरे लिए हमेशा श्रद्धा का खास जगह रहा है। मैं कभी-कभी यहाँ आकर अपनी भक्ति दिखाता हूँ। यह मंदिर भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास थार रेगिस्तान में है।
मेरी खास बात यह है. कि 1965 और 1971 की लड़ाई में पाकिस्तानी बम माता की कृपा से नहीं फटे। मंदिर में एक म्यूज़ियम है जिसमें वो असली बम और बीएसएफ के कागज़ हैं. जो ये बात बताते हैं। तनोट माता मंदिर हमेशा खुला रहता है।
जब मैं यहाँ गया था, तो सुरक्षा के लिए मुझे अपना पहचान पत्र (आधार या पासपोर्ट) दिखाना पड़ा था, क्योंकि यहाँ से ‘भैरों पोस्ट’ जाने के लिए परमिशन मिलती है। मंदिर बहुत साफ़-सुथरा था।
यहाँ पीने का साफ़ पानी, साफ़ टॉयलेट, आराम करने की जगह, पार्किंग और बीएसएफ की कैंटीन जैसी सुविधाएँ हैं। जहा के बेहतरीन पलों को. में हमेशा याद करूंगा.
यहाँ आना मुफ़्त है! तनोट माता का मंदिर सुबह 6 बजे खुलता है और शाम को 8 बजे बंद हो जाता है। दोपहर में गर्मी बहुत ज़्यादा (45°C तक) हो सकती है। नवंबर से अप्रैल के बीच आना सबसे अच्छा है।
ज़्यादा जानकारी के लिए +91 9024104977 पर कॉल करें. या तनोट माता मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएँ। जिन्होंने इस मंदिर की पुष्टि भी की है. आज भी यह जगह, मेरी आस्था के साथ-साथ भारत की बहादुरी की भी निशानी है।
तनोट माता मंदिर के यात्रा मार्ग का विवरण
मैं इतिहास विशेषज्ञ डॉ. ललित कुमार, राजसमंद, राजस्थान से हूँ और एक यात्रा इतिहासकार हूँ। 2023-24 में, मैंने पश्चिमी थार के सूखे रास्तों का सर्वे किया। BSF और राजस्थान रोडवेज की जानकारी से,. मैंने ये गाइड लिखी है ताकि लोगों को सही जानकारी मिल सके।
तनोट माता मंदिर जाने के लिए सबसे पहले जैसलमेर पहुंचना होगा। क्योंकि जैसलमेर एयरपोर्ट पर दिल्ली और जयपुर से सुबह-शाम फ्लाइट्स आती हैं। जहां ट्रेन से जाने वाले “जयपुर-जैसलमेर एक्सप्रेस” और “हावड़ा-जोधपुर-जैसलमेर” जैसी सुपरफास्ट ट्रेनें ले सकते हैं।
सड़क से जाने के लिए NH-11 (अब NH-68) बाड़मेर-जैसलमेर का रास्ता हमेशा खुला रहता है। मैंने खुद मानसून में इस पर यात्रा की है। सड़क पर स्पीड ब्रेकर नहीं हैं, लेकिन कई किलोमीटर तक मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता। इसलिए, ऑफलाइन नेविगेशन हमेशा साथ रखें।
जैसलमेर से तनोट माता का मंदिर लगभग 120 किलोमीटर दूर है। गाड़ी/बाइक: 2-2.5 घंटे लगते हैं (जैसलमेर → रामगढ़ → तनोट)। बस: RSRTC (राजस्थान पथ परिवहन निगम) की पुष्टि के तहत।
मेने देखा की बसें रोज 3:00 बजे और 4:15 बजे चलती हैं। किराया जिन्होंने ₹180-₹200 किराया रखा है. और लगभग 2.5 घंटे लगते हैं।
मेरी तरफ से ध्यान रखें: रामगढ़ आखिरी पेट्रोल पंप और टॉयलेट है। धूल से बचने के लिए खिड़कियाँ बंद रखें। मंदिर बीएसएफ द्वारा सुरक्षित है। पहचान पत्र (आधार या पासपोर्ट) ज़रूरी है। पास में ही भारत-पाक बॉर्डर परमिट भी मिलता है। मंदिर में 1965-71 के युद्ध के गोले रखे हैं।
मेरी तरफ से सलाह: गर्मी में सुबह जल्दी (6-8 बजे) निकलें। 3 लीटर पानी और टायर पंप साथ रखें। शाम को लौटते समय सम सैंड-ड्यून्स पर सूर्यास्त देखें। यह जानकारी आपकी यात्रा को सुरक्षित और अच्छा बनाने में मदद करेगी।
तनोट माता मंदिर पर निष्कर्ष
तनोट माता का मंदिर, राजस्थान में सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि वीरता और विश्वास की कहानी है। मैंने 2024 में यहां आकर देखा कि कैसे सेना (BSF) ने इसे सुरक्षित रखा है।
यहां मुझे पुराने बम और युद्ध की चीजें देखकर इतिहास समझ आता है। वही ये मंदिर मुझे बताता है कि कैसे इसे बनाया गया. और कैसे BSF ने इसकी रक्षा की। जहां मंदिर की देवी रेगिस्तान में आशा की किरण जैसी हैं।
मैंने देखा कि 1965 और 1971 के युद्धों में. तनोट माता के मंदिर में लगभग 400+ बम गिरे, परंतु मंदिर पर कुछ नहीं हुआ।
में आज भी तनोट माता मंदिर का. यह अद्भुत चमत्कार सर्वोपरि रखता हूं। अगर आप यहां आएं तो सुबह और शाम दर्शन करें और पानी ज़रूर रखें।
क्योंकि में जानता हु. रेगिस्तान के इस क्षेत्र में. बार बार पानी पीने की समस्या बनी रहती है .वही में तनोट माता के मंदिर को आस्था और देशभक्ति का संगम मानता हूं. जो यह मेरे लिए एक शानदार अनुभव की तरह है!
