झांसी किले के इतिहास का परिचय | Jhansi Fort History
झांसी का किला, भारत के ऐतिहासिक किलों में से एक है। जो भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी शहर में स्थित है। जो पूरी तरफ झांसी शहर के मध्य में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की बंगरा पहाड़ी पर स्थित है।
यहां से पूरे शहर का नजारा दिखता है।
वही झांसी किले की ऐतिहासिक पहचान की बात करे तो। यह किला मुख्यतः 1857 में स्वतंत्रता संग्राम झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के वीरतापूर्ण संघर्ष से जुड़ा हुआ है। जो अपने संघर्ष की गौरवगाथाएं सुनाता है।
यह दुर्ग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। जहां प्रतिदिन बड़ी अल्पसंख्या में पर्यटक। इस दुर्ग को देखने आते है। तथा अपनी यात्रा ओर इस दुर्ग के भ्रमण का भरपूर आनंद लेते है।
झांसी किले का भूगोल (आसपास का आकर्षण)
स्थान और ऊंचाई
झांसी का किला समुद्र तल से 285 मीटर ऊंचा है। यह बंगरा पहाड़ी पर है, जो सुरक्षा देती है। किला शहर के बीच में है। आसपास ग्रेनाइट चट्टानें हैं। किले का क्षेत्रफल 15 एकड़ है और यह ग्रेनाइट पत्थर से बना है।
इसकी लंबाई 312 मीटर और चौड़ाई 225 मीटर है। किला शहर की दीवारों से दक्षिण में जुड़ा है। पहाड़ी चढ़ाई थोड़ी कठिन है, लेकिन दृश्य शानदार है। यह स्थान 17वीं शताब्दी से महत्वपूर्ण रहा है।
आकार और संरचना
झांसी के किले की बाहरी दीवारें 16 से 20 फीट मोटी हैं और ये अभेद्य हैं। यहां 22 बुर्ज हैं। दो तरफ रक्षा खाइयां हैं। अंदर बड़ा घास का मैदान है। 10 फाटक हैं, जैसे खंडेराव गेट और दतिया दरवाजा।
जलाशय पानी की आपूर्ति करता था। Bharat Mata साइट पर विस्तार से पढ़ें। मराठा स्थापत्य कला के उदाहरण बारादरी और पंचमहल हैं।
भू-आकृति और पर्यावरण
झांसी का किला पहाड़ी इलाके में है। आसपास बुंदेलखंड का पठारी भूभाग है और यह ग्रेनाइट चट्टानों से घिरा है। वर्षा में खाइयां पानी भर लेती हैं। शहर किले के चारों ओर फैला है। ऊंचाई से झांसी का दृश्य बहुत सुंदर है। पर्यावरण हरा-भरा है।
प्रमुख आंतरिक स्थल
झांसी किले में शिव मंदिर, गणेश मंदिर, रानी झांसी गार्डन और कड़क बिजली तोप है। गुलाम गॉस खान की मजार भी है। संग्रहालय में मूर्तियां हैं। ये सभी भूगोल से जुड़े हैं। पहाड़ी पर होने से संतुलन मजबूत है। विकिपीडिया पेज देखें।
संरक्षण और महत्व
1938 से केंद्र सरकार इसका संरक्षण कर रही है। भूगोल ने इसे युद्धकाल में अभेद्य बनाया। आज यह एक पर्यटन स्थल है। व्यक्तिगत भ्रमण में किले की मजबूती प्रभावित करती है.
” झांसी का किला अपने आत्मसम्मान, वीरता, शौर्य, साहस ओर बलिदान का प्रतीक भी माना जाता है जिसके अंतर्गत सर्वप्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में रानी लक्ष्मी बाई को याद किया जाता हैं “
झांसी किले की इमारतें एवं वास्तुकला
झांसी किले के निर्माणकर्ता एवं स्थापना
झांसी किले का प्रथम निर्माण कार्य। बुंदेला के राजपूत राजा ”वीर सिंह जूदेव” ने करवाया था। जिसकी शुरुआत 1602 ईस्वी में की गई थी। यह भव्य दुर्ग लगभग 10 साल बाद। 1613 ईस्वी में पूरी तरह बनकर तैयार हुआ।
इसके बाद, झांसी के पुनर्निर्माण में कई शासकों ने। किले की निर्माण प्रक्रिया में अपना अपना योगदान दिया। तथा उनके द्वारा किले में कई सुधार किए गए।
मराठा की शासन प्रक्रिया में। झांसी का किला ओर भी स्वचालित रूप से मजबूत किया गया।
झांसी किले रानी लक्ष्मी बाई की शासन प्रक्रिया में। यह किला 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का गवाह बना।
निर्माण सामग्री और शैली का प्रभाव
किले का निर्माण मूल रूप से ग्रेनाइट ( कठोर पत्थरों ) द्वारा किया गया था। जिससे किले की दीवारें मजबूत ओर आज भी टिकाऊ बनी हुई है। वही वास्तुकला के रूप में बुंदेला शैली का प्रभाव देखने को मिलता हैं।
