इतिहास का परिचय | Tanot Mata Temple History
तनोट माता हिंगलाज माता का एक स्वरूप मानी जाती है। जिसके कई अलग अलग नाम भी है।
जैसे तनोट राय और रुमालों वाली लोकदेवी, सैनिकों की रक्षक देवी, BSF के जवानों की कुलदेवी, तनोटिया माता आदि अन्य कई नामों से इसकी पहचान है.
वही यह मंदिर थार की वैष्णो देवी कहलाता है. जहां हर साल यहाँ बड़ा मेला भी लगता है. ओर लाखों पर्यटन माता के दर्शन करने के लिए आते है।
और सैनिको की रक्षा भी करता है। यह जगह चमत्कार और भारतीय सेना के लिए बहुत खास है। वही तनोट माता मंदिर जैसलमेर से लगभग 120 किलोमीटर दूर तनोट नामक गाँव में है। वही पाकिस्तान बॉर्डर से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर है। जहा यह मंदिर भारत और पाकिस्तान बॉर्डर पर स्थित है।
हालांकि स्थानीय लोगों के मुताबिक. यह मंदिर सिर्फ भारतीयों के लिए ही नहीं, पाकिस्तानी फौजियों के लिए भी दर्शन करने के लिए माना जाता है। यह मंदिर 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान की लड़ाई का गवाह रहा है। ओर यह जगह पहले राजाओं की राजधानी के रूप में भी मानी जाती है।
ओर जैसलमेर का किला भी. यहां से सिर्फ 122 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कुछ समय पहले, अमित शाह भी तनोट माता मंदिर के दर्शन करने के लिए आए थे। कही कही पुराने समय में बादशाह अकबर ने भी यहाँ माथा टेका था।
आरतियां, समय, दिनचर्या
विधिवत आरती, समय
मंगला आरती
माता के मंदिर में यह आरती सुबह जल्दी 5:30 बजे होती है। ओर यह तनोट माता मंदिर के दिन की पहली और सबसे खास आरती भी मानी जाती है। आरती शुरू होने से पहले पुजारी और BSF के जवानों द्वारा मंदिर को साफ़ किया जाता है।
इस आरती में माता को जगाने का मौका बहुत खास माना जाता है। जहां माता के सिंहासन का श्रृंगार किया जाता है। जहां पर्यटक सुबह के भोग के लिए तैयारी रहते है। आरती के समय घंटा, घड़ियाल और शंख की आवाज़ से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
पूरा मंदिर परिसर भक्तों के द्वारा। “जय माता दी” और “तनोट माता की जय” के नारों से गूंज उठता है। इस आरती में पर्यटक माता से दिनभर की सुरक्षा और सुख-समृद्धि की दुआ भी करते है।
इसी बीच आरती की लौ और धूप की खुशबू से। पूरे मंदिर परिसर को शांति मिलती है। जिसमें देशभर से आये हुए। बहुत से भक्त शामिल होते हैं। जिनमें दिल्ली, गुजरात, पंजाब और राजस्थान भी शामिल हैं।
मंगला आरती विधि: मंगला आरती में पुजारी के द्वारा। कपूर और घी के दीपक से आरती की जाती है। वहीं पाँच मुखी दीपक की रोशनी चारों ओर फैल जाती है।
तनोट मंदिर के मंगला आरती के बाद। माता को फूल, नारियल और चुनरी चढ़ाने का समय आता है।
श्रृंगार आरती
मंगला आरती के बाद, श्रृंगार आरती को सुबह 8:00 के समय किया जाता है। हालांकि मंगला आरती के बाद ही। माता का खास श्रृंगार भी किया जाता है। श्रृंगार आरती की शुरुआत करने से पहले। मंदिर के पुजारी और सीमा सुरक्षा बल के जवान। माता के सिंहासन को पूरी तरह से साफ करते हैं।
जहां ठीक आरती के शुरू होने से पहले। मुख्य माता की मूर्ति को पूरी तरह से सजाया जाता है। जिसमें मूर्ति को सोलह श्रृंगार से सजाया जाता हैं।
16 श्रृंगार सामग्री (श्रृंगार आरती): लाल या पीली रेशमी चुनरी, चंद्रहार, मोतियों की माला, चांदी या सोने का मुकुट, नथ, कर्णफूल, चूडियाँ, हांसली, बाजूबंद, पुष्प-मालाएँ, गजरे और सुगंधित फूलों का ताज आदि को उपयोग में लाया जाता है। वहीं मातृ-रूप को उभारने वाले खास अलंकरण। बहुत ही अच्छा लगता है।
भोग आरती
श्रृंगार आरती के बाद, भोग आरती का समय दोपहर 12:00 बजे होता है। ओर दोपहर के 12:00 बजे ही भोग आरती की जाती है। जिसे राजभोग आरती भी कहा जाता हैं। भोग आरती या राजभोग आरती का मतलब.
इस आरती में माता को भोजन खिलाया जाता है। जिसमें सेना के जवान और पुजारी मिलकर। माता की मूर्ति के ठीक सामने। सब्ज़ी, चावल, दाल, खीर और हलवा माता की मूर्ति के ठीक सामने नीचे रखते है।
यहां BSF के द्वारा बनाया गया प्रसाद। काफी खास माना जाता है. जहां भोग लगने के बाद। मंदिर परिसर में घी के दीपक जलाए जाते है। हाथ जोड़कर माता को प्रसाद चढ़ाया जाता है।
आरती के समय में तो “तनोट राय माता की जय” के नारे भी लगाए जाते है। इसीलिए तनोट माता की यह भोग आरती। पर्यटन के लिए खास मानी जाती है। क्योंकि यहां BSF के जवान इसे अनुशासन से करते हैं.