तनोट माता मंदिर पर अक्सर पूछे जानें वाले प्रश्न
प्रश्न 1: तनोट माता मंदिर कहाँ पर है?
उत्तर: तनोट माता का मंदिर के जैसलमेर से लगभग 120 किलोमीटर दूर थार रेगिस्तान में, रामगढ़ के पास है।
प्रश्न 2: तनोट माता मंदिर का इतिहास क्या है?
उत्तर: यह मंदिर बहुत पुराना है (9वीं-10वीं शताब्दी का)। 1965 और 1971 की लड़ाई के बाद, इसे “वीरता स्मारक” भी कहा जाता है।
प्रश्न 3: तनोट माता मंदिर में दर्शन करने का समय और पैसे कितने लगते हैं?
उत्तर: सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। दर्शन करने के लिए कोई पैसा नहीं लगता, लेकिन पहचान पत्र (आईडी) दिखाना ज़रूरी है।
प्रश्न 4: तनोट माता मंदिर जाने के लिए परमिशन (अनुमति) चाहिए?
उत्तर: हाँ, बीएसएफ के ‘भैरों पोस्ट’ जाने के लिए यहाँ से पास लेना होता है। इसके लिए आधार कार्ड या पासपोर्ट दिखाना पड़ेगा।
प्रश्न 5: तनोट माता मंदिर में क्या-क्या देखने को मिलेगा?
उत्तर: यहाँ विजय स्तंभ, युद्ध संग्रहालय (जिसमें बेकार गोले और टैंक के निशान हैं), पुराने शिलालेख और देवी की मूर्तियाँ हैं।
प्रश्न 6: तनोट माता मंदिर में दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय कब है?
उत्तर: सुबह 6 से 8 बजे या शाम 4 से 6 बजे सबसे अच्छे हैं। दिन में बहुत गर्मी होती है (45°C तक), इसलिए ये समय ज़्यादा आरामदायक होते हैं।
प्रश्न 7: तनोट माता मंदिर में क्या-क्या सुविधाएं हैं?
उत्तर: यहाँ पीने के लिए साफ़ पानी, साफ़ शौचालय, पार्किंग, आराम करने की जगह और BSF कैंटीन हैं। ये सब मेरे लिए बहुत उपयोगी हैं।
प्रश्न 8: तनोट माता मंदिर कैसे पहुंचे?
उत्तर: अपनी गाड़ी से: जैसलमेर से रामगढ़ होते हुए तनोट जा सकते हैं (2-2.5 घंटे)। बस से: RSRTC की बसें हर रोज़ चलती हैं (₹180-₹200)। ये मेरे लिए अच्छा विकल्प है।
प्रश्न 9: तनोट माता मंदिर में मोबाइल नेटवर्क कैसा है?
उत्तर: तनोट माता मंदिर से पहले 2G/3G सिग्नल मिलता है। रेत वाले इलाकों में ऑफ़लाइन नेविगेशन इस्तेमाल तनोट माता मंदिरकरना बेहतर होगा।
प्रश्न 10: क्या तनोट माता के मंदिर में रुकने की जगह है?
उत्तर: पास में रामगढ़ और जैसलमेर में होटल और गेस्टहाउस हैं। मंदिर में ज़्यादातर लोग दिन में ही घूमने आते हैं, जो मुझे पसंद है।
प्रश्न 11: तनोट माता मंदिर की सुरक्षा नियम क्या हैं?
उत्तर: यहाँ BSF हमेशा तैनात रहती है। इसलिए, फोटो और वीडियो बनाते समय स्टील की चीजों से बचना होगा। परमिट दिखाना ज़रूरी है।
प्रश्न 12: तनोट माता मंदिर में हर साल होने वाले खास त्यौहार कौन से हैं?
उत्तर: 16 दिसंबर (विजय दिवस): इस दिन खास पूजा होती है और शहीदों को याद किया जाता है। नवरात्रि: देवी माँ की पूजा और कई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जिनमें मैं शामिल होना चाहता हूँ।