वही किले को मध्य नजर रखते हुए। उनमें आकर्षक डिजाइन दिया गया। जो दिखने में प्राचीन वास्तुकला का उत्कृष्ठ उदाहरण है। जो अपने वर्तमान समय में भी उसी अवस्था में खड़ा है।
किले के प्रवेश द्वार ( दरवाजे )
झांसी किले के बाहर की ओर चारों तरफ। विशाल दीवारें हुआ करती थी। जिसे परकोटा के नाम से जाना जाता है। वही किले में प्रवेश करने के लिए। बड़े बड़े 10 द्वार हुआ करते थे।
जिनमें धतियां गेट, ओरछा गेट, उनाव गेट, लक्ष्मी गेट संयर गेट, बड़ा गांव गेट आदि शामिल है। इन सभी प्रवेश द्वारों के बीच झांसी का यह दुर्ग था। दूसरी ओर जब भी कोई दुर्ग के अंदर या फिर बाहर की ओर जाता। तो उसको प्रवेश द्वारों पर स्थित पहरेदारों के द्वारा उनसे पूछताछ की जाती थी।
आखिर जैसे ही हम झांसी किले के अंदर की ओर प्रवेश ( Visit ) करते है। तो हमे झांसी दुर्ग के प्रवेश द्वार दिखाई देते है। जिनकी Hight तकरीबन 12·15 फीट के बीच है। हालांकि यह द्वार राजाओं के शासनकाल में लकड़ी के बने होते थे। जिनकी दिखावट काफी आकर्षक ओर वर्तमान में प्रेरणदायक है। जो यहां प्रतिदिन आए पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनता है।
लेकिन अंग्रेजों के आक्रमण के दौरान। लकड़ी के दरवाजों को। लोहे के दरवाजों में तब्दील कर दिया गया। जो दिखने में अब छोटा दिखाई पड़ता है। इन्हीं कुछ दरवाजों को बंद करते वक्त। यह अंग्रेजों के ध्वज का आकार में परिवर्तित हो जाते है।
किले की विभिन्न दीवारें
किले की मजबूत सुरक्षा के लिए। मजबूत ओर मोटी दीवारों का निर्माण करवाया गया। जिनकी साइज तकरीबन 20·30 फीट के बराबर है। मुख्य दीवारों में पतले पतले चैनल्स ( लगभग 1’ * 1’ के आले, बॉक्स ) बनाए गए थे।
ताकि किसी भी आक्रमणकारियों द्वारा आपातकालीन स्थिति के समय। उन पर उबलता हुआ गर्म पानी या गर्म तेल डाला जा सके।
दूसरी ओर तोप रखने के लिए। दीवारों के बीच में लगभग 2’ * 2’ का स्पेस रखा गया। जहां से दुश्मनों के ऊपर निशाना साधकर तोप चलाई जाती। यहां की दीवारें काफी छोड़ी ओर मजबूत है। जो वर्तमान समय में भी टिकाऊ है।
किले के भीतर की आंतरिक संरचनाएं
दुर्ग के भीतर अनेकों संरचनाएं स्थापित हैं। जिनमें कुछ निम्नलिखित है। झांसी किले में रानी का महल, पंच महल, महल, सैनिकों के कक्ष ( रूम ), चर्च, मंदिर, फांसी गृह, प्रवेश द्वार ओर किले की मुख्य दीवारों आदि शामिल है।
किले में स्थित कुछ ऐसी गुप्त जगह भी मौजूद है। जिन्हें बाहर की तरफ से देखा जा सकता है। जिनमें सुरंगे, गुप्त रास्ते ओर तहखाने आदि शामिल हो सकते है। जिन्हें सरकार के तहत अब बंद कर दिया गया हो।
किले के अन्य विशेष निर्माण
झांसी किले की मरम्मत के वक्त प्राचीन सड़कों को नष्ट कर दिया गया। जो कभी कच्ची सड़के हुआ करती थी। जहां हमें आज की आधुनिक मशीनरी द्वारा निर्मित डामर की सड़कें। किले के कुछ हद तक के जमीनी फर्श पर देखने को मिलती है।
वही इन सड़कों के आसपास के भू भाग पर। पेड़ो की प्रजातियां लगाई गई है। जो झांसी के किले को वर्तमान समय में खास बनाती हैं। अर्थात् आए दिन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बनती है।
यदि हम इन्ही पेड़ पौधों की प्रजातियों के आगे की ओर देखे। तो हमे विभिन्न सैनिकों के कक्ष दिखाई देंगे। जहां कभी दुर्ग की रक्षा करने के लिए। यहां सैनिक रहा करते थे।
हालांकि किले के निर्माण में कुछ आधुनिक निर्माण कार्य भी होता चला आ रहा है। जिसकी देखरेख भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ( ASI ) के तहत लागू किया जाता हैं। जिन्हें प्रमीशन सरकार के तहत दी जाती है।
झांसी किले के कुछ प्रमुख पर्यटन जगहें
पंच महल ( झांसी दुर्ग )
पंच महल वह महल है। जिसे रानी लक्ष्मी बाई का पंच महल भी कहा जाता हैं। जिसके अंदर रानी लक्ष्मी बाई और उनके पति गंगाधर राव इसी महल में रहा करते थे।