संध्या आरती
संध्या आरती तनोट राय मंदिर के दिन की सबसे खास आरती होती है। जहां संध्या आरती गर्मी में 6:00 ओर सर्दी में 5:30 बजे की जाती है। सर्दियों में सूरज ढलते ही रेगिस्तान की हवा ठंडी हो जाती है। ओर संध्या आरती में भक्तों की भीड़ काफी ज्यादा बढ़ जाती है।
संध्या आरती लगभग 30-40 मिनट तक चलाई जाती है। जिसमें ढोल, नगाड़े और भजन बजाए जाते हैं। यहां आरती में ‘आरती श्री तनोट राय माता की‘ जैसे पारंपरिक भक्ति-गीत गाए जाते है।
संध्या आरती में देवी के अद्भुत चमत्कार और शक्ति का एहसास भी किया जा सकता है।
संध्या आरती विधि: संध्या आरती के समय सात प्रकार के दीपक जलाए जाते है। जिसमें घी का दीपक, कपूर का दीपक, तेल का दीपक, धूप, फूल, वस्त्र और पंखे का दीपक आदि शामिल है। वहीं पुजारी पूरी विधि से सभी उपचारों के साथ आरती करते हैं।
शयन आरती
शयन आरती तनोट माता मंदिर की आख़िरी आरती होती है। जिसे 8:30 बजे की जाती है। इस आरती का स्वर कोमल और शांत होता है। जहां शयन आरती लगभग 1:30 घंटे तक चलने वाली आरती है।
जिसे रूमाली देवी या सैनिकों की रक्षा करने वाली देवी की आरती भी कहा जाता है। आरती करने से ठीक पहले। माता की मूर्ति की सजावट को हल्का कर दिया जाता है।
जिसमें “माता रानी, अब विश्राम करो, अपने भक्तों की रक्षा करो जैसे गीत भी गाए जाते है।”
इस आरती के खत्म होते ही। ठीक रात 9:00 बजे मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते है। ओर श्री तनोट माता मंदिर परिसर में माता को विश्राम के लिए सुलाया जाता है। यह मंदिर के आरती की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है।
दैनिक दिनचर्या
प्रातःकालीन गतिविधियाँ
तनोट माता मंदिर के प्रातःकालीन गतिविधि की शुरुआत। सुबह के समय से होती है। जब हर सुबह मंदिर परिसर के दरवाज़े 4:30 बजे खोले जाते हैं। क्योंकि 5:30 बजे मंगला आरती का समय होता है।
जो मंदिर के दिन की पहली आरती होती है। जहाँ पुजारी मंदिर की साफ-सफाई करते हैं।
जहां पुजारी माता की मूर्ति को स्नान कराते है। जिसमें जल की बूंदें मूर्ति पर गिराई जाती हैं। जैसे उस समय माता का आशीर्वाद मिल रहा हो। फिर पुजारी माता को नए वस्त्र पहनाते है। और माता की मूर्ति का श्रृंगार भी करते हैं।
यह नजारा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान के लिए नहीं होता है। बल्कि इसे कला का प्रदर्शन भी माना जाता है।
सुबह 5:00 बजे से मंगल आरती की तैयारी शुरू हो जाती है। जिसमें भक्ति का संगीत मंदिर में गूंजने लगता है। ओर ठीक इस समय (सुबह का वातावरण) भी बिल्कुल शांत होता है।
विशेष अवसरों पर आरती
नवरात्रि में विशेष व्यवस्था
नवरात्रि के समय अक्सर तनोट माता मंदिर में। एक खास आरती देखने को मिलती है। इस समय, हर दिन पाँच सामान्य आरतियों के अलावा। रात 11 बजे भी एक खास आरती होती है।
नवरात्रि में कन्या पूजन और हवन भी खास होते हैं।
पूर्णिमा, अमावस्या
हर पूर्णिमा और अमावस्था को मंदिर में खास आरती की जाती है। ओर उस दिन भक्तों की संख्या बाकी दिनों से बहुत ही ज्यादा रहती है।
भक्तों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
इस पवित्र स्थल पर कीमती जगहों पर फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है। तनोट माता का मंदिर सीमा के पास स्थित है। इसीलिए पर्यटन को हमेशा अपना पहचान पत्र साथ रखना होता है। जो यहाँ के नियमों के पालन के अनुसार माना जाता है.
तनोट राय मंदिर परिसर में प्रवेश करते समय। पर्यटकों को प्रसाद के रूप में नारियल, चुनरी, धूप-दीप और मिठाई चढ़ाने के आदेश मिलते हैं। आरती के समय माहौल बहुत ही बड़ा होता है। और मंदिर में अनुशासन बनाए रखना भी बहुत जरूरी होता है।
क्योंकि BSF के जवान भी। हर वक्त मंदिर की सुरक्षा और व्यवस्था देखते रहते हैं। जहां अब तनोट माता मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं है। हालांकि यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक भी बन चुका है। क्योंकि इस जगह पर कभी भारत पाकिस्तान के युद्ध हुए थे।
पर्यटन जगहें
मन्दिर परिसर
पुरानी कहानियों के अनुसार, तनोट माता, हिंगलाज माता का एक स्वरूप मानी जाती हैं। क्योंकि हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान में है। लेकिन तनोट माता मंदिर को भाटी राजा ने बनवाया था।
कहा जाता है कि जब भाटी राजा यहाँ आए थे। तो महामाया तनोट माता की सात बहनें भी तनोट पधारी थीं। हालांकि आज तनोट माता की मूर्ति दिखने में काले पत्थर की है। और मूर्ति के आसपास सोने-चांदी की सजावट की गई है।
यहाँ हर दिन सुबह से शाम तक खास आरतियां होती है। उस समय मंत्र, धूप और संगीत से मंदिर में बहुत अच्छा माहौल बन जाता है।
तनोट माता मंदिर में एक बड़ा दरवाजा बनवाया गया था। और मंदिर तक जाने के लिए चार सीढ़ियाँ भी बनाई गई थी। मंदिर के चारों तरफ का इलाका खुला (verandah) हुआ है। जहाँ से पूरा रेगिस्तान बिल्कुल साफ दिखा देता है।
तनोट माता मंदिर के आसपास दो और छोटे मंदिर बनाए गए थे। एक दुर्गा माता का और दूसरा हनुमान जी का मंदिर है। मंदिर में हाथी, घोड़े और ऊंटों की सजावट की गई है। वही एक गुफा में देवी माता की मूर्ति भी स्थापित की गई है।
युद्ध संग्रहालय
यह बात सन 1971 की है। जब भारत और पाकिस्तान के बीच। एक बहुत ही बड़ा युद्ध हुआ था। उसके बाद, भारत के सीमा सुरक्षा बलों (BSF) के जवानों ने मिलकर। तनोट माता मंदिर को ओर भी ज्यादा बड़ा कर दिया है। वहां विजय टावर और एक भारत पाकिस्तान के युद्ध का संग्रहालय भी बनाया गया है।
आज भी तनोट माता मंदिर के संग्रहालय में। उन बम को रखा हुआ है। जो कभी भारत पाकिस्तान 1965 के युद्ध में। तनोट माता के मंदिर पर 450 से भी ज्यादा बम मंदिर पर गिरे थे। लेकिन माता के चमत्कार से।
एक भी बम मंदिर में नहीं फटा। आज भी इन बम को देखकर। BSF के जवानों का हौसला भी बढ़ता है। 1966 में मंदिर की देखभाल BSF को दे दी गई। जो आज भी इसकी देखभाल कर रही है.
इस संग्रहालय में पाकिस्तान की सेना के वो बम और टैंक रखे गए हैं। जब भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था। जिसमें मंदिर में 400 से भी ज्यादा बम गिरे ओर उनमें से एक भी बम मंदिर परिसर में नहीं फटा।
हालांकि आज भी हर साल 16 दिसंबर को। यहां विजय दिवस बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन आज की निगरानी से। तनोट माता का मंदिर और युद्ध संग्रहालय, BSF की “भारत रणभूमि दर्शन” पहल का खास हिस्सा बन चुके हैं।
इससे लोगों में देशभक्ति की भावना बढ़ती है। साथ ही आस-पास के इलाके में पर्यटन और कारोबार भी बढ़ता है।
भारत पाकिस्तान बॉर्डर
तनोट माता मंदिर से 15-20 किलोमीटर की दूरी पर। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर स्थित है। जहां पहुंचने के लिए। BSF के जवानों के द्वारा इजाज़त लेनी पड़ती है। ओर भारत पाकिस्तान बॉर्डर पर्यटन के लिए। काफी खास जगह मानी जाती है। जहां पर्यटक घूमना भी बहुत पसंद करते है।
वहीं बॉर्डर पर भारतीय सेना हर वक्त तैनात रहती है। जहां वह हर समय देश की रक्षा करते हैं।
वास्तुकला
भाटी शासक “तन्नू राव” ने। विक्रम संवत 888 (828 ईस्वी) में तनोटगढ़ शहर की नींव रखी थी। ओर बाद में यहां पर तनोट माता का मंदिर बनाया गया था। जो पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया था। और यह मंदिर 1.8 मीटर ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया था।
मंदिर का अंदरूनी हिस्सा चूना और रेत से बनाया गया था। ओर यह जानकारी स्थानीय इतिहास और मंदिर के रिकॉर्ड में भी दर्ज है।
तनोट माता मंदिर के वास्तुकला का निर्माण। राजस्थानी वास्तुकला के अंदर। मरू राजपूत ओर नागर शैली में किया गया था। जहां पूर्व दिशा वाले दरवाजे के अंदर की तरफ। 24 खंभों वाला एक खुला मंडप भी बनाया गया था।
जिसकी छतें गर्म हवा को ऊपर कीकर उठाती हैं। और जालीदार खिड़कियों से आने वाली धूप पूरे दिन के तापमान को बराबर रखती है।
बाहर का तापमान IR-थर्मल कैमरे से 47 °C माना गया है। जबकि अंदर का तापमान 33 °C माना गया है। पहले, मंदिर के अंदरूनी हिस्से की छत सागवान की लकड़ी और पीले बलुआ पत्थर से बनी हुई थी।
लेकिन 1970-71 में BSF के जवानों ने मिलकर। अब इसे स्टील और RCC में बना दिया गया है। क्योंकि स्टिल ओर RCC की छतें काफी मजबूत मानी जाती हैं।
मंदिर के कुछ हिस्सों में। पत्थरों को फिर से लगा दिया गया है। ताकि मंदिर का पुराना आकार बना रहे। तनोट माता के मंदिर में 1965-71 की लड़ाई के बाद। पश्चिमी दीवार को हटाकर वहां विजय-स्तंभ और युद्ध-संग्रहालय बना दिया गया है। संग्रहालय की दीवारें मोटी बनाई गई थी। ताकि बाहर की गर्मी संग्रहालय अंदर की ओर प्रवेश न कर सके।
संग्रहालय में तो लड़ाई के अवशेष और ज़रूरी दस्तावेज़ भी रखे गए हैं। वहीं मंदिर के विकास में। लड़ाई के बाद, सफेद संगमरमर का फर्श, देवी की मूर्ति के लिए आसन और तांबे का कलश लगाया गया था। मंदिर का शिखर अभी भी दूर से छोटा दिखाई देता है। ताकि बॉर्डर पर लगे रडार को कोई परेशानी न हो।
नवंबर 2022 में, गृह मंत्री (अमित शाह) ने। एक नई योजना की शुरुआत की। इसमें बच्चों के लिए कमरे, एक खुला थियेटर और एक जानकारी केंद्र (Information Center) बनाया गया हैं। इसे बनाते समय, सौर ऊर्जा (Solar Energy) से चलने वाली। बिजली और पानी बचाने वाली प्रणाली का भी ध्यान रखा गया है.
यहां 40 kW का सोलर पैनल और बारिश के पानी को साफ करने वाले पाइप भी है. इससे रेगिस्तान में टिकाऊ (sustainable) विकास का एक नया तरीका शुरू होगा. इस तरह, तनोट माता के मंदिर की कहानी। 8वीं सदी के पत्थर से बने एक मंदिर से शुरू होकर।
बीएसएफ (BSF) द्वारा सुरक्षित और आधुनिक सुविधाओं तक फैली हुई है। यह मंदिर थार रेगिस्तान (Thar Desert) की कला का अच्छा उदाहरण माना जाता है.