वही सबसे ऊपर ( शीर्ष स्तर ) पर कभी रानी का शीश महल हुआ करता था। जिसको अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। ओर उसे मीटिंग हॉल ( Mitting Hall ) में तब्दील कर दिया गया।
ठीक दूसरे शीर्ष स्तर पर कभी दरबार लगा करता था। तीसरे शीर्ष स्तर ( भाग ) पर रानी लक्ष्मी बाई का झूला महल हुआ करता था। चौथे स्तर पर कभी दीवान ए आम ओर दीवान ए खास हुआ करता था।
हालांकि दीवान ए आम ओर दीवान ए खास वह स्थान था। जहां से राजा ओर उनकी रानी प्रजा की सुनवाई वगैरह करते थे।
रानी लक्ष्मी बाई का महल ( झांसी की रानी )
झांसी के किले में रानी महल वह महल है। जिसका निर्माण कार्य झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने स्वयं करवाया था। जब 1853 ईस्वी में गंगाधर राव का देहांत हो चुका था। वही रात्रि के समय रानी लक्ष्मी बाई इसी महल में रहा करती थीं। जहां दिन में वह दूसरी जगह शासन चलाती थीं।
रानी का यह महल कभी चार मंजिला इमारत हुआ करता था। हालांकि अंग्रेजों के आक्रमण के चलते। अंग्रेजों द्वारा दो इमारतों को नष्ट ( खंडित ) कर दिया गया।
क्योंकि रानी के महल के निकट अंग्रेजों का चर्च स्थित है। जो रानी महल के शीर्ष स्तर से छोटा दिखाई देता था। जिसके कारण अंग्रेजों ने 2 फ्लौर को गिरा दिया। जिसके बाद रानी के महल के शीर्ष स्तर से ऊपर। अब चर्च दिखाई देता है।
किले का शिव मंदिर
झांसी किले के अंतर्गत एक पवित्र शिव मंदिर भी है। जो भगवान् शिव को समर्पित है। जिसका निर्माण कार्य भी उसी कालखंड में करवाया गया था। जब झांसी की रानी लक्ष्मी बाई यहां पूजा अर्चना करने आती थी।
वही शिव मंदिर के आसपास खुला प्रांगण है। जहां कुछ मात्र में पेड़ों की प्रजातियां है। मंदिर मुख्य रूप से पत्थरों से निर्मित है। जहा नागर शैली का प्रभाव हमे देखने को मिलता है. जिसके बाहरी हिस्सा में. कुछ हद तक केसरिया रंग से रंगा हुआ है। मंदिर दिखने में काफी छोटा है। परंतु भगवान की दृष्टि बेहद ही आकर्षक है।
दुर्ग में स्थित गणेश मंदिर
भगवान् गणेश का यह मंदिर। भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण मराठाओं के आगमन पर। 19वीं शताब्दी में बनाया गया था। जिसकी दिखावटी मराठी वास्तुकला में प्रदर्शित है।
मंदिर में भगवान् गणेश की विशाल प्रतिमा स्थापित है। जो दिखने में बेहद ही खूबसूरत है। हालांकि यह मंदिर वर्तमान समय में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ हैं।
वही कहा जाता है झांसी के किले की लक्ष्मी बाई यहां पूजा अर्चना करने के लिए आया करती थीं। जिसके निकटतम भगवान शिव का मंदिर स्थापित है।
कुदान स्थल, छलांग स्थल ( क्योंकि मारी थी छलांग )
कहा जाता है रानी लक्ष्मी का एक देवर हुआ करता था। जिसका नाम दौराजी राव था। इस दौराजी राव की ड्यूटी किले के ओरछा गेट पर थी। वही जब अंग्रेजों ने ओरछा गेट से किले में प्रवेश करने की सोची।
तब अंग्रेजों ने दौरा जी राव से कहा कि हमें तो सिर्फ रानी लक्ष्मी बाई से मतलब है। हालांकि यदि तुम हमे किले में प्रवेश करने दोगे। तो झांसी किले का सम्पूर्ण राजपाठ तुम्हारे नाम कर दिया जाएगा।
इतना सुनते है रानी लक्ष्मी बाई का देवर। दौराजी राव लालच में आ गया। ओर उसने अंग्रेजों के लालच में आकर। ओरछा गेट खोल दिया।
इसके बाद अब अंग्रेज झांसी किले में प्रवेश कर चुके थे। जहां रानी लक्ष्मी बाई के पास बचने का रास्ता नहीं था। तभी रानी लक्ष्मी बाई ने। एक क्षत्राणि को घोड़े पर सवार होकर जाने को कहा। जो दिखने में एकदम रानी लक्ष्मी बाई की तरफ दिखाई देती है।
जैसे ही वह क्षत्राणि घोड़े पर सवार होकर गई। जिसे रानी लक्ष्मी बाई समझकर अंग्रेज भी उसके पीछे पीछे भागने लगे।
उसके बाद रानी लक्ष्मी बाई ने। अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए। किले के ऊपर से ( 10·12 मीटर ) नीचे तक। अपने घोड़े सहित छलांग मारकर वहां से निकल गई।
जहां से लक्ष्मीबाई ने छलांग लगाई। उस जगह को वर्तमान में छलांग स्थल के नाम से जाना जाता हैं।
फांसी गृह ( अपराधियों, दोषियों के लिए )
झांसी के किले में फांसी गृह वह स्थान है। जहां से लोगों को फांसी दी जाती थीं। वही फांसी गृह की लम्बाई लगभग 15·20 फीट की है। ओर चौड़ाई लगभग 8·10 फीट के बराबर है। जिसके पैरों की सतह के नीचे लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता।
आखिर जैसे ही जल्लाद लकड़ियों को हटाता। उसी के दौरान कैदी को फांसी लग जाया करती थीं। दूसरी ओर ठीक उसी के बाहर की तरफ। जनता लटकते हुए शव को देखती। ताकि जनता कोई भी एक नई प्रेरणा मिले। जिससे वह भी गलत काम को अंजाम न दे।
जैसे ही शव अपने प्राण त्याग देता। तो शव को घर गंगाधर राव द्वारा सूचित किया जाता। ओर उन्हें शव को लौटाया जाता। अन्यथा शव को निकट के तालाब में फेंक दिया जाता।
झांसी किले की एक कहावत है। जो काफी लोकप्रिय मानी जाती है।
झांसी गले की फांसी ओर धतियां गले का हार,
ललतपुर ना छोड़ियों, जब तक मिले न उधार,
झांसी दुर्ग के रहस्य ओर चमत्कारों का वर्णन
किले की गुप्त सुरंग का रहस्य
झांसी के किले में एक गुप्त सुरंग होने का दावा भी किया जाता है। जो झांसी किले से बाहर की ओर जंगलों, तथा अन्य सुरक्षित स्थान पर जाकर समाप्त होती है। वर्तमान में इस सुरंग को बाहर से देखा जा सकता है। लेकिन अंदर से पूरी तरह बंद कर दी गई है।
क्योंकि अक्सर यहां रहस्यमय घटनाएं घटित हो चुकी हैं। वही भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के द्वारा। इस सुरंग को पूरी तरह संरक्षित किया गया है। कुछ किंवदंती के अनुसार। इस गुप्त सुरंग में खजाने होने का दावा भी किया जाता है।
कहा जाता है 1857 की क्रांति के दौरान। जब अंग्रेजों ने झांसी किले पर अधिकार स्थापित कर लिया था। तब रानी लक्ष्मी बाई ने इसी गुप्त सुरंग से निकलकर। ग्वालियर की ओर प्रस्थान किया था।
कड़क बिजली तोप का रहस्य
इस तोप को झांसी किले की सबसे बड़ी तोप मानी जाती हैं। जिसका नाम कड़क बिजली तोप रखा गया था। क्योंकि इस तोप का इस्तेमाल जब भी दुश्मनों के ऊपर किया जाता। तब यह कड़क आवाज करती हुई। बिजली की रफ्तार में चलती थी।
जिसके चलते इस तोप का नाम कड़क बिजली तोप रखा गया। इस तोप के बारे में यह भी कहा जाता है कि। जब यह दुश्मनों पर चलती थी। तब इसमें मां भवानी की शक्ति आ जाती थीं।
आज भी इस कड़क बिजली तोप के अंदर। उस कालखंड का तोप का गोला देखा जा सकता है। जिसके ऊपर की ओर शेरनुमा आकृति बनी हुई है। तथा दिशा के अनुसार घुमाने के लिए। दो पहिये नीचे की ओर दिए गए है। झांसी किले की यह एक अद्भुत तोप रही थी।
सलामी तोप का रहस्य
सलामी तोप वह तोप है। जिसे वेलकम ( Welcome ) या स्वागत तोप भी कहा जाता है। जो दिखने में काफी छोटी है। मानों जब भी कोई गंगाधर राव से मिलने को आता। ओर जब वह झांसी किले से बाहर की तरफ होता।
तो इसी सलामी तोप में बारूद भरके। किले के बाहरी की ओर छोड़ा जाता। ओर इसी तरह से किले में आए मेहमानों का स्वागत किया जाता था। वही इसी तोप के माध्यम से किले के वासियों को। यह भी पता चल जाता। की गंगाधर राव से कोई मेहमान मिलने के लिए आया है।
झांसी किले पर अंग्रेजों का आक्रमण (1858 ईस्वी)
| झांसी की सेनानायक | अंग्रेजों का सेननायक | |
| 1. | रानी लक्ष्मी बाई | ह्यूग रोज़ |
आक्रमण से पहले ( शुरुआती चरण )
यह बात है 1851 ईस्वी की है। जब झांसी किले में रानी लक्ष्मी बाई के घर। एक बेटा जन्म लेता है। जिसके चार महीनों बाद उस बैठे की मृत्यु हो जाती है।
इसी बीच लक्ष्मी बाई के पति। गंगाधर राव की अचानक तबियत बिगड़ जाने के चलते। उन्हें गोद में पुत्र लेने की सलाह दी गई। वही गंगाधर राव को। शशक्त राजा माना गया है। जो गद्दारों के साथ बड़ा सख्त रवैया अपनाते थे।
जो छोटी से गलती के दौरान भी। फांसी की सजा सुना दिया करते थे।