इतिहास
भारत पाक का युद्ध 1965
राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा के पास। थार रेगिस्तान में तनोट माता का मंदिर स्थित है। यह वही मंदिर है। जहां कभी इतिहास में भारत पाकिस्तान (1965) का युद्ध हुआ था।
4-5 दिसंबर 1971 की घोर अंधेरी रात में। पाकिस्तानी सेना ने मिलकर। लोंगेवाला बॉर्डर पर हमला किया। हालांकि पाकिस्तानी सेना के पास। T-55 टैंक और लगभग 2,000 से भी ज्यादा सैनिक शामिल थे।
1965 की भारत पाकिस्तान की लड़ाई में। पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना पर। लगभग 3,000 से भी ज्यादा बम गिराए थे। लेकिन उन 3,000 बम में से 450 बम तो सिर्फ। तनोट माता के मंदिर पर ही गिर गए। लेकिन तनोट माता की कृपा से उन 450 बम में से। एक भी बम मंदिर में नहीं फटा।
अंत में रेगिस्तान की रेत की वजह से। पाकिस्तानी टैंक जमीन में ही फंस गए। पाकिस्तान की सेना हैरान हो गई। और पीछे हटने को मजबूर हो गई। और भारतीय वायुसेना ने मौका पाकर। उन्हें खत्म कर दिया। ओर इसी बीच पाकिस्तानी सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। ओर भारतीय सेना ने युद्ध में जीत हासिल की।
हालांकि आज भी सैनिक कहते है। कि तनोट माता ने भारतीय सैनिकों की मदद की। कहते हैं कि माता ने रेत को दलदल बना दिया था। इस जीत को याद रखने के लिए। मंदिर में एक विजय स्तंभ भी बनाया गया था। वहाँ पाकिस्तानी सैनिकों के हथियार और युद्ध की चीजें भी रखी गई थी।
जहां 1965 और 1971 की लड़ाई में यह जगह। ‘रेगिस्तानी बहादुरी’ का निशान भी बन गई है।
भारत पाक का युद्ध 1971
तनोट माता मंदिर, जो राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित है। इसी के निकट लोंगेवाला (भारत पाकिस्तान बॉर्डर) वह जगह है। जहां भारत पाकिस्तान के बीच। 3 दिसंबर 1971 को युद्ध हुआ था। यह युद्ध 3 दिसंबर 1971 से लेकर। 16 दिसंबर 1971 तक। लगभग 13 दिनों तक चलता रहा।
जहां पाकिस्तानी सेना में 2000 सैनिक और 30-40 टैंक शामिल थे। वही भारतीय सेना में मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी समेत 120 जवान शामिल थे। 3 दिसंबर 1971 की शाम को। युद्ध की शुरुआत पाकिस्तानी सेना ने की। जहां पाकिस्तानी सेना ने सबसे पहले भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया था।
इसके बाद, पाकिस्तान की सेना ने लोंगेवाला (भारत पाकिस्तान बॉर्डर) पर अचानक हमला किया।
लेकिन युद्ध के बीच में, भारतीय नौसेना ने भी मिलकर। Operation Trident के द्वारा। पाकिस्तान के करांची बंदरगाह को निशाना बनाया। जिससे पाकिस्तान की नौसेना कमजोर हो गई।
13 दिन बाद, 16 दिसंबर 1671 को भारतीय सेना ने। पूर्वी पाकिस्तान के ढाका तक हमला किया। जिसके चलते पाकिस्तानी सेना पीछे हटने के लिए मजबूर हो गई। जहां 93,000 पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए। ओर भारतीय सेना ने इस युद्ध में जीत हासिल की।
लड़ाई के बाद, भारतीय सेना ने मिलकर। तनोट माता मंदिर के पास एक 25 फीट का विजय स्तंभ का निर्माण भी करवाया। जो 1671 के युद्ध में जीत की याद दिलाता है।
भारतीय सेना (BSF) के द्वारा। यह युद्ध जितने के पीछे। तनोट माता का आशीर्वाद या माता का चमत्कार भी माना जाता है। यही नहीं हर 13 दिसंबर को तनोट माता तीर्थ स्थल पर उन सैनिकों की याद में। बड़ी धूम धाम से विजय दिवस भी मनाया जाता है।
जहां खास आरती और कार्यक्रम भी शामिल होते हैं। जो भारत देश के बहादुर सैनिकों और देवी के आशीर्वाद या चमत्कार की याद दिलाते हैं।
भ्रमण
पर्यटन सुविधाएं
तनोट माता मंदिर की देखरेख भारतीय सीमा सुरक्षा बल (BSF) करता है। ओर यहां आने वाले पर्यटकों के लिए।
BSF ने कई तरह की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई हैं। हालांकि यह एक बहुत ही दूर सीमा का इलाका है। इसलिए यहां की सुविधाएं कम लेकिन पर्याप्त हो सकती हैं।
BSF द्वारा मंदिर चलाना:- मंदिर का पूरा परिसर BSF को सौंपा हुआ है। जिनकी सुरक्षा व्यवस्था 24 घंटे यहां रहती है।
युद्ध का संग्रहालय:- मंदिर परिसर में ही 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध से संबंधित। एक छोटा सा संग्रहालय बनाया गया है। जिसमें अखंडित बम के गोले, हथियार और युद्ध की तस्वीरें रखी हुई हैं।
पेयजल की व्यवस्था:- BSF द्वारा पर्यटकों के लिए। स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था मंदिर परिसर में की गई है।
शौचालय सुविधा:- मंदिर परिसर में पुरुष और महिला दोनों के लिए अलग-अलग शौचालय भी बनाए गए हैं।