यह बात 21 नवंबर 1853 ईस्वी की है। जब गंगाधर राव की अचानक तबियत बिगड़ने के दौरान। उनका देहांत हो जाता है। इसके बाद गंगाधर राव के इस देहांत पर। अंग्रेजों के मन में लालच बड़ी। क्यों न इस दुर्ग पर बिना किसी राजा के चलते। किले पर आक्रमण करके। इसको अपने नियंत्रण में ले लिया जाए।
इसी वक्त भारत में अंग्रेजों का कई जगहों पर वर्चस्व स्थापित हो चुका था। जिनका अगला पड़ाव झांसी का दुर्ग था।
अंग्रेजों की घेराबंदी ओर युद्धनीति ( प्रथम चाल )
अंग्रेजों ने एक चाल चलते हुए रवैया अपनाया। की क्यों न रानी लक्ष्मी बाई के गोद लिए बैठे को। राजा का उत्तराधिकारी से इनकार करवाकर। उनके सारे अधिकार छीन लिए जाए। रानी को अपने पुत्र के साथ। किले को छोड़ने को कहा जाए।
जहां उन्हें सालाना 60,000 पेंशन के साथ। 3 मंजिला इमारत दे दी जाए। हालांकि उधर रानी लक्ष्मी बाई मानी नहीं।
तभी अंग्रेजों की तमाम सेना। झांसी किले को पाने के लिए। किले के निकट आ पहुंचती है। जहां किले के पीछे वाले भाग से। एक पहाड़ी के पीछे से तोप के गोले दागने लगे।
अंग्रेजों ने इस अवधि में। लगभग 8 दिनों तक किले की घेराबंदी के चलते। फायरिंग जारी रखी। हालांकि अंग्रेजों को जब लगा। की वह किले का अब तक कुछ नहीं बिगाड़ पाए है। तो उन्होंने दूसरी चाल चली।
रानी लक्ष्मी बाई की युद्ध नीति ओर बहादुरी
जब अंग्रेजों द्वारा रानी लक्ष्मी बाई को महल छोड़ने को कहा गया। तो रानी लक्ष्मी बाई ने। झांसी किले को छोड़ने से इनकार कर दिया गया।
जहां अंग्रेजों ने कभी सोचा तक नहीं था। रानी इस तरह का जवाब देगी।
वही रानी लक्ष्मी के द्वारा भी। अंग्रेजों के आक्रमण पर। किले के ऊपर कड़क बिजली तोप, भवानी शंकर तोप आदि को रखवाया गया। वही रानी लक्ष्मी बाई के तोपची को। इन तोपों को चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
जहां किले से अंग्रेजों के ऊपर भी गोले दागने शुरू हुए। अंग्रेजों की सेना फीकी पड़ने लगी। जहां उनके पास अब गोले ओर बारूद में भी कमी आने लगी।
जहां लक्ष्मी बाई ने झांसी किले की सुरक्षा इतनी चौकन्न कर रखी थी। जहां से अंग्रेज अभी तक कुछ नहीं बिगाड़ सके। लगभग 8 दिन की घेराबंदी के बाद। अंग्रेजों की दूसरी चाल कुछ इस प्रकार थी।
अंग्रेजों द्वारा किले पर नियंत्रण पाना ( दूसरी चाल )
जब अंग्रेजों को लगा। की वह अभी तक झांसी के किले हासिल करने में नाकामयाब है। तो अंग्रेजों ने दूसरी चलने का निर्माण लिया।
जहां रानी का देवर दौराजी राव। जिसकी ड्यूटी किले के ओरछा गेट पर थी। अंग्रेजों ने दौराजी राव को। अपने साथ लेते हुए कहा। कि किले का सम्पूर्ण राजपाठ तुम्हारे नाम कर देंगे।
कृपया हमें सिर्फ किले के अंदर प्रवेश करने की अनुमति दी जाए। दौराजी राव अंग्रेजों के इस लालच में आ गया। और उसने दुर्ग का औरछा गेट खोल दिया। अब अंग्रेज किले के अंदर प्रवेश कर चुके थे।
जहां रानी लक्ष्मी बाई की सभी चालाकियां ओर सुरक्षा की रणनीति नाकामयाब रही। अब रानी लक्ष्मी ने अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए। अपने बेटे को कंधों के पीछे बांध दिया। और दुर्ग के ऊपर से छलांग लगाकर। झांसी से निकल गई।
ओर इसी दौरान अंग्रेजों ने किले में प्रवेश किया। जहां उन्होंने संपूर्ण किले को अपने नियंत्रण में ले लिया था।
झांसी किले पर अंग्रेजों द्वारा। कब्जा करने का मुख्य कारण। रानी लक्ष्मी बाई के देवर दौराजी राव की गद्दारी दिखी।
झांसी दुर्ग का इतिहास
झांसी किले की रानी लक्ष्मी बाई
आज भी भारत देश में। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को। एक क्षत्राणि के रूप में देखा जाता है। जिन्होंने झांसी किले से अपनी शासन प्रक्रिया संभालने का निर्णय लिया था। वही अपनी कम उम्र के चलते। अंग्रेजों के खिलाफ भारत देश की आजादी का संघर्ष जारी रखा।
वही अक्सर झांसी किले की रानी लक्ष्मी बाई को याद करते हुए। इनके बारे कुछ पंक्तियां काफी लोकप्रिय साबित हुई। जिन्हें अक्सर भारतीय लोगों के मुंह पर सुनते हुए मैंने देखा है।