पार्किंग इलाका:- बसें, कारें और दोपहिया वाहनों के लिए भी। पर्याप्त पार्किंग जगह बनी हुई हैं।
प्रसाद काउंटर:- मंदिर के बाहर प्रसाद और पूजा सामग्री की दुकानें मौजूद हैं। जहां से पर्यटन (श्रद्धालु) माता के लिए। प्रसाद, फुल, अगरबत्ती, मिठाई, चढ़ावा आदि खरीद सकते हैं।
समय, शुल्क और कब जाएं
तनोट माता मंदिर जाने से पहले। पर्यटन को सही समय और प्रवेश का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि यह भारत पाकिस्तान की सीमा का इलाका है। इसीलिए यहां कुछ विशेष नियम भी लागू किए हुए हैं।
दर्शन का समय
रोजाना दर्शन का समय:- दर्शन का समय सुबह 6:00 बजे से लेकर। दोपहर 12:00 बजे तक रखा गया है। जहां मंदिर हमेशा दर्शन के लिए खुला रहता है।
दोपहर के दर्शन का समय:- दोपहर का समय 2:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक रखा गया है। जहां पर्यटक तुरंत दर्शन कर सकते हैं।
आरती का समय:- रोजाना आरती सुबह 6:30 बजे से लेकर। संध्या की आरती शाम 6:30 बजे तक होती है।
प्रवेश शुल्क
मंदिर प्रवेश शुल्क:- मंदिर में प्रवेश करना पूरी तरह मुफ्त है। यहां कोई टिकट नहीं लगता है।
संग्रहालय प्रवेश शुल्क:- युद्ध संग्रहालय देखने के लिए भी। कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। पर्यटन यह भी मुफ्त में देख सकते है।
फोटोग्राफी लेना:- मंदिर परिसर में फोटो लेना सख्त मना है। किंतु सीमा वाले इलाके में BSF की इजाजत के बाद फोटो ली जा सकती है।
जाने का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च:- यह सबसे अच्छा समय माना जाता है। क्योंकि अक्टूबर से मार्च के महीनों में तापमान 10°C से 25°C के बीच रहता है। और मौसम भी काफी सुहावना रहता है।
नवरात्रि उत्सव:- चैत्र और शारदीय नवरात्रि में यहां विशाल मेला भी लगता है। जिसमें लाखों पर्यटन (श्रद्धालु) आते हैं। हालांकि इस दौरान भीड़ भी बहुत ज्यादा होती है।
मई-जून में परहेज:- राजस्थान की भीषण गर्मी में तापमान 45°C से ऊपर चला जाता है। इसलिए गर्मियों में तनोट माता मंदिर की यात्रा करने से बचना चाहिए।
मानसून में सावधानी:- जुलाई-अगस्त में थार मरुस्थल में रेतीले तूफान और कभी-कभी बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है। जिससे रास्ते बंद भी हो जाते हैं।
भोजन, ठहरने की व्यवस्थाएं
तनोट एक बहुत ही छोटा ओर सीमा के पास बसा हुआ गांव है। इसलिए यहां कोई भी लक्जरी होटल नहीं बने हुए हैं। किंतु यहां छोटे आवास और भोजन की व्यवस्था जरूर देखने मिल जाएंगी।
ठहरने की व्यवस्था
BSF गेस्टहाउस:- BSF के द्वारा चलाए जाना वाला। एक सीमित क्षमता वाला गेस्टहाउस यहां मौजूद है। जिसमें पहले से ही बुकिंग कराना जरूरी होता है।
क्योंकि पहले से गेस्टहाऊस बुकिंग हो सकता है। इसीलिए बुकिंग कराने के लिए, जैसलमेर के BSF कार्यालय से संपर्क करें।
धर्मशाला:- मंदिर ट्रस्ट के द्वारा एक छोटी सी धर्मशाला भी यहां बनाई गई है। जो पर्यटक के लिए बहुत ही सस्ती और सुविधा के साथ है।
जैसलमेर में ठहरें:- ज्यादातर पर्यटक जैसलमेर में रात बिताकर। सुबह जल्दी तनोट मंदिर के लिए रवाना होते हैं। क्योंकि जैसलमेर में एक से ज्यादा होटलें है। और हर कीमत के अनुसार अलग अलग रहने के कमरे मिलते हैं।
कैंप विकल्प:- जैसलमेर के रास्ते में सम सैंड ड्यून्स के पास कई डेजर्ट कैंप (छोटे छोटे घर) हैं। जो पर्यटकों के रुकने के लिए। बहुत ही खास माने जाते हैं।
भोजन की व्यवस्था
मंदिर परिसर के ढाबे:- मंदिर के पास कुछ छोटे ढाबे बने हुए हैं। जहां दाल-बाटी-चूरमा, खिचड़ी और राजस्थानी थाली भी मिलती है। जो स्वादिष्ट और कम कीमत में आसानी से मिल जाती है।
लंगर सेवा:- विशेष धार्मिक अवसरों (नवरात्रि, त्यौहार, विजय दिवस) पर BSF और स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा लंगर खिलाने का कार्यक्रम भी किया जाता है। जिसमें सभी को मुफ्त में भोजन खिलाया जाता है।
पैकड फूड साथ रखें:- यह सीमा के पास का इलाका है। इसलिए यहां आने वाले पर्यटकों को सलाह दी जाती है। कि वे अपने साथ पर्याप्त पानी की बोतलें और हल्का नाश्ता जरूर साथ रखें।
स्थानीय बाजार, पर्यटन खरीदारी वस्तुएं
तनोट मंदिर के आसपास कोई बड़ा बाजार नहीं है। किंतु मंदिर परिसर के आसपास कुछ छोटी दुकानें जरूर बनी हुई हैं। और जैसलमेर जाने वाले रास्ते में भरपूर खरीदारी की जा सकती है।
माता का प्रसाद और चुनरी:- मंदिर के बाहर की दुकानों पर। माता की चुनरी, नारियल, अगरबत्ती और लाल धागा आसानी से मिल जाता है। जहां से श्रद्धालु इन वस्तुओं की खरीददारी कर सकते है।