”चमक उठी वह सन संतावन में, वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हर वोलो के मुंह, हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।”
इन पंक्तियों को इतना ज्यादा महत्व दिया गया है कि। आज भी भारत के किसी भी बच्चे से पूछ लिया जाए। तो उसके दिमाग में रानी लक्ष्मी बाई की छवि एक क्षत्राणि के रूप में दिखाई देगी।
झांसी किले से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी
भवानी शंकर तोप
भवानी तोप वह तोप है। जो कास्ट आयरन के द्वारा निर्मित है। जिसे आज झांसी किले में रखी गई हैं। जिसके पीछे सिरे पर गणेश जी को दर्शाया गया है। जिन्हें प्रथम पूज्य देव माना जाता है।
वही तोप के आगे वाले भाग ( मुंह ) के ऊपर की ओर शेरनुमा आकृति को दर्शाया गया है। ताकि तोप चलते वक्त आकर्षक ओर शेर के चित्र को परिभाषित करते हुए चले। इसके अलावा तोप के बाएं ओर दाएं दोनों तरफ हमे हाथी की आकृति देखने को मिलती है।
हालांकि 1857 की क्रांति के दौरान इस तोप को कुछ हद तक नुकसान भी हुआ। जहां वर्तमान में सिर्फ पर्यटन के तौर पर रखी गई है।
अंग्रेजों द्वारा स्थापित किले में 2 मशीन घन
झांसी के किले के एक प्रवेश द्वार के ठीक बाहर की तरफ। 2 मशीन घन रखी हुई है। जिन्हें अंग्रेजों के शासनकाल के वक्त 1905 में लाया गया था। कुल मिलाकर अंग्रेजो द्वारा 12 घन मशीनें यहां किले में लाई गई थीं।
जहां उन्होंने किले के चारों तरफ लगाई थी। वही अंग्रेज जाते वक्त। सारी घन मशीनें अपने साथ लेकर गए थे। जिनमें से 2 शेष घन झांसी के किले में आज भी देखी जा सकती है।
जिनकी रेंज तकरीबन 1500 मीटर के लगभग हुआ करती थीं। हालांकि कितनी रेंज तक फायर करना है। इसको लागू करने का सिस्टम भी मशीन घन में दिया गया है। हालांकि वर्तमान में यह पर्यटकों के के लिए देखने लायक है।
क्या आप इन्हे पढ़ना पसंद करेंगे…
झांसी किले के भ्रमण की जानकारी
झांसी का किला बंगरा-पहाड़ी पर बना एक पुराना किला है, जिसे 1613 में Bir Singh Deo (ओरछा के राजा) ने बनवाया था। विकिपीडिया किले की दीवारें मोटी ग्रेनाइट की हैं।
यह किला 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और Rani Lakshmi Bai की वीरता से जुड़ा है। आज झांसी किला इतिहास प्रेमियों और भारतीय स्वाधीनता के बारे में जानने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है।
झांसी किले में सुविधाएँ
पीने का पानी और बैठने की व्यवस्था
किले में कई छांव और पेयजल के नल हैं। गर्मी में भी पानी के नल मिलते हैं। बड़ी उम्र के लोग और बच्चे बैठ सकते हैं।
पार्किंग सुविधा
मुख्य द्वार पर पार्किंग की जगह है। कार पार्किंग का शुल्क लगभग ₹20–₹30 है।
सुरक्षा और CCTV
झांसी किले में सुरक्षा-कर्मचारी रहते हैं। कुछ जगह लोहे की रेलिंग हैं और कई जगह CCTV लगे हैं।
गाइड सुविधा
पर्यटक स्थानीय गाइड ले सकते हैं। गाइड शुल्क आमतौर पर ₹200–₹400 है। कुछ गाइड बुंदेलखंडी में कहानी भी सुनाते हैं।
साफ-सफाई और शौचालय
मुख्य द्वार के पास साफ सरकारी शौचालय हैं। किले की सफाई नियमित है, जिससे परिसर साफ रहता है।
भ्रमण समय और प्रवेश शुल्क
झांसी का किला सुबह 6:00 बजे से खुलता है और शाम 6:00 बजे बंद होता है। trawell.in
कभी-कभी किला 7:00 AM से भी खुलता है।
भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क लगभग ₹15 – ₹25 है।
विदेशी पर्यटकों के लिए शुल्क अधिक होता है — कई जगह ₹200 या उससे ऊपर बताया गया है।
आप शाम को होने वाले लाइट-एंड-साउंड शो का भी आनंद ले सकते हैं, जो 7:00 बजे शुरू होता है।
भ्रमण करने का सबसे अच्छा समय सुबह 6-7 बजे या शाम 4-5 बजे है।
क्या देखें और क्या करें (मुख्य आकर्षण)
झांसी किले में कई दिलचस्प स्थान हैं:
- Kadak Bijli Cannon — एक विशाल तोप, जिसका इस्तेमाल ब्रिटिशों व विद्रोहियों ने किया था।
- मंदिर व पूजा स्थल — किले में प्राचीन शिव मंदिर और गणेश मंदिर हैं।