BSF स्मृति चिह्न:- मंदिर के आसपास की कुछ दुकानों पर। BSF और तनोट माता से संबंधित की-चेन, मैगनेट और पोस्टकार्ड खरीदे जा सकते हैं। जो पर्यटकों के भ्रमण के यादगार के रूप में माने जाते हैं।
राजस्थानी हस्तशिल्प:- जैसलमेर के बाजार में ऊंट चमड़े की जूतियां (मोजड़ी), रंग-बिरंगी बंधेज साड़ियां, लाख की चूड़ियां और पत्थर की नक्काशी वाली वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं।
थार का नमक और मसाले:- स्थानीय नमक, मिर्ची और राजस्थानी पापड़ की खरीददारी करना न भूलें। क्योंकि यह यहां की पहचान की वस्तुएं मानी जाती है।
मोलभाव जरूर करें:- तनोट हो या जैसलमेर यहां के स्थानीय बाजार में खरीददारी करते समय। MRP से ज्यादा कीमत न चुकाएं। क्योंकि यहां मोलभाव करना आम बात मानी जाती है।
स्थानीय जानकारी, पर्यटन सुझाव
पहचान पत्र की जरूरत:- यह एक सीमा के पास का इलाका है। इसलिए यहां जाने से पहले। अपने पास आधार कार्ड, पासपोर्ट या वोटर आईडी जैसा सरकारी पहचान पत्र साथ रखना बहुत ही जरूरी माना जाता है। नहीं तो जरूरत पड़ने पर भारतीय सेना (BSF) आपसे पूछताछ कर सकती हैं।
वाहन की जांच करें:- तनोट माता मंदिर की यात्रा करने से पहले। अपने वाहन में पूरा पेट्रोल/डीजल ज्यादा भरकर साथ रखें। क्योंकि रास्ते में कोई पेट्रोल पंप मौजूद नहीं है। और सीमा के पास के इलाकों में मदद मिलना भी मुश्किल हो जाएगी।
मोबाइल नेटवर्क:- तनोट माता मंदिर के इलाके में। मोबाइल नेटवर्क बहुत ही कमजोर या कभी-कभी बिल्कुल नहीं मिलता है। इसलिए ऑफलाइन नक्शा (Google Maps Offline) डाउनलोड करके अपने साथ रखें।
सूर्यास्त से पहले लौटें:- BSF के नियमों के अनुसार पर्यटकों को सूर्यास्त से पहले मंदिर परिसर को छोड़ना होता है। साथ ही समय का भी खास ध्यान रखें।
लोंगेवाला भी देखें:- तनोट माता के मंदिर से लगभग 60 किलोमिटर पहले। लोंगेवाला युद्ध स्थल रास्ते में बना हुआ है। जहां 1971 के युद्ध में भारत देश की ऐतिहासिक जीत हुई थी। इसे भी अपनी यात्रा में जरूर शामिल करें।
स्थानीय गाइड साथ लें:- जैसलमेर से किसी अनुभवी स्थानीय गाइड (व्यक्ति) को। अपने साथ लाना भी पर्यटकों के लिए अच्छा रहेगा। क्योंकि वह यहां के रास्ते, यहां के नियम और यहां की स्थानीय परंपराओं के बारे में ज्यादा जानते हैं।
सम्मानजनक आचरण:- यह एक पवित्र धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व की जगह मानी जाती है। इसलिए BSF के जवानों का सम्मान करें। और मंदिर की मान मर्यादा को भी बनाए रखें।
यात्रा मार्ग विवरण
सड़क मार्ग यात्रा
तनोट माता के मंदिर तक पहुँचने के लिए। सड़क मार्ग का रास्ता सबसे अच्छा माना जाता है। जहां जैसलमेर से तनोट माता मंदिर की दूरी लगभग 120 किलोमीटर है। जिसे सड़क मार्ग से तय करने में करीब 2.5 से 3 घंटे का समय लग सकता है।
मुख्य रास्ता: NH-11 व राज्य राजमार्ग के द्वारा। जैसलमेर से रामगढ़ से किशनगढ़ से तनोट पहुंचा जा सकता है।
सड़क कैसी है: बीच का रास्ता अच्छी तरह पक्का और एकदम अच्छा है। हालांकि तनोट पहुंचने के 30 किलोमीटर पहले। रेतीले और संकरे रास्ते देखने को मिलते हैं।
जैसलमेर से बस सेवा: जैसलमेर बस स्टैंड से कुछ सीमित सरकारी बस सेवा मौजूद है। किंतु यह हर वक्त तनोट जाने के लिए नहीं चलती है। लेकिन एक बार बस के समय का पता लगा लेना जरूरी होता है।
- पहली बस: RSRTC एक्सप्रेस पहली बस है। जो जैसलमेर से 3:00 बजे तनोट मंदिर के लिए रवाना होती है। जिनका किराया 130 रुपए से 150 रुपए तक होता है।
- दूसरी बस: RSRTC एक्सप्रेस दूसरी बस है। जो जैसलमेर से 4:15 पर तनोट मंदिर के लिए रवाना होती है। जिनका किराया 130 रुपए से 150 रुपए तक होता है।
जैसलमेर से किराया: जैसलमेर से टैक्सी या जीप के द्वारा जाने पर। एक आदमी का किराया लगभग ₹300 से ₹600 तक होता है।
यात्रा का सही समय: सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच। यात्रा करना सबसे अच्छा रहता है। क्योंकि दोपहर के समय में रेगिस्तान की गर्मी बहुत ही तेज हो जाती है।
अतिरिक्त जानकारी: BSF चेकपोस्ट से गुजरना जरूरी होता है। इसलिए हमेशा अपने पास पहचान पत्र (Aadhaar Card या Voter ID) साथ रखें। क्योंकि इनकी जरूरत हमेशा पड़ सकती हैं।
रेलवे मार्ग यात्रा
तनोट माता मंदिर तक जाने के लिए। तनोट के खुद का कोई रेल स्टेशन नहीं बना हुआ है। परंतु यहां का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन। जैसलमेर रेलवे स्टेशन मौजूद है।
जो मंदिर से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां हमेशा जयपुर, जोधपुर, दिल्ली और अहमदाबाद से जैसलमेर के लिए। हर रोज ट्रेन सेवाएँ चलती रहती हैं। जिनके बाद आगे का सफर सड़क मार्ग से करना होता है।
प्रमुख ट्रेनें:
- दिल्ली से जैसलमेर: रणकपुर एक्सप्रेस (14707)
- जयपुर से जैसलमेर: जैसलमेर एक्सप्रेस (14659)
- जोधपुर से जैसलमेर: जोधपुर-जैसलमेर इंटरसिटी (54801)
किराया: स्लीपर क्लास में ₹200–₹500 और AC में ₹600–₹1200 (दूरी अनुसार)।
समय: दिल्ली से जैसलमेर पहुँचने में लगभग 18–20 घंटे लगते हैं।
स्टेशन से मंदिर: जैसलमेर स्टेशन से टैक्सी, जीप या शेयर वाहन द्वारा मंदिर तक पहुँचा जा सकता है।
बुकिंग: IRCTC की वेबसाइट irctc.co.in से टिकट बुकिंग करें।
हवाई मार्ग यात्रा
तनोट माता मंदिर के आसपास कोई हवाई अड्डा नहीं है। हालांकि जैसलमेर एयरपोर्ट (JSA) यहाँ का सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है।
जो मंदिर से लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह हवाई अड्डा मुख्य रूप से सेना के इस्तेमाल में किया जाता है। इसलिए नागरिकों की उड़ानें कम मात्रा में भी मिल जाती हैं।
वैकल्पिक हवाई अड्डा: दूसरा सबसे नजदीकी जोधपुर एयरपोर्ट (JDH) है। जो तनोट से लगभग 330 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। और यहाँ से दिल्ली, मुंबई, जयपुर के लिए। हर वक्त उड़ानें आसानी से मिल जाती हैं।
किराया: दिल्ली से जोधपुर का हवाई किराया ₹2,500–₹6,000 (सीजन के अनुसार) होता है।
जोधपुर से तनोट: जोधपुर एयरपोर्ट से जैसलमेर होते हुए। सीधे तनोट जाने के लिए। सड़क मार्ग से 5–6 घंटों का समय लगता हैं।
एयरपोर्ट के लिए बुकिंग: तनोट माता मंदिर आने या वापिस जाने के लिए। MakeMyTrip या IndiGo Airlines से उड़ान बुक भी की जा सकती है।
सुझाव: सर्दियों (अक्टूबर–मार्च) में तनोट मंदिर के लिए। जैसलमेर या जोधपुर की हवाई यात्रा करना। अधिक आरामदायक और किफायती मानी जाती है।
खुद की गाड़ी से यात्रा
खुद की गाड़ी से तनोट माता मंदिर की यात्रा करना। सबसे स्वतंत्र और सुविधाजनक मानी जाती है। क्योंकि इससे रास्ते में रुकना ओर घूमना हम खुद तय करते है।
जैसलमेर से तनोट का पूरा रास्ता Google Maps पर भी देखा जा सकता है। जिसे देखने के लिए पर्यटक maps.google.com पर जाकर। सर्च tanot mata temple करके देख सकते है।
तनोट की दूरी व समय: जैसलमेर से तनोट मंदिर 120 किलोमीटर स्थित है। जिसको 4 पहिया वाहन से तय करने में। लगभग 2.5–3 घंटे का समय लग सकता है।
वाहन कैसी हो: मंदिर जाने के लिए। SUV या 4WD वाहन लेना अच्छा रहता है। क्योंकि अंतिम हिस्से तक रेतीली सड़क बनी हुई है।
ईंधन: सिर्फ रामगढ़ में ही पेट्रोल पंप मौजूद है। इसलिए गाड़ी में हमेशा पेट्रोल भरकर रखे। क्योंकि तनोट मंदिर के आसपास कोई पैट्रोल पंप नहीं बना हुआ है।
BSF अनुमति: चेकपोस्ट पर भारतीय सेना (BSF) के जवान। गाड़ी की जाँच पड़ताल कर सकते है। इसलिए गाड़ी के दस्तावेज़ (RC, Insurance) अपने साथ लेकर जाए।
यात्रा करने का सही समय: यहां यात्रा करने का अक्टूबर से मार्च के बीच का मौसम। सबसे अच्छा माना जाता है।
रेंट की गाड़ी से यात्रा
जो पर्यटक अपनी खुद की गाड़ी से। तनोट मंदिर नहीं जाना चाहते है। उनके लिए जैसलमेर में कई विश्वसनीय कैब और किराए की जीप लेने की सुविधा मौजूद हैं। जिनको लेकर वह आराम से तनोट माता मंदिर के लिए घूमकर आ सकते हैं।
किराया दर:
- किराए पर जीप (डबल राउंड के लिए): जिप में जैसलमेर से तनोट मंदिर ओर तनोट मंदिर से फिर से जैसलमेर के लिए किराया। ₹2,500 से ₹4,000 (पूरी गाड़ी) समेत लिया जाता है।
- किराए पर शेयर टैक्सी: शेयर टैक्सी में जैसलमेर से तनोट मंदिर ओर तनोट मंदिर से फिर से जैसलमेर के लिए किराया। लगभग ₹300 से ₹600 तक एक व्यक्ति के हिसाब से लिया जाता है।
किराए पर बाइक: जैसलमेर में 150cc से 350cc तक बाइक का किराया। एक दिन के लिए ₹500 से ₹1,200 तक लिया जाता है। जो युवा पर्यटकों के लिए बहुत ही खास मानी जाती है।
टूर पैकेज: कई स्थानीय ट्रैवल एजेंसियाँ “जैसलमेर से लोंगेवाला से सीधे तनोट डे टूर” का किराया। लगभग ₹1,500 से ₹2,500 एक व्यक्ति के हिसाब से उपलब्ध कराती हैं।
ऑनलाइन बुकिंग: Thrillophilia और Viator जैसी वेबसाइटों पर। रेंटल (किराए पर गाड़ी) व टूर पैकेज भी देखे जा सकते हैं।
सुझाव: रात के वक्त यहां की यात्रा करने से बचना चाहिए। क्योंकि तनोट मंदिर एक सीमा के नजदीक होने के कारण। अंधेरे में यहां रास्ता भटकने का खतरा रह सकता है।
निष्कर्ष
तनोट माता का मंदिर राजस्थान के जैसलमेर जिले के भारत-पाक सीमा के पास स्थित है। जहां तनोट माता का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं है।