- विशाल किले की दीवारें — किले की दीवारें और दरवाज़े ऐतिहासिक वास्तुकला का अनुभव कराते हैं।
- ऊपर से झांसी शहर का दृश्य — किले की ऊँचाई से पूरा झांसी शहर देख सकते हैं; यह दृश्य खासकर सूर्यास्त के समय सुंदर होता है।
- क्वीन का ‘जम्पिंग पॉइंट’ — यह जगह ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
यदि समय हो, तो शाम का लाइट-एंड-साउंड शो देखना अच्छा रहेगा।
किले के बड़े भाग को पैदल घूमने में करीब 2–3 घंटे लगते हैं। tripadvisor
सुविधाएँ और सावधानियाँ
किले के मुख्य द्वार पर मैप और संकेत होते हैं।
किले तक पहुँचने के लिए नज़दीकी रेलवे स्टेशन है Jhansi Junction, जहाँ से ऑटो-रिक्शा या बस से किला पहुँच सकते हैं।
किले के पास पार्किंग की व्यवस्था है।
किले में पैदल चलना पड़ता है, इसलिए आरामदायक जूते पहनकर जाएँ।
गर्मी में धूप से बचने के लिए टोपी और पानी साथ रखें।
किले के कुछ हिस्सों में सावधानी से चलें।
किले के अंदर वंदन या धार्मिक स्थलों का सम्मान करें।
लाइट-एंड-साउंड शो के लिए पहले से टिकट समय जान लें।
रुकने और खाने-पीने की व्यवस्था
किला शहर के केंद्र में है, इसलिए झांसी में कई होटल और गेस्ट हाउस मिल जाएंगे।
किले के पास कुछ दुकानें हो सकती हैं, लेकिन विश्वसनीय खाने-पीने के लिए अपना पानी और खाना साथ रखें।
यदि आप झांसी में रात बिताने का सोच रहे हैं, तो रेलवे स्टेशन या शहर के व्यस्त क्षेत्र में बुकिंग करना बेहतर होगा।
अतिरिक्त जानकारी और सुझाव
झांसी में झांसी किले के अलावा Rani Mahal, Government Museum Jhansi आदि भी देख सकते हैं। holidify
यदि आप इतिहास में रुचि रखते हैं, तो किले के इतिहास और 1857 की लड़ाई के बारे में पढ़ें।
सुबह जल्दी जाएँ ताकि आपको शांति और समय मिले।
किला घूमने के बाद झांसी शहर के स्थानीय जीवन और भोजन का अनुभव लेना अच्छा रहेगा. क्योंकि इससे आपकी यात्रा और समृद्ध होगी।
झांसी किले तक पहुंचने का यात्रा मार्ग
प्रमुख शहरों से झांसी किले की दूरी चार्ट
| शहर | दूरी (किमी) | रेल समय (घंटे) | सड़क समय (घंटे) | हवाई दूरी (किमी) |
|---|---|---|---|---|
| दिल्ली | 410 | 5-6 | 7-8 | 321 (दिल्ली एयरपोर्ट से) |
| ग्वालियर | 103 | 2 | 2-3 | – |
| आगरा | 220 | 3-4 | 4 | – |
| लखनऊ | 290 | 5 | 6 | – |
| मुंबई | 1100 | 16-18 | 18-20 | – |
| झांसी स्टेशन | 3 | पैदल/ऑटो | 10 मिनट | – |
सड़क मार्ग से झांसी किले तक पहुंचना
झांसी NH-44 और NH-27 से जुड़ा है। दिल्ली से 410 किलोमीटर, 7-8 घंटे की ड्राइव। आगरा से 220 किलोमीटर, 4 घंटे। लखनऊ से 290 किलोमीटर, 6 घंटे। UPSRTC की बसें चलती हैं, किराया 300-600 रुपये।
अपनी कार से जाने पर किले के पास पार्किंग है। सड़क मार्ग लचीला है लेकिन ट्रैफिक के कारण थकाऊ। टोल 500-700 रुपये लगते हैं।
रेल मार्ग से झांसी किले तक पहुंचना
झांसी जंक्शन प्रमुख रेल स्टेशन से जुड़ा है। जो झांसी किले से 3 किलोमीटर दूर है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से सीधी ट्रेनें हैं। स्टेशन से ऑटो या ई-रिक्शा 10-15 मिनट में किला पहुंचा देता है, किराया 50-100 रुपये।
शताब्दी एक्सप्रेस से दिल्ली से 5-6 घंटे लगते हैं। ट्रेन सबसे सुविधाजनक रही, क्योंकि स्टेशन शहर के केंद्र में है।
हवाई मार्ग से झांसी किले तक पहुंचना
निकटतम एयरपोर्ट ग्वालियर है, जो झांसी से 103 किलोमीटर दूर है। दिल्ली से ग्वालियर की उड़ान 1 घंटे में पूरी होती है। ग्वालियर एयरपोर्ट से टैक्सी लें, जो 2-3 घंटे में किले तक पहुंचा देती है।
किराया 2000-3000 रुपये। यह मार्ग तेज लेकिन महंगा है। दिल्ली एयरपोर्ट 321 किलोमीटर दूर है, जो लंबी ड्राइव के लिए सही नहीं है।
झांसी किले पर निष्कर्ष | Conclusion on Jhansi Fort
झांसी का किला भारतीय इतिहास में वीरता, बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है। 17वीं शताब्दी में ओरछा के राजा बीर सिंह जू देव द्वारा बनाया गया।