बल्कि यह भारत की चमत्कार की आस्था, सैनिकों की वीरता और भारत के इतिहास का जीवंत प्रमाण है। क्योंकि इस मंदिर में आज भी हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को।
हर वर्ष अपनी ओर आकर्षित करता है। क्योंकि यहाँ माँ की शक्ति का अद्भुत प्रमाण 1965 के भारत-पाक युद्ध में देखने को मिला था।
हालांकि युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने। इस मंदिर के आसपास 3,000 से अधिक बम गिराए थे। किंतु माँ तनोट की कृपा से एक भी बम मंदिर परिसर में नहीं फटा। जो आज भी विज्ञान के लिए एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है।
जिससे यह स्थल श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बन गया है। यही कारण है कि BSF (सीमा सुरक्षा बल) इस मंदिर की देखभाल स्वयं करता है। और यहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना भी की जाती है।
यह स्थान जैसलमेर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल है। जहां हर साल दूर-दूर से हजारों पर्यटक और श्रद्धालु माता के दर्शन करने के लिए आते यहां हैं। जिससे स्थानीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है।
तनोट माता मंदिर राष्ट्रीय एकता, सैनिक समर्पण और दैवीय शक्ति का अनूठा संगम है। जो इसे भारत के सबसे विशेष तीर्थ स्थलों में से एक बनाता है।
12 अक्सर पूछे जानें वाले प्रश्न
प्रश्न 1: तनोट माता मंदिर कहाँ पर है?
उत्तर: तनोट माता का मंदिर राजस्थान के जैसलमेर से लगभग 120 किलोमीटर दूर थार रेगिस्तान में, रामगढ़ के पास स्थित है।
प्रश्न 2: तनोट माता मंदिर का इतिहास क्या है?
उत्तर: यह मंदिर बहुत पुराना माना जाता है।(9वीं-10वीं शताब्दी का)।
हालांकि 1965 और 1971 की लड़ाई के बाद। इसे “विजय स्मारक” के नाम से जाना गया।
प्रश्न 3: तनोट माता मंदिर में दर्शन करने का समय और पैसे कितने लगते हैं?
उत्तर: सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। दर्शन करने के लिए कोई पैसा नहीं लगता है। लेकिन पहचान पत्र (आईडी) दिखाना ज़रूरी है।
प्रश्न 4: तनोट माता मंदिर जाने के लिए परमिशन (अनुमति) चाहिए?
उत्तर: हाँ, बीएसएफ के ‘भैरों पोस्ट’ जाने के लिए यहाँ से पास लेना होता है। इसके लिए आधार कार्ड या पासपोर्ट दिखाना पड़ेगा।
प्रश्न 5: तनोट माता मंदिर में क्या-क्या देखने को मिलेगा?
उत्तर: यहाँ विजय स्तंभ, युद्ध संग्रहालय (जिसमें बेकार गोले और टैंक के निशान हैं), पुराने शिलालेख और देवी की मूर्तियाँ भी हैं।
प्रश्न 6: तनोट माता मंदिर में दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय कब है?
उत्तर: सुबह 6 से 8 बजे या शाम 4 से 6 बजे सबसे अच्छे हैं। दिन में बहुत गर्मी होती है।
लगभग 45°C तक हो सकती है। इसलिए ये समय ज़्यादा आरामदायक होते हैं।
प्रश्न 7: तनोट माता मंदिर में क्या-क्या सुविधाएं हैं?
उत्तर: यहाँ पीने के लिए साफ़ पानी, साफ़ शौचालय, पार्किंग, आराम करने की जगह, ठहरने की व्यवस्था ओर BSF कैंटीन हैं। यह सब पर्यटन के लिए बहुत उपयोगी हैं।
प्रश्न 8: तनोट माता मंदिर कैसे पहुंचे?
उत्तर: खुद की गाड़ी से: जैसलमेर से रामगढ़ होते हुए तनोट जा सकते हैं। जिसे तय करने में लगभग 2:00 से 2.30 घंटे का समय लगता है।
बस से: RSRTC की बसें हर रोज़ तनोट मंदिर के लिए चलती हैं। जिसका किराया ₹180-₹200 तक होता है।
प्रश्न 9: तनोट माता मंदिर में मोबाइल नेटवर्क कैसा है?
उत्तर: तनोट माता मंदिर से पहले 2G/3G सिग्नल मिल जाता है।
हालांकि तनोट मंदिर रेत वाले इलाकों में होने के कारण। यहां कुछ हद तक नेटवर्क न मिलने की समस्या आ सकती है।
प्रश्न 10: क्या तनोट माता के मंदिर में रुकने की जगह है?
उत्तर: मंदिर के पास में रामगढ़ और जैसलमेर में होटल और गेस्टहाउस हैं।
मंदिर में ज़्यादातर लोग दिन में ही घूमना पसंद करते हैं। लेकिन मंदिर के आसपास भी ठहरने की व्यवस्था है।
प्रश्न 11: तनोट माता मंदिर की सुरक्षा नियम क्या हैं?
उत्तर: यहाँ BSF हमेशा तैनात रहती है। इसलिए, फोटो और वीडियो बनाते समय स्टील की चीजों से बचना होगा। हालांकि कभी कभी परमिट दिखाना पड़ जाता है।
प्रश्न 12: तनोट माता मंदिर में हर साल होने वाले खास त्यौहार कौन से हैं?
उत्तर: 16 दिसंबर (विजय दिवस): इस दिन खास पूजा होती है और युद्ध के शहीदों को याद किया जाता है।
नवरात्रि: देवी माँ की पूजा और कई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। जिनमें यहां आने वाले कई पर्यटक शामिल भी होते है।