यह किला अपनी खूबसूरत वास्तुकला और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका के लिए प्रसिद्ध है। यह किला रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा, जहां मजबूत ग्रेनाइट की दीवारें और भव्य फाटक जैसे खंडेराव गेट और दतिया दरवाजा हैं। pratinidhimanthan
रानी लक्ष्मीबाई ने अपने दामाद दामोदर राव की रक्षा के लिए इसे ब्रिटिश सेना के खिलाफ मजबूत किला बनाया। ब्रिटिश जनरल ह्यू रोज की घेराबंदी के बावजूद रानी ने 3 महीने तक मुकाबला किया, जो उनके साहस को दर्शाता है।
अप्रैल 1858 में झांसी किले पर ब्रिटिश झंडा फहराया गया, लेकिन रानी ग्वालियर की ओर चली गईं।bharatmata आज झांसी किला उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है,
जहां संग्रहालय रानी के जीवन, 1857 विद्रोह के हथियारों और बुंदेलखंडी इतिहास को दिखाता है। यह किला 285 मीटर की ऊंचाई पर है और पर्यटकों को इतिहास में ले जाकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।audiala
झांसी का किला केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि भारतीयों की भावना का प्रतीक है। यह हमें रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों के त्याग की प्रेरणा देता है और आने वाली पीढ़ियां इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित रखेंगी,
जो स्वराज की आकांक्षा को सदा प्रज्वलित करेगा।
झांसी किले पर 15 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. झांसी किला किसने बनवाया?
उत्तर झांसी किला 17वीं शताब्दी में राजा बीर सिंह जू देव ने बनवाया। यह चट्टानी पहाड़ी पर है।
प्रश्न 2. झांसी किले का निर्माण कब हुआ?
उत्तर किले का निर्माण 1613 में शुरू हुआ, जो बुंदेला वास्तुकला का अच्छा उदाहरण है।
प्रश्न 3. झांसी किले का मुख्य ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर यह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई का प्रमुख केंद्र था।
प्रश्न 4. रानी लक्ष्मीबाई ने किले की रक्षा कितने समय तक की?
उत्तर रानी ने मार्च से अप्रैल 1858 तक लगभग 3 महीने तक किले का बचाव किया।
प्रश्न 5. झांसी किले में कितने फाटक हैं?
उत्तर किले में कुल 10 फाटक हैं, जैसे खंडेराव गेट और दतिया दरवाजा।
प्रश्न 6. किले की ऊंचाई कितनी है?
उत्तर झांसी किला समुद्र तल से लगभग 285 मीटर ऊंचा है।
प्रश्न 7. किले में कौन-कौन सी प्रमुख संरचनाएं हैं?
उत्तर रंगमहल, शिव मंदिर, कड़क बिजली तोप और मजबूत दीवारें प्रमुख हैं।
प्रश्न 8. झांसी किले पर ब्रिटिश कब कब्जा कर सके?
उत्तर अप्रैल 1858 में जनरल ह्यू रोज के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने किले पर कब्जा किया।
प्रश्न 9. किले में संग्रहालय क्या प्रदर्शित करता है?
उत्तर संग्रहालय में 1857 विद्रोह के हथियार, रानी लक्ष्मीबाई का जीवन और बुंदेलखंडी इतिहास है।
प्रश्न 10. झांसी किला पर्यटकों के लिए कब खुला रहता है?
उत्तर सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक, सभी दिन खुला रहता है।
प्रश्न 11. किले तक कैसे पहुंचा जा सकता है?
उत्तर झांसी जंक्शन रेलवे स्टेशन से 3 किमी दूर, सड़क से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
प्रश्न 12. किले में प्रवेश शुल्क कितना है?
उत्तर भारतीय पर्यटकों के लिए 40 रुपये, विदेशियों के लिए 600 रुपये।
प्रश्न 13. झलकारी बाई का किले से क्या संबंध है?
उत्तर झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई को किले से सुरक्षित निकलने में मदद की।
प्रश्न 14. किला किस पत्थर से बना है?
उत्तर यह ग्रेनाइट पत्थर से बना है, जो इसे मजबूत बनाता है।
प्रश्न 15. झांसी किला आज क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर यह स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक और पर्यटन स्थल है, जो युवाओं को वीरता की की प्रेरणा देता है।
